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Showing posts from January, 2016

सपनों की धूसर झाड़न में

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मन उष्णता से सिंचित एक सुबह को देखता है. ऐसी सुबह जो लौट-लौट कर आती है. नुकीले प्रश्नों की खरोंचों में आई तिलमिलाहट की स्मृति रक्ताभ रेशों की तरह आड़ी तिरछी मुस्कुराती रहती है. तलवों पर पुनः शीत बरस रहा है. धूप कच्ची है, उजास मद्धम है. रात्री का अवसान हो चुका है. प्रश्नों के मुख पर चुप्पी है. उत्तरों के मुख पर प्रश्नों की कड़वाहट की स्याह छवि है. एक घिरता हुआ हल्का स्याह अकेलापन है. एक प्रज्ज्वलित होती स्मृति है. 
एक शांत, निरपेक्ष और निर्दोष मन हूक से भर उठता है. 
रिश्तों से प्रश्न न करो. उनको भीतर से खोलकर मत देखो. उनको टटोलो नहीं. उनकी प्रवृतियों को स्मृतिदोष के खाने में रखो. चुप निहारो, सराहो, प्रसन्न रहो. 
मन एक किताब उठाता है. सोचता है स्वयं को कोई रेफरेंस याद दिलाये. मन किताब का एक सौ बारहवां पन्ना खोलते हुए स्वयं को रोकता है. इस तरह के उद्धरण क्या भला करेंगे. अपनी प्रकृति और प्रवृति चिकनी मिटटी होती है. उस पर स्थिर होने का विचार तो जाग सकता है किन्तु अंततः वह स्वभाव के अनुसार ही व्यवहार करती है और फिसलन पर सब कुछ गिर पड़ता है. मन चुप्पी का सिरा थामता है. एक अनंत चुप्पी इस जगत की…

दूसरी दुनिया का कोई फाहा, जाग के कंधे पर

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बंद आँखों में
कभी-कभी
चहचहाती हैं नीली- धूसर चिड़ियाँ.
खुली आँखों में जैसे कभी बेवक्त चले आते हैं आंसू.
सुबहें तलवों के नीचे तक घुसकर गुदगुदी करती हैं. उजास का कारवां अपने चमकीले शामियाने के साथ तनकर खड़ा होता है. मैं जागता हूँ. घर में आवाजें आती हैं. रसोई से. पास के कमरों से. इन आवाज़ों में मेरी करवटें खो जाती हैं. बिस्तर के सामने की खिड़की पर पड़े हुए परदे से छनकर कुछ लकीरें उतरती हैं.
सफ़र में जो बरस जो गिर गए, उनकी बुझी हुई याद कमरे में भरी लगती है. क्यों होता है ऐसा कि जागते ही लगता है कहीं भटक गए थे, खो गए किसी रास्ते में या कुछ छूट गया है अधूरा सा. ये छूटा हुआ एक बेचैनी बुनता है. इसे पूरा कर भी नहीं सकते और इससे बच भी नहीं सकते.
कहीं ऐसा तो नहीं कि एक ही दुनिया में बसी हुई हैं अनेक दुनिया. हम इन दुनियाओं में आते-जाते रहते हैं. कई बार मन पीछे छूट जाता है. कई बार दूसरी दुनिया में जो काम कर रहे थे, उनकी स्मृति, उनका अधूरापन, उनसे बिछड़ने की तकलीफ़ साथ चली आती है. फिर किसी नींद में हम उसी दुनिया में दाख़िल हो जाते हैं.
ये सिलसिला खत्म नहीं होता.
दिल की दीवारें पहनती रहती हैं दरारें.
अँध…