September 25, 2010

शोक का पुल और तालाब की पाल पर बैठे, विसर्जित गणेश

[4] ये हमारी यात्रा की समापन कड़ी है. 


सुख लीर झीर बजूके की तरह खड़ा रहता है और दुख के पंछी स्याह पांखें फैलाये हमारे जीवन को चुगते रहते हैं।

कवास गाँव में बना सड़क पुल सैंकड़ों परिवारों के शोक की स्मृति है। इस पुल के नीचे सूखी रेत उड़ रही है। नदी अलोप हो चुकी है। रेगिस्तान में इस रास्ते सौ साल में एक बार नदी बहती है। किसी को ठीक से नहीं मालूम कि पिछली बार नदी कब आई थी और आगे कब आ सकती है। अभी चार साल पहले कुछ एक दिन की लगातार बरसात के बाद पानी के बहाव ने नालों का रूप लेना शुरू किया था। प्रशासन ने मुनादी करवाई कि अपने घर खाली कर लें। कभी भी नदी आ सकती है। रेगिस्तान का आदमी जीवन में दुख और संकट के बारे में अधिक नहीं सोचता। वह छाछ पीकर सो जाता है। उसके पास उपहास होता है "हमें आवे है नदी" उसके चेहरे पर व्यंग्य की लकीरें खिल आती हैं।

पीने के पानी को तरसने वाले रेगिस्तान में रह रहे लोगों से कोई ये कहे कि नदी आ रही है तो भला कौन मानेगा। किसी ने नहीं माना। शाम की मुनादी के बाद तड़के तक कवास पानी में डूब गया। मिर्ज़ा ग़ालिब ने कहा "हुये मरके हम जो रुसवा हुये क्यों न गर्क ए दरिया, न कहीं जनाजा उठता न कहीं मज़ार होता।" मजार तो वैसे भी न बननी थी मगर जनाने खूब उठे। सड़कें बह गई, बिजली गुल हो गई, फोन सेवाएं ठप हो गई थी। रेगिस्तान की बाढ़ में दो सौ पच्चीस लोग लापता हो गए। वे शव यात्राओं के दिन थे। टेलीफोन के पुराने पोल्स पर जानवरों के शव तैरते हुए अटके थे। बचावकर्मी डूब गए तो वायुसेना में मातम पसर गया। चार दिन बाद एक दुर्गंध फैलने लगी। महामारी की आशंका के बीच देश भर के बचाव और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के दल पहुंचे। यूपीए की चेयरपर्सन ने देखा और अफ़सोस जताया।

ये पुल उन्हीं शोक के दिनों की स्मृति से बढ़ कर कुछ नहीं है।

पुल और मेरा पैतृक गाँव तीन किलोमीटर के फासले पर हैं। घर को याद करते ही दुखों के आवेग कम होने लगते हैं। हरे खेतों में तना हुआ लाल-पीले रंग वाला शामियाना सुंदर दिखता है। यहाँ एक विवाह का भोज है। दुशु को इन दिनों जीमण में बड़ा मजा आता है। वह इस तरह के समारोहों में ज़मीन पर बिछी दरी पर बैठकर खाना खाने को लालायित रहता है। असल में खाने से अधिक उसे उन भाइयों के साथ बैठने में आनंद है जिनसे वह कम ही मिल पाता है, जिनको याद रखना भी संभव नहीं है। वह भोजन के स्वाद की कड़ी समीक्षा करता है।

यहाँ आकर हम सुख से भर जाते हैं। जैसे शहर की भीड़ में खो गए थे और अब फिर से ठिकाने लग गए हैं। ग्रामीण आत्मीयता को बहुराष्ट्रीय तेल कंपनी निगल चुकी है फिर भी अपनों के चेहरे देखना सुकून देता है। जीमण के बाद हम दोनों अपनी बाइक पर फिर से सवार हुये। जिस रास्ते गए थे उसी रास्ते लौटना था।

हम लौटते समय उतरलाई नाडी पर रुके। मैंने कहा- "सर, नाडी का मुआयना कर लिया जाए।" उसने कहा- "हाँ।" मैंने दुशु को बताया कि मैं अपने मामा के साथ इस नाडी तक आता था। उनके पास तीन चार ऊंट थे। भेड़ें और बकरियाँ तो थी ही। मुझे मामा ऊंट पर नहीं बिठाते थे। उनको डर लगता था कि मैं गिर जाऊंगा। मैं उनके साथ पैदल चलकर जालिपा से उत्तरलाई आया करता था। तब ये नाडी बहुत बड़ी लगती थी। अब मुझे ये बहुत छोटा सा तालाब लगता है।

हम दोनों नाडी की पाल चढ़कर अंदर चले आए। एक पेड़ के पास बने ओटे पर बैठ गए। पानी को छूकर आती हवा ठंडी थी। कुछ एक पक्षी जलक्रीड़ा में खोये थे। किनारे पर भगवान गणेश मूर्तियाँ रखी थी। दुशु उनको देखने लगा। उसने पूछा- "ये इतनी सारी मूर्तियाँ क्यों रखी हैं।" मैंने कहा- "स्वार्थी मनुष्य कुछ भी कर सकता है। वह देव बनाकर घर ला सकता है और कूड़ा बनाकर कहीं फेंक भी सकता है।" दुशु कहता है- "मैंने टीवी में देखा है। गणेश प्रतिमा को समंदर में डालने जाते हैं।"

संस्कृति के नाम पर अब राज्यों की अलग पहचान कुछ नहीं है। सबकुछ अंतर्राष्ट्रीय होता जा रहा है। राजस्थान के लोग गंवर की शोभायात्रा के बारे में बहुत कम जानते हैं। लेकिन वे हर बरस नए पुंठिए खरीदने नहीं भूलते। गरबा एक बाज़ार हो गया है। लोग इस परमानंद में रहना चाहते हैं। हमारा गरबा जो कि आदिवासियों का लूर नृत्य था, आज चकाचौंध से भर गया है। घूमर रमती राजस्थानी की स्त्रियाँ गायब हैं। जबकि आयातित गणेश चतुर्थी, दुर्गा पूजा जैसे आयोजन रेगिस्तान के तालाबों के लिए मुसीबत बनकर आए हैं। घर में नल से पीने का पानी आ रहा है तो किसी को क्या परवाह की तालाब का मोल क्या है। उसे प्लास्टर के कचरे से पाट दो। जय गणेश को जय विघ्नकर्ता बना दो।

उत्तरलाई नाडी पर मूर्तियाँ विसर्जित होने को आई तो गाँव के लोगों ने कोतूहल से देखा। बाद में उनको मालूम हुआ कि देवताओं के नाम पर तालाब को कचरे से भरा जा रहा है। गाँव के लोग जमा हो गए। उन्होने कहा- "ऐसे देव और ऐसी रीति अपने घर में रखिए। हमारे तालाब नष्ट मत कीजिये।" कथित धर्मांध लोग ऊंची आवाज़ में बोले "हिन्दू धर्म- हिन्दू धर्म" तो गाँव वालों ने कहा "पगरखियाँ फटी हुई हैं जहां पड़ी, वहाँ से खाल उतार लेगी। अपने देवता को घर में इज़्ज़त से रखो, गिंडक की तरह अंदर बाहर दुत्कारों मत"

मूषक पर सवार गणेश प्रतिमा को देख कर बेटा पूछता है- "पापा ये चूहा इतना बड़ा क्यों है और भगवान इतने छोटे क्यों हैं?" मैं उसकी गहरी भूरी निश्छल आँखों में झांकते हुए कहता हूँ- "बेटा, चूहे को भगवान ने बनाया है और भगवान को इंसान ने..."

मैं गणेश भगवान से कहता हूँ ऐसे मिट्टी की मूरत बने न बैठे रहो। कुछ चमत्कार करो। ये तालाब बहुत ख़ूबसूरत हुआ करता था। इसे फिर से वैसा ही बना दो। कुदरत के आगे हाथ जोड़ते हुये हम बाइक पर सवार होकर अरावली की छोटी पहाड़ियों की उपत्यका में बसे बाड़मेर की ओर चल देते हैं।
* * *

मैं अच्छा यात्री नहीं हूँ मगर जहां भी जाता हूँ मुझे कुदरत, लोगों और पशु पक्षियों को देखकर प्रसन्नता होती है। मैं इन सब को आँख भरकर देख लेना चाहता हूँ। इन सबको शब्दों में मांड देना चाहता हूँ। आपने इन कड़ियों को प्रेम से पढ़ा। कमेन्ट किए और प्यार दिया। इसके लिए आपको बहुत सारा प्यार।

इति॥



September 22, 2010

आओ शिनचैन लड़कियों के शिकार पर चलें

[3]

हम उसे केवल छूकर देखना चाहते थे। हो सकता है पल भर उसके साथ होने की इच्छा थी। संभव है केवल घड़ी भर उसके साथ जी लेने का मन था। किसी को पाने की कामना का कोई बहुत दीर्घकालीन उद्धेश्य हो ज़रूरी नहीं है। सम्बन्धों में, चाहनाओं में, इच्छाओं में, आवश्यकताओं में कुछ भी स्थायी नहीं होता।

रेल से होड़ करने की चाह रखने वाला दस साल का लड़का कुछ एक मिनट में उस चाहना को भूल गया। नाडी के बाहर बबूल के नीचे बैठे देवताओं के पास से एक जीप होर्न बजाते हुए निकली। विकट तो नहीं पर मोड़ है। यहाँ पर हॉर्न देना अच्छा है। चाहे वह देवताओं के लिए हो कि सामने से आने वालों को सचेत करने के लिए हो।

हम जिप्सम हाल्ट पहुँच गए। रेल पीछे छूट गई थी। दुशु रेल को ही देख रहा था लेकिन आश्चर्य कि उसे रेल को हरा देने में मजा नहीं आया।

रेल पास ही है। मैं नेशनल हाईवे पर रफ़्तार नहीं बढ़ाता हूँ। मुझे रेल से होड़ में कोई दिलचस्पी नहीं। इसलिए कि जब आप किसी से मुक़ाबले में उतरते हैं तब केवल एक स्पर्धा में कीमती जीवन बीत जाता है। मुझे ऐसा न करने का फल मिल गया। सड़क पर हलचल दिखाई दी। मेंने कहा- "दुशु उसे देखो" वह मेरी बगल से सड़क पर देखने लगा। दो फीट लंबी छिपकली सड़क पार कर रही थी। इसे स्थानीय भाषा में गोह कहा जाता है। वैसे लोग इसे डेजर्ट मॉनिटर लेजार्ड के रूप में पहचानते हैं। रेगिस्तान में बहुतायत में हैं। हम जब तक करीब पहुंचे गोह देसी बबूल की छांव तक पहुँच गयी।

गोह का यहाँ बेहिसाब शिकार किया गया। कहावतों में कहा जाता है "गोह री मौत आवे तो भीलों रे घरे भाटा भावे" भील रेगिस्तान और इसके पहाड़ी इलाके की मार्शल कौम है। ये दिलेर लोग कुदरत के बहुत करीब के हैं। कृष्ण भक्ति पर कोई भी चाहे जितना हक़ जमा ले लेकिन वास्तविक कृष्ण भीलों के थे और उनके ही रहेंगे। कानूड़ों इस आदिवासी समुदाय का नौजवान था, जिसका बाद में कुलीन कही जाने वाली जातियों ने अधिग्रहण कर लिया। भील गोह का शिकार करते रहे हैं। वे इसकी खाल उतार कर बेच देते थे। इसकी खाल से जो जूतियाँ बनती उनकी चमक और डिजायन बेहद आकर्षक होती थी। वन्यजीव कानून के जानकार होने के बाद गोह की खाल से जूतियाँ बननी बंद हो गयी। उस कहावत का अर्थ है कि जब किसी की मृत्यु आती है तब वह अपने सबसे शक्तिशाली दुश्मन को उकसाता है।

रेल, परी लोक को जाती हुई सी है। रंग बिरंगे ओढने खिड़कियों से झाँकते दिखते हैं। रेल डिब्बों के दरवाज़ों के पायदानों पर बैठे हुए लड़के, हत्थियाँ पकड़े हुए नौजवान रेल के साथ उड़े जाते हैं। चौमासा है इसलिए हल्की उमस में बाहर से आती हवा उनके मन को ठंडा करती होगी। मुझे भी गर्मी नहीं लग रही। एक हाथ से बेटे को अपने पास सरकाता हुआ कहता हूँ- "ध्यान से बैठो" मेरे पापा भी सायकिल चलाते हुए रास्ते भर मुझे हाथ से छू कर टटोलते रहते थे। उनकी नज़र जरूर सामने होती थी लेकिन मन सायकिल के करियर पर ही अटका रहता था। हर आदमी के पास एक सुखों की पोटली होती है। जिसे वह उम्र भर ढ़ोने का साहस रखता है। इसी साहस को महाभारत में धृतराष्ट्र कहा गया है।

बेटे से अविश्वसनीय घटनाक्रम वाली कहानी सुन कर मैं खो गया था। मुझे अफ़सोस हुआ कि इसके विस्मय को छल लिया गया है। अमेरिकी कार्टून करेक्टरों में नए विस्मयबोध की लालसा में निरंतर रचे गए अतिरंजित हादसों और उनसे उबरने के तरीकों को देख कर मेरे बेटे में स्वभाविक आनंददायी घटनाओं के प्रति रूचि नहीं बची है। आशा के लिए निराशा को रचना एक बाध्यता है। इसी बाध्यता ने कई काल्पनिक शैतानी दुनिया रची और एलियंस को चित्रित किया। उन पर जीत के लिए सुपरमैन को रचा। हम सुपरमैन से ऊब गए तो बैटमैन, शेडोमैन, हीमैन, होलोमैन, स्पाइडरमैन जैसे असंख्य चरित्रों के निर्माण को बाध्य हुए। व्यक्ति एक रहस्यमयी शक्ति चाहता है ताकि वह रोज़मर्रा के जीवन में एक अद्भुत रोमांच को तलाश सके।

दूरदर्शन पर नब्बे के दशक में ऐसा ही एक भारतीय पात्र भी बच्चों के मुख्य आकर्षण का केंद्र था। देश भर में उसे देख कर बच्चों ने अपने घरों की छतों से छलांगे लगा दी थी। मैं जिस स्कूल में पढ़ा करता था, उसके सामने तापड़िया जी का घर था। मैंने सुना कि उनके घर से भी एक बच्चे ने कथित रूप से इसी धारावाहिक को देखने के बाद अपने पांवों पर बारदाना बाँध कर दो मंजिल से छलांग लगा दी। यह एक सम्मोहन है। अद्वितीय और अलौकिक शक्तियों को प्राप्त करने की आदिम चाह का आधुनिक रूप है। गंभीर किस्म का अफ़सोस ये है कि इसका लक्षित वर्ग बेहद कोमल और कच्चा है। इसलिए हमें अपने बच्चों को गोबर ढोते गुबरैले, गुंगले, गोह, दूधिया छिपकली जैसे अपने सहजीवियों से मिलवाते रहना चाहिए।

जिप्सम हाल्ट से आगे सड़क बायीं और मोड़ लेती है। सड़क किनारे दो एक प्याऊ आती है। सामने नया बना पुल दिखाई देता है। एक फ़ेक्ट्री के बाहर प्लास्टर से बनी शीट्स सूखती दिखाई देती है। आस पास के इलाके में जिप्सम काफी है। इसे स्थानीय लोग धधड़ा कहते हैं। उसी धधड़े को प्योर करके "प्लास्टर ऑफ पेरिस" कहे जाने वाले पाउडर का कारख़ाना है।

मैं पीछे मुंह करके दुशु को आह भरने के अंदाज में कहता हूँ "काश हम बाप-बेटे, शिनचैन और उसके पापा की तरह लड़कियों के शिकार पर निकले होते" वह मुस्कुराया नहीं उसकी मुद्रा बेहद गंभीर हो गयी कि मैंने गलत प्रस्ताव दिया है। इस उम्र में उसने इस तरह के कार्यक्रमों के प्रयोजन जान लिए हैं। उसने मेरी इस हरकत पर मुझे एक वरिष्ठ नागरिक की तरह समझाया। "आपको क्या हुआ है? वह एक कार्टून है।" सच में आठ-दस साल के बच्चों के लिए रचे गए ये जापानी चरित्र उनका सहज बचपन छीनते जा रहे हैं। मैं भी शिनचैन को बेहद प्रेम से देखता रहा हूँ। शिनचैन अपने पापा से कहता है "ओ हो मैंने सोचा आप मेरे साथ कबड्डी खेलोगे मगर आप तो सिर्फ मम्मा के साथ खेलते हो..." इतना कहते ही उसके गालों पर खिलते सूरज जैसी लाली का स्केच बन जाता है।

मुझे आज के दिनों की तुलना अपने बचपन से नहीं करनी चाहिए। ऐसा सोचते हुये बाइक नदी के पुल पर चढ़ जाती है। ऐसी नदी जो सौ साल में एक बार बहती है। 
* * *

September 20, 2010

हरे रंग के आईस क्यूब्स



[2]

"हाँ भईया गाडी जा री है गढ़ड़े"

मेरा रेगिस्तानी क़स्बाई बचपन फेरी की इस आवाज़ से भरा हुआ है। फिर थोड़ा रुककर "मिरचोंओओओं...." सायकिल के करियर और कैंची के बीच मिर्च की बोरियाँ रखे हुये ऊकजी दिख जाते थे। "मिरचोंओओओं.... मथाणीया री मिरचों। छेका आओ भाई गाड़ी जा री है गढ़ड़े" मिर्च रेगिस्तान के भोजन में इस तरह शामिल है जैसे हमारे जीवन में सांस। घर में सूखी लाल मिर्च है माने हर तरह का साग रखा हुआ है। लाल मिर्च नहीं माने जीवन की रसद खत्म हो गयी है। अच्छी लाल मिर्च मथानियां से ही आती थी। खाने में थोड़ी मीठी भी लगती थी। कथा संसार में सूखे मेवे बेचने वाले फेरीवाले हुआ करते थे लेकिन हमारा मेवा यही था। मिर्च और कच्चे लहसुन की चटनी घर में बन जाती तो माँ कड़ी नज़र रखती थी। सलीके से राशनिंग होती थी। ये हमारा सूखा मेवा था या नहीं मगर मोहल्ले भर की औरतें ऊकजी को शिकायत करती "हमके मोड़ा आया" ऊकजी कहते- "सरकारी नौकरी है टैम ही कोनी मिले"

कलल्जी के पालिए के पास ऊकाराम कृषि फार्म का बोर्ड देखते ही में लाल मिर्च की याद से भर उठता हूँ। मुंह में चटनी का स्वाद आने लगता है। हाइवे की सड़क के दूजी तरफ की ज़मीन फार्म हाउस की तरह दिखने लगी है। कभी ये खुले खेत थे लेकिन अब यहाँ बाड़े बन गए हैं। इन बाड़ों में बड़ी गाड़ियाँ खड़ी रहने लगी हैं। ये तेल की खोज में लगी कंपनियों की है। स्थानीय लोगों के पास नया धंधा आया है जिसे बाड़ेदार कहा जा सकता है। सड़क किनारे की अपनी ज़मीन को बाड़ा बनाकर किराए पर दे दिया है।

बेटा पूछता है ये इतनी गाडियाँ यहाँ क्यों आई हैं? मैं पूछता हूँ- "लुटेरों के बारे में सुना है?" बेटा कहता है- "हाँ" उसके हाँ कहने पर मैं कहता हूँ- "इस दुनिया में बहुत लुटेरे हैं। वे दूजों की ज़मीन से तेल कोयला, गैस, धातुएं निकाल लेना चाहते हैं। अब लुटेरे वापस आ गए हैं। इनसे हमारे नए राजा मिले हुये हैं। ये हमारी ज़मीन को लूट लेंगे" वह अचंभे से पूछता है- "ज़मीन को कैसे लूट सकते हैं? वह तो यहीं रहेगी।" मैं उसे कहता हूँ- "तुम जब बड़े होवोगे तब समझोगे कि ज़मीन ही नहीं आत्मा को भी लूटा जा सकता है"

मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ तो बेटे को रेलवे पटरी की ओर देखते हुये पाता हूँ। रेल की पटरी बाड़मेर से बालोतरा तक सड़क के साथ ही चलती है। लेकिन हमें तो कवास तक जाना था।

उत्तरलाई हवाई अड्डे की तारबंदी दिखने लगती है। मैं पूछता हूँ "दुशु तुमने बार्डर फिल्म देखी है?" वो पूछता है- "कौनसी?" 
"वही जिसमें सन्नी देओल होते हैं।"
"वो उसमें क्या करते हैं?" 
"वो कहते हैं कि मैं कोई चोर कर्मचारी नेता नहीं हूँ कि देश पर संकट आते ही छुट्टी चला जाऊँ" 
दुशु कुछ नहीं कहता।

हमारी बाइक उत्तरलाई स्टेशन के जिगज़ैग मोड़ से गुज़रने को होती है और मैं देखता हूँ कि लोंगेवाला सेक्टर में भारी लड़ाई छिड़ी हुई है। सन्नी देओल और उनके साथी मोर्चे पर डटे हुये हैं। इधर उत्तरलाई एयरबेस में विंग कमांडर जैकी श्रोफ अपनी खुली हथेली में बंद मुट्ठी ठोक रहे हैं। उनकी बेचैनी बढ़ी हुई है। उनके पास रात को हवाई जहाज उड़ाने की सुविधा नहीं है। इसलिए सुबह होने का इंतज़ार कर रहे हैं। इकहत्तर के युद्ध में विंग कमांडर एंडी बाजवा यहाँ उत्तरलाई बेस में कमांड कर रहे थे। लोगों का कहना था कि उनकी टीम ने पाकिस्तान पर खूब बमबारी की थी।

उत्तरलाई स्टेशन पर बहुत सारे हेंगर हैं। लोग इनको भूमिगत बैरक समझते हैं जहां हवाई जहाज रखे जाते हैं। बचपन की कहानियों में हम अंदाजा लगाया करते थे कि क्या हवाई जहाज ज़मीन के अंदर चलते हुये हमारे घर के नीचे तक आ जाते हैं? हो सकता है कभी उनकी चोंच ज़मीन फोड़कर गली में निकल आए।

बचपन बहुधा एक उम्र को संबोधित हुआ करता है लेकिन असल में बचपन का उम्र से कोई वास्ता नहीं है। कुछ बरस पहले एक दिन उत्तरलाई स्टेशन पर दिहाड़ी मजदूरी कर रहे आस-पास के किसान काम करते हुये थक गए थे। उनेक पास ही एक लड़ाकू जहाज खड़ा था। उनको उस जहाज की चोंच पसंद आ गयी। तो पंद्रह बीस मजदूर कृषकों ने दुपहरी करने के बाद एक लंबा तार उठाया और उसे हवाई जहाज की चोंच से चोंच की तरह लड़ा दिया। पता नहीं उस में क्या था कि करंट के झटके से सभी मजदूर दूर जाकर गिरे। थोड़ी देर बाद उठे, अपने पिछवाड़े झाड़े और काम पर लग गए।

मैंने भी एंडी बाजवा साब की तरह बेचैनी से भरा सड़क का मोड़ लिया। इतना सोचते याद करते मुसकुराते हुये हमारी बाइक गुरुद्वारा तक आ गयी। मैंने ऊंची आवाज़ में जैकारा लगाया। "जो बोले सो निहाल..." लेकिन मेरे प्यारे निहंग गायब थे। मैंने मुड़कर पीछे देखा तो दुशु मुस्कुरा रहा था। मैंने कहा- "बादशाओं रब्ब नु कदी नी भूलना... बोलो सत्त श्री अकाल"

ईश्वर हमारे भीतर है। वह ब्रह्म है। ब्रह्म मैं हूँ। अहम ब्रह्मास्मि। जिस रूप में स्वयं को स्वयं की याद दिला सको दिलाते रहो। सत्त श्री अकाल बोलने में दुशु को मजा आया। लेकिन दो बार बोलकर उसे शर्म आने लगी कि हम बाइक पर बैठे हुये ये क्या कर रहे हैं। मैंने उससे पूछा "तुमने निहंग देखे हैं?" उसने कहा नहीं। मैंने कहा हम कभी चलेंगे। उनके नीले रंग के घेरदार वस्त्र मुझे बहुत लुभाते हैं। उनके चेहरे का नूर अलग होता है। कॉन्फिडेंट शब्द को ठीक उनके व्यवहार में पढ़ा जा सकता है।

उत्तरलाई रेलवे स्टेशन पर दक्षिण अफ्रीकी देश से आया कोयले का चूरा उड़ रहा है। हर सप्ताह कत्थई लाल रंग के बीस डिब्बों वाली एक रेल गाड़ी आकर उतरलाई स्टेशन पर रुकती है। दूर देश की खदानों का कोयला ट्रकों में लादा जाता है। काले रंग की गर्द रेलवे ट्रेक से होती हुई चारों और बरसने लगती है। ये कोयला हाल ही में रेगिस्तान में उग आये थर्मल बिजली कारखानों तक जाता है। दिन के सवा दो बजने को है, जोधपुर जाने वाली पेसेंजर के निकलने का समय है। उन्नतीस रुपये में दो सौ दस किलोमीटर का सफ़र, डिब्बे भरे हुए और सफ़र से बंधी आशाएं सरपट भागती हुई।

उत्तरलाई स्टेशन से तीन सौ मीटर दूर एक नाडी है। हमारे यहाँ तालाब को नाडी कहा जाता है। इसी नाडी की ओर रेल और हम एक दिशा में चल रहे हैं। सोचता हूँ कि घर से बाहर आते ही हम बदलने लगते हैं। पुराने सुख-दुख के बीच नए रंग की कोंपलें मन की धरती को फोड़ते हुए खिलने लगती है।

बेटा कहता है- "पापा रेल से आगे निकलें." मैं पूछता हूँ- "क्यों ?" वह कहता है- "मजा आएगा." इसका अभिप्राय हुआ कि किसी को पछाड़ कर आगे निकलने में मजा है। मेरे हाथों में बहुत से हाथ थे वे बारी-बारी से मुझे पीछे छोड़ते हुए आगे निकल गए थे। उनको भी बहुत मजा आया होगा? फिर मैं सोचता हूँ कि सामने की नाडी तक अगर हम पहले पहुंचे तो जो सोचा है, वह हो जायेगा। मेरा बचपन भी अभी ज़िंदा है। मैं रेल से होड़ करके जानना चाहता हूँ कि क्या उसके पास ऐसा दिल बचा है? जो मुझे याद करता हो।

रेल के पास सैंकड़ों पहिये हैं। मनुष्य मन के पास अनगिनत पहिये हैं। जिनपर सवार मन सरपट दौड़ता जाता है। रेल पर सवार होकर कितने ही सुख सात समंदर पर चले गए हैं। मन के पहियों पर सवार होकर हम उन सुखों की टोह लेते रहे।

सड़क के किनारे जिप्सम खोद लिए जाने के कारण चौकड़ियाँ बनी हुई है. उनमे बरसात का पानी भरा है दूर से देखो तो लगता है कि फ्रीज़र में बर्फ 
जमाने के लिए हरे रंग के पानी की विशाल आईस ट्रे रखी है. सर्दियों तक ये पानी बचा रहा तो हरे रंग के आईस क्यूब्स कितने सुन्दर दिखेंगे। प्यार में आदमी ऊपर उठ जाता है। वह एक ड्रोन हो जाता है। जो सामान्य निगाह नहीं देख पाती उसे प्यार भरी निगाह देख लेती है।

तुमने कभी प्यार किया है तो तुम हरे रंग के आइसक्यूब देख सकते हो। 
* * *

September 19, 2010

मुंह के बल औंधे गिरे हों और लॉटरी लग जाये

तुमको एक लट्टू की तरह घुमाकर धरती पर छोड़ दिया गया है। तुम्हारा काम है घूमते जाना और देखते-सीखते रहना। लुढ़क तो एक दिन अपने आप जाओगे। 

जीवन आरोहण में उम्र कम होती जाती है और जीवन बढ़ता जाता है। उम्र की तस्वीर में रेखाओं की बढ़ोतरी जीवन चौपड़ की अनेक कहानियाँ कहती हैं। मनुष्य एक आखेटक है। वह अपने रोमांच और जीवन यापन के लिए निरंतर यात्रा में बना रहता है। असल में यात्रा ही जीवन है। अगर सलीके से दर्ज़ कीजाए तो कुछ बेहद छोटी यात्राएं भी हमें अनूठे आनंद से भर देती हैं। मेरा बेटा ऐसी ही एक छोटी सी यात्रा पर मेरे साथ था। 

इस दौर के बच्चे सबसे अधिक सितम बरदाश्त कर रहे हैं। उनको अनवरत माता-पिता की लालसा और पिछड़ जाने के भय की मरीचिका में दौड़ते जाना होता है। दस साल का बच्चा है और चौथी कक्षा में पढ़ता है। समझदार लोगों से प्रभावित उसकी मम्मा कहती है कि ये एक साल पीछे चल रहा है. मैं कहता हूँ कोई बात नहीं एक साल कम नौकरी करनी पड़ेगी। हम सब अपने बच्चों को अच्छा नौकर ही तो बनाना चाहते हैं। दरिया खत्म, बांध तैयार। लेकिन फ़िलहाल हम दोनों में ये तय है कि वह जैसे पढ़ और बढ़ रहा है, उसकी मदद की जाये। 

बाड़मेर एक छोटा सा क़स्बा है और यहाँ के बाशिंदे ख़ुद को शहरी नहीं समझते। शहर के नाम पर हमारे नज़दीक का शहर जोधपुर है। मुझे शहर जाने के दो ही कारण समझ आते थे। एक था कि किसी कि तबीयत खराब है और दूजा बड़े कोर्ट में पेशी है। उसी जोधपुर जाने वाली सड़क पर मेरा पैतृक गाँव पड़ता है। 

हम पिता पुत्र दो बजे घर से निकले। बाइक से गाँव आना-जाना आसान लगता है। मैं बाइक चला रहा था और बेटा पीछे बैठा था। आज कल बेटा मेरे साथ रहना पसंद करता है, ऐसा क्यों है ? इसका कारण मुझे पता नहीं है। शायद छोटे बच्चे जानते हों कि माँ-बाप से चिपक कर बैठ सको जितना बैठ लो कि बाद में जाने ये हो कि न हो। समझदार हुये माँ बाप सबसे बड़े मूर्ख होते हैं जो सोचते हैं कि हाँ सब यहीं है कहाँ जा रहे हैं? फिर एक रोज़ आप जिसकी बाहों में होना चाहते हैं वे बाहें नहीं होती। 

मेरी बाइक यात्राओं में पहले बेटी होती थी। अब वह बड़ी हो रही है इसलिए अपनी मम्मा और चाचियों से चिपकी हुई ऐसी यात्राओं में स्त्रीसंवाद रस का सुख उठाती है। हो सकता है उसकी मम्मी उसे जानबूझकर साथ रखती हों कि स्त्रियों की कड़ी दुनिया में उपहास, व्यंग्य और उपेक्षा को झेलना और बरतना सीख सके। मैं सोचता हूँ कि इस तरह स्त्रियाँ अपने आस-पास एक कड़ा असहनीय तंत्र रचकर सुरक्षा का घेरा बनाती हैं। वे थोड़ा चतुर बनती है। वे बातों ही बातों में दूसरों के मंसूबों का आंकलन करने का हुनर सीखती हैं। हो सकता है ऐसा कुछ न हो। 

सिणधरी चौराहे से बाईं तरफ होते हुये आप क़स्बे से बाहर निकलते हैं तो चौराहे पर टिड्डी नियंत्रण के लिए बना दफ्तर है। मौन खड़ा रहता है। इसके आहते में कभी कोई व्यक्ति नहीं दिखता। इसके बंद दरवाज़े गठिया के शिकार हैं। इसके आस-पास विदेशी बबूलों का जंगल है, उनके बीच से बर्फ फैक्ट्री को रास्ता जाता है। इसी रास्ते पर पर्यटन विभाग का मोटेल है खड़ताल। यहाँ कोई नहीं आता जाता। कुछ एक नौजवान इस वाद्य के नाम की लाज रखने के लिए शाम को आते हैं। वे पहले मल्लिनाथ सर्कल के बीच के घेरे में बैठते हैं। बीएसएफ़ की बाड़ को देखते हुये उकता जाते हैं। ट्रैफिक बढ़ने लगता है तब इस मोटेल की चारदीवारी के अंदर चले आते हैं। यहीं खाली बोतलों और पव्वों की खनक से खड़ताल के सुर की याद को हवा में घोल देते हैं। अब ये मोटेल तेज़ी से उजड़ रहा है। ये लोग कब तक इन सुरों को ज़िंदा रख पाएंगे कहना कठिन है। 

उत्तरलाई जाते मार्ग पर शहर से बाहर निकलते ही कल्लजी का थान है। इसे पालिया भी कहते हैं। हमारे गाँव के माली परिवार के एक ट्रांसपोर्टर के बेटे थे। एक शाम बाड़मेर-शहर से गाँव की ओर लौटते हुए, उनकी आर्मी डिस्पोजल जोंगा गाड़ी पलट गई थी। उनकी आत्मा ने सामान्य मनुष्य की तरह इस दुनिया को छोड़ने से मना कर दिया था। शराबी और प्रेमी हठी होते ही हैं। उनके हठ के मृत्योपरांत चलने का ये अद्वितीय उदाहरण है।

जिस रात कल्लजी का निधन हुआ, उसके एक महीने बाद से उनके परिवार में अजब वाकये होने लगे। उनकी जोंगा गाड़ी गेरेज में अपने आप स्टार्ट हो जाती थी। कुछ का कहना था कि गेरेज का फाटक भी खुलता था और वह बाहर आ जाया करती। इस तरह की और घटनाओं के बाद कष्टों की मुक्ति के लिए उनसे आशीर्वाद माँगा जाने लगा कि परिवार की रक्षा अब आप ही करो। उनके दिवंगत होने के स्थान को, उनके रहने के लिए एक पवित्र स्थल की तरह थापा गया। 

कल्लजी को पूजने के लिए बने चबूतरे के पास से गुज़रने वाले पत्थरों से भरे ट्रक एक-दो खंडे श्रद्धापूर्वक डाल कर आगे जाया करते थे। इस कारसेवा से उस चबूतरे के आस-पास कुछ ही सालों में पत्थरों का बड़ा जमावड़ा हो गया. यह स्थान उत्तरलाई एयर फ़ोर्स स्टेशन के ठीक पास है तो वहां कार्यरत वायुसैनिक इस स्थान को पत्थर बाबा कहने लगे। पत्थर बाबा को शराब और सिगरेट से बहुत प्यार था तो प्रसाद के रूप में यहाँ पर यही मिलता भी है। आप चाहें तो नारियल या मखाणे भी चढ़ा सकते हैं मगर असल भक्त बोतल-पव्वा और सिगरेट लेकर आते हैं। अब रेड एंड व्हाइट कम ही मिलती है इसलिए बाबा फॉर स्क्वायर या छोटी गोल्ड फ्लेक भी स्वीकार लेते हैं। 

पालिए के साथ एक बैठक बन गयी है। ऊपर चबूतरा है नीचे बैठक है। पहले श्रद्धालु आते थे। कंजूसी से शराब की दो बूंद डालते और बोतल लेकर घर चले जाते थे। इस बात से कोई सामाजिक सरोकार नहीं बनता था। इसलिए स्थानीय प्रबुद्ध नौजवानों ने ड्यूटी निर्धारित की, इसके तहत एक नौजवान को सेवक के रूप में सेवा देनी होती थी। वह श्रद्धालु के आते ही उसे समझाता कि इस जगह चढ़ाई हुई शराब को घर ले जाने या कहीं और ले जाने से चढ़ावा अधूरा माना जाता है। इसके बाद सूचना कर दी जाती कि कोई श्रद्धालु आया है। सेवा में सहयोग के लिए आ जाओ। परहित ही इस लोक का श्रेष्ठ कार्य है। इसमें रेगिस्तान के लोग कभी पीछे नहीं हटते। वे आगे होकर हाथ बँटाते हैं। कड़वी और बिना बर्फ वाली शराब को गले से उतारने का कष्ट उठाने में चेहरे पर कोई शिकन नहीं लाते। भलोस करे कलल्जी। 

कल जैसे ही मैं कल्लजी के थान के पास पहुंचा, बाइक पर पीछे बैठे हुए बेटे ने कहा "पापा, सोचो कि आप अभी बाइक चलाते हुए मुंह के बल गिर जाओ। आपको ज्यादा चोट नहीं आये। आँख खुलते ही आप देखो कि आपके चेहरे पर एक लॉटरी का टिकट चिपका हुआ है। उसका नंबर है नौ आठ आठ नौ सात नौ आठ... फिर आप उस टिकट को चेहरे से हटा कर फैंक देते हो और चल देते हो। इतने में आपको मालूम होता है कि उस टिकट पर तो बहुत बड़ा ईनाम खुला है। अब आप क्या करोगे? क्या लौटकर उस टिकट को खोजोगे या फिर अपने काम से काम रखते हुए आगे चले जाओगे" इस कहानी का कथानक काम्प्लिकेटेड था और मैं कल्लजी के ख़यालों में गुम था। इसलिए बचने को मैंने पूछ लिया- "छोटे सरकार आप क्या करते?"

उसका जवाब था "मैं खोजता फिर भी नहीं मिलती तो मुझे अफ़सोस होता कि एक अच्छा खासा मौका हाथ से निकल गया" इस कहानी में औंधे मुंह गिरने की वास्तविकता है और उड़कर आया लॉटरी का टिकट आशा की अतिरंजना है। मुंह पर चिपक जाना सबसे बुरी स्थिति में भी असामान्य अवसर है। लेकिन फिर हालात वही है कि टिकिट खो गया है।

हम सब हर रोज़ खोयी हुई अतिकाल्पनिक चीज़ों का अफसोस करते रहते हैं। हमारे सहज मन को जब भी दुनियावी दौड़ से फुरसत मिलती है। हम शेख़ चिल्ली हो जाते हैं। एक ख़याली यात्रा से सचमुच की यात्रा सदा बेहतर होती है। जो इस ख़ूबसूरत और अविश्वसनीय दुनिया से हमारा परिचय करवाती है।
***

यात्रावृतांत - पहली कड़ी 

September 16, 2010

मैं तुम्हारी आँखों को नए चिड़ियाघर जैसा रंग देना चाहती हूँ

डिक नोर्टन को कम ही लोग जानते हैं. मैं भी नहीं जानता. उसके बारे में सिर्फ इतना पता है कि वह एक विलक्षण लड़की का दोस्त था. उससे दो साल आगे पढ़ता था. उस लड़की ने उसे टूट कर चाहा था. वह कहती थी, तुम्हारी साफ़ आँखें सबसे अच्छी है मैं इनमे बतखें और रंग भर देना चाहती हूँ एक नए चिड़ियाघर जैसा... उस लड़की का नाम सिल्विया प्लेथ था. हां ये वही अद्भुत कवयित्री है जिसने लघु गल्पनुमा आत्मकथा लिखी और उसका शीर्षक रखा 'द बेल जार' यानि एक ऐसा कांच का मर्तबान जो चीजों की हिफाज़त के लिए ढ़क्कन की तरह बना है.

प्लेथ ने आठ साल की उम्र में पहली कविता लिखी थी. इसके बाद उसने निरंतर विद्यालयी और कॉलेज स्तर की साहित्यिक प्रतियोगिताएं जीती. उसके पास एक मुक्कमल परिवार नहीं था. वह अकेले ही नई मंजिलें गढ़ती और फिर उन पर विजय पाने को चल देती थी. उसके भीतर एक प्यास थी कि वह दुनिया को खूबसूरत कविताओं से भर देना चाहती थी. वह पेंटिग करती थी. उसे गाने का भी शौक था. उसने कुछ एक छोटी कहानियां भी लिखी. जो उसने हासिल किया वह सब दुनिया की नज़र में ख़ास था किन्तु स्वयं उससे प्रभावित नहीं थी. उसकी कविताओं को अमेरिका की महान कविताओं में रखे जाने की बातें की जाने लगी थी फिर भी डिक नोर्टन के आस पास बीते दिनों के सिवा उसे कोई चीज अपनी नहीं लगी.

वह विद्वता और पागलपन के सी - सा झूले पर सवार थी. कभी उसे पागलखाने में बिजली के झटके लग रहे होते फिर वह दो साल में अपना शोध कार्य पूरा कर के जमा करवाती फिर किसी मनो चिकित्सक से उसका उपचार हो रहा होता और वह सबसे खूबसूरत कविता लिखती.

'द बेल जार' में वह अवसाद के दिनों में भी खूबसूरती से आशाओं को लिखती है. वह जीवन के उच्चतम शिखर पर बैठ कर घाटी में टहलती हुई मृत्यु को देखती है. तीस साल की होते होते एक दिन विदुषी अथवा पागल होने के बीच का बारीक फासला मिट गया. उसने अपने दो बच्चो को गीले टावेल से दूसरे कमरे में ढका, कमरे के दरवाजों के आगे फर्श पर पानी डाला ताकि वे हर संभावित खतरे से सुरक्षित रहें, फिर खुद को रसोई में बंद कर के कार्बन मोनों ऑक्साइड के लिए ओवन को ऑन कर लिया. सुबह साढ़े चार बजे के करीब उसने अपना सर ओवन में रखा और सो गई.

यह भयानक था. ओवन में सर रख कर मर जाने के ख्याल से ही लोगों के रोंगटे खड़े हो गए. डिक के बाद उसके जीवन में आये पूर्व पति द्वारा उसे मारे जाने के कयास लगाये गए. उस कवि पति को आशंका से देखा गया. एक अद्वितीय कवयित्री के प्रशंसकों ने गहन जांच का दवाब बनाया था लेकिन चिकित्सकों ने कहा कि यह एक आत्महत्या का मामला है, क्या मैं इसे एक विलक्षण आत्महत्या कह दूं ?

मेरा नाम डिक नोर्टन नहीं है. मैं प्लेथ की तरह विलक्षण नहीं हूँ इसलिए मेरे खो जाने की चिंता गैर वाजिब है. इन दिनों किसी को याद नहीं कर रहा हूँ मगर डर सिर्फ यही है कि जब से मैंने याद के गमलों को तोड़ना शुरू किया है, मेरी पसंद के फूल फिर से खिलने लगे हैं.

September 10, 2010

दिनेश जोशी, आपकी याद आ रही है.

अब उस बात को बीस साल हो गए हैं. वे फाके के दिन थे. शाही समौसे और नसरानी सिनेमा की दायीं और मिलने वाली चाय के सहारे निकल जाया करते थे. उन्हीं दिनों के प्रिय व्यक्ति दिनेश जोशी कल याद आये तो वे दिन भी बेशुमार याद आये. मैं डेस्क पर बैठ कर कई महीनों से प्रेस विज्ञप्तियां ठीक करते हुए इस इंतजार में था कि कभी डेट लाइन में उन सबको भी क्रेडिट मिला करेगी, जो अख़बार के लिए खबरें इस हद तक ठीक करते हैं कि याद नहीं रहता असल ख़बर क्या थी.

हमारे अख़बार के दफ्तर में ग्राउंड फ्लोर पर प्रिंटिंग प्रेस और ऊपर के माले में एक हाल के तीन पार्टीशन करके अलग चेंबर बनाये हुए थे. एक में खबरों के बटर पेपर निकलते थे दूसरी तरफ पेस्टिंग, ले आउट और पेज मेकिंग का काम होता था. बाहर की तरफ हाल में रखी एक बड़ी टेबल पर तीन चार लोग, जो खुद को पत्रकार समझते थे, बैठा करते थे. मैं भी उनके साथ बैठ जाया करता था.

एक सांध्य दैनिक में काम करते हुए कभी ऐसे अवसर नहीं मिलते कि आप कुछ सीख पाएं, सिवा इसके कि हर बात में कहना "उसको कुछ नहीं आता". इसी तरह के संवादों से दिन बीतते जाते हैं. ऐसे अखबारों के हीरो क्राइम रिपोर्टर हुआ करते हैं. वे बलात्कार, छेड़-छाड़, अपहरण का प्रयास, या जानवरों के साथ इंसान का दुष्कर्म से जुड़ी खबरें खोजते हुए, पुलिस थानों में घूमते रहते हैं बाकी लोग जिन दुकानों के उदघाटन के विज्ञापन आये होते हैं. उनकी खबरें बनाने में दिन काट देते हैं. टेबलायड फार्म में छपने वाले अख़बार हमेशा लोकरंजन की सस्ती खबरों पर ही चला करते हैं, ये सच्ची बात नहीं है मगर वहां ऐसा ही था.

मुझे एक काम मिला कि सोनू खदान से निकलने वाले लाइम स्टोन पर जैसलमेर के संवाददाता बद्री भाटिया एक सीरीज लिखेंगे और मुझे उसको सही करना है. सत्रह कड़ियाँ लिखने के बाद एक सप्ताह बड़ी आपत्तिजनक ख़बर मिली. कुल मिला कर उसमे लिखा था कि न्यायालय का स्थगन आदेश तो कोई भी ला सकता है. दिनेश जोशी मुखिया थे तो उनको मैंने बताया कि ये कुछ ठीक नहीं लग रहा. खैर साहब, प्रबंधन ने वह ख़बर लिखवाई. जोशी जी की समझाईश फ़ैल हो गयी. ख़बर का शीर्षक था "स्टे तो गरीब की जोरू है जो चाहे सो ले आये" मेरे सीनियर जानते थे कि इसका अंजाम क्या है ?

मूल ख़बर पर प्रबंधन ने छापने का आदेश लिखा और अपने हस्ताक्षर किये. मेरे हाथ से लिखे आलेख को तुरंत कम्प्युटर कक्ष से मंगवा कर दिनेश जोशी ने मेरे ही सामने जला डाला. मूल आलेख वे अपने बैग में रख कर घर ले गए. मैं उस अख़बार को छोड़ कर चला गया फिर कुछ दिनों बाद सूचना और प्रसारण मंत्रालय की एक मिडिया यूनिट में भारत सरकार का नौकर हो गया.

उस ख़बर पर राजस्थान उच्च न्यायालय ने कड़ा फैसला सुनाया. पत्रकारों को कारावास की सजा दे दी गई. मेरे लिए ये अप्रत्याशित तो नहीं मगर कोई अच्छी खबर नहीं थी. खबरों के प्रकाशन के लिए उत्तरदायी दिनेश जोशी ने न्यायालय के समक्ष वास्तविक ख़बर का परचा रखा, जिसमे प्रबंधन के निर्देश थे. मैंने सुना कि बद्री भाटिया ने कहा, भाई मेरी कोई नौकरी तो है नहीं मैं तो छः महीने सेन्ट्रल जेल में काटना बेहतर समझूंगा... प्रबंधक शायद अपील लेकर आगे गए थे.

आखिरी बार की मुलाकात के समय जोशी जी भास्कर में कॉपी एडिटर थे... मगर आज बीस साल बाद भी उनकी याद आती है और याद आता है कि सीखने को हर जगह मिलता है.

September 5, 2010

हम तुम... नहीं सिर्फ तुम

अभी बहुत आनंद आ रहा है. रात के ठीक नौ बज कर बीस मिनट हुए हैं और मेरा दिल कहता है कुछ लिखा जाये. खुश इसलिए हूँ कि चार दिन के बुखार के बाद आज सुबह बीवी की डांट से बच गया कि मैंने दिन में अपने ब्लॉग का टेम्पलेट लगभग अपनी पसंद से बदल लिया कि एक दोस्त ने पूछा तबियत कैसी है कि अभी आर सी की नई बोतल निकाल ली है... हाय पांच सात दिन बाद दो पैग मिले तो कितना अच्छा लगता है.

सुबह ख़राब हो गई थी. मेरे समाचार पत्र ने अपने परिशिष्ट का रंग रूप तो बदला मगर आदतें नहीं बदली. यानि वही सांप वाली फितरत कि मध्य प्रदेश में व्यापार करने और अख़बार के पांव जमाने को भारतीय जनता पार्टी को गाली दो लेकिन हिंदुस्तान की खुशनुमा फेमिली के तौर पर भाजपा नेता शाहनवाज हुसैन और उसकी पत्नी का इंटरव्यू छापो. चाचा, कृष्ण के वैज्ञानिक तत्व पर शोध की पोल यहीं खुल जाती है. तुमसे तो कुलिश साहब अच्छे थे कि जो करते थे, वही कहते भी थे. तुम मीर तकी मीर से शाहिद मीर तक को भुला देना चाहते हो और संगीत में अन्नू मलिक को हिंदुस्तान का सिरमौर मनवाना चाहते हो, कि तुम्हें सब भूल जाता है और एक आमिर खान का लास्ट पेज पर पांच सेंटी मीटर का स्टीमर लगाना याद रहता है... और तो कुछ बचा नहीं है उस कौम में जो हिंदुस्तान की होकर भी हिंदुस्तान की नहीं कहलाती.

आज दिन भर मेरे ज़ेहन में बहुत से नाम आते रहे और मैं सोचता रहा कि क्या वाकई उनको प्रकाशन उद्योग मिटा पायेगा, क्या व्यापार इंसान से बड़ा हो जायेगा और क्या महमूद दरवेश का नाम भी फिलिस्तीन के मिट जाने पर मिट जायेगा. उधर चार दिन पहले फ़िडेल कास्त्रो फिर दिखाई दिये थे उन्होंने बोला भी कि दुनिया में जब कुछ न बचेगा तब मज़लूम बचेंगे. मुझे उनको देख कर ख़ुशी होती है कि उनका देश रहमो करम पर नहीं चलता. हम दिल से भूल जाते हैं भोपाल गैस काण्ड के सबक को और नए परमाणु समझौते को सदन में पारित करवा लेते हैं. हम भूल जाते हैं उन लोगों को जो तीन सौ इकहत्तर को समाप्त करने का एजेंडा लेकर आते हैं और राज कर के चलते बनते हैं.

'हम तुम' नहीं सिर्फ तुम...

September 1, 2010

अफीम सिर्फ एक पौधे के रस को नहीं कहते हैं


उसे मरने से बीस दिन पहले अस्पताल में लाया गया था. उसने ज़िन्दगी के आखिरी दिन एक पुलिसकर्मी की परछाई देखते हुए बिताये थे. वह लीवर और ह्रदय के निराशाजनक प्रदर्शन से पीड़ित थी. उसका नाम एलोनोरा फेगन था और बेल्ली होलीडे के नाम से पहचानी जाती थी. वह अमेरिका की मशहूर जोज़ गायिका थी. पैंतालीस साल की होने से पहले ही मर गई. उसे अफीम से बेहद लगाव था. इसके लिए वह कुछ भी कर सकती थी. कुछ भी यानि कुछ भी...इंसान की अपनी कमजोरियां होती है. उसकी भी थी.

मुझे लगता है कि उसकी ज़िन्दगी के आखिरी दिन उस भारतीय आम एकल परिवार जैसे थे. जिसमे पत्नी या पति को विवाहपूर्व या विवाहेत्तर सम्बंधों का पता चल जाये फिर तुरंत रोने -धोने, लड़ने - झगड़ने और आरोप - प्रत्यारोप के बाद अपराधी को अन्य परिवारजनों द्वारा नज़रबंद कर दिया जाये. ऐसे ही लेडी डे के नाम से मशहूर उस स्त्री के हालात रहे होंगे कि वह अपनी कमजोरियों पर बैठे एक पहरेदार को देखते हुए मर गई और ठीक इसी तरह कई परिवार भी तबाह हो गए. नशाखोरी और देहिक सम्बन्धों की चाह सभ्य समाज में अनुचित है, अपराधिक है... मगर है.

हमारा समाज कथित रूप से बहुत ही सभ्य है. सभ्य होने की आकांक्षा में समाज कई बार अमानवीय भी हो जाया करता है. हम प्रेम और उसकी अनुभूतियों को गहराई से जीये जाने से अधिक इसकी चिंता में डूबे रहते हैं कि समाज हमें कितना शिष्ट और शालीन मानता है. हम जरूरी बातें भूल जाते हैं और स्वयं को प्रताड़ित करते हुए एक अच्छे आदमी का चेहरा ओढना अधिक पसंद करते हैं. मैं ऐसा नहीं कर पाता फिर भी मुझे अपराधबोध नहीं होता तो क्या मैं एक दम गया गुजरा आदमी हूँ ? दुनिया के महान लोगों को भी इसलिए मुआफ नहीं किया गया कि उन्होंने अपनी कमजोरियों को स्वीकार कर लिया था. मैं तो महान क्या ख़ास भी नहीं हूँ फिर भला रहम की उम्मीद भी क्यों कर हो. इसलिए जैसा पहले था वैसा अब भी हूँ सिर्फ इस विरोधाभासी बयान के साथ कि किसी को दुःख नहीं देना चाहता हूँ.

मेरी प्रिय पत्नी, मैं नामी आदमी न बन सका लेकिन फिर भी मेरी कमजोरियों पर तुमने अमेरिकी प्रशासन जैसा निर्णय लेकर कोई कोप पहरे पर नहीं बिठाया इसीलिए ज़िन्दा हूँ. हालाँकि मैं अपने आचरण में घुली अफीम से मुक्त नहीं हो पाऊंगा लेकिन आज तुम्हारे जन्मदिन पर फिर से कहता हूँ "तुमसे जब पहली बार मैंने कहा था कि तुम्हारे साथ ज़िन्दगी बिताने को जी चाहता है तो उसका अर्थ भी यही था. मुझे तुम बेहद हसीन लगती थी. अब और ज्यादा हसीन लगती हो. इससे भी बड़ी एक बात थी. मेरे मन में एक विश्वास था कि मेरी गुज़र तुम्हारे सिवा कहीं न हो पायेगी. मैं सही निकला. इस एक सही निर्णय ने मेरे बाकी के गलत निर्णयों को ढक लिया."

वह अगले जनम में मेरे साथ नहीं रहना चाहती... कल रात ऐसा कहते हुए मुस्कुरा रही थी. कभी कभी मुस्काने का अर्थ ये नहीं होता कि वह सीरियस नहीं है, लेकिन जाने दो... हसीन लोगों के बहुत नखरे होते हैं.

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.