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वादे की टूटी हुई लकीर पर

काश बालकनी में उग आती
एक बेरी.

कोई शाख झांकती खिड़की से अंदर
कोई काँटा फंस जाता स्वेटर की बाह में.

अचानक लगता कि तुम आ गए.
* * *

उलझे होते काँटों में
और पीड़ा भरी होती पोर-पोर में.

मगर काश हम होते.
* * *

आंधियां आकर उड़ा ले जाती है गर्द
इंतज़ार आकर ढक देता है गर्द से.

तुम्हारे बिना ज़िन्दगी
आसान है या मुश्किल, कहना कठिन है.
* * *

एक तड़प सी बची है
दो धडकनों के बीच.

एक ज़िन्दगी थी सो तुम्हारे साथ चली गयी.
* * *

साँझ के झुटपुटे में
आती है उडती हुई चिड़ियाँ
दौड़ते हुए खो जाते हैं खरगोश.

रात की मुंडेर पर बैठा मैं
भर लेता हूँ दो कासे.

एक मज़बूरी से दूजा इंतज़ार से.
* * *

जैकेट की जेब के अन्दर की तरफ
छुपा लेता हूँ व्हिस्की भरा गिलास.

जैसे सहेज रहा होऊं
हताशा में उदासी
नाकामी में इंतज़ार.
* * *

रेत के धोरे की किनार पर
नदी किनारे के किसी घाट की आखिरी सीढ़ी पर
पहाड़ की तलहटी के किसी पत्थर पर बैठे हुए
आँख में एक आंसू था मगर लुढ़क न सका.

ज़िन्दगी इसके सिवा तुमसे कोई शिकवा नहीं
कि वो यूं भी न मेरा था, न वो हो सकता है.
* * *

परित्यक्त किले की
दीवार से झांक रही थी दरारें.

जाने क्यों मुझे मेरा होना याद आया.
* * *

वे गिरफ़्तार थे
एक-दूजे की बाहों में
जैसे पसरी हुई हो रेत, सूने आँगन में.


वे उलझे थे, बेरी के काँटों में
किसी पुराने अख़बार की तरह.

अब जब
कई बार मैं पी लेता हूँ दो पैग
मुझे ख़ुशी होती है, कि वे थे.
* * *

तय होनी चाहिए कोई तारीख
हर बरबादी की.

ये बहुत बुरा होता है
कि 
अचानक कोई आ जाये ज़िंदगी में. 
* * *

कभी कभी
मैं कर रहा होता हूँ दस्तखत
कि अब कुछ नहीं चाहिए.

कभी-कभी
मैं स्थगित कर देता हूँ मृत्यु
कि शायद अब भी
तुम कुछ कहना चाहते हो मुझको.
* * *

आखिरी बेवजह की बात में
मैं तुम्हें करना चाहता हूँ एक मेसेज.

मगर मैं जिसके लिए हूँ
उससे किया वादा नहीं तोडूंगा.

दुआ कर कि एक आखिरी नींद आये.
* * *

सुबह दूधिया है. 
कोहरा दीवारों, छतों, मेहराबों और रास्तों को चूमता हुआ ठहर गया है. दूर खड़े पहाड़ों से एक शांति की धुन आती है. आँखों के किनारों पर सुरमेदानी से आई ठंडी ताज़ा लकीरें रखीं हैं. सलेटी रंग के टी पर सलवटें नहीं हैं. रात किस तरह सोये थे, रात कहाँ गुम थे, रात तुमने कोई करवट ही न ली या ये बात कुछ और है. कच्चे हरे बेरों से भरी है बेरी. कहीं बोर की पीली गुच्छियाँ हैं. गिलहरियों ने अपनी सुबह की दावत शुरू कर ली है. मैं अपनी हथेली को खुला रखता हूँ. इस पर ठण्ड उतर रही है. ठण्ड दिखती नहीं, महसूस होती है. जैसे कोई होता है मगर दीखता नहीं. जैसे बातें बेवजह चली आती हैं ज़िन्दगी में. जैसे एक वादे की टूटी हुई लकीर पर खड़ी होती है कोई अजनबी परछाई. जी चाहता है इस टूटन में खुद को भर दूं और वादा बचा लूं. जी होता है शैतान का आह्वान करूँ, बस जाओ हर कहीं. रहो मेरे आस पास कि मुझे कोई दुःख दुःख न लगे, प्रतीक्षा इतनी आसान हो जाये जैसे पत्थर पर बरसते रुई के फ़ाहे. एक सख्त मन हो जो न याद करे कुछ. मगर मैं इन चाहनाओं पर आमीन कहे बिना उठ जाता हूँ. मैं जाता हूँ महबूब की याद के रास्ते. आहिस्ता और थका हुआ.

[Painting : Tsuyoshi Imamura]

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
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नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

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* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
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