June 24, 2010

अलग किस्म की याद जैसे 'साही' की पीठ पर काला सफ़ेद तीर

घड़ी की पुरानी सुइयों जैसे टूटे फूटे पल. जिनमे तेरी खुशबू सुनाई देती, अब मंदिर की सीढ़ियों के किनारे लगे लेम्प पोस्टों में बदल गए हैं. शाम होते ही जलते बुझते रहते हैं. मेरी आँखें, उन्हें अपलक निहारने में कोई कष्ट नहीं पाती. वे पहाड़ी के विस्तार पर उन लम्हों की याद ताजा करने को अटकी रहती है, जब तुम्हें हर बार सायास कहीं से छू लिया करता था और तुम मुड़ कर नहीं देखती थी. उसी मुड़ कर न देखने से उपजने वाली मुहब्बत की फसल अब बरबाद हो चुकी है.

धरती पर पहाड़, इंसान में प्रेम की तरह है. प्रेम और पहाड़ दुनिया में हर जगह पाए जाते हैं यहाँ तक की भयावह सूने रेगिस्तानों में भी, कहीं ऊँचे, कहीं चपटे और कहीं 'डेड ऐंड'. बस ऐसे ही हर कोई एक दिन उस डेड ऐंड पर खड़ा हुआ करता है. कुछ के हाथ में नरम भीगी अंगुलियाँ होती है जो आगे की गहराई को देख कर कसती जाती है और ज्यादातर मेरी तरह तनहा खड़े हो कर सोचते हैं कि अगर तुम यहाँ होती तो मेरी बाँह को थामे हुए इस गहराई को किस तरह देखती.


मेरे पास बहुत कुछ बचा हुआ है. उसमे एक जोड़ी सेंडिल की तस्वीर भी है. किसी पहाड़ पर बने मंदिर के आगे आराम करने को बनाई गई पत्थर की बेंच के ऊपर रखी हुई सेंडिल, कैसा पागलपन है कि मैं ऐसी तस्वीर को अभी भी सहेज कर बैठा हूँ. अब तुम्हारे दो बच्चे तो होंगे ही... फिर रात होने को है तो जाहिर है कि उनके डिनर की तैयारी चल रही होगी. सोचता हूँ कि किचन में जब तुम सब्जी काट रही हो तब वह भी तुम्हारे कंधों पर हाथ रख कर मेरी तरह खड़ा होता होगा... फ़िर ख़याल आता है कि अब उसने रसोई में प्यार जताने पर भड़क जाने वाली आदत जरूर बदल ली होगी. ऐसा इसलिए सोचता हूँ कि मैंने अपनी बहुत सी आदतें बदल ली हैं.

आदमी दुनिया में सीखने आया है, पिछले दस सालों में मैंने भी सीखा कि अन्तरंग क्षणों में कहो 'आई लव यू' और इसे याद रख कर कहो, फिर उसकी तरफ देखते हुए मुस्कुराओ और आहिस्ता से अपनी आँखें बंद कर लो. जिंदगी इस एक काम से स्मूथ राईड की तरह हो जाती है... तुम परेशान ना होओ... कि दुनिया में कई लोग हैं मेरे जैसे, जो असंभव को जीने की उम्मीद से जीये जाते है.

June 20, 2010

स्त्री तुम सदा सुहागन रहो, अभी हमारे पास दूसरे काम हैं...


फैंव्किस बर्नियर विदेशी क्रिस्तान था और उसने शाहजहाँ के समय भारत में रहते हुए मुगलों की नौकरी की थी. उसने दुनिया भर में लम्बी यात्रायें की और सामाजिक जीवन को दर्ज किया. विकासशील किन्तु रुढियों से जकड़े हुए इस देश के लोगों को और खुद को देखता हूँ तो लगता है कि पांच सौ साल में भी अगर हम लिंग भेद और सामाजिक बराबरी का सफ़र तय नहीं कर पाए हैं तो आगे भी क्या उम्मीद हो ?

बर्नियर ने अपनी भारत यात्रा में लिखा था कि मैंने देखा एक बहुत बड़ा गड्ढा खोदा हुआ था और उसमे बहुत सी लकड़ियाँ चुनी हुई रखी थी. लकड़ियों के ऊपर एक मृत देह पड़ी है जिसके पास एक सुंदरी उसी लकड़ियों के ढेर पर बैठी हुई है चारों और से पांच ब्राहमण उस चिता में आग दे रहे है थे. पांच अधेड़ स्त्रियाँ जो अच्छे वस्त्र पहने थी एक दूसरे का हाथ पकड़ कर चिता के चारों और नाच रही थी और इन्हें देखने के लिए बहुत सी स्त्रियों और पुरुषों की भीड़ लगी थी. इस समय चिता में आग अच्छी जल रही थी क्योंकि उस पर बहुत सा तेल और घी डाल दिया गया था. मैंने देखा कि आग उस स्त्री के कपड़ों तक जिसमे सुगन्धित तेल, चन्दन और कस्तूरी आदि मली हुई थी - भली भांति पहुँच गयी. मैंने अनुमान किया कि यह पांचों स्त्रियाँ यों ही नाच गा रही हैं पर मुझे यह देख कर आश्चर्य हुआ कि जब उनमे से एक स्त्री के कपड़ों तक आग पहुंची तो वह भी चिता में कूद पड़ी और इसी तरह बाकी सब भी. मैं इसका मतलब न समझ सका पर मुझे शीघ्र ही मालूम हो गया कि ये पांचों स्त्रियाँ दासियाँ थी.

इसी तरह के भयावह किस्सों का वृतांत लिखते हुए बर्नियर ने आगे लिखा कि मैं जल्द ही ऐसी असंख्य घटनाएँ देख कर उकता गया क्योंकि मैं बहुत भयभीत भी हो जाता था. उसने लिखा कि माताएं इन्हें बचपन में ही ये शिक्षा देती है कि पति के साथ सती हो जाना प्रशंसा और पुण्य का काम है पर वास्तव में यह मर्दों की धूर्तता है जो इस प्रकार स्त्रियों को अपने वश में कर लेते हैं और फिर इन्हें यह भय नहीं होता कि बीमारी में उसकी स्त्री अच्छी तरह से सेवा नहीं करेगी या उसे ज़हर नहीं देगी. बर्नियर को ये दो उपरी और छिछले कारण ही समझ आये किन्तु सच तो था कि स्त्री को पति के जीते जी भी उचित सम्मान नहीं मिलता था तो मरने के बाद उसे असंख्य कष्टों का का सामना करना पड़ता था. माताएं अपनी पुत्रियों के तिल तिल मरने से बेहतर जानती थी कि वे एक ही बार मर जाएं.

पाच छः सौ साल बाद भी मैं अपने आस पास सामाजिक बराबरी और सुसंस्कृत होने के संकेत नहीं देख पाता हूँ. समाज में अशिक्षित और निराश्रित स्त्रियों की संख्या बहुत बड़ी है. मेरी नानी को जीवन यापन के लिए चार सौ रुपये पेंशन से मिलते है. उनका भी कोई पक्का हिसाब नहीं है. वे कहती हैं बेटा मेरे पैसे कोई खा जाता है मुझे मिलते ही नहीं... तो मैं बोलता हूँ मुझसे ले लो, यानि मैं भी भ्रष्ट व्यवस्था के साथ हूँ. मेरे नाना, मामा और मामियां इस संसार में नहीं रहे अब उनके साथ दो पोते हैं जो दुनियादारी से अभी अनभिग्य हैं. पड़ौसी उनकी ज़मीन को हड़प लेना चाहते हैं. वह बूढ़ी औरत, अपने दोहित्रों के मजिस्ट्रेट और पुलिस अधिकारी होने का दम भर कर जिंदा है और पड़ौसी भी इससे परिचित हैं. मेरी नानी ने अभी थक हार कर अपनी बीस भेड़ें बेच दी हैं. पेंशन समय पर आती नहीं और बरसात का कोई ठिकाना नहीं...

स्त्री को सदा सुहागन होने का आशीर्वाद देते रहो.

June 16, 2010

खुद को धोखे देने की बीमारी, तुम्हारी याद और जिम मोरिसन

यातना भरे दो दिन सुलगते रहे। रात को बिजली की आड़ी तिरछी लकीर आकाश से उतरती और जाने किस पर गिरती। यहीं क्यों नहीं गिर जाती। ये मौसम ये गर्मी ये आर्द्रता और ये उसकी याद के साये। सरसराते हुये। 

स्मृतियों के बचे सामान पर कमबख्त समय नाम की दीमक भी नाकाम है। 

कोई हल नहीं होता कोई याद नहीं जाती। सत्रह साल पहले अक्सर वह छत पर लेटा हुआ आसंन देखता रहता था। कभी आसमान को देखते हुए उसकी सांसों को अपनी हथेलियों में कैद करने की कोशिशें करता। वह बाँहों पर अपने सर को रखे हुए मौन के तार बुनती रहती।

एक ऐसा ही नामुराद सपना उसने कल सुबह देखा।

सुबह की जाग के बाद खोया बैठा हुआ देखता है की सपना क्या है और वास्तविकता क्या है? उस सपने को हज़ार लानतें भेजता है। ऐसा नहीं है कि उसके ही ख़यालों में जीता है। हर दिन नयी ख्वाहिशों का दिन है। कुछ हसीन चेहरे और भी हैं, जो दिल के सुकून को काफी है। लेकिन सपने ने उसके पूरे दिन वहशी हवाओं में टूटते हुए कच्चे पेड़ों जैसा कर दिया था। 

हर आहट पर घबराता रहा। भरी-भरी आँखों के छलक जाने के डर से भागता रहा। उसकी सुवासित गेंहुआ देह से आती पसीने की गंध भूलने के लिए टीवी देखने लगा। अक्सर जाने क्यों कुदरत और जानवरों का चैनल लगाकर बैठ जाता था। वह कुछ और देखता ही नहीं था। इस दोपहर भी नॅशनल ज्योग्राफिक चेनल पर देखता रहा कि किस तरह मादा तेंदुआ घात लगाती है। कुछ चीखें जो मदांध युवा मृग के गले में दब कर रह गई।  उसे लगा कि वह एक मदांध मृग है। उसके दोनों हाथ अपनी गरदन तक चले गए।

होने और न होने के बीच के वीरान फासले में।  उसके साथ जुड़े अपने नाम को ही मुजरिम पाता। इसलिए उसे भूल जाने को। उस वीरान फासले को मिटा देने को। ख़ुद पर कई सितम किये। लेकिन एक सपना उन बरदाश्त तकलीफों को फिर से नाकाम कर गया। 

रात को पीने को नहीं मिली। रखी थी मगर पी नहीं सका। एक थका हुआ मन थकी देह से अधिक खराब होता है। इसलिए उसे सोते ही नींद आ गई। नयी सुबह में सपने के कारणों को तलाशता रहा। सवाल सिरहाने रखे रहे। काम पर नहीं गया। वह घर पर भी नहीं था, वह था भी ?

रात किसी ने पूछा कि कोई था ज़िन्दगी में जिसे याद करते हो? आज सोचने लगा तो खुद पर तरस आता रहा। वे बाँहें क्या थी। वे सीलन भरी दुपहरें क्यों थी। वे खुली रातें कहाँ चली गयी। अगर सब कुछ जा ही चुका है तो ये सपने क्यों हैं?

क्या कहीं लौटना है?

नहीं। नहीं। नहीं।

काश जेम्स डगलस मोरिसन जैसी बुलंदी भले ही ना पाता मगर उस की तरह मर जाता तो कितना अच्छा रहता। उसके तनहा बीते बचपन में गीत गाने का शऊर नहीं आया। उसकी स्मृतियों में भी नहीं था कि वह अपने पिता के गले में बाहें डाल कर झूल रहा है।

वह देह-सुवास से कई चेहरे अब भी बुन सकता था। जब भी तीन चार घूँट जब पी लेता सिर्फ उस वक्त वह ख़ुद को अपने पास पाता। अचानक उसी स्पर्श की कमी रेगिस्तान की तरह बढ़ने लगती। वह एक अलौकिक स्पर्श।  जब उसके स्पर्श का आभास नहीं होता तब वह सोचता कि आदमी के काम करने का समय सात आठ साल ही होना चाहिए। चंद खूबसूरत चेहरों के दिल में उतर जाने के बाद हेरोइन जैसे किसी मादक पदार्थ का भरपूर सेवन करके बाथ टब में ही मर जाना चाहिए वो भी पैंतीस साल की उम्र से पहले...

ओह जिम, तुम जिस फायर की अपेक्षा करते हो, वह उसी में तड़प रहा है। उसका कोई चाहने वाला उसके बारे में कुछ लिखना चाहेगा तो उससे कहना- "मेरी बायोग्राफी का नाम 'नो वन हियर गेट्स आउट अलाइव' से अलग कुछ ऐसा साउंड करे कि एक आदमी जो ख़ुद को धोखे देने की बीमारी से पीड़ित था."

तुम्हारा के।

June 12, 2010

कुछ बीती हुई शामों का हिसाब और एक अफ़सोस ?

अक्सर दीवारों पर उनके पते लिखे होते हैं जिनके मिलने की आस बाकी नहीं होती. महीनों और सालों तक मुड़ा-तुड़ा, पता लिखा बदरंग पन्ना किसी उम्मीद की तरह जेब में छुपाये घूमते रहते हैं मगर एक दिन कहीं खो जाया करता है. मेरी उलझनें, तुमसे हुई मुहोब्बत जैसी हो जाती है. यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि उसका होना जरूरी था या फ़िर ज़िन्दगी का गुज़ारा इस बे-पर की लगावट के बिना भी सम्भव होता.

पिछले सप्ताह एक विवाह में शामिल होना था. एक रात बनोला जीमने के लिये और दूसरी रात प्रीतिभोज के नाम हो गई यानि अपनी कही जाने वाली शाम को कुछ और लोगों के साथ बांटना पड़ा. इधर एनडीए में पासिंग आउट परेड में शामिल हो कर बच्चे अपने भाई को ग्रेजुएट होने की डिग्री दिला लाये तो मेरी कुछ और शामें बच्चों के नाम हो गई. मेरे फ़ौजी को चालीस दिन की छुट्टी मिली है और वह इन दिनों को भरपूर एन्जोय करना चाहता है. आज शाम की गाड़ी से वह अपने दोस्तों के पास जोधाणें चला जायेगा.


मेरी इन शामों में मदिरा का सुकून भरा सुख नहीं बरसा है. अभी फ्रीजर की आईस ट्रे को पानी से भर कर आया हूँ. सुबह एक दोस्त से बात की, वैसे हर रोज़ ही होती है मगर लगती नयी और जरूरी सी है. बात करने के साथ वाशिंग मशीन में कपड़ों पर भी ध्यान था फिर थोड़ी देर में धुल रहे कपड़ों के साथ अपनी पहनी हुई जींस भी डाल दी. वाश टब में कुछ टकराने की आवाजें आने लगी तो हाथ घुमा कर देखा, सोचा पांच रुपये का सिक्का होगा मगर निकला मेरा सेल फोन.


महीने भर पहले खरीदा था, पांच एमपी का केमरा और शानदार म्यूजिक सपोर्ट वाला ये फोन दम तोड़ चुका था और उसके साथ फोनबुक में सेव किये गए नंबर भी. इस सोच में उलझा हूँ कि कितने ऐसे लोगों के नंबर थे जो मुझे प्यार करते थे और कितने ऐसे नम्बर थे जो किसी अनवांटेड कुकी की तरह घुसे बैठे थे ? मुझे कौन फोन करता है ये ख्याल आते ही खुद को एक ऐसी तनहा शाम की तरह पाता हूँ जिसमे कभी - कभी कोई एक परिंदा उड़ता दिखता है.


अब कोई उतना ख़ास अफ़सोस भी नहीं
कि मेरे पास अपने ही बनाये हुए कई बड़े अफ़सोस पहले से ही हैं.

मैंने जाने कितनी प्रतीक्षा भरी आँखों में नीरवता को बने रहने दिया है, मैं कई - कई बार वादे कर के भी मिलने नहीं गया, मैंने कई सौ बार झूठ बोला है कुछ मुहोब्बतों के बचाने के लिए और कई हज़ार बार अपनी सुविधा की ज़िन्दगी जीने के लिए... मुझ से इन्सान से उस सेल फोन को अधिक उम्मीद नहीं रखनी चाहिए. मेरा अफ़सोस जाने कैसा है कि मैं कुछ रिश्तों के लिए आंसू बहाता हूँ और कुछ को बिखरने देता हूँ समय की थाप पर.

ओ मेरे सेल फोन ! मैंने रात - रात भर तेरे जरिये सुने थे लोकगीत.

June 3, 2010

तोन्या, चाईल्ड मोलेस्टेशन और मेरा विचलित विश्वास

तोन्या, अब तुम हर आरोप से बरी हो मगर तुम्हारे मुकदमे की राख से उड़ते हुए कई सवाल मेरी पेशानी की सलवटों को मैला कर जाते हैं. चाइल्ड मोलेस्टेशन और सेक्स अब्यूज के बाईस आरोपों से संभव था कि तुम्हें चार सौ साल की कैद की सजा सुना दी जाती. दुनिया के कई विचित्र या अतिसामान्य मुकदमों की फाइलों के साथ तुम्हारी भी गहरे भूरे रंग वाली फ़ाइल किसी न्यायालय के रिकार्ड रूम में रखी रहती और उसका अंत दीमकों के चाट जाने से होता मगर प्रस्तर-अरण्यों के निर्माण से सभ्य होने में जुटे लोगों के हाथ इस बार भी एक विद्रूप प्रश्न लगा है.

इस पर बहुत बहस हो गयी कि पाश्चात्य देशों में छोटे बच्चों के पड़ौसियों, स्कूल के सहपाठियों और माता-पिता के परिचितों के यहाँ रात को सोने की परंपरा का हासिल क्या है ? इससे बच्चे किस तरह की दुनियादारी सीखते हैं या उनके पेरेंट्स को बच्चों की अनुपस्थिति में कितना खुला आकाश मिलता है ? हमने शिक्षित और विकसित होने का जो रास्ता चुना है उस पर हम एक कदम आगे और दो कदम पीछे जा रहे हैं. जोर्जिया ही क्यों, किसी भी देश के किंडरगार्टन स्कूल की शिक्षिका पर अपनी बेटी सहित दो और छोटी लड़कियों को घर में पीट कर 'बैड गर्ल' बनने को विवश करने और उनके साथ रात को सोने के दौरान वयस्क शारीरिक मैथुन क्रिया सदृश्य हरकतें करना कभी स्वीकार नहीं किया जा सकेगा. ऐसा है तो यह एक मानसिक व्याधि है.

न्यायाधिकारी के समक्ष पुलिस डिटेक्टिव द्वारा प्रस्तुत तुम्हारी सगी बेटी के रिकार्डेड बयान में पूछे गए प्रश्नों को सुन कर मैं विचलित हो उठता हूँ. मेरी माँ मुझसे इन दिनों बहुत दूर रहती है मगर मैं सोच रहा था कि पूछूं "माँ तुम जब अपनी सात साल की बेटी को नहलाती हो तब कहाँ कहाँ से छूती हो ?" मुमकिन है कि मैंने दुनिया नहीं देखी है इसलिए मुझे इस सवाल पर आपत्ति हो रही हो मगर ऐसा सवाल सोचने के लिए भी मेरा असभ्य मन शर्मिंदा है. कैसे कोई माँ से पूछे ?

मैं बीएसएफ के किंडर गार्टन स्कूल में पढ़ा करता था. आवासीय परिसर में बनी स्कूल में पहुँचने के लिए एक बड़ा दरवाजा था जिस पर हरवक्त पहरेदार और एक बिल्ली रहा करती थी. मुझे उस बिल्ली से बहुत डर लगता था लेकिन स्कूल में किसी से नहीं. उस स्कूल की एक टीचर मुझे याद है मिसेज रंधावा. वह मुझे एक गुलाबी कुरते में ही स्मृत होती है जिसकी की बाहें चूहे ले गए थे. रंधावा मेम की याद इसलिए है कि वह गोल मटोल बच्चों को पकड़ लिया करती थी और उनको इतने बोसे देती थी कि बच्चे कभी फिर से पकड़ में नहीं आना चाहते थे. मुझे उन्होंने कभी नहीं पकड़ा इसलिए बाल मन इस तरह के अनुभव को किस तरह नोट करता है कह नहीं सकता पर इतना यकीन है कि वे बहुत पवित्र रही होंगी.

बच्चों के साथ शालीनता से व्यवहार होना चाहिए, वे बेहद नाजुक हुआ करते हैं मगर क्या वयस्क दुनिया की धूप में तप कर कठोर हो जाया करते हैं ? मैं समझता हूँ कि इस तरह के मुकदमे जिसमे एक औरत से उसकी नौकरी, मकान, बच्ची छीन ली जाये और उसे जेल के सींखचों के पीछे से अपने टूटे हुए ह्रदय से मेरी बच्ची लौटा दो की गुहार लगानी पड़े फिर दो साल तक चिकित्सकों की रिपोर्ट को कभी सस्पीसियश और कभी नोरमल बताया जाता रहे फिर उस औरत के घर के आगे न्यायालय द्वारा सुनवाई की जाये फिर पड़ौसी तोन्या के चरित्र को उत्तम बताते हुए समर्थन जताएं और आखिर में माननीय न्यायालय सब तथ्यों की बिना पर दो साल से रेहन रखे स्त्री चरित्र को साबुत लौटा दे.

तोन्या तुम शराब कम पिया करो, यह मेरा निजी अनुभव है कि शराब भावनाओं को इस कदर आलोड़ित करती है कि वे बे-लगाम हो जाया करती है. तुम पर जो गंभीर आरोप लगे थे उनकी छाया में तुम्हें किसी मनो चिकित्सक से जरूर मिलना चाहिए ताकि माँ के बारे में हमारी धारणाएं जितनी पवित्र और कोमल हैं, बची रहे. वैसे यह मुक़दमा मेरे देश में चलाने लायक नहीं है क्योंकि यहाँ हर माँ, दूसरी माँ पर लगे इस तरह के आरोपों को प्रथम-दृष्टया ख़ारिज कर देती है.

[ तोन्या क्राफ्ट जोर्जिया की किंडर गार्टन स्कूल की पूर्व शिक्षिका है, दो साल चले इस मुक़दमे का फैसला दो सप्ताह पहले आया है. ]

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.