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सर्द मौसम भला था

"ऐसे दूर हो। जैसे किसी और के पास हो।" इतना कहकर हमें चुप हो जाना चाहिए. इसे अधिक कोई क्या कह सकता है. जिस हगाह नज़र धुंधला जाये, जिस जगह पहाड़ शुरू होने लगे, जिस जगह गीलापन सूखने लगे. ऐसी हर जगह पर ठहर जाना चाहिए. बहुत गहरे विचार से पूरा समय लेकर तय करना चाहिए कि हमें अब किधर जाना चाहिए. 

सर्द दिनों में पहाड़
कोहरे से ढक जाते हैं।

सर्द दिनों में भीग जाती है
रेगिस्तान की रेत।

सर्द दिनों में समन्दर
हो जाते हैं बर्फ।

मेरा जाने क्या होगा?

कि जाने किससे हो जाये
तुमको प्रेम।
* * *

पिछली सर्दियों में तुमने बुनी थी
कहवा के प्याले के लिए स्वेटर।

इस बार के सर्द दिनों में
शायद तुम सिर्फ देख ही लो कभी, मेरी तरफ।

सर्द दिनों का केवल इसलिए इंतज़ार है।
* * *

सर्द दिनों में
कोई ध्यान नहीं देता
कि दरवाज़ा बन्द क्यों है?

इसलिये अच्छा है ये मौसम।

इसलिए भी अच्छा है
कि हम छुपा सकते हैं मुंह
और कोई नहीं पूछता
वो जो बेक़रारी थी,
वो जो इंतज़ार था कहाँ गया?
* * *

सर्द मौसम भला था
कि उन दिनों मिले थे हम।

अब भी भला होगा
कि ढके जा सकेंगे, पुराने हो चुके रिश्ते
सर्दी के नाम पर।
* * *

अक्सर ज़रूरी सवालों को समय की धूल ढक देती है। अक्सर हम भी तब तक उन सवालों को एक तरफ रखा मान लेते हैं।
* * *

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चुड़ैल तू ही सहारा है

रेगिस्तान में चुड़ैलों के कहर का मौसम है. वे चुपके से आती हैं. औरतों की चोटी काट देती हैं. इसके बाद पेट या हाथ पर त्रिशूल जैसा ज़ख्म बनाती हैं और गायब हो जाती हैं.
सिलसिला कुछ महीने भर पहले आरम्भ हुआ है. बीकानेर के नोखा के पास एक गाँव में चोटी काटने की घटना हुई. राष्ट्रीय स्तर के एक टीवी चैनल ने इस घटना को कवर किया. पीड़ित और परिवार वालों के इंटरव्यू रिकॉर्ड किये. कटी हुई चोटी दिखाई. बदन पर बनाया गया निशान दिखाया. गाँव के बाशिंदों की प्रतिक्रिया दर्ज की. पुलिस वालों के मत लिए. इसके बाद इसे एक कोरा अंध विश्वास कहा. घटना के असत्य होने का लेबल लगाया. टीवी पर आधा घंटे का मनोरंजन करने के बाद इस तरह सोशल मिडिया के जरिये फैल रही अफवाह को ध्वस्त कर दिया.
इसके बाद इस तरह की घटनाओं का सिलसिला चल पड़ा. बीकानेर के बाद जोधपुर जिले की कुछ तहसीलों में घटनाएँ हुईं. जोधपुर से ये सिलसिला बाड़मेर तक आ पहुंचा. सभी जगहों पर एक साथ पांच-सात स्त्रियों के साथ ऐसी घटनाएँ हुईं. उनकी कटी हुई चोटी का साइज़ और काटने का तरीका एक सा सामने आया. शरीर पर बनने वाले निशानों की साइज़ अलग थी मगर पैटर्न एक ही था.
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मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।