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ये भी तो किसने सोचा था कि


एक ठहरी हुई सांस 

बेचैन निग़ाह में उदासी घोलती है.

बारिश नहीं थी मगर थी. एक आवाज़ ने बुनी बारिश. एक सूखी रात का ये पहला पहर था. बंद आँखों में कहीं दूर हिलते हुए होठ खिले थे कि कोई संगीतकार, साजिंदों को अपनी छड़ी से प्रवाहित कर रहा था. मुझे उसे कहना था कि सांस लेने में कठिनाई है. मगर उसकी आवाज़ दवा थी. एक ठहर के बाद प्रतिध्वनी गूंजती. क्या बारिश रुक गयी है? कोई जवाब आता. तीन बार. वह जवाब मुझे बाहर बारिश की ओर खींच ले जाता. उसकी आवाज़ में बारिशें बुनने का हुनर था. 

क्या हम पहले कहीं मिले थे? अगर नहीं तो फिर ऐसा क्यों लगता है कि तुम बिन कुछ नहीं. बचपन में पढ़ी प्रेम कहानियों से ऊब होती थी. ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई दो, एक होकर अंतिम विदा का गीत गाकर चुप हो जाते हैं. बचपन में रूह का नाम न सुना था. तब सिर्फ प्रेतों के किस्से थे. शाम के धुंधलके में बाहर जाना निषेध था. ये प्रेतों का समय था. ये भय और जिज्ञासा के मारक मिलन का समय था. 

काश, बचपन में रूह का कोई किस्सा सुना होता. रूह के मिलने का समय मालूम होता. यकीनन मैं उस समय को अपने भटकने के हिस्से में जमा रखता. 

कि कहीं रूह मिले. 

तो क्या तुम रूह हो? बदन तो कहीं पर भी मिल जाता है. किसी न किसी तरह. किसी लम्बे छोटे इंतज़ार के बाद. बदन उदास नज़र के रंग में घुले अनमने मौसम को विदा नहीं कह सकता. उसे रूह ही बुहार सकती है. तुम्हें छूकर, तुम्हें छूने के अहसास से गुजरकर, तुम्हें बेहिसाब याद करके लगता है कि रेत के बीच पड़े हुए सीपियों के खोल में हवा कुछ लिख रही है. ये हवा है या तुम्हारी रूह है. 

एक कोड़ा बरसता है. कि कोई है, मुझे जाना है, तुम भी जाओ. अब न होगा. विदा, विदा, विदा. इस कोड़े की तड़प में याद की बही से गर्द उड़ती है. ऐसा पहली बार कब कहा था. ये विदूषक की हंसी के भीतर का कड़वा अनुभव है. ये नकार के खोल में लिपटी हुई जाने की चाहना है. ये सच है मगर सच की तरह कहा नहीं गया है.

मुमकिन है
हम इस तरह बिछड़ जायेंगे
कि कभी न मिलें.
ये भी तो किसने सोचा था
कि हम मिलेंगे. 

[Painting Image Courtesy ; Fabio Cembranelli ]

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