October 31, 2015

तुम ये क्या बना रहे हो चित्रकार?

चित्रकार ने तस्वीर में थोड़ी सी ठंडी हवा बनाई. 

बहुत सी खाली कुर्सियां, कुछ एक लोग, हल्की रौशनी, और हल्का इंतज़ार बनाया. गलबहियां डाले हुए एक टीन-एज जोड़ा बनाया. उस जोड़े के झरता बहुत सारा प्रेम उससे अधिक उत्तेजना और उससे अधिक अबखाई बनाई. 

कि दुनिया में बहुत कम जगहें बची थी निजता भरा प्रेम जीने की. 

चित्रकार ने और जो कुछ बनाया वह किसी सड़क किनारे रेस्तराओं का सिलसिला था. वहां लेम्प पोस्ट थे. उनपर धर्मेद्र और हेमा के जमाने की फिल्मों के पोस्टर लगे थे. चित्रकार ने अमिताभ का कोई पोस्टर न बनाया. इसलिए कि अपनी 'डैन' में आराम करते हुए राजेश खन्ना के चेहरे पर एक अफ़सोस रखा था कभी-कभी हम ऐसे लोगों का साथ दे देते हैं, जिनमें सिर्फ दूसरों के पाँव काटकर खुद के लिए सीढियाँ बनाने का हुनर होता है. 

चित्रकार ने एक इंतज़ार बनाया. जैसे रंग बनाने वाले बोर्ड पर नीले रंग की ओर बहता हुआ कोई और रंग. उसने टेबल के नीचे पैरों में हरकत बनायीं. उन हरकतों में छुअन भरी. छुअन में अपनापा बनाया. और जिस आदमी पर छुअन के छींटे बनाये उसी आदमी के चेहरे पर एक सवाल बनाया. कि काश तुम एक पारदर्शी रंग होते. 

चित्रकार थक गया होगा कि अचानक उसने विदा बनाई. 

धक्-धक्, धकड़-धकड़. हवा की सांय-सांय, रेल इंजन की विशल, सेलफोन, अँधेरा, और अनमनी करवटें. किसी ने कान में कहा- कैसा प्रेम? सेलफोन छुपाये रखना, घबराए हुए आना. ये कैसा आवरण. ये कैसी निजता. ये असल में हवस का एक सौदा है. जो कहता है, मेरी दुनिया में तुम एक कोना भर हो. तुम मेरी दुनिया नहीं हो. तुम समझते क्यों नहीं?

धक्-धक्, धकड़-धकड़. शू. शा. शीई. 

ज़िन्दगी का बुरादा अपनी ही सांस में घुलता रहा. उसके पास देने के लिए भारी सांसों के सिवा कुछ नहीं था. अचानक, आधी रात के बाद एक झटके से रुक गया सब कुछ. कोई ठिकाना आया. 

क्या सबकुछ?

अचानक चित्रकार लौट आया. उसने एक तीन साल की नन्हीं लड़की बनायीं. उसकी पीठ को सीट से टिकाया. उसका सर खिड़की के शीशे के सहारे रखा. उसकी आँखों में उनींदे स्वप्न रखे. उसके बदन में एक अनगढ़ नृत्य की लय रखी. 

चित्रकार ने रेल में यात्रा कर रही एक नन्ही प्यारी लड़की बनाते हुए पास की बर्थ पर सोये आदमी के मन पर स्याह रेख बनायी. न जी सकने लायक बेचैनी से भरी हुई स्याह रेख. 

हुश-हुश, हश-हश, सूं ऊऊ की आवाज़ों में धक्के खाती हुई ठण्ड से भरी ज़िन्दगी और एक तुम. 

तुम, तुम तुम.

[Painting Courtesy : Judi Light]

October 29, 2015

एक तेरे आने की, याद के सिवा



तल्ख़ दिन 
अचानक बरसों पीछे छूट गए. 

खिड़की और दरवाज़ों के पल्ले वेगवती हवाओं से अपने आप उढक गए. एक बार सब कुछ कांपा और फिर शांत हो गया. बरसों से कोई अँधेरा गर्द की चादर के नीचे पड़ा हुआ था. कसक से भरे विकल मन की कोई ठांव न थी. अव्वल तो ज़िन्दगी कहने लायक तकलीफें देती ही नहीं है. फिर भी कोई ऐसी तकलीफ़ जिसे मनमीत से बाँट सकें तो भी उम्र की छीजत इस सुख को भी छीन लेती है. 

अब कहाँ बचा है कोई मीत.

दूर तक एक उजाड़ उदासी है. आबाद चीज़ें बेपर्दा हो गईं है. कोई सुख एक स्मृति है और अधिकतर स्मृतियाँ सुख नहीं हैं. अधिकतर माने जिस तरफ टटोलिये उखड़े हुए पैबंद हैं. ज़िन्दगी जो हादसों की शक्ल में सीख देती है वे सीखें बहुत कुछ छीन लेती है. यकीन, आसरा, उम्मीद, दिलचस्पियाँ... सब पर धब्बे पड़ जाते हैं. ऐसे तेजाबी धब्बे जिनसे सिर्फ दाग नहीं छेद बनते हैं. 

एक कंधे पर लटकने वाला थैला तब तक साथ रखने का मन है जब तक दुनियादार हूँ. इस पर लिखा है आखिरी उम्मीद. जैसे कि आखिरी में आप फिर से एक जुआरी की तरह हारते जाएँ. इससे ज़िन्दगी ज़रा आसान लगती है. आसान कुछ नहीं होता बस भुलावा है और भुलावा बड़ी चीज़ है.


सब्र के प्याले को खाली न होने देना. 

जब खुद से ऐसा कहता हूँ तो दुनिया के कारोबार में लगे जगमग और अँधेरे चेहरों के पार एक तार का बाजा सुनाई पड़ता है. जा रहा है, जा रहा है, जा रहा है वक़्त. हर जगह बीत रहा है, रौशनी में और अँधेरे में भी. फिर किस चाह में, किस उम्मीद के खातिर और किस बिना पर? 

वेगवती हवाएं जब दीवारों से टकराकर जा चुकी थी, तब उसने कहा- ऐसी आभा देखी है कभी? इतना पीला उजास ओढा कभी? इतनी मोहक छवि धरती की सोची थी कभी? 

सोचा तो ये भी न था कि 
फिर एक चुप लग जाती है मगर मौसम मन के भीतर से उगता है. तल्खी की रुखसती. 

धूप, हवाओं का शोर, बारिश और शाम सब कुछ बुझ चुके हैं. बालकनी के दरवाज़े के पार दूर सड़क पर गोल घेरे में दिखती हुई रोशनियों के नीचे कुछ सरपट रोशनियाँ हैं. वे सम्मोहन की तरह हैं. वे एक के बाद एक अनियत और अद्वितीय हैं. 

कभी ठहरो तो गिरते हुए लम्हों को देखना, ठहरना बुरा न लगेगा. 

October 25, 2015

तुम जो मिलोगे इस बार तो



उदासी के झोंके ने 
गिरा दिया शाख से पत्ता 

ज़िंदगी को इतना भी यूनिक क्यों होना चाहिए कि जीया हुआ लम्हा बस एक ही बार के लिए हो. कुछ क्लोन होने चाहिए कि हम उसी लम्हे को फिर से जी सकें. एक याद का मौसम जब भी छू ले, उसी पल कोई दरवाज़ा बना लें. दरवाज़े के पीछे एक छुअन हो. एक लरज़िश हो. एक धड़क हो. इस तरह याद जब उदासी और नया इंतज़ार घोले, उससे पहले हम उसी लम्हे को फिर से बुला लें. 

जिस तरह गिरते हुए पत्ते ख़ुद को धरती को सौंप देते हैं, उसी तरह कभी हम ख़ुद को प्रेम को सौंप दें. प्रेम लुहार की तरह हमें लाल आंच में तपाकर बना देगा कोमल. किसी बुनकर की तरह बुन देगा एकसार. किसी राजमिस्त्री की तरह चुन देगा भव्य. 

वह जो दरवाज़े के पीछे अँगुलियों के रास्ते बदन में उतर आई लरज़िश थी. वह उसी एक पल के लिए न थी. उसका काम बस उतना सा ही न था. 

तुम जो मिलोगे इस बार तो पूछेंगे ये हवा क्या है, उदासी कैसी है और तन्हाई कब तक है? 

October 23, 2015

ये भी तो किसने सोचा था कि


एक ठहरी हुई सांस 

बेचैन निग़ाह में उदासी घोलती है.

बारिश नहीं थी मगर थी. एक आवाज़ ने बुनी बारिश. एक सूखी रात का ये पहला पहर था. बंद आँखों में कहीं दूर हिलते हुए होठ खिले थे कि कोई संगीतकार, साजिंदों को अपनी छड़ी से प्रवाहित कर रहा था. मुझे उसे कहना था कि सांस लेने में कठिनाई है. मगर उसकी आवाज़ दवा थी. एक ठहर के बाद प्रतिध्वनी गूंजती. क्या बारिश रुक गयी है? कोई जवाब आता. तीन बार. वह जवाब मुझे बाहर बारिश की ओर खींच ले जाता. उसकी आवाज़ में बारिशें बुनने का हुनर था. 

क्या हम पहले कहीं मिले थे? अगर नहीं तो फिर ऐसा क्यों लगता है कि तुम बिन कुछ नहीं. बचपन में पढ़ी प्रेम कहानियों से ऊब होती थी. ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई दो, एक होकर अंतिम विदा का गीत गाकर चुप हो जाते हैं. बचपन में रूह का नाम न सुना था. तब सिर्फ प्रेतों के किस्से थे. शाम के धुंधलके में बाहर जाना निषेध था. ये प्रेतों का समय था. ये भय और जिज्ञासा के मारक मिलन का समय था. 

काश, बचपन में रूह का कोई किस्सा सुना होता. रूह के मिलने का समय मालूम होता. यकीनन मैं उस समय को अपने भटकने के हिस्से में जमा रखता. 

कि कहीं रूह मिले. 

तो क्या तुम रूह हो? बदन तो कहीं पर भी मिल जाता है. किसी न किसी तरह. किसी लम्बे छोटे इंतज़ार के बाद. बदन उदास नज़र के रंग में घुले अनमने मौसम को विदा नहीं कह सकता. उसे रूह ही बुहार सकती है. तुम्हें छूकर, तुम्हें छूने के अहसास से गुजरकर, तुम्हें बेहिसाब याद करके लगता है कि रेत के बीच पड़े हुए सीपियों के खोल में हवा कुछ लिख रही है. ये हवा है या तुम्हारी रूह है. 

एक कोड़ा बरसता है. कि कोई है, मुझे जाना है, तुम भी जाओ. अब न होगा. विदा, विदा, विदा. इस कोड़े की तड़प में याद की बही से गर्द उड़ती है. ऐसा पहली बार कब कहा था. ये विदूषक की हंसी के भीतर का कड़वा अनुभव है. ये नकार के खोल में लिपटी हुई जाने की चाहना है. ये सच है मगर सच की तरह कहा नहीं गया है.

मुमकिन है
हम इस तरह बिछड़ जायेंगे
कि कभी न मिलें.
ये भी तो किसने सोचा था
कि हम मिलेंगे. 

[Painting Image Courtesy ; Fabio Cembranelli ]

October 21, 2015

उदासी नींद, बावरा स्वप्न

सिसकियाँ ख़ामोशी हिचकी और ज़रा ठंडी हवा

रात जिस ढलान पर चली थी, सरकती गयी. हलकी स्याही में एक वही पुराना स्वप्न. जो पहले भी कई बार देखी हुई जगहों से होकर गुज़रता है.

घर के आँगन के बीच दक्खिन में एक पानी जमा करने का भूमिगत हौद बना हुआ है. इसकी जगत ज़मीन से तीन एक फीट ऊँची है. इस हौद की छत एकदम पारदर्शी. पानी भी इसमें ऐसा कि दस फीट नीचे तल में पड़ी हुई सुई को देखा जा सके.

प्यास लग आई.

हम दो लोग थे वहां पर. मैंने पानी खींचने के लिए टाँके यानी हौद के अन्दर देखा. वहां एक धारीदार लम्बा घोड़ा पड़ा हुआ था. वह टाँके के तल पर लेटा हुआ सा जान पड़ता था. मगर मैंने समझ लिया कि घोडा पानी के अंदर है तो मर चुका है. मन में एक चिंता आई कि पानी दो दिन बाद सड़ जाएगा. अब उस घोड़े को बाहर निकालने के लिए एक लम्बे बांस के सहारे रस्सी का फंदा बनना था. उस फंदे को घोड़े की किसी टांग में डालकर बांस निकालकर फिर रस्सी के सहारे घोड़े को उपर खींच लेना था.

घोड़े को निकालने के लिए कुछ सामान चाहिए थे.

एक दूकान है. जो कि ज़मीन से चार पांच फीट ऊँची है. उसके आगे सीढियां है और एक तीन फीट का रास्ता है. वहां से फुटबाल की पेलेंटी लेने की तैयारी हो रही थी. एक लड़का फिर लड़की और फिर एक लड़का. वे तीनों एक ही पंक्ति में उसी तीन फीट के रास्ते को रोक कर लाइन में खड़े थे. लड़की किसी बेले नर्तकी की तरह दो बार गोल घूमकर किक लेने के रास्ते से हट जाती है. लड़के भी एक तरफ हो जाते हैं. और फिर वहां कोई फुटबाल और कोई पेनल्टी स्ट्रोक लगाने वाला नहीं होता.

वहां पर तीन गोरे होते हैं. वे डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहे होते हैं. उनमें से एक हँसता है. मैं उसे कहता हूँ कि तुम क्या कहना चाहते हो. वह कुछ जवाब देता है मगर मैं उसे सुने बिना कहता हूँ- इसके दो ही परिणाम हो सकते थे. पहला कोई ऐसा इशारा था जो किसी जीत के लिए किया जाता हो अथवा शालीन हो. उस इशारे के बार में मुझे कुछ याद नहीं रहता मगर दूसरा इशारा था मिडल फिंगर को अश्लील तरीके से दिखाना. इस पर मेरे पास यानि पीछे खड़े किसी प्रिय ने कहा- ऐसा न करो.

वह भाई ही था. या मंझला या छोटे वाला. हमारे पास एक सायकिल थी. किसी बहुत बड़े मानव निर्मित पुल की ढलान की ओर चढ़ते हुए भाई ने कहा- हमें शायद उस रास्ते जाना चाहिए था. लेकिन नहीं जब हम उपर पहुंचे तो देखा कि ढलान पर पानी जमा हुआ है और वह काई से भर गया है. ज़रा देर बाद भाई ने कहा हम निकल सकते हैं. पानी के किनारे सूखे थे और कहीं कहीं बेहद कम पानी था.

वहां खरगोश थे. वे घास में कूद रहे थे. उनको किसी का डर नहीं था. वे खरगोश होकर बिल्लियों की तरह सीधे ऊपर की और छलांग लगा रहे थे. मैंने चाहा कि एक खरगोश को उठालूं. लेकिन खरगोश के बिल्लियों जैसे नाखून थे. मुझे लगा कि वे अजनबी हाथों को खरोंच सकते हैं.

एक घासफूस के छज्जे वाले घर के भीतर बक्सों के ऊपर एक खरगोश बैठा था. ये उन चार खरगोशों में से एक था, जो बड़े पुल के पास घास में खेल रहे थे. मैंने चाहा कि इस धूसर काले रंग वाले खरगोश की जगह काश वह सुनहरा खरगोश आ जाता.

स्वप्न फिर से घर में ले आया तो वहां पापा मिले. उन्होंने बताया कि पानी का भूमिगत हौद खाली हो चुका है. मैंने पूछा कि ये कैसे किया? अंदर देखा तो वहां सोया हुआ या मरा हुआ घोड़ा नहीं था. कुछ और इतने छोटे जानवर थे जैसे वे बच्चे हों. टाँके के तल को एक तरफ से छेद दिया गया था और पानी पूरा बह चुका था. पापा ख़ामोश रहते हैं. मगर वे ज़रूरी बात कहते हैं. वे जरूरी बात पूछते हैं. मैं उनको जवाब देता हूँ.

अचानक एक औरत मुझे पीठ की तरफ से पकड़ लेती है. उसकी बाहें मेरे सीने पर आगे की तरफ कस जाती हैं. मैं कहता हूँ- ये क्या? वो कहती है- हाँ ये ही. एक हल्की उत्तेजना होने लगती है.

स्वप्न रेगिस्तान की सुबह की ठंडी हवा की कंपकपी के कारण टूटता है. वह उत्तेजना असल में ठंड थी.

* * *

मैं जाग गया हूँ. मैं खोया हुआ हूँ. मैं घर से बाहर निकल जाना चाहता हूँ. कहीं सड़क पर चलता जाऊं. बाहर किसी से कोई काम नहीं है. बस कहीं जाकर बैठना चाहता हूँ. ऐसी जगह जहाँ खुला खुला हो सबकुछ.

October 20, 2015

तेरे बाद की रह जाणा

मौसम ऐसा है कि कमरे अंदर ठंडे और बाहर गरम। प्लास्टिक के सफ़ेद छोटे कप चाय से भरे हुए। नया हारमोनियम।। जमील बाजा के बारे में कुछ और बताते हुए गुनगुनाना शुरू करते हैं। तेरे बाद की रह जाणा... मैं कहता हूँ गाते जाइए। जमील मुस्कुराते हुए स्वरपटल पर अंगुलियां रखे हुए अपनी आँखें मेरी आँखों में उलझा देते हैं। मैं डूबता जाता हूँ। सचमुच तुम्हारे बाद जीवन में क्या बचा रह जायेगा। उदासी, तन्हाई और बेकसी। आकाशवाणी के विजिटर रूम में ढोलक की हलकी थाप से सजी संगत और सिंधी-पंजाबी के मिले जुले मिसरों का मुखड़ा, गहरी टीस से भरता रहता है। 

जमील अपने कुर्ते के कॉलर ठीक कर एक लम्बे सूती अजरक प्रिंट के अंगोछे को गले में डाल कर बिना सहारा लिए आँगन पर बैठे हैं। ग़फ़ूर सोफे पर बैठे हैं। मैं अधलेटा सोफे का सहारा लिए सामने खिड़की की ग्रिल पर पाँव रखे हुए। मैं कहता हूँ ये हारमोनियम कितने का आया? ग़फ़ूर कहते हैं कल ही अट्ठारह हज़ार में लिया। मैंने पूछा कलकत्ता का है? बोले- नहीं! पंजाब की बॉडी है और सुर... मैं कहीं खो गया कि ये न सुन पाया सुर कहाँ के हैं। मेरा मन उकस रहा था कि कहूँ कोई बिछोड़ा सुना दो। ऐसा विरह गीत की आँख भर आये। 

सिगरेट का धुंआ, सुरों की गमक फिर भी आबाद खालीपन। 

वे कलाकार अपने साज़ कसते रहते हैं। थाप लगाकर देखते हैं। मैं थके कदम बाहर आ जाता हूँ। एक कमायचा बजाने वाला नहीं आया है। उसका इंतज़ार है। स्टूडियो बिल्डिंग के साये में खड़े हुए देखता हूँ बड़ी भूरी चिड़ियां अपने साथ की चिड़िया को कुछ कह रही है। जाने क्या? मुझे लगा कि वो दो ही बातें समझा रही है। पहली बात बुद्ध की- ये संसार दुखों की खान है। दूसरी बात-सन्यास सुख का पड़ोसी है। अगली चिड़िया शायद कोई शंका रखती थी तो उसने कुछ पुछा। बड़ी भूरी चिड़िया ने अपने परों को फैलाया और कहा चलो। वे मेरे पास से उड़कर नीम पर चली गयी। 

मुझे साँस नहीं आ रही। कनपटी से पसीना आ रहा है। मैं उसे बिना छुए गरदन के रास्ते नीचे उतरने देता हूँ। मालूम है क्यों? इसलिए कि मेरे दिमाग में एक सी सा झूला है। नष्टोमोह की कामना है और कुछ नहीं जाने देने का वादा भी है। मैन गेट के पास से वॉयलिन कवर पीठ पर लटकाये हुए एक आर्टिस्ट आता है। मैं स्टील के पाइप से सहारा हटाकर अंदर की ओर चल देता हूँ। साफ पानी की मशीन के पास खड़ा होकर एक पन्नी से छोटी नीली गोली निकालता हूँ और गटक जाता हूँ। दुनिया के उस पहले आदमी या औरत के नाम जो पहली बार किसी को छोड़कर गया था।

बाजे की बॉडी तो पंजाब की है पर सुर कहाँ के हैं?

October 19, 2015

उस रुत झड़ गये थे पत्ते, इस बार?

अलमारी की ऊपरी दराज़ में यूएसबी केबल्स रखीं हैं। अंगुलियां उनमें उलझकर सब्र भूल जाती हैं। सब्र जो पहले से ही चुकता जा रहा था। एक पतली पन्नी चाहिए। जिसमें कुछ साल्ट रखे हों। किसी कोने में अँधेरे और ठण्डी दीवार के सिवा कुछ हाथ नहीं लगता। 

रात ठहर गयी है। आधे रास्ते में कोई और काली दीवार आ खड़ी हुई। रात को दीवार के पार कोई रास्ता नहीं है। रोशनियाँ नाकाम टूट-टूट कर वहीँ गिर पड़ती हैं जहाँ से उगी थीं। हर रौशनी रेंगने से लाचार तलछट को पीलेपन से रंगकर खो जाती है। 

अचानक साँस की लड़ी टूटती है। एक अल्पविराम। अगली साँस के लिए कुएं से रहट खींचते हुए निर्जन उजाड़ चुप टोह लेता है। एक लहर सी पंजों से सर तक दौड़ती है। ज़हर की तड़प से भरी आंत के मरोड़ जैसी। 

धप धप धप... सीढ़ियों पर थके अबकाये कदम कभी तेज़ कभी दीवानावार पहले तल से दूसरे तल और कभी छत पर। अलमारियों, दराजों और किताबों के आलों में पीछे छूटी जगहों पर हाथ घूमकर टटोलते हुए पन्नियों की तलाश खत्म नहीं होती। एक ऐसी गोली, ऐसा रसायन, ऐसा जैसे जान बख़्श दिए जाने की आस जगे। मगर नहीं मिलता।

मौसमों की बड़ी बातें लिखीं। उनकी बेवफ़ाई और मेहरों पर तकरीरें की मगर भूल गए कि मन का बन्धन अंततः धोखा ही साबित होगा। अब तक कोई ऐसा न मिला था तो कैसे इस रुत को समझ लिया कि अब उजाड़ और वीराना सिर्फ किताबों और यादों में बचा रह जायेगा। 

सुबह के चार बजे डॉक्टर नहीं आया होगा। उस चारागर को किसी से मोहोब्बत हो जाये तो बेवक़्त क्लीनिक खोलकर इंतज़ार करने लगे। मगर नौ बजे सफ़ेद रंग की कार से उतर कर दरवाज़े की और बढ़ते हुए आँखों से दुआ सलाम हो जाती है। 

एक छः सात साल का लड़का है। कमीज के बटन खोल कर बेंच पर बराबर बैठा है। उसके पेट से एक गाँठ निकाल दी है मगर चीरे की जगह टाँके नहीं लगाए हैं। वह चीरा पट्टी उतर जाने से ऐसा दीखता है जिसे रात इसी रास्ते से आई होगी। उसे देखते हुए अंगुलियां मुड़ने लगती है। मन को लगता है कहीं कोई अंगुली पकड़ कर उस चीरे से छुआ न दे। 

उस रुत पत्ते झड़ गए थे मगर कोई कोंपल बची रह गयी थी। इस बार? 

साँस फिर उखड़ती है। कदम बदन का बोझा उठाये बाहर आते हैं। क्या कहूँगा? डॉक्टर! कोई ऐसी दवा है आपके पास जिससे आंसू आते हों?

के सी

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Kishore Choudhary is a poet and fiction writer from Barmer (Rajasthan). His writing career took a formal leap from his personal journals to make him a hugely popular blogger on two of his blogs- Kahaniyan and Hathkadh.

Having spent most of his formative years in the desert, the life there is his favourite canvas to contextualise his poetry and stories. His followers from across the world vouch for his realistic and authentic portrayal of the desert life and its typical dilemmas, fused beautifully and almost effortlessly with some stunning images of the desert and its folklore.

Kishore in a way pioneered the incorporation of pre-publishing interactions and feedback with his readers on his blogs and across social media platforms in his final works. His style is known for its lucid and unexampled metaphors that he exquisitely uses to express universal feelings like love, loneliness, hope, pain, longing and fantasy. 

His first collection of stories Chaurahe Par Seedhiyan (2012)was such a thumping bestseller that the first issue was sold out within 50 days of its launch.All the stories skilfully bring the rich and exotic background of the desert come alive and make the reader delve deeper into the layers of human emotions.This much sought after collection raised the bar for all contemporary Hindi works of short fiction and brought in a fresh change in the existing status quo for Hindi short stories. 

The second collection titled Dhoop Ke Aaiyne Mein(2013)had an array of short stories that looked at life through a multi-dimensional prism, lending each one of them a distinctive charm. Kishore being a poet first, his stories are more like poetic fiction. Having a great affinity to the stream of consciousness novels by English literary greats like James Joyce and Virginia Woolf his stories defy the conventional rules of a definitive beginning, middle and end. 

Kishore’s first publication was a collection of poetry Baatein Bewajah, an alluring and bewitching series of short poems which capture the vast expanse of human emotions and have images that have a rare haunting quality.

Kishore is a Radio Broadcaster by profession and has a special fondness for classical & folk music. Articles about him and his interviews are available across many major newspapers and websites. Kishore certainly is the Avant-garde flavour in contemporary Hindi writing and his ever expanding avid readership eagerly waits for his next chartbuster.

Kishore's latest is another collection called "Jaadu Bhari Ladki". This collection has his same imitable style of stories but the contexts and places are beyond the desert as well. 
His deep understanding of the complexity of modern relationships and how they play out in our minds, homes and workplaces makes it a very unique almost post-modern work in Hindi Fiction.

http://www.goodreads.com/author/show/7361739.Kishore_Chaudhary

हेंगओवर सिलसिला

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Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.

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