April 24, 2010

कितने साये याद करूँ

दसों दिशाओं में आग बरसती है.

रेत के सहरा में उठते हैं धूल और स्मृतियों के बवंडर. सन्नाटा पसर जाता है धुली हुई चादरों की तरह. घड़ी भर की छाँव में याद की पोटली से निकली कुछ हरे रंग की चूड़ियाँ, लू को थोडा सा विराम देती है. एक पीले रंग का ततैया पानी की मटकियों के पास काली मिटटी को खोदता हुआ, गरमी के बारे में शायद नहीं सोचता होगा. पिछले साल उसने दरवाजे के ठीक बीच में गलती से अपना घरोंदा बनाया था या फिर गलत जगह पर दरवाजा बना हुआ था.

जैसे तुम्हें केजुअली याद करता हूं वैसे ही वह दरवाजा भी खुलता और बंद हुआ करता था. जाने किसकी आमद के इंतजार में महीनों से खुला वह दरवाज़ा एक दिन उकता कर अपने आप बंद हो गया. ततैये के घरोंदे से उसके सफ़ेद - पीली लट जैसे दस - बारह बच्चे धूप में गिरे और झुलस कर मर गए. जब ट्रेन तीन नंबर प्लेटफार्म छोड़ने को थी और मैं तुम्हारा हाथ थामे हुए, बस एक और पल की दुआ कर रहा था कि वही दरवाज़ा बहुत दिनों तक खुला रहने के बाद औचक बंद हो गया था.

इन दिनों सिर्फ शराब पीता हूँ.


April 18, 2010

मैं माओवादी नहीं हूँ

गरमियां फिर से लौट आई है दो दशक पहले ये दिन मौसम की तपन के नहीं हुआ करते थे. सबसे बड़े दिन के इंतजार में रातें सड़कों को नापने और हलवाईयों के बड़े कडाह में उबल रहे दूध को पीने की हुआ करती थी. वे कड़ाह इतने चपटे होते थे कि मुझे हमेशा लोमड़ी की दावत याद आ जाती थी, जिसमे सारस एक चपटी थाली में रखी दावत को उड़ा नहीं सका था. रात की मदहोश कर देने वाली ठंडक में सारा शहर खाना खाने के बाद दूध या पान की तलब से खिंचा हुआ चोराहों पर चला आया करता था.

जिस तेजी से सब चीजें बदली है. उसी तरह फूलों के मुरझाने और रेत के तपने का कोई तय समय नहीं रहा है. बढ़ती हुई गरमी में मस्तिष्क का रासायनिक संतुलन गड़बड़ होने से जो दो तीन ख़याल मेरे को घेरे रहते हैं, वे बहुत राष्ट्र विरोधी है. कल रात को पहले एक ख़याल आया था कि आईस बार जैसा मेरा भी अपना एक बार हो. उसमे बैठने के लिए विशेष वस्त्र धारण करने पड़ें जो तीन चार डिग्री तापमान को बर्दाश्त करने के लिए उपयुक्त हों. जहाँ बरफ के प्यालों में दम ठंडी शराब रखी हों जो गले में एक आरी की तरह उतरे. जब ये सोच रहा था तब रात के आठ बजे थे और घर की छत पर तापमान था बयालीस डिग्री यानि दिन के उच्चतम स्तर से चार डिग्री कम तो ऐसे में शराब के लिए ही छत पर बैठा जा सकता है क्योंकि इस गरमी में चाँद तारे अपना आकर्षण खो चुके होते हैं. अपना निजी आईस बार होना एक राष्ट्रद्रोही ख़याल है क्योंकि भूखे और तंगहाल जीवन यापन करने वाली चालीस फीसद आबादी के विकसित होने से पूर्व ऐसा ख़याल रखना सामंतवाद, पूंजीवाद और राजशाही का प्रतीक है.

ख़यालों की इस दौड़ में दूसरा ख़याल आया कि अस्सी के दशक में एक साल पड़ी भयानक गरमी ने जैसलमेर में तेल गैस खोज रहे विदेशी गोरी चमड़ी वालों को हलकान कर दिया, उनमे से एक तो ए सी के आगे लेटा - लेटा ही दुनिया को छोड़ गया. उसकी बची पार्थिव देह को देख कर उसके सखा थार के इस मरुस्थल को छोड़ गए थे. इस बार की गरमी भी कुछ ख़ास होगी, अभी मई और जून जिसे कहते हैं उनका आना बाकी है , मैं चाहता हूँ कि गजब की पड़े सब रिकार्ड तोड़ दे. ये बड़ी गरमी का ख़याल इसलिए है कि केयर्न इण्डिया ने भारत सरकार को अधिक हिस्सेदारी देने से मना कर दिया है. भारत सरकार ने ओ ऍन जी सी को भागीदार बनने के बहुतेरे प्रयास किये मगर इस मिट्टी में दबे तेल पर अब सिर्फ ब्रितानिया कंपनी का हक है. मिडिया खुश है बड़ी खबरें छापता है कि देश आत्मनिर्भर हो गया है तेल के मसले में, कोई पूछो तो सही कि दस डॉलर लागत में उत्पादित होने वाले क्रूड के अंतरराष्ट्रीय दाम हैं अस्सी डॉलर, फिर हमारा ही तेल हमें किस भाव से मिलेगा ? और लाईट स्वीट क्रूड के दाम बढ़ते ही जा रहे हैं. देश के तेल का बाईस फीसद हिस्सा यहाँ से निकलेगा मगर हमें क्या मिलेगा ?

हमें मिलेगा बस्तर के आदिवासियों की तरह अपने ही देश से 'देश- निकाला. हमारी ज़मीन इस बहुराष्ट्रीय कंपनी के लिए सरकार ने छीन ली है. सदियों से जिस ज़मीन पर जैसे कुदरत ने रखा वैसे रहने के बाद, अब अपने बहुमूल्य पेड़ और झाड़ियों को खोते जा रहे हैं. ज़िन्दगी में नई चीजें आती जा रही है डामर की सड़कें, आग उगलते बेरल पोईन्ट्स, भारी भरकम वाहनों का प्रदूषण, पचासों होटल्स के सैंकड़ों कमरों में लगे दो - दो सौ ए सी से निकलती गरमी, सांस्कृतिक प्रदूषण और पैसे की चकाचौंध में पगलाए हुए किसानों की राह से भटकी हुई नयी पीढी. हजारों परिवारों की ज़मीन छिनी तो मुआवजा मिला लाखों और करोड़ों में, इससे समाज में एक बड़ी आर्थिक खाई बनी. अब इन बेघर हुए परिवारों को सौ किलोमीटर के दायरे में ज़मीन नहीं मिल रही यानि पैसे से इनकी जड़ें खोद दी गयी है.

जाने दो आगे कहना ठीक नहीं है, अरुंधती का नाम बड़ा है उसे बचाने कई आ जाएंगे. मुझे कह दिया गया कि मैं माओवादियों की तरह बोल रहा हूँ तो मेरा इतना सामर्थ्य नहीं है कि धन्ना सेठों के लिए बनी जेलों में अपने लिए एक पव्वे का इंतजाम करवा सकूँ.

April 4, 2010

म्हें होग्यो फोफलियो

मिनिट मेड न्यूट्री लेमन की बोतल ख़त्म होने को थी तो सोचा कि थोडा सा ज़िन कल के लिए बचा लिया जाये. इसी उधेड़बुन में एक नीट पैग गले उतर गया. धुआं सा कुछ मुंह से उठा और आह बन कर हवा में खो गया. मेरी वाईफी आज मेरे लिए रेशनल कारपोरेशन के स्टोर से कुछ ख़ास किस्म के स्नेक्स लायी थी, वे भी कमबख्त और आग लगाने से नहीं चूके. अब आईस क्यूब का सहारा है और कल के हसीं दिन की ख़ास यादों का, जिनमे दोस्त तेरा दिल धड़कता था.

अपने मोबाइल फोन के पास सफ़ेद चने रखता हुआ सोचता हूँ कि जल्दबाजी की वजह है नयी फसल के नए फल. कल सांगरियों की सब्जी बनी थी यानि मरुभूमि के कल्प वृक्ष खेजड़ी के फल की. उस सब्जी के बारे में सोचते हुए मुझे रतन सिंह जी की याद हो आई यानि आर एस हरियाणवी 'रतन'. आपने कभी अहमद हुसैन मोहम्मद हुसैन की आवाज़ में ग़ज़ल सुनी हो "सीने में समंदर के लावे सा सुलगता हूँ, मैं तेरी इनायत की बारिश को तरसता हूँ, चन्दन सा बदन उसका खुशबू का समंदर था, एक बार छुआ लेकिन अब तक महकता हूँ..." तो ये शाईर हैं जनाब रतन हरियाणवी.

हरियाणवी जी से मैं साल निन्यानवे में मिला था. वे तब आकाशवाणी में उप निदेशक हुआ करते थे. उनके सम्मान में आयोजित एक सांस्कृतिक संध्या में मैंने कुछ राजस्थानी में कविताओं के टुकड़े पढ़े थे. उस जिंदादिल शाईर ने मेरी पसंद की कविताओं के शब्दों पर गहरी साँसें ली थी और फिर एकांत में मुझसे उनके सन्दर्भ में बात भी की थी. उन्होंने राजस्थान में बहुत नौकरी की मगर जिन कवियों की पंक्तियाँ मैं बोल रहा था वे उनके लिए अद्भुत थी.

शराब पीते वक्त जाने क्यूं आज एक और मुराद दोस्त की याद आ रही है मगर वह अभी ऑनलाइन नहीं है. खैर मैं सांगरी और हरियाणवी जी की बात कर रहा था. उस नेक दिल इंसान ने मुझसे राजस्थान के लोकगीतों के बारे में बहुत देर तक बात की, मैंने उन्हें कहा कि आपको एक शेर सुनाता हूं जो राजस्थानी लोक गीत का दोहा है लेकिन इसमें सब शेर को चित्त करने का सामर्थ्य है.


डूंगर माथे डूंगरी जी कईं सोनों घड़े सुनार
बिछिया घड़ दे बाजणा, म्हारी पायल री झंकार.

इस गीत में नायिका कह रही है, हे सुनार, कुदरत ने इतना खूब रचा है कि पर्वत के ऊपर पर्वत खड़े कर दिए हैं तुम अपनी कला रहने दो, मेरे लिए बजने वाले बिछिये घड़ दो ताकि पायल मनभावन आवाज़ में बजने वाली बन जाये. ये लोक गीत है, हिचकी... उन्होंने बताया कि मैंने गीत हज़ार बार सुना मगर इस पक्ष को नहीं देखा.

जिस कविता पर वे संजीदा हुए वह आज़ादी के पचास वर्षों का मखौल उड़ाती है. समय के साथ अपेक्षाएं बढ़ी है किन्तु वे जायज हैं कि हम सब का भला कुछ नहीं हुआ है. सूखे हुए काचर को फोफलिया कहते हैं. अब बिम्ब देखिये कि एक खेजड़ी के फल और बरसात में होने वाले काचर के जरिये कवि क्या कहता है ?

आजादी मिलियाँ पछे न म्हें पाँग्र्यो, न थूं पांगरी
म्हें होग्यो फोफलियो अर तूं होगी सांगरी।

इस कविता में कवि कहता है कि आज़ादी मिलने के बाद न मैं फला फूला न ही तुम, मैं तो सूख कर फोफलिया हो गया हूँ और तुम एक सूखी हुई सांगरी, यानि दोनों के बदन का रस चूस लिया गया है. रतन हरियाणवी साहब बहुत दिनों तक दुनिया के रंजो-गम में नहीं रहे. वे मुझे अपने घर एक शाम बिताने को आमंत्रित कर गए थे मगर उनके पास बहुत कम शामें थी. आज जब फिर से मेरी स्वीट वाईफी ने सांगरी बनाई है मैं उनको याद करते हुए रो पड़ा हूँ और मेरा आज का आखिरी पैग पूरा होने को है काश वे इसे पूर्णता देते ?

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.