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Showing posts from September, 2015

ढब सब उलटे पड़े हो जहां

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इंतज़ार की कोई मियाद नहीं होती.
तपते हुए दिन और रेगिस्तान पर कुछ एक हरे टप्पे से दीखते खेत पीले पड़ते जा रहे थे. कोई राह में मिलता तो कहता इस बार जमाना ख़राब. फसलें कहीं कहीं दिख रही हैं बाकि सब जगह सुनसान. वो सप्ताह भर जो पानी बरसा था जाने किस काम लगा. भीगे दिन भीगी रातें और धूप का इंतज़ार. कुछ एक दिन बाद बरसातें इस तरह गुम हुई कि गोया रेगिस्तान सदियों से सूखा ही था. कल शाम अचानक से हवा चली और ज़रा देर बाद शहर को भिगो गयी. एक बारिश सब कुछ बदल देती है. रात अँधेरी, छपरे पर गिरती पानी की बूंदों की आवाज़. कुछ एक मुरझाई हुई ककड़ी कि फांकें. उनका फीका स्वाद. और एक पुरानी व्हिस्की से भरा प्याला. कितना तो इंतज़ार था और कैसे अचानक खत्म हो गया. उसकी इतनी ही उम्र थी. रात भर बिजली गुल. हवा बंद. आसमान से छींटे. पलंग पर से भारी गद्दों को उठाकर बाहर बालकनी में डालकर लेटे हुए, भूले भटके आते हवा के झोंकों को शुक्रिया कहते हुए रात बीत गयी. 
असल नींद उस वक़्त आई जो शैतानों के सोने का समय होता है. 
स्मार्ट फोन में बेटरी के सिवा हर बात में स्मार्टनेस है. वह तुरंत दुनियावी षड्यंत्रों, जालसाजियों, धोखों, उदासियों…

तन्हा और खुश रहना

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तुम जब पूछते हो कि इस जीवन में स्वयं का परिष्कार करने का ढंग क्या है ? मैं उस वक़्त अपने आपको देखता हूँ. मुझे वहां एक ही बात दिखाई पड़ती है कि मैंने जीवन को साधने के यत्न करने की जगह उसका आनन्द लिया है. ख़ुशी क्या है? ये समझ आये तो उसके लिए जीयो. बस. क्योंकि जीवन को यंत्रों, सींखचों और आदर्शों में बांध कर किसी विशेष रूप में ढालना मुझे अच्छा नहीं लगता. तुम्हें मालूम है कि मेरे पास कई बांसुरियां हैं. मेरे बच्चे उनसे डांडिया खेलने लगते थे. वे प्रिय बांसुरियां टूट जाती थी. मैं नयी बांसुरी ले आता था. जहाँ से बांसुरी खरीदता रहा हूँ वहां बांसुरियां संदूकों के अँधेरे में पड़ी होती थी. मैं उनको छूकर देखता. उनके रंग और आकर को देखकर अपने साथ ले आता. घर लाकर उनको किसी दीवार पर टांग देता या वे मेरी अलमारी में पड़ी रहती थी. जाने कितने ही बरस हुए वे बांसुरियां मेरे साथ हैं. वे मुझे प्रिय हैं मगर मैं उनको बजाता नहीं हूँ. कभी किसी रोज़ कोई बांसुरी मेरे होठों से लगकर बजने लगेगी तब तक के लिए मैं खुद को किसी ऐसे परिश्रम में नहीं झोंकना चाहता हूँ जहाँ मन न हो बस बांसुरी बजाने का गुण आने की चाह हो. मेरी ही तरह …

स्थायी दुःख से कैसलिंग

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काश बहुत से हैं जैसे गिरहें जब पैर में उलझी तब गिर पड़ने की सीख को पहले उठाया होता और ख़ुद बाद में उठता. आज ढलती हुई शाम में रेल पटरी पर बने पुल से गुज़रते हुए सोच रहा था कि पुल के उपर से देखने पर नीचे का दृश्य ज्यादा समझ आता है. इसी तरह जीवन बिसात को देखा समझा होता. बीते दिनों के किसी अफ़सोस की दस्तक के साथ फिर एक काश आता है. काश उन दिनों कुछ सोचा जा सकता परिस्थिति से थोडा ऊपर उठकर.
एक गिर पड़ने का ख़याल और एक ज़रा उपर से गिरहों को देखने की समझ. थोडा सा फासला कितना कुछ बदल देता है. सुख के भेष में दुखों को आमंत्रण पत्र लिखते समय सोचा होता कि रेगिस्तान के तनहा पेड़ सूखे के स्वागत में कुछ ज्यादा रूखे और ज्यादा कंटीले हो जाते हैं तो हमने ख़ुद के लिए क्या तैयारी की है?
मगर कुछ नहीं होता.  बेख़याली में समय की ढलान पर फिसलते हुए दिन रात, बरस के बरस लील लेते हैं. इस छीजत में उदास काले धब्बे, अनामंत्रित खरोंचें, अनगढ़ सूरत बची रह जाती है. दुःख आता है कि बीते वक़्त रिश्तों, सम्मोहनों और कामनाओं के प्रवाह में किनारा देखा होता. खो देने के भय में लुढकते खोखले ढोल से बाहर आ गए होते. सोचा होता जिस तरह पुराने …

नासमझी के टूटे धागों में

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कुछ काम अरसे से बाकी पड़े रहते हैं. उनके होने की सूरत नहीं बनती. कई बार अनमने कदम रुकते हैं और फिर किसी दूजी राह मुड़ जाते हैं. फिर अचानक किसी दिन पल भर में सबकुछ इस तरह सध जाता है कि विश्वास नहीं होता. क्या ये कोई नियति है. घटित-अघटित, इच्छित-फलित भी किसी तरह कहीं बंधे है? क्या जीवन के अंत और उसके प्रवाह के बारे में कुछ तय है? मैं अक्सर पेश चीज़ों और हादसों और खुशियों के बारे में सोचने लगता हूँ. अब क्यों? अचानक किसलिए? और वह क्या था जो अब तक बीतता रहा. मुझे इन सवालों के जवाब नहीं सूझते. एक चींटी या मकड़ी की कहानी कई बार सुनी. बार-बार सुनी. निरंतर असफल होने के बाद नौवीं या कोई इसी तरह की गिनती के पायदान पर सफलता मिली. मैं यहाँ आकर फिर से उलझ जाता हूँ. कि पहले के जो प्रयास असफल रहे वे असफल क्यों थे और एक प्रयास क्यों सफल हुआ.
हम कब तक जी रहे हैं और हम कब न होंगे. आदेश श्रीवास्तव. अलविदा. गीता का संदेश इसी नासमझी का सन्देश है कि कर्म किये जा और फल की इच्छा मत कर.  _____________________
हाथों में आ गया जो कल रुमाल आपका
मेरा पेशा ही इतना मीठा है कि कभी खुद पर रश्क़ होने लगता है. रेडियो स्टेशन…