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अपनी अँगुलियों से कह दो

मौसम किसी उदास परिंदे के बदन सा था. थकन से भरा और अनमना. 

विचित्र छायाओं के स्याह-सुफेद चित्र बनाते हुए बादल ठहर-ठहर कर किसी यात्रा में फिर शामिल हो जाते. हवा ख़याल से अचानक बाहर आये बच्चे की तरह टोह लेकर फिर से अपने आप में गुम हुई जाती थी. तन्हाई की स्याही से बदन के कोरेपन पर शाम लिख रही थी- कोई तुमसा नहीं होगा प्यारे. तुम अकेले ही थे. तुमने अपने असल अकेलेपन से घबराकर सम्बन्धों का चुनाव किया. ये भी हो सकता है कि वह एक चुनाव न होकर किसी हड़बड़ी में कहीं छुप जाना भर हो. घर के छज्जे के नीचे शहतीर पर बैठी नन्हीं चिड़िया की तरह ये चुनाव और बाध्यता में से कुछ भी हो सकता है. हो सकता है कि ये दोनों न हों. 

ज़िदगी ने जो लिखा है उसका पाठ सदा अधूरा था. अधूरा ही रहे कि जिस दिन पढ़ लिया गया उस दिन एक विस्तृत और रंगहीन दृश्य क़ैद कर लेगा. जहाँ कोई अनुभूति न होगी. जहाँ कोई आवाज़. कोई परछाई कोई भय कोई चाहना न बुन सकेगी.
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हर किसी के जीवन में कितने ही द्वार खुले हैं. कितनी ही चीज़ों का आकर्षण-विकर्षण बसा हुआ है. न वह तुम्हें बताएगा, न वह सब जानकार कुछ लाभ होगा. कुछ भी कहीं क्यों है? ये जानना एक मीठी चाहत ज़रूर है मगर हर हासिल के आगे एक नयी तकलीफ है. किसी और सिम्त बढ़ जाने, कुछ और जान लेने की. 

मैं एक कोने में रखता हूँ अपना प्याला जिसमें जिंदगी नहीं वरन एक बहाना भरा है. बहाना वक़्त के गुज़र जाने के इंतज़ार का. 
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हल्की नीली रोशनी के कालीन पर बनती हुई आदमकद छायाओं के बेढब पैबंद ठहरे हुए हैं। लोग बार चेयर पर सहारे को पंजे रखे ज़रा सीधे और बहुत से गुम बैठे, उदासियों को तरल में घोलते चुप पी रहे हैं। इत्र की ख़ुशबू में घुला हुआ धुंआ और नीम रोशनी में भी नहीं छुप पाता लोगों की बेख़याली का अक्स।

ड्रेस अप होकर, कोने के सोफ़ा पर बैठा सोचता हूँ कि क्या पहले खत्म हो जाये तो अच्छा. 
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उस रात बहुत देर हो गयी थी।
एक पार्टी में बच्चे लोकसंगीत सुन रहे थे। मैं लॉन में एक मोढ़े पर बैठा था। अचानक उसने कहा- सर वन मोर। मैंने कहा- नो थैंक्यू। उसने जाने क्या सोच कर पूछा- आर यू वर्किंग फॉर केयर्न। मैंने कहा- नो आई वर्क्स फॉर आल इण्डिया रेडियो। उसकी शांत आँखों में पहाड़ की किसी लड़की की सूरत कौंधी होगी। उसने कहा- सर माई फेवरिट सॉन्ग इज लग जा गले के फिर ये हंसी रात हो न हो।
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उसकी वर्दी अच्छी है। उसकी वर्दी से ज्यादा अच्छी उसकी पहाड़ी आँखें हैं। इससे भी अच्छा है कि वह कई साल से रेगिस्तान में है। उसका ये कहना सबसे अच्छा लगता है कि वह यहाँ खुश है। शायद पहाड़ के लड़के भी एक दिन जान जाते हैं कि रेगिस्तान के दुःख पहाड़ों से अलग नहीं है।

वह ज़रा झुका हुआ था, जब उसने कहा- सर, नाइस टू सी यू। मैंने समझा उसने पूछा है- ब्लैक डॉग ऐंड क्लासिक अल्ट्रा माइल्ड।
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उल्फ़त,
अपनी कत्थई अँगुलियों से कह दो
कि वे ज़रा मेरे नाम को छू लें।
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प्रेम कल्पना में भव्य
और असल में
जीने की साधारण ज़रूरत होता है।
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भरे प्यालों में
खत्म होने का इन्तज़ार है,
खाली प्यालों में भरे जाने का।
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हमेशा सुनने का मन रखना।
इससे बड़ा उपकार कुछ नहीं है।
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[Painting by Johnny Morant]

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