An illegally produced distilled beverage.


June 19, 2015

कि कुछ नहीं था, न कुछ रहेगा.

उस वक़्त परछाइयाँ ज्यादा लम्बी न थी. शाम मगर एक बेहद खूबसूरत रंग में सड़कों, दरख्तों, मकानों की छतों पर उतर आई थी. इस्कॉन मंदिर से हरे रामा हरे कृष्णा के स्वर बिखरते हुए दूर दूर तक फ़ैल रहे थे. धनाढ्य भक्तों की महंगी कारों का आना अभी शुरू न हुआ था. घर की बालकनी तक आते कृष्णा-कृष्णा, रामा-रामा के सुरीले लयबद्ध पाठ को सुनते हुए मुझे लगा कि वे अभी आ जायेंगे. नयेपन की आभा से भरे हुए. सुगन्धित वस्त्र पहने हुए उन देसी गोरे लोगों की आँखों में चमक भर आएगी. वे कार के डैशबोर्ड पर रखे पीले और गुलाबी फूलों की मादक गंध के ऊपर से शीशे के पार खड़े देव को हाथ जोड़कर ध्यानमग्न हो जायेंगे. छठे छठे माले के घर की बालकनी को लोहे के जाल से ढका हुआ है. उसी जाली को थामे हुए अंगुलियाँ चुप उलझी रहती हैं. हरे रामा हरे कृष्णा हवा के झोंकों के साथ कहीं उड़ जाते हैं. स्मृति में कुमार गंधर्व की आवाज़ में नियत अंतराल पर प्रवाहपूर्ण किन्तु साधना की उच्चतम स्थिरता से भरे सुर छूकर गुज़रते हैं. उड़ जायेगा हंस अकेला, जगदर्शन का मेला... 

देखो केसी! 

वह क्या रंग है? ये इतना सुन्दर कोलाज किसने रचा है? ख़यालों के बेतरतीब सिलसिले में लम्बी सड़क से होता हुआ कोई दाखिल हो जाता है. शाम है. इन छुट्टियों की आखिरी सुकून वाली शाम. बालकनी में बेमक़सद खड़े हुए सड़क के किनारों पर अविचल खड़े दरख्तों की तस्वीर जहाँ तक देखी जा सके वहां तक देखते हुए. सड़क पर एक धुंधला सा रंग करीब आता जाता है. धुंधलेपन से पहले स्याह रंग दिखाई पड़ता है फिर करीब आने पर चमकता हुआ सलेटी रंग. दोनों रंगों का मेल कितना सम्मोहक है. सम्मोहक होने से आगे जादुई होने तक जाता हुआ. काला और सलेटी. 

दो किताबें बालकनी के कोने में स्टूल पर पड़ी हुईं. मोपासा का फ़्रांस. घास, नदी का किनारा, टूटी छत वाली बिसरा दी गयी झोंपड़ी, परिंदे, नाव, मछलियाँ, चुप्पी और एक बारूद से भरी बन्दूक. ये सब मेरे पास बैठे हुए, उस रंगों के कोलाज को देखते रहते हैं. मैं पूछता हूँ- ये काले और सलेटी रंग का कोलाज जो इधर बढ़ा आ रहा है अगर कोई परिंदा होता तो क्या तुम मार गिराते? बन्दूक क्या तुम्हारी नाल इतनी ही सीधी रहती. अँगुलियों क्या तुम दबा देती ट्रिगर? आह जिस जादू का अभी आग़ाज़ हुआ है, क्या वह यहीं खत्म हो सकता था? 

अचानक मन पर उदासी आती है. क्या-क्या न हुआ खत्म. 

सड़क के बाएं छोर पर दुकानों की लम्बी कतार है. ऐसी दुकानें जो अब तक कभी खुली ही नहीं. जो भविष्य में खोली जाएगी. जिन पर दुकानदार होंगे, ग्राहक होंगे और सौदे होंगे. अभी वहां धूल बुहार कर एक लड़का पानी छिड़क गया है. नए ज़माने के सबसे बड़े मुनाफे वाले ज़मीनों के कारोबार के सौदागर शाम भर कुर्सियां लगाये बैठे रहेंगे और फिर अपनी बड़ी कारों में सड़क पार चले जायेंगे. उन्हीं खाली पड़ी कुर्सियों से पहले एक कच्चा सा पेड़ है. उतना ही ऊँचा जितना कि पानीपूरी बेचने वाले का ठेला. एक दिन जब ये बहुत बड़ा हो जायेगा तब इस पेड़ के नीचे अनेक चीज़ें समा जाएगी. जैसे उम्र बढ़ने के साथ दुखों को सहने की, उन्हें अपने पास बसाये रखने की जगह बढती जाती है. 

मन न रफूगर हुआ, न कबाड़ी. जो ख़राब हुआ, जो नाकाम हुआ, जो बोझ हुआ उसे उसी हाल में रहने दिया. न ठीक किया न बीना. मालूम हुआ कि अभी जो मंज़र है, ये अगले पल न होगा. तो क्या करेंगे इसे यहीं रोक कर. जाने दो. इसी सोच में जब मन उकताया तो उसे कहा- उकताए रहो. जब ख़राब हुआ तो कहा- ख़राब रहो. मन टूट गया तो कहा- पड़े रहो टूटे हुए मिट्टी के बर्तन की तरह और एक दिन पूरा मिट्टी हो जाना. 

जून का आधा महीना बीत चुका है. मौसम में चुप्पी है. उमस है. 

अभी बारिश हो रही होती तो सड़क दूर तक भीग जाती. ज़मीन नया रंग पहन लेती. मौसम ठंडी नमी से भर जाता. तपता हुआ लोहा ठंड से भर उठता. कुछ बूँदें चेहरे पर गिरती. कुछ एक पांवों की अँगुलियों को छूकर बह जाती. फिर क्या होता? मौसम उड़ जाता. ज़मीं अपने पुराने रंग में लौट आती. सड़क सूख जाती. फिर क्या कमी है. मैंने अपनी अंगुलियाँ जाली में फंसाए हुए एक फुहार को महसूस किया. सिगरेट के धुंए की तरह उड़ते बादलों के फाहों को पास से गुज़रते हुए देखा. उनको अपने बदन पर लपेटा. आह ये हल्की सर्द झुरझुरी. ये मौसम. ये भीगी हुई सड़क. और वह स्याह और सलेटी रंग का कोलाज अपनी वापसी पर. जिस रास्ते आया उसी तरफ लौटता हुआ. उसी रास्ते पर जहाँ एक शाम दूर तक टहलते रहे थे. उन दो रंगों में तीसरा रंग आया. लाल रंग. ब्रेक करने से उगा रंग. हाँ आगे सडक नीचे की तरफ है. एक तेज़ ढलान है. वहां से पूरब की ओर मुड़कर वे रंग आहिस्ता-आहिस्ता ओझल होते रहे. निगाहें जहाँ तक उनके साथ जा सकती थी गयी. 

अँगुलियों ने ट्रिगर दबाया. धायं. बारूद के छोटे धुएं के पीछे वह रंगों का कोलाज गायब हो गया. हालाँकि वक़्त की गांठ से गिरा एक छोटा सा टुकड़ा था मगर मुकम्मल था. ये एक कहानी थी. अपने लिए अपने साथ बीते लम्हों की कहानी. अचानक किसी को बिना देखे, देख लेने की कहानी. जैसे वह बरसात आई न थी मगर आई ही थी. जो नहीं था मगर था. जो नहीं होगा, वह है.

कि कुछ नहीं था, न कुछ रहेगा. 

तुम्हारे पास कितने साल बचे हैं ज़िन्दगी के? तुम वहां क्यों नहीं होते जहाँ होना चाहते हो.

June 17, 2015

कमानीदार रास्ते पर तहखाने में आबाद सस्ता शराबघर

एम आई रोड से सिन्धी केम्प की ओर जानेवाले कमानीदार रास्ते पर तहखाने में आबाद सस्ते शराबघर की डिस्प्ले केबिन पर अँधेरा पसरा था. सब शराबें एक ही पारदर्शी स्याह आवरण में ढकी थी. जादू तमाम एक रंग. खाली पड़े सोफों पर किसी बीते दिन के धुंए की तलछट पर नई परत रोपते हुए मेरे हमपेशा आदमी ने कहा- सब चालू है. अपने निजी स्वार्थों पर कायदे और काम का मुलम्मा चढ़ाए हुए ज़माना. 

आरडी मेरे पास के सोफे पर बैठे थे. नब्बे के दशक की शुरुआत में रेगिस्तान में सरकारी दफ्तर की कॉलोनी में शाम होने से पहले रियाया ताजपोशी के इंतज़ार में बेसब्र हो उठती थी. पानी की कमी से जूझ रहे कस्बे पर रहम खाकर आरडी कहते नहालिया जाता तो सुकून आता मगर हमें क्या है. जैसे औरों का जीना वैसे अपने भी कोई कमी नहीं. शाम अचानक टूट पड़ती. व्हिस्की की बू पसीने की बू को रिप्लेस कर देती. सिगरेट के धुंए से माहौल के नमकीन स्वाद में थोडा कैसलापन भी घुल जाता. ठहाके, लतीफे, बेपरवाही और बेख़याली जिंदगी के सभी दुखों को बुझा देती. आरडी जो कुछ कहते वह अक्सर किसी वेद वाक्य की तरह फूटता. पहली बार सुना गया. अंतिम बार तक याद रखने लायक. 

आज दोपहर फिर उसी सस्ते शराबघर में मैंने आरडी के कंधे को छूकर देखा. दिल के रास्ते कई जगह ब्लोक हो गए थे और कुछ चीरफाड़ करके रास्ता बनाने वाले सर्जनों ने एक आध बायपास बना कर दिल के काम करते जाने को रास्ता बना दिया था. मैंने कहा- बीस एक साल बाद आपको छूकर देखते हुए कितना अच्छा लग रहा है. ज़िन्दगी भी क्या कमाल चीज़ है. कहीं चलती जाती है और कहीं डेड एंड. मालूम हुआ कि वह दढ़ियल राम कंवार कुछ साल पहले रुखसत हो गया. मैंने देखा कि कुछ सीढियां उपर की ओर जा रही थी. रतनू साहब कहते हैं ये रास्ता आकाशवाणी को जाता है. इससे जाने पर हमें उस कमानीदार रास्ते से जाने की ज़रूरत नहीं होती. हम यहीं से वापस जायेंगे. अचानक लगा कि कहूं राम कंवार ने और ज्यादा छोटा रास्ता चुन लिया. मगर वह जा चुका था. रेगिस्तान के उस कस्बे में बिताये उसके दिनों में एक साथी था दीपक सिंह. बहुत साल पहले उसने और भी छोटा रास्ता खुद चुन लिया था. 

जैसे हम बीयर पीते जाते हैं क्या वैसे ही कोई हमारी ज़िन्दगी को पीता जाता है? 

आज अचानक एक आदमी की नाम पट्टिका देखी. चड्ढा जी कहते थे- कि ईश्वर हमें इतनी ही अक्ल दे कि हम छोटी चीज़ों को बड़ा मान कर सीने से लगा लें और जीते जाएँ. जैसे वह आदमी कहता था मैंने कभी आकाशवाणी केंद्र में किसी स्वतंत्रता या गणतंत्र दिवस के अवसर पर एक बार झंडा फहराने का सौभाग्य पाया था और उसी तस्वीर से उड़कर असीम आल्हाद बरसता रहता है. बस इतनी ही अक्ल. जैसे किसी ने कमा लिया नाम, किसी ने कमा लिए हों कुछ करोड़ रुपये और वह इस कमाई पर मुग्ध होकर जी सके उम्र भर. 

आरडी की बीस एमएल आहिस्ता पैंदे की ओर सरकती है. दिल नाज़ुक है बहुत और ज़ख़्मी भी है. जीने के लिए कितनी ही कतरनों, कितनी ही सिलाइयों से गुज़रा है. मैं कहता हूँ- आरडी सर उन सालों मेरी उम्र थी पच्चीस साल और आप थे पैंतीस के. उन सालों के क्या कहने. वे जो रेगिस्तान की सूनी सड़कों पर आधीरात बाद कोई खुले शटर वाली दुकान को खोजते हुए स्कूटर की दो सीट पर बैठे हुए तीन लोग बिता देते थे. 

आरडी मुस्कुराते हैं. उनकी मुस्कान खिली रहती है. धुंए के बाद बची राख मौका पाकर झड़ती जाती है.

सुबह मैं एक अद्भुत किस्सागो से मिला. वे यूं तो बड़े निदेशक हैं. उससे बड़े प्रोग्रेमर हैं. लेकिन मेरे लिए इन सबसे बड़े किस्सागो हैं. उनके पास हर बात को कहने का सलीका है. मुझे आज उन्होंने व्हाट्स एप का किस्सा सुनाया. ‘देखो, ये जो चीज़ है.’ वह एक मोबाइल फोन था. काफी स्मार्ट रहा होगा. ये मैंने उसकी सेहत को देखकर अंदाज लगाया. उस फोन के आगमन से आरम्भ हुआ किस्सा अपनी पूरी रचनात्मकता से मुझे उन्हीं दिनों में ले गया, जब आरसी का अद्धा और गुटखा पीक की हल्दी घाटी के किस्से सुने थे. जब मैंने छिपकलियों और सायनाइड का किस्सा सुना था. कथा की प्रस्तावना से लेकर उपसंहार तक श्रोता विस्मय से भरा मामूली चीज़ों के खास होने के बिम्बों को सम्मोहन में बंधा हुआ सुनता जाता था. 

उनकी दो लम्बी कहानियां थी. जिनको लघु उपन्यास कहा जाता है. एक निर्णय रुका हुआ और दूसरी थी और अंत यही है. उन कहानियों का शिल्प रोज़मर्रा की बातचीत के सरल लेकिन अनूठेपन को फिर से एक कामयाब शिल्प साबित करता है. आज इसी किस्सागो को महात्मा गाँधी की बड़ी और उनके दायें बाएं प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की छोटी तस्वीरों के नीचे बैठे बात करते पाया कि असल सुख कहानी है. ये बड़ी कुर्सी शायद उतनी आरामदेह नहीं है, जितना की जोधपुर आकाशवाणी के ड्यूटी रूम का सोफा. जितना कि नागौर या बाड़मेर आकाशवाणी में ड्यूटी रूम में रखी कुर्सी. क्या हम कुछ खास किस्म के सुखों के लिए बने होते हैं? अचानक याद आया कि मेरी जितनी मुलाकातें हुई हरबार लोक संगीत और उसके आर्काइव की बात ज़रूर हुई. “मैं आ रहा हूँ. मेरा मन है. मैं ये ज़रूर करूँगा.” 

एमआई रोड पर रेडियो के दफ्तर के प्रवेशद्वार पर खड़े हुए अनेक कुलीग बाद बरसों के मुझसे इस तरह मिलते हैं. जैसे कोई विभाजन हमें बाँट गया था. हम किन्ही अपरिहार्य कारणों से बिछड़ गए थे. आज अद्भुत कुम्भ संयोग हुआ है. 

क्या आपने कभी सोचा है कि जब जिंदगी गुज़र चुकी हो तब भी आप किसी को किडनैप करने का प्लान बनायें. आरडी हिचके कि न न ऐसा न करो. रतनू सर कहें कि हाँ कोई मेन्युअल थोड़े ही है. आनंद की कश्ती कभी भी सूखे किनारों से परे किसी गीले अहसास में धकेली जा सकती है. 

ठीक है, जिंदगी मुबारक. 

और इस पोस्ट के लिए कोई तस्वीर मेरे पास नहीं है. दोस्तों से मिलने गया तो फोन घर छोड़ दिया था. 

June 15, 2015

जून के सात दिन-रात

कई बार हमें लगता है कि किसी एक चीज़ के कारण हमारे सब काम रुके पड़े हैं. कई बार उस चीज़ के न होने से मालूम होता है कि ऐसा नहीं था. क्या इसी तरह हमें ये समझना सोचना नहीं चाहिए कि जो कारण हमें सामने दिख रहे हैं वे इकलौते कारण नहीं है. 

इसलिए सोचिये, योजना बनाइये और धैर्य पूर्वक काम करते जाइए. 

ये कुछ रोज़ की डायरी है. तारीख़ें मुझे याद दिलाएगी कि ये दिन कैसे बीते थे. 

June 8 at 11:41pm ·

आवाज़ का दरिया सूख जाता है
उड़ जाती है छुअन की ज़मीन।

मगर शैतान नहीं मरता,
और न बुझती है शैतान की प्रेमिका की शक्ल।


June 9 at 12:09am ·

शैतान के घर में होता है 

शैतान की प्रेमिका का कमरा। 
जहाँ कहीं ऐसा नहीं होता वहां असल में प्रेम ही नहीं होता।
* * * 

सुबह से आसमान में बादल हैं। 

बिना बरसे ही बादलों की छाँव भर से लगता है कि ज़मीं भीगी-भीगी है।

किसी का होना भर कितना अच्छा होता है।
* * *

June 10 at 1:03pm ·

अतीत एक साया 

इसलिए भी नहीं होना चाहिए 
कि जितना आपने खुद को खर्च किया है, 
वह कभी साये की तरह अचानक गुम हो जाये।
* * *

ओ प्रिये
एक दिन सब ठिकाने लग जाते हैं, 

हमारे दिन भी लगेंगे. 
तब तक तुम जब भी ज़िन्दगी पियो 
ज़रा सा इशारा मुझे भी कर दिया करो.
* * *

June 11 at 3:38pm · 


सुबह छितराई हुई बूँदें बरस रही थी। मौसम सुहान था। अभी उमस है।
कि कुछ भी स्थायी नहीं। 


फिर वो ख़ुशी का उल्लास किस बात के लिए था, दुःख के आंसू क्यों थे।
* * *

June 11 at 3:50pm
उसकी नींद बाकी थी या वह प्रतीक्षा की ऊब में नींद से भरने लगी थी। उसने पैरों को कुर्सी की सीट पर रखा हुआ था। उसका सर दीवार का सहारा लिए था। उसके पीछे की दीवार पर सफ़ेद और हरे रंग की अनेक पट्टियों वाला चार्ट लगा था। सर्जरी के कई मास्टरों के नामों की कतार नीचे ज़मी तक गयी हुई थी। उसकी नींद में शायद स्टील के चमकते हुए किसी औज़ार दस्तक दी या घर में खेलते हुए अपने बच्चे के गिर पड़ने के ख़याल से चौंक से भर उठी।

उसने अपना सर फिर से दीवार से टिका लिया। गुलाबी चप्पलें कुर्सी की सीट के नीचे अविचल पड़ी रहीं।
* * *

June 11 at 11:18pm 


बालकनी को थपकियाँ देती ठंडी हवा 

और दूर टिमटिमाता जयपुर शहर।

सुनो जाना, ये याद है कि कोई अमरबेल है ।

June 12 at 11:00pm 


आज एक मुंह फेरकर खड़ी दीवार को देखा 

तो अचानक तुम्हारी याद आई।

June 14 at 11.12pm


कभी-कभी लगता है 

कि ज़िन्दगी लकड़ी का घर हो गयी है। 

तुम्हारी याद की हर चाप पर सबकुछ थरथराता है।
* * *


डरते हैं बंदूकों वाले