An illegally produced distilled beverage.


November 29, 2015

तलवे चाटते लोगों की स्मृति में

एक पत्थर की मूरत थी, उस पर पानी गिरता था. एक सूखा दरख्त था उसे सुबह की ओस चूमती थी. एक कंटीली बाड़ थी मगर नमी से भीगी हुई. असल में हम जिसे सजीव देह समझते हैं, वे सब मायावी है. वे छल हैं. वे जागते धोखे हैं. वे असल की शक्ल में भ्रम हैं. उनके फरेब प्रेम की शक्ल हैं मगर असल में पत्थर और पानी के मेल जैसे सम्मोहक किन्तु अनछुए हैं. वे साथ हैं मगर दूर हैं. 

अचानक याद आया कि बीते दिनों मैं ज़िन्दा था. अचानक याद आया कि कोई जैनी थे, तो अचानक याद आया कि बौद्ध भी तो थे. उन्हीं बौद्धों के महामना बुद्ध की बातों की स्मृति से भरी कुछ बेवजह की बातें. 

महाभिनिष्क्रमण
साधारण मनुष्यों के लिए नहीं है।

वृद्ध, रोगी, मृतक और परिव्राजक को
देखना और समझना
छः वर्षों की कठिन तपस्या के बाद
मार-विजय प्राप्त कर
अज्ञान के अंधकार से बाहर चल देना।

ये केवल बुद्ध का काम हो सकता है।

बाकी दलाल मन उम्र भर दलाली ही कर सकता है।
उसकी आत्मा को इसी कार्य में सुख है। यही उसकी गति है, यही उसका निर्वाण।

[सम्यक सम्बुद्ध : मतिहीन प्रबुद्ध - 1]
* * *

विचित्र संयोग ही था कि
बुद्ध का जन्म, बोधि-प्राप्ति और निर्वाण
ये तीनों घटनाएं
एक ही दिन वैशाख पूर्णिमा को हुई।

कुछ लोगों पर मगर
उम्रभर ऐसा अंधकार छाया रहा
कि वे जिनसे मिलना तक गवारा नहीं करते थे
उनके तलवे चाटते रहे।

सब पूर्णिमाएं व्यर्थ गईँ।

[सम्यक सम्बुद्ध : मतिहीन प्रबुद्ध - 2]
* * *

बुद्ध उपदेशों के संकलन
विनयपिटक और सुत्तपिटक
थेरवादियों की कल्पनों से भरे पड़े हैं।

सत्य अलोप होने को शापित है।

[सम्यक सम्बुद्ध : मतिहीन प्रबुद्ध - 3]
* * *

सुख की खोज के सूत्रों को
लिपिबद्ध करने को आयोजित
चार प्रमुख बौद्ध संगीति
दुखों के आडम्बरों में डूबकर विदा हुई।

मूल को निष्काषित कर कल्पना अधिकार कर लेती है।

[सम्यक सम्बुद्ध : मतिहीन प्रबुद्ध - 4]
* * *

सत्य एक शाखीय है,
असत्य की अनेक शाखाएं होती हैं।

बुद्धत्व
हीनयान और महायान में विभक्त हुआ
इसके बाद थेरवाद, सर्वास्तिवाद
और सौन्त्रान्तिक शाखाएं उगी।

अफ़सोस कि बुद्धत्व शायद
हो गया होगा विदा, बुद्ध के ही साथ।

[सम्यक सम्बुद्ध : मतिहीन प्रबुद्ध - 5]
* * *

चुप्पी चोरों का सहारा
विद्वानों का आभूषण
धूर्तों का हथियार है।

बुद्धत्व का इन तीनों से कोई लेना-देना नहीं है।

[सम्यक सम्बुद्ध - मतिहीन प्रबुद्ध - 6]
* * *

चार आर्यसत्यों में
पहला कहता है संसार दुःखमय है।

कभी प्रिय किसी का अस्त्र बन जाता है
कभी प्रिय आपको अस्त्र बना देता है।

दुःख या तो पहलू में बैठे हैं या फिर दिल में।

[सम्यक सम्बुद्ध : मतिहीन प्रबुद्ध - 7]
* * *

अकारण कुछ नहीं होता
कार्य-कारण की श्रृंखला लंबी है।

वह आया तो कोई कारण था
उसके जाने का भी कारण होगा
इस द्वादशाङ्ग से बाहर आओ।

दुःख पर मिट्टी डालो।

[सम्यक सम्बुद्ध : मतिहीन प्रबुद्ध - 8]
* * *

ये सम्भावना कम
और वास्तविकता अधिक है
कि आत्मपीड़ा में आसक्ति दुःखमय है।

भिक्षु, प्रव्रज्या के लिए इस अंत का सेवन न करो।

[सम्यक सम्बुद्ध : मतिहीन प्रबुद्ध - 9]
* * *

जिनका त्याग करना था
वे भौतिक चीज़ें नहीं थीं।

मगर आडम्बर बिना
धर्म और प्रेम दोनों कठिन होते हैं।

[सम्यक सम्बुद्ध : मतिहीन प्रबुद्ध - 10]
* * *

November 20, 2015

जाने क्या बात थी, उस उदासी में

विलासिता की चौंध से दूर. मन के नीम अँधेरे कोने में रखे किसी अहसास के करीब. खाली लम्हे में कभी सुनी गयी धड़कन की याद में डूबे हुए. बीत लम्हों की तस्वीरों से उड़कर आते रंगों के हल्के शालीन कोलाज में ज़िन्दगी है. बातें बेवजह कहने में ज़िन्दगी हैं. उसे बेहद प्रिय है मेरा इस तरह कहना. कहना कि ज़िन्दगी तुम बे परदा मेरे साथ चल रही हो. मैं तुम्हें रिश्तों और पाबंदियों में नहीं जीता. मैं किसी बोसे के गीलेपन में, किसी छुअन के ताप में और इंतज़ार की नीली शांत रौशनी में वैसा ही लिखता हूँ, जैसा महसूस करता हूँ. मैं ख़राब था और मैंने हमेशा चाहा कि ज़रा और खराब होते जाने कि गुंजाइश हमेशा बची रहे. मैं तनहा था और मैंने चाहा कि और तन्हा होते जाने के सबब बने रहे. मैं प्रेम में था और सोचा कि प्रेम मुझे किसी शैतान नासमझी के कोहरे में ढककर मुझे चुरा ले. 

यही चाहना, यही जीना है. 

मैंने जब कहानियां कहनी शुरू की तो दोस्तों ने कहा- "केसी, ये कहानियां किताब की शक्ल में चाहिए." मैं विज्ञान छोड़कर हिंदी साहित्य का विद्यार्थी हुआ था, मैंने ही मित्रों से कहा- “आपने ब्लॉग पर पढ़ ली न. अब क्या करना है इनका? मुझे लेखक या कवि कहानीकार कहलाने की चाह नहीं है. मैं सिर्फ ख़ुद को लिखना भर चाहता हूँ.” 

इसके तीन साल बाद मेरी कहानी की पहली किताब आई. चौराहे पर सीढ़ियाँ. मित्र सच्चे थे. उन्होंने पचास दिन में ही पहला संस्करण खरीद लिया. जाने उस उदासी और टूटन में क्या बात थी कि नए लोगों को भी खूब पसंद आई. एक अच्छे जीवन में एक ऐसा लम्हा होता है, जब लगता है कि हम ये सब क्यों कर रहे हैं? बस उन्हीं लम्हों की वे कहानियां है. जीवन में कुछ चीज़ें और हाल, बिम्बों के माध्यम से बेहतर बयान होते हैं. ये बिम्ब ही थे, जिन्होंने उधड़ी हुई ज़िन्दगी को पैबन्दों से ढक कर एक बेहतर किस्सा बना दिया. 

एक कविता की किताब आई थी. बातें बेवजह शीर्षक वाली इस किताब के चाहने वाले अलग थे. वे जो भी थे दीवानावार थे. उनको इन बातों से सम्मोहन था. खरगोश, शराब, शैतान की प्रेमिका, रेगिस्तान की गरम हवा, इंतज़ार और खालीपन के बिम्बों से कही गयी कुछ मामूली बातें ख़ास बनकर दोस्तों के दिल में बैठ गईं. ये कविता संग्रह ऑनलाइन कम ही उपलब्ध रहा. पुस्तक मेलों में दोस्त आये और खरीद ले गए. दोस्तों ने बताया कि किताब आ गयी है. कुछ एक को अभी तक न मिली. मैं अक्सर सोचता हूँ कि मायामृग जी से पूछूँ कि किताब का क्या हाल है? लेकिन बुझे मन में चाह जागती ही नहीं. ये स्थागित होता जाता है. 

अचानक एक दोस्त ने अपनी खरीदी हुई किताब में पेन्सिल से अनुवाद करना शुरू कर दिया. ये इसी बरस जून महीने की बात होगी. कुछ महीने पहले मेरे पास डाक से आया एक पार्सल रखा था. मुझे अपनी ही किताब मिली. मैंने अचरज से खोला. उसमें जो कुछ पाया, उसे देखकर क्या महसूस हुआ? उसका बयान मुमकिन नहीं है. मेरे पास शुक्रिया और तारीफें नहीं थी. इसलिए कि ये काम इन चीज़ों के लिए नहीं किया गया था. 

मैंने शैलेश भारतवासी से पूछा कि इस किताब को कहीं से छपवा सकते हैं? 

शैलेश जी ने कहा कि कुछ अंग्रेजी प्रकाशकों को भेजते हैं. मैंने कहा- “नहीं. अव्वल तो कविता कौन खरीदता है. उस पर अनुवाद की हुई कविता. तिस पर ये केसी है कौन?” इसलिए कोई ऐसा प्रकाशक जो किताब छापने में वे सवाल न करे, जो साहित्य और प्रकाशन के नाम करके सिर्फ हतोत्साहित किया जाता है. वे बस उसे ऑनलाइन उपलब्ध करवा दे. इन नीले रंग से भरी चाहनाओं, हलके नीले रंग की बरबादियों और उससे भी हलके नीले रंग की उम्मीदों के लिए हमने तय किया इसका लिमिडेट एडिशन छापते हैं. लिमिटेड एडिशन माने कम प्रतियाँ. वे लोग जो इसका प्री ऑर्डर करेंगे और बाकी सौ किताबें. मेरी किताब का पहला एडिशन एक हज़ार कॉपी का छपता है लेकिन हम इसकी दो सौ प्रतियाँ ही छापेंगे. यही सब आज तय किया. 

एक अरसे बाद लैपटॉप को इसलिए ऑन किया है कि मैं लिखने से जुड़ा कोई काम शुरू करने जा रहा हूँ. मैं शुरू करूँगा तो शायद बहुत कुछ लिखूंगा. 

कुछ एक आपके लिए 
[आंग्ल भाषा में मेरा हाथ तंग है. मैं जैसा पढ़ पाया हूँ वैसा मैंने कॉपी कर दिया है. अग्रिम मुआफ़ी.]

At last
my smile came back.

When I thought
That the sorrow of
not being with you
is only one lifelong.
* * *

There can’t be a worst sorrow than this.

That someone is kissing you right next to your neck
and you are thinking of someone else.
* * *

Hot winds pierce the leaves bodies
sparrow keep hoping on a branch
life in desert moves on. 

Resting against the wall
the devil thinks about his beloved.

Like a pulley in a dry well
a separated heart cries
and like a blade cutting wood
shines love in separation.

Nearby the sounds of marriage drums sing
Devil’s beloved, devil’s beloved, devil’s beloved.

And the devil dies in her memory.
* * *

They confiscated my dice
and ostracised me 
saying 
I am the cheapest gambler. 

On all side of my dice was your name. 
* * *  

[Painting courtesy : Molly Prince]

November 18, 2015

वादे की टूटी हुई लकीर पर

काश बालकनी में उग आती
एक बेरी.

कोई शाख झांकती खिड़की से अंदर
कोई काँटा फंस जाता स्वेटर की बाह में.

अचानक लगता कि तुम आ गए.
* * *

उलझे होते काँटों में
और पीड़ा भरी होती पोर-पोर में.

मगर काश हम होते.
* * *

आंधियां आकर उड़ा ले जाती है गर्द
इंतज़ार आकर ढक देता है गर्द से.

तुम्हारे बिना ज़िन्दगी
आसान है या मुश्किल, कहना कठिन है.
* * *

एक तड़प सी बची है
दो धडकनों के बीच.

एक ज़िन्दगी थी सो तुम्हारे साथ चली गयी.
* * *

साँझ के झुटपुटे में
आती है उडती हुई चिड़ियाँ
दौड़ते हुए खो जाते हैं खरगोश.

रात की मुंडेर पर बैठा मैं
भर लेता हूँ दो कासे.

एक मज़बूरी से दूजा इंतज़ार से.
* * *

जैकेट की जेब के अन्दर की तरफ
छुपा लेता हूँ व्हिस्की भरा गिलास.

जैसे सहेज रहा होऊं
हताशा में उदासी
नाकामी में इंतज़ार.
* * *

रेत के धोरे की किनार पर
नदी किनारे के किसी घाट की आखिरी सीढ़ी पर
पहाड़ की तलहटी के किसी पत्थर पर बैठे हुए
आँख में एक आंसू था मगर लुढ़क न सका.

ज़िन्दगी इसके सिवा तुमसे कोई शिकवा नहीं
कि वो यूं भी न मेरा था, न वो हो सकता है.
* * *

परित्यक्त किले की
दीवार से झांक रही थी दरारें.

जाने क्यों मुझे मेरा होना याद आया.
* * *

वे गिरफ़्तार थे
एक-दूजे की बाहों में
जैसे पसरी हुई हो रेत, सूने आँगन में.


वे उलझे थे, बेरी के काँटों में
किसी पुराने अख़बार की तरह.

अब जब
कई बार मैं पी लेता हूँ दो पैग
मुझे ख़ुशी होती है, कि वे थे.
* * *

तय होनी चाहिए कोई तारीख
हर बरबादी की.

ये बहुत बुरा होता है
कि कोई छोड़ जाये अचानक.
* * *

कभी कभी
मैं कर रहा होता हूँ दस्तखत
कि अब कुछ नहीं चाहिए.

कभी-कभी
मैं स्थगित कर देता हूँ मृत्यु
कि शायद अब भी
तुम कुछ कहना चाहते हो मुझको.
* * *

आखिरी बेवजह की बात में
मैं तुम्हें करना चाहता हूँ एक मेसेज.

मगर मैं जिसके लिए हूँ
उससे किया वादा नहीं तोडूंगा.

दुआ कर कि एक आखिरी नींद आये.
* * *

सुबह दूधिया है. 
कोहरा दीवारों, छतों, मेहराबों और रास्तों को चूमता हुआ ठहर गया है. दूर खड़े पहाड़ों से एक शांति की धुन आती है. आँखों के किनारों पर सुरमेदानी से आई ठंडी ताज़ा लकीरें रखीं हैं. सलेटी रंग के टी पर सलवटें नहीं हैं. रात किस तरह सोये थे, रात कहाँ गुम थे, रात तुमने कोई करवट ही न ली या ये बात कुछ और है. कच्चे हरे बेरों से भरी है बेरी. कहीं बोर की पीली गुच्छियाँ हैं. गिलहरियों ने अपनी सुबह की दावत शुरू कर ली है. मैं अपनी हथेली को खुला रखता हूँ. इस पर ठण्ड उतर रही है. ठण्ड दिखती नहीं, महसूस होती है. जैसे कोई होता है मगर दीखता नहीं. जैसे बातें बेवजह चली आती हैं ज़िन्दगी में. जैसे एक वादे की टूटी हुई लकीर पर खड़ी होती है कोई अजनबी परछाई. जी चाहता है इस टूटन में खुद को भर दूं और वादा बचा लूं. जी होता है शैतान का आह्वान करूँ, बस जाओ हर कहीं. रहो मेरे आस पास कि मुझे कोई दुःख दुःख न लगे, प्रतीक्षा इतनी आसान हो जाये जैसे पत्थर पर बरसते रुई के फ़ाहे. एक सख्त मन हो जो न याद करे कुछ. मगर मैं इन चाहनाओं पर आमीन कहे बिना उठ जाता हूँ. मैं जाता हूँ महबूब की याद के रास्ते. आहिस्ता और थका हुआ.

[Painting : Tsuyoshi Imamura]

November 15, 2015

बड़ी तकलीफ़ की छोटी कहानियां

रात आहिस्ता सरकती रहे मगर मन और दिमाग ठहरे रहें, एक ही बात कि तुम कब तक अपने आपको सताओगे. कब तक पागलपन के झूले पर सवार रहोगे. कोई दिन आएगा? जब ज़रा सा खुद का फेवर करोगे, बिना किसी को सताए हुए. मन को कुछ समझ नहीं आता. वह बस इसी एक बात पर सहमत होता है कि फिलहाल चुप रहो कि तुम समझ चुके हो चीज़ें सरल नहीं है. इसलिए प्लीज एक बार अपना फेवर करो कि तुम वह कर चुके हो जो किसी चीज़ को टूटने से बचाने के लिए तुम्हारे लिए ज़रूरी था. वह आवाज़ तुम दे चुके हो, जिसे देना तुम्हारी ज़रूरत थी. अब तुम खुद को हर बात के लिए माफ़ कर दो. यही सब सोचते हुए कुछ एक सच्ची और तकलीफ़ भरी बातें लिखीं. आप इन्हें सच समझें या कहानी इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. इससे फर्क पड़ता है कि अपने आस पास के धोखों को जल्दी पहचानना सीखना. ताकि आप गहरे दुःख से तब बाहर आ सको जब आने का अवसर हो न कि तब जब आपकी ज़रूरत हो. 
* * * 

हमारे घर में चार कमरे हैं और वहां हम दो लोग रहते हैं. मुझे बहुत डर लगता है.
* * * 

जब उसने मुझे ये बात बताई कि मैं जिससे प्रेम करती हूँ वह किसी और के साथ घूम रहा है, तब मैंने उसे झिड़क दिया था. मैंने इससे बड़ी भूल कभी नहीं की. 
* * * 

मेरे कुलीग फिजिकल टीचर ने मेरा शारीरिक शोषण किया था. मैंने अठाईस साल तक अकेले जीवन जीया था. बाद में घर वालों ने जबरन मेरी शादी तय कर दी. जब मैं नए घर में गयी तो मेरे लेक्चरर पति ने मुझसे कहा- वे बारहवीं में पढने वाली एक लड़की के साथ सम्बन्ध में हैं. 
* * * 

वह नवनियुक्त आईपीएस था. मैं उसे कॉलेज के दिनों से जानती थी. मैंने उससे कहा कि मुझे सिविल सर्विस की तैयारी में मदद कर दो. वह अक्सर मदद करने आता था. मैं इस काम से उकता गयी. आखिर मैंने तय किया मैं मर जाऊं.
* * * 

एक रोज़ माँ को पिताजी ने बहुत मारा. मैंने अगली सुबह शादी के लिए हाँ कर दी. 
* * * 

वह उसके ठीक सामने कार से उतरते हुए, उसे फोन पर कह रही थी. भीड़ बहुत है, मैं पैदल चलकर आ रही हूँ. तुम कहाँ खड़े हो? 
* * * 

वह एक रात मेरे पाँव के नाखून चूमता रहा. उसने कहा कि ये रंग बहुत प्यारा है. मुझे उसी रात उसे छोड़ देना चाहिए था. 
* * * 

उसे नहाने की आदत थी. वह अक्सर वाशरूम में बहुत देर तक नहाता था. मुझे उसे कहना चाहिए था कि अब बस. 
* * * 

उस शाम जब मैं घर पहुंची तब वह सब्जी बनाने की तैयारी कर रहा था. मैं जिस टूटन से भरी घर आई थी, उसे ऐसा करते देखकर और ज्यादा टूट गयी. 
* * * 

ये उस क्रीम की गंध नहीं थी, जो हमारे घर में रखी रहती थी. 
* * * 

मैं एक डरपोक हूँ. काश उसे कभी कह सकती कि उस रात तुमने मुझे क्या कहकर बुलाया था.
* * * 

गले में स्कार्फ बांधे देखकर सहपाठी ने कहा- डू यू हैव बॉय फ्रेंड. उसने जवाब दिया- नो, आई एम मेरिड. उनके सामने एक मॉडल पीठ किये थी. वह उसकी पीठ को देखने लगी. 
* * * 

अब ये रोज़ होने लगा कि वह खाने की थाली को दूर सरका देता. बुरा सा मुंह बनाता और घर से बाहर चला जाता था. 
* * * 

क्या तुम समझ नहीं सकते कि मुझे आज ही मिसकेरेज हुआ है इस हाल में किसी पार्टी में नहीं जा सकती हूँ. उसके पति ने कहा- मैं कुछ नहीं कर सकता, ये बात तुम जानो और माँ जाने. 
* * * 

मेरे एक बच्ची नहीं होती या मेरे पास कोई नौकरी होती तो मैं नरक से बहुत पहले बाहर जा चुकी होती. 
* * * 

वह मेरा एटीएम कार्ड अपने पास रखता है. 
* * * 

मुझे मालूम है कि वह क्या कर रही है. ईश्वर उसे दंड देगा.
* * * 

उसने मेरा हाथ बदतमीजी से पकड़े रखा. वह कह रहा था- हमारी शादी होने वाली है. जब मैंने ये बात माँ को बताई तो उन्होंने कहा कि इस उम्र में ऐसा होना कोई अजीब बात नहीं है. मुझे दुख है कि माँ ने मुझसे झूठ बोला था. 
* * * 
[Painting Image : Luqman Reza Mulyono]

November 7, 2015

मिट जाने तक कोई वैसे

तुम इस वक़्त बिस्तर की सलवटों में गुम हो
मैं इस वक़्त हूँ तुम्हारी याद के मुहाने पर 

लड़के ने कहा- उस जादुई नदी का नाम हिनातुँ है. 

आसमान से दो सितारे एक के बाद एक टूटे. लड़का उन टूटे तारों को देखने लगा. वह भूल गया कि उसने अभी जिस जादुई नदी का नाम लिया, उसे किसी ने सुना या नहीं. आसमान से गिरते सितारे बुझते हुए अंगारों के जैसे न होकर किसी पीले उजास के कम होते जाने जैसे थे. लड़के ने अपना हाथ आगे किया कि सितारों की राख़ उसकी हथेली को चूम ले. उसकी हथेलियाँ खाली पड़ी रहीं. उन पर अगर कोई गर्द बरसी थी तो वह उसे महसूस नहीं कर पाया था. 

रात के बारह बजने को थे. वह अपने काम से घर जाते समय रास्ते के रेलवे पुल पर रुक गया था. वह खाली पुल टूटी हुई चूड़ी का टुकड़ा दिख रहा था. उसने पुल की चौड़ाई को देखकर सोचा कि ये पुल चूड़ी नहीं किसी भरवाँ कंगन का टुकड़ा है. पुल की सड़क को गहरा लाल या रात के कसूम्बल रंग में रंग दिया जाये तो ये किसी कलाई में सजा आधा कंगन हो. और वह इस कंगन की किनार पर खड़ा है.

वो गर्द नहीं आई. ये कंगन का टुकड़ा स्थिर रहा. 

रेल के इंजन की रोशनी आई. पटरियों को चूमती और बलखाती हुई. मोड़ पर बबूलों के झुरमुट को चूमकर रौशनी ने प्लेटफ़ॉर्म की सीध में रास्ता कर लिया. रेल धक-धड़क की मद्धम हलकी आवाज़ करती हुई पुल के नीचे से गुज़र कर स्टेशन की ओर बढ़ गयी. लड़का वहीँ खड़ा था. उसने अपने हाथ समेट लिए. 

क्या उसे हवा छू रही है. क्या हवा में ठंडक है? क्या रात की नमी है? क्या कुछ ऐसा है, जिसे वह लड़का महसूस कर सके. लड़का एक अचेत चलती फिरती देह में बदल गया था. उसे हवा, ठंड और नमी का अहसास नहीं हो रहा था. उसके पास एक ही अहसास था कि उसके सर में कुछ बह रहा है. वहां कोई आसवन हो रहा है. अपशिष्ट तल में जमते जा रहे हैं और निर्मल जल सुन्दर रोचक प्रवाह बुन रहा है. 

लड़के के ख़याल कुंद थे. उनकी धार खत्म हो गयी थी. वह प्रेम के बारे में सोचने लगा. क्या उसे कोई इस तरह प्रेम नहीं कर सकता जैसे वह करता है. बस जिससे प्रेम हो उसके सिवा किसी की ज़रूरत न हो. लड़के ने खुद को समझाया. असल में वह दो दिन से खुद को समझा ही रहा था कि इस दुनिया में हर किसी को बहुत सी चीज़ों की ज़रूरत होती है. हर कोई इस तरह इकहरे प्रेम में नहीं जी सकता है. हर किसी को एकरस होने पर ऊब आती है. परिचितों, मित्रों, संगियों, सहपाठियों और इस तरह के जाने ही कितने सम्बन्ध ज़रूरी होते हैं. 

उसने खुद से पूछा- मेरे लिए ऐसा सब क्यों ज़रूरी नहीं है? मैं क्यों इतना निष्ठुर हूँ कि सबकुछ ठुकरा कर जीए जाता हूँ. मुझे क्यों एक से ही चैन आता है. मैं क्यों इस तरह का जीवन नहीं जी सकता, जिसमें एक व्यवस्थित दिनचर्या हो. मित्र हों, परिवार और ज़रा कम या ज्यादा प्रेमी हो. मैं क्यों हर वक़्त एक ही ट्रांस में रहता हूँ. मैं गलत हूँ. मुझे सचमुच ठीक-ठीक रसायनों की ज़रूरत है. 


कुछ साल पहले फिलिपिन्स में पानी के भीतर बनी गुफाओं के बीच बहने वाली रंगीन नदी के बारे में गोताखोरों को मालूम हुआ, जैसे उस लड़के को अचानक वह लड़की मिली. गहरे अवसाद के दिनों में नीली दवाओं के जादुई नशे के बीच. लड़के को लगा कि पानी में डूबी वे गुफाएं उसके दिमाग जैसी हैं. जाने कहाँ से शुरू होकर कहाँ खत्म होती हैं. एक से निकलो तो दूसरी शुरू हो जाती है. और उन गुफाओं के बीच बहने वाली नीले रंग की मीठी विद्युतीय चमक से भरी नदी, उसकी प्रिय लड़की ही है. 

वह लड़की निरंतर निर्मल रूप में नदी की तरह उसके भीतर बह रही है. 

नीले रंग के दो शेड्स को पहने हुए. नीले पानी के किनारे बैठी हुई. नीले आसमान के नीचे दूर खड़ी अट्टालिकाओं से सजे बैकड्राप से बनी तस्वीर उसके दिमाग में स्थिर है. एक प्रवाहमय स्थिर. शांत और मधुर. अचानक हलके रंग के अपर पर कुछ फूल खिल आये हैं. वो अपर रंग बदलता जा रहा है. फूल खिलकर उसे ढक रहे हैं. पानी के रंग की पत्तियां बढ़ी आ रही हैं. आहिस्ता से वह पल्लवित-पुष्पित दृश्य एक नदी में ढल जाता है. 

लड़के ने सोचा कि काश उस लड़की ने अभी सुना होता जादुई नदी का नाम तो वह चहक कर कह उठती- हम दोनों वहां चलेंगे. 

लेकिन आधा टूटा कंगन का टुकड़ा चुप पड़ा था. लड़के के दिमाग में नीली गोलियां घुल रही थी. हवा शांत थी. ज़िन्दगी उदास थी. मन अजनबी था. दुनिया थी मगर नहीं थी. बुझ गया था सबकुछ. लड़के ने रुआंसा होते हुए एक दुआ पढ़ी. ओ दुनिया के मालिक इस तकलीफ से तो अच्छा है कि सबकुछ बुझा ही दो. 

लड़के ने लोहे की ठंडी रेलिंग पर अँगुलियों से लिखा- “मिट जाने तक कोई वैसे प्रेम नहीं कर सकेगा. तुम इस दुनिया से जाओगे इंतज़ार से भरे हुए और तन्हा.” इसके बाद लड़के ने कोलोन और केपिटल डी लिखा और चला गया.
* * *

[Painting courtesy ; Michele Traggakiss]

November 4, 2015

देखना उसको, जैसे पेड़ के भीतर झांकना

ये उस साल के नम्बर की बात है जिस साल एक बूढ़ा फ़कीर अचानक सामने आ खड़ा हुआ. उसने कहा- क्या दिखाई दे रहा है? वे दोनों देर तक दूर-दूर तक देखते रहे. उन्होंने सही जवाब देने के लिए सबकुछ देख लेना चाहा. वे चाहते थे कि उनका जवाब सुनकर फ़कीर खुश हो जाये. फ़कीर ने एक हरे रंग का कुरता पहना हुआ था. उसके गले में आसमानी रंग के पत्थरों की माला थी. उसके हाथों में कत्थई रंग के मनके थे. 

फ़कीर ने कहा- मेरे बच्चे ज़िन्दगी बहुत छोटी है. जल्दी देखो और जवाब दो. 

वे दोनों अपनी चाहना के फलीभूत होने के लिए सबकुछ देखने में ही लगे थे मगर आख़िरकार फ़कीर चलने को हुआ तब उन्होंने कहा- हाँ हमने देखा. अब आप पूछिए. 

फ़कीर ने फिर वही सवाल किया- तुमने क्या देखा मेरे बच्चों? 

हड़बड़ी में वे एक साथ बोलने लगे. एक दूजे को बोलता सुनकर दोनों एक साथ रुके. फिर लड़के ने इशारा किया तुम रुको. मुझे बोलने दो. फ़कीर के चेहरे पर जवाब के इंतज़ार के सिवा कोई भाव नहीं था. 

लड़के ने कहा- एक सड़क है. इसके किनारे पेड़ खड़ा है. इसके आगे विश्वविध्यालय का मुख्य दरवाज़ा है. उस दरवाजे के प्रवेश के पास एक घुमटी है. उसमें एक गार्ड बैठा है. दूर एक टेम्पो आ रहा है. उसके पीछे एक बड़ा शोरूम दिख रहा है. 

फ़कीर ने कुछ न कहा. वह जाने क्या सोचता हुआ चुप खड़ा रहा. 

फ़कीर कि चुप्पी को देखकर लड़की ने कहा- मुझे एक पेड़ दिख रहा है. 

अचानक से बिना चमके ही फ़कीर की आँखें रोशन होने लगी. वह लड़की पर केन्द्रित होने लगा. लड़की से उसने कहा- और क्या देखा? लड़की ने कहा- शाखाएं देखीं. 

फ़कीर ने झोली से एक कटोरा निकाला और कहा बेटी तुम्हारे पास जो पानी है उसे इसमें भर दो. 

लड़की ने अपने पिट्ठू बैग से पानी की बोतल निकाली और पानी को कटोरे में उड़ेल दिया. पानी पीने के बाद फ़कीर ने कहा- बेटी शाख के आगे भी देखना. वहां कच्ची शाखाएं होंगी. उन पर पत्ते होंगे. देख सको तो देखना कि वहां कोंपलें भी होंगी. 

वह चला गया. 

लड़का उदास खड़ा रहा. उसे आशा थी कि फ़कीर कोई चमत्कार करेंगे. उसकी ज़िन्दगी संवर जाएगी. लड़की कहीं खो गयी थी. शायद पेड़ में. 

अचानक उसने उदास लड़के का हाथ थामा और अपनी तरफ खीच लिया- तुम मुझसे प्रेम करते हो? 

हाँ
तो आओ मुझे प्रेम करो
कैसे
जैसे हम पेड़ के पत्ते-पत्ते को पढ़ें 

वे दोनों भरी दोपहर एक दूजे में खोये रहे. उन्होंने प्रेम को हर जगह से चखा. वे सब कुछ भूल गए. यहाँ तक कि फ़कीर भी उनकी स्मृति में न रहा. ये सब देखते हुए समय कपूर की तरह उड़ गया. वे दोनों प्रेम में डूबे रहे. 

उस फ़कीर को गए हुए एक साल बीत गया. 

उन्होंने दुआ की- बहार का मौसम फिर आये. बवंडर के आने से पहले की ख़ामोशी की तरह कुछ समय बीता और अचानक वे एक दूजे करीब थे. उनके बीच में फासला न बचा था. वे दो थे और बाकी दुनिया उनकी बायीं या दायीं तरफ से शुरू होती थी. 

उनके वहां से उठ जाने के बाद लड़की ने कहा- अब मुझे तुम्हारे साथ सोने से अधिक सुख तुम्हारे साथ घूमने से होता है. 

एक तरफ टप टप टप रात टपकती रही. स्याही में कोई नया रंग नहीं दिखा. बदन ने अपने आपको छोड़ दिया. उदासे मन ने अपना चेहरा झुका लिया. वह कैसे जीएगा उस लड़की को छुए बिना. कैसे उसे बता पायेगा कि प्रेम क्या है? कैसे उनको सुख आएगा. अचानक लड़के को उस फ़कीर की खूब याद आने लगी. दूसरी तरफ लड़की ने सोचा कि यही वक़्त है. हम आगे बढ़ आये हैं. जब तक हम पेड़ के तने के पास थे, हम उसे बाहों में भर सकते थे. अब हम शाखों पर हैं तो टहनियों को हथेली में थाम सकते हैं. कल जब हम पत्तों के पास होंगे तब उनको सिर्फ होठों से चूम सकेंगे. पत्तों को बाहों में नहीं भरा जा सकेगा. फिर कभी हम कोंपलें देखेंगे तब सिर्फ उनको आँखों से सहला सकेंगे. 

लड़के ने दो दिन बाद लड़की से कहा- मैं समझ गया. 
लड़की की आँखों में वह फ़कीराना चमक नहीं आई. वह अब भी जानती थी कि ये पागल है. न समझा है, न समझेगा. एक दिन मेरे लिए अपने आप को मिटा देगा.
_______________________

[Painting Image : Darryl Steele]

November 3, 2015

इस छुअन का कोई नाम है



ज़िन्दगी की उदास सतर में
फिर कोई बुझी-बुझी सी लहर 
रात के पहले पहर.
कैसी हवा है न?

लड़के ने कहा- “मौसम बदल गया है. ये हवा ज़रा ठंडी, ज़रा गरम, ज़रा बेख़ुदी से भरी हुई है.” लड़का जब ये बात कह रहा था, पीले फूल रात की स्याही से भर गए थे. बस एक साया था. घनेरा, एक रंग और चुप खड़ा हुआ. किसने सोचा था कि रौशनी के डूब जाने पर रंग अपने पूरे वुजूद में बने रहने के बाद एक स्याही से ढक जायेंगे.

“वह मुझे बुला रहा है” लड़की ने कहा. लड़के को उसकी आवाज़ न सुनाई दी. अक्षरों को पढ़कर ये जानना कठिन था कि उसकी उदासी घनी है या उसकी मज़बूरी. वह उस वक़्त क्या सोच, कर या लिख रही थी, ये ठीक-ठीक जानना असंभव था. वह अपने मन में खोयी थी या किसी से मुखातिब थी, ये कहना एक कयास लगाना भर था. लड़के ने एक उलझी हुई लम्बी सांस भरी और ख़ुद से कहा- “तुम बने रहो उसके लिए, हर हाल में हर समय. फिर भी कुछ छूट गया तो भी तुम सुकून में रहोगे कि तुमने वही जीया जिसका वादा था.”

एक बार उस लड़की ने कहा था कि सब कुछ सरल होना चाहिए. ज़िन्दगी आसान होनी चाहिए. हमें अपना समय, अपनी जगह, अपना मन जीने का हक़ होना चाहिए. मैं जहाँ चाहूँ, जब चाहूँ तब वहां जा सकूँ. क्या हमारा हम पर ही कोई अधिकार नहीं. लड़के ने कहा- “हमने गुलामी चुन ली है. दूसरे गुलाम इसे तोड़ देने की जगह इसे बचाए रखने को वचनबद्ध है.” 


वे लोग ऐसी दुनिया में जी रहे थे जहाँ आज़ादी एक भयभीत करने वाला विचार था. बंधनों के समाज में सुरक्षा की आश्वस्ति थी.

लड़का नहीं चाहता कि वह लड़की को दुनिया की असलियत के बारे में ज्यादा बताता. दुःख भरे दिनों में किसी स्वप्न को तोड़ना बुरी बात होती है. लड़का अपने हाल के बारे में सोचता था कि वे दोनों किसी चिड़ियाघर में दो अलग पिंजरों में क़ैद जीव थे. वे कभी-कभी एक-दूजे को देख और सुन सकते थे मगर नुमाइश और जरूरत के कारोबार के कारण उन पर बेहिसाब बंदिशें थी. जैसे कभी बाद बरसों के चाँद को ग्रहण लगता है, कभी सूरज और धरती के रास्ते में चाँद के आने से आसमान में हीरे की अंगूठी सी शक्ल बनती है. उसी तरह वे शापित और न दोहराए जा सकने वाले मिलन के गवाह भर हो सकते थे.

लड़के के कहा-“ये ज़िन्दगी है, इसका कोई हल नहीं”

लड़की ने कहा- “हाँ”

इसके बाद एक टूटी हुई चुप्पी बोलती रही. शहर भर में रोशनियों से लेम्पपोस्ट सज गए थे. दीवारों के बीच ठहरी हुई सड़कें अजनबी शक्ल में बदल गयी थी. उस कमरे की खिड़की पर एक भारी परदा था. परदा ऐसे स्थिर था जैसे कोई मरुस्थल ठहर गया हो. उस कमरे तक रुत के बदलने की आहट आई थी या अनदेखी कर दी गयी थी कि ए सी ऑन था. इसके सिवा और वहां जो कुछ था या हो सकता था, वह एक उदासीन परिंदे के पंखों की एक ठहर के साथ आती आवाज़ थी. जैसे अँधेरे में कुछ कहीं अटक गया हो. जैसे किसी उलझी हुई रस्सी में पड़ा हुआ पाँव, ज़रा रुक कर कोई सिरा तलाश करे और फिर नियति के हाथ खुद को छोड़कर शांत हो जाये.

स्याह सलवटें. स्याह छुअन. स्याह बेकसी.

हालाँकि कई बार उसने चेहरे से चादर को हटाया मगर अँधेरा घना था. देखने को कुछ न था और चादर के अंदर और बाहर सांस एक सी आ रही थी. उसने कहा- “शुक्रिया ज़िन्दगी, सलामत रहो”


[काश उसके पास एक फीकी हंसी हुई होती. ये बात इस कहानी का हिस्सा नहीं थी. बस कहीं से मेरे ज़ेहन में दफअतन टपक गयी थी. जाने किसलिए .वैसे उस लड़की का बदन पतले धागे जैसा था ,जब वह दसवीं जमात में पढ़ती थी. उसके ख्वाब पानी जैसे थे तब उसने चाहा कि वह कहीं बह जाये. लड़का जब कॉलेज जाने लगा था, तब उसके पास एक ख्वाब था कि कोई ऐसी ही लड़की कहीं है. अगर वह मिली तो उसका नया नाम रखेगा और उसे नाम से बुलाएगा. इसलिए काश एक फीकी हंसी की जगह उनके पास ज़िन्दगी का एक दिन होता. वे मिलकर सूखे हुए गमलों में कुछ नए पौधे लगा देते और सोचते कि इनपर जल्द ही फूल आयेंगे.]
___________________
[Painting Courtesy : Nik Lamley Brown ]

November 2, 2015

एक प्रेम अलभ्य था

सैंकड़ों दोस्त और हज़ारों फॉलोवर में ख़ुशी की एक बूँद नहीं मिली। संख्या बढती जाती, संदेशे बढ़ते जाते, वाह-वाही बढती जाती. इस बढ़त में भी अनमना अरुचि का सागर मिला। कम ओ बेश हर कोई वही दे रहा था जो उसे स्वयं के लिए चाहिए था. जिस तरह मैं तुम्हें सराहूँ उसी तरह तुम भी आओ चंदन के शीतल लेप लेकर. बस एक प्रेम अलभ्य था. कहाँ मन था ऐसा कि किसी इसी तरह कि दुनिया बाशिंदे होते. बस जो मिला उसमें पाया कि आत्ममुग्धता के आवरण में बन्दी व्यक्तियों के संसार में रचनात्मकता एक प्रदर्शन मात्र थी। चेतना का आंकलन अनुपयोगी कचरे के ढेर से था। विमर्श और चिंतन की उपलब्धि गुणात्मक न होकर संख्या पर आंकी जा रही थी। 

प्रेम पीठ खुजाने जैसी वृतियों से परिभाषित था। 

सलिए उचटा हुआ मन इस संसार के प्रति अनिच्छा की पुनरावृति में निबद्ध था। दम्भ अथवा चापलूसी की क्रिया अनुभूतियों से घिरे व्यक्तियों के प्रति समर्थन भरे प्रदर्शनकारी क्रियाकलापों में आबद्ध होना आतंरिक प्रवृति के विरुद्ध था। इसे जड़ता कहा जाये तो भी ये अपनी पसन्द प्रदर्शित करने के सस्तेपन से श्रेष्ठ अवस्था समझ आई। 

तुमसे लगावट जब प्रेम की सीमारेखा को स्पर्श कर भीतर की ओर प्रवेश करती है, तब पाया कि मेरे प्रिय का इतना कथित सहज और सरल होना अशोभनीय और निम्न होना भर रह जाता है। हम सहज सरल होते हैं, ये मानव का श्रेष्ठ गुण है. मैं स्वयं भी ऐसा होना चाहता हूँ मगर ऐसा होने के पश्चात् पाता कि इससे सुख की जगह पश्चाताप आता है. मेरे अपने अनुभव इस तरह के हैं कि सहज-सरल आचरण से किसी भी विध प्रसन्न होने के स्थान पर अथवा इसके प्रति उदासीन रहने से अलग व्यथा ही आती है.  

प्रिये जब मैं एक क्षणांश में उसका त्याग करता हूँ जो तुम्हे प्रिय नहीं है, इसको क्रूर होना समझना गलत आंकलन है। वास्तव में मेरी समझ ने जो मुझे सीख दी है, वह केवल इतनी भर है कि प्रेम के असीम होने में भी अपने प्रिय की नापसन्द का सम्मान करना मेरी आवश्यकता में सबसे ऊपर है। सुखों और चाहनाओं के भार से श्रेष्ठ है इकलौते अथवा अल्प के संग जीना। मेरे लिए तुम हो तो अतिरिक्त जो कुछ है, वह अनचाहा है। सांसारिक गतिविधि वास्तव में भीतर की क्रिया होनी चाहिए और अनेक द्वारा रचित सम्पादित कार्यों से सांसारिक स्वरूप का बनना, होना चाहिए। 

हम सोच और स्वभाव के स्तर पर भिन्न हैं। चेतनापूर्ण रचनात्मकता के संग प्रवाहित होने में तुमसे जुड़े अथवा तुम जिसने जिनसे जुड़े हो के बारे में सोचना वास्तव में बाधा भर है। 

प्रेम मगर प्रेम है। कभी-कभी वैसी ही क्रियाओं में लपेट लेता है जिनसे अनुराग नहीं है। 
____________________

[Painting Image Courtesy;  Navin Tan]

डरते हैं बंदूकों वाले