An illegally produced distilled beverage.


December 31, 2015

पुराने जूते पहनकर नए साल में जाना

कभी एक उदास झांक में खोये हुए बहुत दूर तक सफ़र हो जाता है. हम कहीं नहीं जाते. हमारी नज़र ठहर जाती है. मन के भीतर से लावा की तरह कुछ बहता हुआ दूर तक पसरने लगता है. ऐसा लगता है कि रंग फीके पड़ते हुए राख़ के रंग में ढलते जा रहे हैं. चारों और पसरे सूखे-भुरभुरे, पपड़ीदार या हलके दलदली विस्तार पर निगाहें अपने कदम नहीं रखती. निग़ाह ठहरी हुई स्थिर उड़ान में हो जाती है.

दुःख है?

नहीं ये एक अवस्था है. कुछ सोचते हुए खो जाने की अवस्था. ऐसी अवस्था में पंछी और जानवर दुःख नहीं करते. वे इसे भोगते हुए टाल देते हैं. मैं कई बार उनको देखता हूँ. लगभग सांस रोके पड़े हुए जानवर मृत दिखाई देते हैं. जैसे जीवन विदा ले चुका हो और नष्ट होने के इंतज़ार में देह पड़ी हो. उनको देखते हुए मैं ठहर जाता हूँ. अपने अतीत की ओर हाथ बढ़ाकर कुछ चीज़ें टटोलने जैसी कोशिश करता हूँ. जैसे कभी नाव में बैठे हुए पानी को छूने का मन होता है. उसी तरह मैं खुद को यकीन दिलाता हूँ कि हाँ अतीत के पानी पर ज़िन्दगी की नाव खड़ी है या तैर रही है.

सोच की ये अवस्था पतझड़ है.

मैं अपने आप से कहता हूँ कि चीज़ों का नष्ट होना, उनकी चाहना और नियति है. फल को खाया जा सकता है. आदमी खायेगा, जानवर खायेगा, पंछी खायेंगे. इनमें से किसी ने नहीं खाया तो कुदरत कीड़ों को मौका देगी. वह एक आखिरी मौका होगा. उसी तरह चीज़ें बनी होती हैं. वे अपनी और बुलाती हैं. ये उनकी प्रकृति है. वे बुलाये बिना रह नहीं सकती. उनकी पूर्णता इन्हीं बुलावों में छिपी हैं. तुम क्यों दुःख मनाते हो? क्या कोई ऐसी चीज़ तुमने इस दुनिया में देखी, जो अपने आपको बचाए हुए हो? ऐसा कुछ नहीं है. बदलाव में ही जीवन है. चीज़ों को गिरने दो. उनको नष्ट होने दो. उनका लोभ त्याग दो. उनके भले की जो तुम कामना करते हो असल में वह उनकी आंतरिक प्रवृति का विरोध है. उन्हें नष्ट होने के लिए कोई माध्यम चाहिए ही.

यूं ही सोचते हुए अचानक से जानवर उठ बैठता है या पंछी उड़ जाता है. जैसे कुछ हुआ ही न था. कोई ठहराव था ही नहीं. रुकना भी नहीं था. बस वह एक अवस्था थी. जीवन के प्रवाह में एक ज़रूरी ठहराव. अब उसे भूल जाओ और नए तिनके तलाश करो. नयी जगहों का फेरा दो.मैं इन पंछियों और जानवरों से यही एक बात नहीं सीख पाया हूँ कि आगे बढ़ जाऊं. नष्ट होती चीज़ों को जाने दूँ.

शाम के धुंधलके में चलना कठिन होता है.
चीज़ें डूबते हुए उजास में वो शक्ल खोने लगती है जिसे देखने के हम अभ्यस्त होते हैं. चीज़ों के बाहरी आवरण से टकराकर रौशनी हम तक आती है. इसी रौशनी की रूकावट से हम शक्ल तय करते हैं. जहाँ रौशनी बिना किसी कठिनाई के पार हो जाती है वहां कुछ है, ये समझना कठिन होता है. जैसे कि कुछ शीशे इतने पारदर्शी होते हैं कि रौशनी को रोक नहीं पाते. वे शीशे होते हुए भी हमें दिखाई नहीं देते. जहाँ रौशनी का टकराकर लौटना न हुआ वहां कोई वस्तु है ये समझना भी मुश्किल होगा. 

शाम के धुंधलके में रौशनी का कमतर होते जाना चीज़ों के होने के इल्म को बुझा देता है.

रिश्तों में अक्सर धुंधलके आते हैं. तब समझना चाहिए कि हमें जिस बात का यकीन दिलाया जा रहा है कि अब ऐसा नहीं है, असल में उसपर से रौशनी भर हटाई गयी है. चीज़ें वहीँ छोड़ दी गयी हैं.

अक्सर, त्याग एक आडम्बर बनकर आता है. जैसे भूल से बिछावन पर पानी गिर पड़ने के बाद सीले बिस्तर पर एक और चादर बिछा दी जाये. देखो अब नहीं है सीलापन. वह मगर वहीँ होता है. लालच एक मोह जगाता है. हम ऐसा नहीं करते कि सीलेपन को धूप में डाल देते. उसे तब तक हर जगह से सुखाते जब तक कि उसका होना पूरी तरह मिट न जाये.

जहाँ आप होना चाहते हैं वहां अगर सीलापन है और वह आपको सुहाता नहीं है तो से सुखाइये. एक और ज़रूरी बात याद रखिये कि चादर पर चादर बिछाना सीलेपन को सहेजना है. सीलेपन को मिटाना नहीं है.

मेरे दफ़्तर के ऊपरी माले में सब कमरे लगभग बंद पड़े रहते हैं. एक कमरे में कबूतर का एक जोड़ा जमा रहता था. कमरे के पास के छज्जे से उसे उड़ाने के खूब जातां किये जाते थे. वे कबूतर किसी न किसी तरीके से लौट आते. एक रोज़ बेख़याली टूटी तो उधर ध्यान गया जहाँ कबूतर बैठे रहते थे. वह जगह सूनी पड़ी थी. कमरे में कितना कचरा है? ये देखने के लिए मैंने जैसे ही देखा तो पाया कि वहां एक अंडा फूटा पड़ा है. कुछ एक तिनके बिखरे हैं मगर कबूतरों की गन्दी लगभग नहीं है.

अगले दिन उसी जगह जब कबूतरों को नहीं देखा तो निगाहें उधर-उधर कबूतरों को खोजने लगी. पास ही के एक छज्जे पर दो जोड़े बैठे थे. उनको देखकर मैं कभी नहीं कह सकता कि ये वहीँ कबूतर हैं जो जिद्दी थे और उस जगह को नहीं छोड़ते थे. लेकिन असल में वह जगह खाली पड़ी हुई थी. तो ऐसा क्या हुआ? मैंने कई सारी बातें सोची. वजहें तलाशी.

क्या कबूतरों ने उस जगह को दुःख के कारण छोड़ दिया था? क्या कबूतर समझते हैं कि जब तक वे फिर से अंडे न दे सकें तब तक अंडे के फूट जाने के इस दुःख से दूर हो जाएँ. अगर दो-एक रोज़ कबूतर वहां रुकते तो उनकी गंदगी से फूटे हुए अंडे की छवि ढक जाती. वे अपनी प्रिय जगह पर रह सकते थे. क्या सचमुच पंछी दुखी होते हैं? क्या वे ये भी समझते हैं कि दुखों का इलाज सिर्फ दुखों का त्याग है?

कबूतरों के जीवन में जो सीलापन आया, उसे छोड़कर उन्होंने नयी जगह चुनी. मैं कई बार उदास होता हूँ. मेरी समझ ठहर जाती है. मुझ में उदासी के प्रति समर्पण करने की हताशा जागती है. फिर मैं कई बार उन कबूतरों को याद करता हूँ. मुझे नहीं मालूम कि मैंने उनके बारे में जो सोचा वह एक कल्पना भर है या किसी वास्तविकता के आस-पास की बात है. लेकिन ये मुझे थोड़ा हौसला देता है. तुम एक मनुष्य हो. मनुष्य चिंतनशील हो सकते हैं. उदासी और दुखों के बारे में ये सोचकर तय क्यों नहीं करते कि तुम जिसके साथ हो वह उड़कर कहीं तुम्हारे साथ जा बैठता है या सीलेपन पर परदे डालता रहता है.

धुंधलका है तो जीवन गति को मंथर कर लो, दुनिया कहीं नहीं जा रही है.

नया साल मुबारक हो. चीयर्स.


December 21, 2015

उस रोज़ आप ये भी जान लेते हैं

सर्द दिन की दोपहर में किसी की सलाइयाँ छूट गयी, जीने पर. रिश्तों जैसे जो धागे थे, वे उलझे होते तो सुलझाने के जतन में बिता देते नर्म सुबहें और ठंडी शामें मगर बदनसीबी ये कि वे धागे लगभग टूट चुके हैं. सलाइयों को देखता हूँ तो ख़याल आता है कि आँखें ऊन के गोले हुई होती तो उनमें सलाइयाँ पिरो कर रख देता किसी आले में. 


रात के बाजूबन्द से
झरती है, ठण्डी हवा।
* * *

सर्द आह थी किसी की
या मौसम का झौंका छूकर गुज़रा था।
* * *

वे सब जो
विपरीत होने का बोध थे,
असल में एक ही चीज़ थे.
* * *

भ्रम
प्रेम का सबसे बड़ा सहारा है.
* * *

अक्सर कोई कहता है
तुम उसे छोड़ क्यों नहीं देते
अक्सर दिल मुस्कुराकर बढ़ जाता है आगे.

जाने क्या बदा है?
* * *

उम्मीद से अच्छा
और उम्मीद से अधिक मारक कुछ नहीं है.
* * *

फूलों के चेहरे से स्याही बुहारती,
भीगी हरी घास पर रोशनी छिड़कती, ओ सुबह!
आ तुझे बाहों में भर लूँ।
* * *

इस बियाबां के दरवाज़े हैं
और सब बंद है. यहाँ कौन आता है?
* * *

उदास किवाड़ों पर
बेचैन मौसमों की दस्तकों में
दिल के एक कोने में
जलता हुआ किसी धुन का अलाव.

और सोचें उसे, जबकि वो, अब वो नहीं है.
* * *

आँखों में कुछ फूल उकेरे हुए दीखते थे
जो असल में थे नहीं
लफ़्ज़ों में कहानियां कही हुई मालूम होती थी
जो असल में थी नहीं.
जैसे पंद्रह दिन में किसी रोज़ चाँद दिखता है
आधे से ज़रा सा ज्यादा मगर वो होता तो उतना ही है
जितना कभी था.

इसी तरह झूठ अपने ऊपर लगा लेता है
हंसी, उदासी और शिकवों का वर्क
आधे से थोड़ा सा ज्यादा थोड़ा कम मगर
असल में होता वह झूठ ही है.

दोपहरों के इंतज़ार में अक्सर सच साफ़ दिखाई देता है और रातों की स्याही में उम्मीदें ज्यादा अच्छी लगती हैं. बशर्ते आप ख़ुद को रोने से रोक लें और सोच सकें कल के बारे में.
* * *

जिस रोज़ आप जान लेते हैं कि कोई साध रहा है एक साथ दो तीन रिश्ते. उस रोज़ आप ये बात भी जान लेते हैं कि आप एक कटते हुए पेड़ के नीचे खड़े हैं. मगर आप वहां से हटने की जगह ये सोचते रहते हैं कि किस तरफ गिरेगा.
* * *

December 2, 2015

कितनी तहें हैं, और रंग कितने हैं

दिसम्बर का महीना आरम्भ हो गया है. हल्की ठंड है मगर सर्द दिन ही हैं. सुबह धूप में बैठे हुए मुझे पुलिस दरोगा ओचुमेलोव की याद आई. और उसके साथ एक ग्रे हाउंड किस्म का मरियल कुत्ता और सुनार खुकिन याद आया. चेखव की कहानी 'गिरगिट' हमें बचपन में पढ़ाई गयी थी. शिक्षा विभाग ने सोचा होगा कि ऐसी कहानियां पढ़कर बच्चे सीख लेंगे. लेकिन बच्चों ने इस कहानी को पढ़ते और समझते हुए क्या सीखा मुझे नहीं मालूम मगर मैंने जो सीखा वह साफ़ सुथरा था. 

एक- मनुष्य के स्वभाव एवं व्यवहार की जानकारी लेना
दो- कथा की विषयवस्तु को अपने अनुभवों से जोड़ना
तीन- नवीन शब्दों के अर्थ जानना और अपने शब्द भंडार में वृद्धि करना
चार- नैतिक मूल्यों में वृद्धि करना

इनके सिवा जो कुछ और बातें कहानी के बारे में बनायीं जा सकती थीं, वे छात्र को आधा अतिरिक्त अंक दिलवा सकती थी. इसमें आगे हमारे अध्यापक कहते थे कि इस तरह की कहानियां पढने से कथा कौशल में वृद्धि होती है. 

कहानी आपने पढ़ी होंगी. इस कहानी में एक कुत्ता व्यक्ति की अंगुली काट लेता है. कुत्ते की पकड़ के हंगामे के दौरान सख्त और क़ानून की हिफाज़त के लिए प्रतिबद्ध दरोगा ओचुमेलोव अपने सिपाही साथी के साथ वहां पहुँचता है. सुनार अपनी अंगुली काटे जाने का हर्जाना मांगता है. दरोगा कहता है कि वह ऐसे आवारा कुत्तों से मनुष्यों को होने वाली हानि बर्दाश्त नहीं करेगा. भीड़ से अचानक आवाज़ आती है कि ये कुत्ता तो जनरल जिगालोव का है. इसके बाद दरोगा को बारी-बारी से ठण्ड और गर्मी लगती है. वह अपना कोट उतारता और पहनता है. अंततः ये मालूम होता है कि कुत्ता जनरल के भाई का है और वे इन दिनों यहाँ आये हुए हैं. दरोगा कहता है- अरे मुझे बताया ही नहीं गया कि वे यहाँ आये हुए हैं. कब तक रुकेंगे?” 

इसके बाद सुनार को एक उपद्रवी बताकर धमका कर दफ़ा कर दिया जाता है. कुत्ते को अपनी गोदी में उठाकर दरोगा साहब चल देते हैं. 

वे इस कहानी को कक्षा में इस तरह पढ़ाते थे कि ये व्यवस्था और चाटुकारों की कहानी है. इसमें व्यवस्था का चरित्र खुलकर सामने आता है. जहाँ कहीं व्यवस्था है वहां नैतिकता होने पर ही समाज का भला हो सकता है. आह !! काश उन्होंने इस कहानी को मनोविज्ञान की तरह पढ़ाया होता. मुझे समझाते कि बेटा इस दुनिया के आदमी का कोई भरोसा नहीं है. वह अपने लाभ और हित के लिए कितने ही स्वांग कर सकता है. तुम उसके कहे शब्दों को अंतिम न मान लेना. वह बाहर से जो दीखता है असल में अंदर से वैसा नहीं है. 

पुलिस दरोगा ओचुमेलोव काश तुम आखिरी गिरगिट होते. 

इस कहानी के नाट्य रूपांतरण को दुनिया भर में बेहिसाब खेला गया है. बहुत से कलाकार इन पात्रों को अपनी आत्मा से जोड़कर निभा सके है. इसलिए कि गिरगिट होने का गुण मनुष्य के भीतर बखूबी उपस्थित है.

डरते हैं बंदूकों वाले