An illegally produced distilled beverage.


August 23, 2016

तुम्हारे उसका क्या हाल है?

उसके हाथ साफ़ थे. अंगुलियाँ सब गिरहों को करीने से रखती जाती थीं. दिल और दिमाग भले कितनी ही जगह उलझे हों, फंदे के कसाव न कम होते थे न फैलते थे. जब तक थका हारा हुआ बदन ठंडा था. वो आराम गरमाहट भली सी लगती थी. लोग कहते थे कि ये बुनावट असल में उसकी अँगुलियों की ज़रूरत थी. वे अंगुलियाँ जो बचपन से अब तक नयी छुअन की तलबगार रही मगर अपने ही किसी डर के कारण चुप लगाकर बैठी रहती थी.
जिस तरह बेशर्मी आती है. जिस तरह असर खत्म होता है. जिस तरह परवाह जाती रहती है. उसी तरह ये हुनर भी आया था. अलग-अलग सिरे बांधना और फंदे बुनते जाना.
एक दोपहर उसने सिरा बाँधा. शाम को बात करते हैं. शाम को फंदा डाला.
"वो बहुत दूर है. हालाँकि लौटने में कोई तीन दिन का फासला भर है. मगर तुम समझते हो न कि किसी का यूं लौट आना लौटना नहीं होता. बस आधी रात को फ्लाइट लेंड करेगी. दो एक घंटे में घर की डोरबेल बजेगी. उसके इंतज़ार में कदम वहीँ दरवाज़े के पास खड़े होंगे. वह अपने ट्रोली बैग को किनारे कर देगा. उसी तरफ जहाँ पिछली बार लाया हुआ एक पौधा रखा होगा. वाशरूम उधर ही है. रास्ता बेडरूम के अन्दर है. अगर उसी की आदत न हुई होती तो वो वो वहीँ सामने रखे सोफे पर आराम करने लगे."
इस फंदे के बाद उसने सांस ली. एक छोटी चुप्पी भरी सांस. ये सांस भी एक फंदा ही था. जो आगे इस तरह बढ़ा- "खिड़की के पास रखे हुए गद्दे, खिड़की के बाहर टंगा हुआ गन्दला आसमान. दोनों किसी काम के नहीं हैं. एक तरफ इंतज़ार किया जा सकता है, दूजी तरफ दूर तक फैले सूनेपन में बे रोक देखा जा सकता है. मैं बस ऐसे ही कोई कागज़ उठाऊं और उस पर लकीरें खींचने लगूं. मालूम है तुमको बेल, बूटे, कसीदे जैसे आकार मुझे भाते हैं. कागज़, कलम, रंग एक इंतज़ार लिखते हैं. रिश्तों से दूर और धन की घनी छाया में मेरा मन चाहता है कि आते ही वो मुझे बाहों में भर ले. पूछे कि कब से नींद नहीं आई?"
इस फंदे की मुकम्मल बुनावट के बाद एक फीकी सी हंसी हवा में घुल जाती है. "अरे कुछ नहीं होता. सब मुझे ही करना पड़ता है"
छोटी चुप्पी, छोटी साँस के बाद - "जाने दे."
फंदे ख़त्म नहीं होते- "हम सबके साथ ऐसा ही है. ठीक ऐसा न हो तो भी लगभग यही है. तुम्हारे उसका क्या हाल है? पता है, तुम मूर्ख हो. तुम चाहो तो... "
* * *

मैं अपनी अंगुलियाँ झटक लेता हूँ. फंदे लिखने से भी अक्सर अँगुलियों का दम घुटने लगता है. 

फंदे - 1

August 12, 2016

उससे पहले

स्मृतियां गहरे से हल्के रंग की ओर बढ़ती हैं। फिर पीली पड़ जाती हैं। जैसे किसी तस्वीर का कागज़ उम्रदराज़ दिखने लगता है। उसके पीलेपन को देखते हुए लगता है कि एक हलके से मोड़ से टूट जाएगा। उस कागज़ को छूने से अंगुलियां डरती हैं। जाने किस छुअन से एक दरार आ जाये। आँखे चुप बैठी सोचती हैं। वो कितना ताज़ा लम्हा था। वक़्त की धूप छाया तक कैसे चली आती है। बंद कमरे की दीवार को भी धूप किस तरह छूती है। कि कागज़ अपना हरापन खो देता है।

तस्वीर के कागजों की कुछ जड़ें हुई होती तो शायद कुछ और वक़्त तक अपना हरापन सींचती रहती। ऐसे ही स्मृतियां जिन कारणों से बची रहती हैं, वे सब कारण असल में बीत चुके कारण होते हैं। स्मृतियों के अक्स में एक पीलापन अपनी जगह बनाता रहता है। हम एक रोज़ स्मृति को छूने से डरते लगते हैं।

सब स्मृतियां उन कारणों पर खिलती हैं जिनके पाए सम्मोहन होते हैं। ये सम्मोहनों की ही दुनिया है। सम्मोहन अपने भीतर ईर्ष्या और युद्ध के नक्शे लिए होते हैं। ये ऐसे संघर्ष है जिन्हें आप टाल नहीं सकते। इनसे लड़कर ही मुक्त हुआ जा सकता है।

अकेलेपन का अभ्यस्त नित नए सम्बन्ध तलाशने में सुख पाता है। वह व्यक्ति आस पास की जड़ों में अपने पैर फंसाता है। बेल की घुमावदार कोमल जकड़न बनाता है। उसी से उसी को छीनता है, जिसके सहारे उगा हुआ है। इस जीवन जुगत में किसी एक हरेपन को हारना होता है। जीत अक्सर परजीवी की होती है। वह सम्बन्धों का पानी चुरा कर आगे बढ़ जाता है।

कभी ऊँची शाखों पर ज़िद करके घोंसला बनाने वाली चिड़िया अपने साथ कुछ बीज लेकर आती है। पेड़ जानता है कि इन बीजों में से कोई एक कोटर में जा गिरेगा। वह बीज उगकर एक दिन उसे लील लेगा। लेकिन जीवन में समझदारी सिर्फ कहने को ज्यादा होती है। जीवन अक्सर लाचार बंधुआ होता।

हम सब हारने को अभिशप्त होने की जगह अपने से लगने वाले रिश्तों से ही छले जाने की नियति से बंधे होते हैं। सच कहूं तो पेड़ का खिले रहने की कामना में रहना ही कष्ट का सबसे बड़ा कारण है। जिन्हें बार-बार नष्ट होकर उगने का हुनर होता है, केवल वे ही इस प्रक्रिया में शांत और गतिमान रहते हैं।

एक रोज़ कोई गहरा सन्नाटा उस चिड़िया के अंतस को भी भेद देता है। ख़ामोशी में याद किरचों की तरह बिखर जाती है। वो दौड़ता भागता मन चोटिल होकर लम्बी सांसे लेने लगता है। तब कोई हल नहीं होता। अपने किये और जीये हुए के नतीजे उसकी साँस घोट देते हैं। सूखे हुए दरख़्त चिड़िया की बुझी हुई आँखे देखने को नहीं होते। वे उसके मरने से पहले मर चुके होते हैं।

जीन्स पुरानी हो चुकी है कि सिर्फ ज़िंदा चीज़ें ही नहीं मरती।

August 11, 2016

असंयत उद्विग्न

आप कभी नहीं समझ पाएंगे कि आसान क्या है और मुश्किल क्या? इस दुनिया में सबकुछ अपनी न्यूनता और आधिक्य के साथ गुण-दोष में परिवर्तित होता रहता है। इधर कई रोज़ से आसमान में बादल हैं। सूरज दिखा नहीं। पूरे राजस्थान में बरसात किसी नवेले प्रिय की तरह बरस रही है। कुछ एक टुकड़े जो सूखे हैं, बादलों की छतरी उन पर भी बनी हुई है। रेगिस्तान तपता हुआ कितना कड़ा लगता है। पानी ही जीवन की इकलौती ज़रूरत जान पड़ती है। जहाँ तक आप देख पाते हैं, केवल सूखा और तपिश दिखाई देती है। इधर जब बादल आसाम पर डेरा डालते हैं और बिखरने का नाम नहीं लेते तब स्थिति प्रकृति के विपरीत हो जाती है। कैसी आदतें होती है न। सूखे, बियाबान और उजाड़ में जीने की आदत। प्यास, पसीना और तन्हाई की आदत। प्रेम की कामना, प्रतीक्षा और उसके अंत होने की चाहना। लेकिन कभी सब बदल जाता है। सडकों के किनारे काई जमी दिखने लगती है। हरियाली का बारीक अक्स हर तरफ उभर आता है। सीले कमरे, सीले पैराहन, सीले बिस्तर और भीगी भारी स्मृतियां।

सफ़र के टुकड़े पांवों में चुभे रहते हैं। लंबे समय तक कहीं जाने की आदत नहीं होती। कभी यात्रा पर यात्रा आमंत्रित करती रहती है। नए पुराने शहरों में, बीते हुए रिश्तों और नए चेहरों की आमद में हम कहीं पीछे छूट गए होते हैं मगर खुद को वर्तमान तक खींचने की जुगत लगाते रहते हैं। कॉफी हाउस, मॉल्स, बड़े शोरूम्स के आगे के अविराम चलते बरामदे। देखे भाले रेलवे स्टेशन, मेट्रो, बसें, कैब्स। सब कुछ मिलकर किसी नयी सर्जना की भूमि तो बनाते हैं लेकिन सर्जक जीवन के इस कारवां में कहीं थककर बैठ चुका होता है। बारिश किस तरह गिरती है, ये लिखने वाला मन गायब रहता है।

बस इसी तरह शायद सबका जीवन चलता होगा।

कुछ एक किताबें पास में हैं। मैं रोज़ दो सौ पन्ने की औसत गति से उनका पठन करता हूँ। किसी एक सिटिंग में साठ-सत्तर पन्ने पढ़ते हुए अकसर कुछ एक पैरा, कुछ एक पंक्तियां लौटकर पुनः पढ़नी पड़ती है। मुझे याद है कि मेरा पढ़ना कभी तेज़ कदम रहा ही नहीं। मैं तीन सौ पन्ने पढ़कर थक जाता था। कुछ रोज़ पहले रेल यात्रा में एक उपन्यास को बाड़मेर से रेक के छूटते ही निकाला था। वे डेढ़ सौ पन्ने पढ़ने में मुझे ढाई- तीन घंटे लगे। उपन्यास का प्रवाह तो अद्भुत था ही शब्दों का आकार भी बड़ा था। कितना के पूरा होते ही ख़याल आया कि ये शायद बीस एक हज़ार शब्द रहे होंगे। मेरे एक सहयात्री ने दूजे से कहा- इनकी किताब पूरी होने वाली है। इसके बाद शायिका को खोलते हैं। मुझे ख़ुशी हुई कि पढ़ते हुए व्यक्ति को लोग परेशान नहीं करने का मन रखते हैं।

कल एक छूटी हुई किताब हाथ लगी। दो एक महीने पहले उसके आठ नौ पन्ने पढ़े थे। वो किताब इस तरह छूट गयी जैसे अजाने जीवन का कोई काम छूट जाता है। एक लघु उपन्यास है। सादा लिफ़ाफ़ा। इसके लेखक हैं, मोती नन्दी। मोती बाँग्ला का उच्चारण है। हिंदी में उनको मति नंदी लिखा गया है।

प्रियव्रत का जीवन एक छद्म आवरण में गुज़र रहा है। वह असल पहचान को छुपाये हुए जीता है। जीवन के छब्बीस बरस। प्रियव्रत ने मज़बूरी में एक छद्म नाम से नौकरी हासिल की थी। नौकरी दिलाने वाला छब्बीस सालों तक भयादोहन करता है। एक रोज़ प्रियव्रत का बचपन के दोस्त की बेटी निरुपमा से मिलना होता है। नीरू छद्म आवरण पर तेजाब की तरह गिरती है। कहानी पढ़ते हुए, कोलकाता का शहरी ढब, ट्रामें, सस्ते जीवन, गिरते मूल्य और परपीड़ा से बेखबर उदास जीवन सामने से गुज़रता रहता है। मैं इस उपन्यास को सुबह और शाम दो बैठक में पूरा करता हूँ। मैं कुछ एक कहानियां और उपन्यास पहले पन्ने से आगे नहीं पढ़ पाता हूं। लेकिन सादा लिफ़ाफ़ा की अद्भुत शैली और कथानक का प्रवाह मुझे परमानन्द तो नहीं मगर आनंद की ओर ले जाता है।

तुम्हें मालूम है एक रोज़ छद्म आवरण में ढका हुआ सब कुछ बाहर की दुनिया के सामने आ जाता है।

अभी मैंने अपनी किताबों के बीच से लेव टॉलस्टॉय की लंबी कहानी खोज निकली है। सुखी दम्पत्ति। मुझे इस कहानी की याद कुछ रोज़ से थी। सर्गेई, मरिया और कात्या याद थे। मालूम है इस कहानी में पात्रों के आचरण और कथन के बीच के बारीक परदे, हलकी स्याही और नमक सी गलन रुक रुक कर पढ़ने पर मजबूर करती है। हम बार-बार किन्ही कहानियों को क्यों पढ़ते हैं? मुझे नहीं मालूम मगर मैं नयी कहानियां भी खूब पढता हूँ। पिछले दिनों नरेश सक्सेना और उपासना झा की कुछ कहानियां पढ़ीं। कुछ एक कहानियां सुखी करती हैं। उनके भीतर रचे बिछोह में गहरा जीवन होता है।

"तुम खेलना चाहते हो, बेशक खेलो। लेकिन मेरे साथ मत खेलो। मैं यहाँ किसी और वजह से हूँ।" सुखी दाम्पत्य। टॉलस्टॉय।

डरते हैं बंदूकों वाले