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कमानीदार रास्ते पर तहखाने में आबाद सस्ता शराबघर

एम आई रोड से सिन्धी केम्प की ओर जानेवाले कमानीदार रास्ते पर तहखाने में आबाद सस्ते शराबघर की डिस्प्ले केबिन पर अँधेरा पसरा था. सब शराबें एक ही पारदर्शी स्याह आवरण में ढकी थी. जादू तमाम एक रंग. खाली पड़े सोफों पर किसी बीते दिन के धुंए की तलछट पर नई परत रोपते हुए मेरे हमपेशा आदमी ने कहा- सब चालू है. अपने निजी स्वार्थों पर कायदे और काम का मुलम्मा चढ़ाए हुए ज़माना. 

आरडी मेरे पास के सोफे पर बैठे थे. नब्बे के दशक की शुरुआत में रेगिस्तान में सरकारी दफ्तर की कॉलोनी में शाम होने से पहले रियाया ताजपोशी के इंतज़ार में बेसब्र हो उठती थी. पानी की कमी से जूझ रहे कस्बे पर रहम खाकर आरडी कहते नहालिया जाता तो सुकून आता मगर हमें क्या है. जैसे औरों का जीना वैसे अपने भी कोई कमी नहीं. शाम अचानक टूट पड़ती. व्हिस्की की बू पसीने की बू को रिप्लेस कर देती. सिगरेट के धुंए से माहौल के नमकीन स्वाद में थोडा कैसलापन भी घुल जाता. ठहाके, लतीफे, बेपरवाही और बेख़याली जिंदगी के सभी दुखों को बुझा देती. आरडी जो कुछ कहते वह अक्सर किसी वेद वाक्य की तरह फूटता. पहली बार सुना गया. अंतिम बार तक याद रखने लायक. 

आज दोपहर फिर उसी सस्ते शराबघर में मैंने आरडी के कंधे को छूकर देखा. दिल के रास्ते कई जगह ब्लोक हो गए थे और कुछ चीरफाड़ करके रास्ता बनाने वाले सर्जनों ने एक आध बायपास बना कर दिल के काम करते जाने को रास्ता बना दिया था. मैंने कहा- बीस एक साल बाद आपको छूकर देखते हुए कितना अच्छा लग रहा है. ज़िन्दगी भी क्या कमाल चीज़ है. कहीं चलती जाती है और कहीं डेड एंड. मालूम हुआ कि वह दढ़ियल राम कंवार कुछ साल पहले रुखसत हो गया. मैंने देखा कि कुछ सीढियां उपर की ओर जा रही थी. रतनू साहब कहते हैं ये रास्ता आकाशवाणी को जाता है. इससे जाने पर हमें उस कमानीदार रास्ते से जाने की ज़रूरत नहीं होती. हम यहीं से वापस जायेंगे. अचानक लगा कि कहूं राम कंवार ने और ज्यादा छोटा रास्ता चुन लिया. मगर वह जा चुका था. रेगिस्तान के उस कस्बे में बिताये उसके दिनों में एक साथी था दीपक सिंह. बहुत साल पहले उसने और भी छोटा रास्ता खुद चुन लिया था. 

जैसे हम बीयर पीते जाते हैं क्या वैसे ही कोई हमारी ज़िन्दगी को पीता जाता है? 

आज अचानक एक आदमी की नाम पट्टिका देखी. चड्ढा जी कहते थे- कि ईश्वर हमें इतनी ही अक्ल दे कि हम छोटी चीज़ों को बड़ा मान कर सीने से लगा लें और जीते जाएँ. जैसे वह आदमी कहता था मैंने कभी आकाशवाणी केंद्र में किसी स्वतंत्रता या गणतंत्र दिवस के अवसर पर एक बार झंडा फहराने का सौभाग्य पाया था और उसी तस्वीर से उड़कर असीम आल्हाद बरसता रहता है. बस इतनी ही अक्ल. जैसे किसी ने कमा लिया नाम, किसी ने कमा लिए हों कुछ करोड़ रुपये और वह इस कमाई पर मुग्ध होकर जी सके उम्र भर. 

आरडी की बीस एमएल आहिस्ता पैंदे की ओर सरकती है. दिल नाज़ुक है बहुत और ज़ख़्मी भी है. जीने के लिए कितनी ही कतरनों, कितनी ही सिलाइयों से गुज़रा है. मैं कहता हूँ- आरडी सर उन सालों मेरी उम्र थी पच्चीस साल और आप थे पैंतीस के. उन सालों के क्या कहने. वे जो रेगिस्तान की सूनी सड़कों पर आधीरात बाद कोई खुले शटर वाली दुकान को खोजते हुए स्कूटर की दो सीट पर बैठे हुए तीन लोग बिता देते थे. 

आरडी मुस्कुराते हैं. उनकी मुस्कान खिली रहती है. धुंए के बाद बची राख मौका पाकर झड़ती जाती है.

सुबह मैं एक अद्भुत किस्सागो से मिला. वे यूं तो बड़े निदेशक हैं. उससे बड़े प्रोग्रेमर हैं. लेकिन मेरे लिए इन सबसे बड़े किस्सागो हैं. उनके पास हर बात को कहने का सलीका है. मुझे आज उन्होंने व्हाट्स एप का किस्सा सुनाया. ‘देखो, ये जो चीज़ है.’ वह एक मोबाइल फोन था. काफी स्मार्ट रहा होगा. ये मैंने उसकी सेहत को देखकर अंदाज लगाया. उस फोन के आगमन से आरम्भ हुआ किस्सा अपनी पूरी रचनात्मकता से मुझे उन्हीं दिनों में ले गया, जब आरसी का अद्धा और गुटखा पीक की हल्दी घाटी के किस्से सुने थे. जब मैंने छिपकलियों और सायनाइड का किस्सा सुना था. कथा की प्रस्तावना से लेकर उपसंहार तक श्रोता विस्मय से भरा मामूली चीज़ों के खास होने के बिम्बों को सम्मोहन में बंधा हुआ सुनता जाता था. 

उनकी दो लम्बी कहानियां थी. जिनको लघु उपन्यास कहा जाता है. एक निर्णय रुका हुआ और दूसरी थी और अंत यही है. उन कहानियों का शिल्प रोज़मर्रा की बातचीत के सरल लेकिन अनूठेपन को फिर से एक कामयाब शिल्प साबित करता है. आज इसी किस्सागो को महात्मा गाँधी की बड़ी और उनके दायें बाएं प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की छोटी तस्वीरों के नीचे बैठे बात करते पाया कि असल सुख कहानी है. ये बड़ी कुर्सी शायद उतनी आरामदेह नहीं है, जितना की जोधपुर आकाशवाणी के ड्यूटी रूम का सोफा. जितना कि नागौर या बाड़मेर आकाशवाणी में ड्यूटी रूम में रखी कुर्सी. क्या हम कुछ खास किस्म के सुखों के लिए बने होते हैं? अचानक याद आया कि मेरी जितनी मुलाकातें हुई हरबार लोक संगीत और उसके आर्काइव की बात ज़रूर हुई. “मैं आ रहा हूँ. मेरा मन है. मैं ये ज़रूर करूँगा.” 

एमआई रोड पर रेडियो के दफ्तर के प्रवेशद्वार पर खड़े हुए अनेक कुलीग बाद बरसों के मुझसे इस तरह मिलते हैं. जैसे कोई विभाजन हमें बाँट गया था. हम किन्ही अपरिहार्य कारणों से बिछड़ गए थे. आज अद्भुत कुम्भ संयोग हुआ है. 

क्या आपने कभी सोचा है कि जब जिंदगी गुज़र चुकी हो तब भी आप किसी को किडनैप करने का प्लान बनायें. आरडी हिचके कि न न ऐसा न करो. रतनू सर कहें कि हाँ कोई मेन्युअल थोड़े ही है. आनंद की कश्ती कभी भी सूखे किनारों से परे किसी गीले अहसास में धकेली जा सकती है. 

ठीक है, जिंदगी मुबारक. 

और इस पोस्ट के लिए कोई तस्वीर मेरे पास नहीं है. दोस्तों से मिलने गया तो फोन घर छोड़ दिया था. 

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