November 26, 2010

खेत में धूप चुनती हुई लड़कियां

वो जो रास्ता था, कतई रास्ता नहीं जान पड़ता था यानि जिधर भी मुंह करो उधर की ओर जाता था. रेत के धोरों में कुछ काश्तकारों ने पानी खोज निकाला था. वे किसान मोटे मोटे कम्बल लिए आती हुई सरदी से पहले चने की जड़ों में नमी बनाये रखने की जुगत लगा चुके थे. मैं ट्रेक्टर पर बैठा हुआ ऊँची जगह पर पंहुचा तब नीचे हरे रंग के छोटे-छोटे कालीन से दिखाई पड़ने लगे. मुझे इसमें कोई खास दिलचस्पी नहीं थी कि ट्रेक्टर किस तरह से सीधे धोरे पर चढ़ जाता है. मैं सिर्फ अपने देस की सूखी ज़मीन को याद कर रहा था जो बारह सालों में दो एक बार हरी दिखती थी.

मैं इन खेतों को देखने नहीं निकला था. ये खेत एक बोनस की तरह रास्ते में आ गए थे. हमें मेहनसर की शराब पीने जाना था. ये रजवाड़ों का एक पसंदीदा ब्रांड था. हेरिटेज लिकर के कई सारे ख्यात नामों में शेखावटी की इस शराब का अपना स्थान था. मैं जिसके ट्रेक्टर पर बैठा था, वह बड़ा ही दुनियावी आदमी था. खेतों में फव्वारों के लिए दिये जाने वाले सरकारी अनुदान के लिए दलाली किया करता था. अफसरों से सांठ-गाँठ थी. कार्यालयों के बाबुओं को उनका कमीशन खिलाता और शौकिया तौर पर लोगों को अपनी सफलता के प्रदर्शन के लिए शराब की पार्टियाँ दिया करता था.

वह जब मेरे घर पहली बार आया उस समय म्यूजिक प्लेयर पर कोई सूफी संगीत बज रहा था. वह चाहे किसी भी समय आता उसे ऐसा ही कुछ सुनने को जरुर मिलता. "मुझे आपकी पसंद से रश्क होने लगा है" ऐसा उसने कहा और फिर हम मित्र हो गए. खैर उसी के साथ हम एक हवेलीनुमा घर वाले एक धनी किसान के यहाँ पहुंचे. उनकी आवभगत ने मुझे भिगो दिया. मैं मानता था कि मारवाड़ के लोग ही अच्छे मेजबान है लेकिन फिर इसमें थोड़ा संशोधन भी कर लिया कि कुछ अच्छे मेजबान शेखावटी में भी हैं.

उन्हीं दिनों जगजीत सिंह के नए एल्बम में एक खूबसूरत ग़ज़ल थी. "अपनी आग को ज़िन्दा रखना कितना मुश्किल है.." किसी शाम ज्यादा प्यार आता तो एल्बम उठाया और शाईर का नाम पढ़ा... इशरत आफ़रीन. नाम भी बड़ा ही खूब था. इशरत का अर्थ था ख़ुशी और उनके नाम के सन्दर्भ में आफ़रीन का अर्थ हुआ, जो किसी से मेल नहीं खाता यानि सबसे जुदा. मैंने इससे पहले कभी उनका नाम नहीं सुना था. उनकी ग़ज़ल "होठों को सी ले लड़की..." ने खूब दिलों में जगह बनायीं और इसके बाद मैंने उनकी कुछ नज़्में पढ़ी. उनकी नज़्मों में महिलाओं की गज़ब की तरफदारी मिलती है. यही अंदाज़ हकों और सामाजिक बराबरी के मुद्दों पर भी मिलता है. इशरत की नज़्में अंतर्राष्ट्रीय सद्भाव का भी प्रतिनिधित्व करती है.

मेहनसर की शराब की लाजवाबी पर अभी नहीं लिखना चाहता. मैं उस कोकटेल के बारे में याद करना चाहता हूँ जो चने के खेत, ट्रेक्टर की सवारी, जगजीत सिंह की गहरी आवाज़ और इशरत आफ़रीन के बारे में सोचने से बना था. फिर कई साल बाद मैंने कपास के खेत देखे. चीन के बाद हम दूसरे नंबर के कपास उत्पादक हैं मगर मैंने पच्चीस साल की उम्र के बाद ही देखा कि कपास के दूधिया फूलों वाला खेत कैसा दीखता है ? उन्हीं दिनों मैंने जाना कि खेतिहर मजदूर कैसा जीवन जीते हैं और एक खेतिहर लड़की को उसके खेत मालिक के लड़कों द्वारा उठा लिया जाना कितना आसान है. उनका जीवन सच में बहुत कष्टप्रद है.

इशरत आफ़रीन का जन्म पाकिस्तान में हुआ था. वे भारत की बहू हैं और फ़िलहाल अमेरिका में रहती हैं. उनकी हाल की ख्यात नज़्म है "समाया के सीने में दिल धड़कता है..." मैं लाख कोशिशें करता मगर मुझे उनकी नज़्में कहीं मिलती ही नहीं. उनकी ये नज़्म मेरे देखे सुने अनुभवों का सतरंगी कोलाज बुनती है.

खेतों में काम करती हुई लड़कियां
जेठ की चम्पई धूप ने
जिन का सोना बदन
सुरमई कर दिया
जिन को रातों में ओस और पाले का बिस्तर मिले
दिन को सूरज सरों पर जले.

ये हरे लॉन में
संग-ए-मरमर के बेंचों पे बैठी हुई
उन हसीन मूरतों से कहीं खूबसूरत
कहीं मुख्तलिफ
जिन के जूड़े में जूही की कलियाँ सजी
जो गुलाब और बेले की ख़ुशबू लिए
और रंगों की हिद्दत से पागल फिरें.

खेत में धूप चुनती हुई लड़कियां भी
नई उम्र की सब्ज़ दहलीज़ पर हैं मगर
आईना तक नहीं देखतीं
ये गुलाब और डेज़ी की हिद्दत से नाआशना
खुशबुओं के जान लम्स से बेखबर
फूल चुनती हैं लेकिन पहनती नहीं,
इन के मलबूस में
तेज़ सरसों के फूलों की बास
उन की आँखों में रोशन कपास.

November 22, 2010

और अब क्या ज़माना खराब आयेगा

पंडित शहर का है और घर के बड़े बूढ़े सब गाँव से आये हैं. गणपति की स्तुति के श्लोकों के अतिरिक्त पीली धोती धारण किये हुए पंडित जी क्या उच्चारण करते हैं ये मेरी समझ से परे है किन्तु विधि विधान से आयोजन चलता रहता है. जटाधारी नारियल के साथ एक मौली भेजी जानी है जिस पर गांठें लगनी है. ये गांठे इस परिवार की ओर से तय विवाह दिवस को निर्धारित करती हैं. इन गांठों को दुल्हे के घर में हर दिन एक एक कर के खोला जाता रहेगा और आखिरी गाँठ वाले दिन शादी होगी तो उन्हें हिसाब से दुल्हन के यहाँ बारात लेकर पहुच जाना है.

कभी हमारे यहाँ तिथि-दिवसों का और कागज-पत्रियों का उपलब्ध होना असंभव बात थी. फेरी पर निकलने वाले गाँव के महाराज से हर कोई तिथि और दिवस पूछा करता था. खेतों में काम करने के सिवा कोई काम नहीं था. ये तो बहुत बाद की बात है, जब स्कूलों का अवतरण हुआ. मेरे पिता और ताऊ जी घर से पच्चीस किलोमीटर दूर पढने जाया करते थे. उन दिनों अनपढ़ लोगों से याददाश्त में भूल हो जाना बड़ी बात नहीं थी इसलिए नारियल के साथ मौली में बंधी गांठे ही विश्वसनीय सहारा होती थी. कई बार भूल से अधिक गांठें खोली जाने से बारातें एक दो दिन पहले पहुँच जाया करती थी. इस मूर्खता के उदाहरण हर बार लग्न लिखे जाते समय दोहराए जाते रहते. दुल्हे के घर में गांठ खोलने का काम अक्सर उसकी माँ के ही पास होता है. इन दिनों लगभग हर दुल्हे की माँ के पास मोबाईल फोन है. विवाह के निमंत्रण पत्र में छपी तिथि को पढने जितना ज्ञान है. घर की दीवारों पर, टेबल पर और हाथ घड़ियों में कलेंडर है फिर भी अगर गांठे नहीं दी जाएगी तो लग्न कैसे भेजा जा सकता है ?

मैंने और जया ने कल दिन का भोजन भी इसी ख़ुशी भरे घर में किया. सच में जिस घर में विवाह होता है, उसके खाने का स्वाद बदल जाता है. उसमे विवाह की खुशबू घुल जाती है. बीस साल पहले मैं एक ऐसे नेक आदमी की संगत में था जो रिजर्व बैंक के गवर्नर के घर और केन्द्रीय मंत्रियों के महाभोजों में मुझे अपने साथ ले जाता था. वे बीसियों पकवानों वाले खाने व्यापार और सियासत की खुशबू से भरे होते थे लेकिन उसी उच्च कुलीन वर्ग के विवाहों के खाने में यही खुशबू जाने कहां से आ ही जाया करती थी. विवाह भोज की खुशबू हमारे मस्तिष्क में बसी है और ये इसलिए भी अलग है कि इसमें कोई सियासत नहीं है.

हमारे यहाँ मुख्यतः बाजरा उत्पादन करने वाले किसानों की आय बहुत सीमित है तो परंपरागत रूप से हलुआ और तेज लाल मिर्च में पके हुए काले चने वैवाहिक अवसरों पर भोज की एक मात्र डिश हुआ करते हैं. यह बनाना आसान है. इससे भी बड़ी बात है कि ये सामाजिक बराबरी की बात है. आप सिर्फ लाल मिर्च के कम ज्यादा होने पर ही चर्चा कर सकते हैं. सरपंच हो या किसान सबका भोज एक सा होता था. समय के साथ बहुत बदलाव आया है. आज कल गावों में बड़े शामियाने लगाये जाने लगे हैं. शहर से आये कंदोई तीन चार तरह की सब्जी और इतनी ही प्रकार की मिठाइयां बनाते हैं. दिखावा और फिजूल खर्ची बढ़ते जा रहे हैं. जो अच्छी परम्पराएँ थी वे हमने छोड़ दी लेकिन मौली में गाँठ लगाना नहीं छोड़ा.

दोस्त कभी सावों के समय इधर आओ... हम किसी सुदूर रेतीले गाँव के विवाह भोज में घुस जाएंगे और खूब सारा हलुआ और काले चने का सूप पियेंगे. तब तक के लिए सबा के दो शेर सुनो. पहला वाला तुम्हारे लिए और दूसरा वाला मेरी बार के मालिक के लिए.

आज कल मुझसे वो बात करता नहीं, और अब क्या ज़माना खराब आयेगा.
मालिक-ए-मयकदा रिंद हो जायेंगे, मयकदे में नया इंक़लाब आयेगा !!


November 19, 2010

रास्ते सलामत रहें

उन्होंने सबसे पहले पत्थर की नक्काशीदार रेलिंग को तोड़ा फिर गोल घेरे में बनी दीवार को उखाड़ फैंका. इस तरह चौराहे का घूम चक्कर नंगा दिखाई देने लगा. अगली सुबह उन्होंने बाहर के बड़े घेरे को इस तरह साफ़ कर दिया जैसे यहाँ इतना बड़ा सर्कल कभी था ही नहीं. मैंने अपने जीवन के बेशकीमती सालों में उदासी और ख़ुशी के अहसासों को साथ लिए हुए इस चौराहे को देखा है. अब स्वामी विवेकानंद की आदमकद मूर्ति और एक हाई मास्ट लाईट का पोल रह गया है. इन्हें भी अगले कुछ दिनों में हटा लिया जायेगा.

मेरे स्कूल के दिनों से ही ये चौराहा साल दर साल संवारा जाता रहा है. युवा दिवस और चिकित्सा महकमे की योजनाओं के बारे में जागरूकता रैली निकालने के लिए बच्चों को स्कूल से उठा कर यहाँ लाया जाता रहा है. वे बच्चे स्कूल के जेल जैसे माहौल से बाहर आकर भी यहाँ यकीनन स्वामी विवेकानंद के बारे में नहीं सोचते होंगे. उन्हें कतार न टूटने, माड़साब या बहिन जी के आदेशों की चिंता रहती होगी या फिर वे मूंगफली ठेलों और चाट पकौड़ी वालों तक भाग जाने की फिराक में रहते होंगे. अब बच्चों को थोड़ा और दूर तक जाना होगा कि ये जगह बचेगी नहीं.

दोस्त के ख़त के इंतजार में शाम काटने या फिर पावती लिखने के लिए छत से उपयुक्त कोई जगह नहीं होती. मैं घर की छत से इस चौराहे को बरसों तक देखता रहा हूँ. अब भी सामने दिख रहा है. पहाड़ी की तलहटी में बसावट से आगे बढ़ता हुआ, ये रेगिस्तानी क़स्बा अब कई किलोमीटर तक फ़ैल गया है. कई हज़ार करोड़ के निवेश से यहाँ के आदमी से सुकून और रेत से तेल निकाला जा रहा है. ये कस्बा शहर होने की प्रसव पीड़ा से गुजर रहा है. वाहनों की तादाद अविश्वसनीय रूप से बढ़ गई हैं. ट्रेफिक को दुरस्त करने के लिए कोई पच्चीस करोड़ की लागत से एक ओवर ब्रिज का काम शुरू हो गया है.

इस चौराहे के बीच में एक पीपल का पेड़ भी है हालाँकि रात में पीपल के पत्तों की आवाज़ें भूतहा ध्वनियाँ बिखेरती होंगी लेकिन दिन भर यहाँ लोक गायक मांगणियार बैठे रहा करते हैं. ये उनके मिलने का स्थान है. यहीं पर भारू की चाय पीने के लिए शहर जुटा करता है. लकड़ी की बेंचों पर बैठे हुए मात्र बीस रुपये में बाजरा के दो सोगरे, खट्टा रायता और कोई एक सब्जी यहीं मिला करती है. दो चार साल पहले लगे पानी के फव्वारे के पास शाम बिताते हुए कई नए नवेले परिवार दिखते रहा करते हैं.

कल शाम हम वोलीबाल खेलने जा रहे थे कि मोहवश मैंने बाईक को रोक दिया और नौ साल के बेटे से कहा "छोटे सरकार, अब कैसा दिख रहा है चौराहा ?" उसने पूछा कि "ऐसा हो क्यों रहा है ?" मैंने उसके प्रश्न को नज़र अंदाज करते हुए फिर पूछा "क्या ये चौराहा आपको याद रहेगा ?" वह बची हुई लोहे की रेलिंग पर हाथ रखे हुए कहता है "शायद रहेगा..." उसने फिर आस पास देखा और पूछा "पापा, यहाँ से और क्या-क्या चीजें हटा दी जाएगी ?" मैंने कहा "बेटा दिल्ली में बैठे हुए लोग जंगलों से आदिवासियों को, समन्दरों से मछुआरों को और रेगिस्तानों में रहने वाले ऊंट जितने लम्बे लोगों को हटा देंगे. सदियों से यहाँ रहने वाले ये लोग जाहिल और गंवार हैं. ये विकास की राह के रोड़े हैं. " मुझे ऐसा नहीं लगा कि उसे कुछ समझ आया है लेकिन मैं चाहता हूँ कि इस चौराहे की याद उसके मन में बनी रहे.

इस चौराहे से कितनी बार मैं अपने पिता के साथ उनकी सायकिल पर, फिर स्कूटर और फिर कार में पीछे बैठे हुए निकला हूँ. उनकी यादें मेरे साथ आजीवन रहेगी, उनमे कहीं ये चौराहा भी होगा. सोचूं तो लगता है कि कोई बड़ी बात नहीं, इसे थोड़ी ही दूर फिर से बना दिया जायेगा. इससे आगे की सोच मुझे परेशान करती है कि क्या उस नई जगह से मेरा कोई जुड़ाव होगा या यही घूम चक्कर सपनों में आता रहेगा. मैंने पाठ्यक्रम से बाहर की पहली पुस्तक स्वामी विवेकानंद की ही पढ़ी थी. मेरे पिता के संग्रह में इतिहास की पुस्तकों के अलावा दयानंद सरस्वती और स्वामी विवेकानंद की पुस्तकें थी. उन्होंने बड़े सलीके से मुझे पहले इन्हें ही पढने को प्रेरित किया था. स्कूल के आखिरी दिनों में उन्होंने मेरा मार्क्स से परिचय करवाया था. चौराहे पर खड़ी गेरुए वस्त्र वाली प्रतिमा, मेरे जीवन का हिस्सा है. ये एक जिद भी है कि मैंने इसे जहाँ देखा है, इसे वहीं होना चाहिए.

दोस्त तुम कुछ समय पहले आये होते तो मैं तुम्हें दिखाता कि ये विवेकानंद सर्कल है. इससे पूर्व की ओर सौ मीटर के फासले पर बैठे गाडोलिया लुहारों के बीच मेरे पिता का बनाया हुआ घर है. इस बदलते हुए पते के बीच मुझे नासिर काज़मी साहब की कही और गुलाम अली साहब की गाई ग़ज़ल याद आने लगती है. ग़ज़ल से पहले के शेर को सुनते हुए मैं अक्सर सोचता हूँ कि मेरे पिता इस रास्ते से ही चले आ रहे हैं. ओह पापा, मुझे आपकी याद बहुत रुलाती है. मैं उन रास्तों को सलामत देखना चाहता हूँ, जो आपके पांवों के निशानों से सजे हुए थे.

November 16, 2010

भूख आदमी को छत तक चढ़ा देती है

नाईजीरिया को लोग भुखमरी के सिवा और किसी कारण से जानते हैं या नहीं लेकिन मैं जानता हूँ कि वहां एक अद्भुत संस्कृति है योरुबा.. योरुबा लोगों का एक लोकगीत बरसों पहले पढ़ा था. उसे एक किताब के पीछे लिख लिया. मेरी किताबें अक्सर खो जाया करती है. खोने का एक मात्र कारण उसे मांग कर ले जाने वालों का लौट कर न आना है.

भाषाएँ दुनिया के किसी कोने में बोली जाती हों या उनका विकास हुआ हो मगर उनकी समझ हतप्रभ कर दिया करती है. मनुष्य के दैनंदिन जीवन के प्रसंग देवों को दी जाने वाली बलि से अधिक महत्वपूर्ण हुआ करते हैं. सामाजिक विकास की कामना और मुश्किलों के गीत कालजयी हो जाया करते हैं. मैं सोचता हूँ कि विद्वानों को और बहुत से अनुवाद करने चाहिए ताकि हम समझ सकें कि मनुष्य मात्र एक है. उसकी खुशियाँ और भय सर्वव्यापी है.

मनुष्य द्वारा किये गए प्रेम का अनगढ़ रूप जितना खूबसूरत लोकगीतों में दिखता और चीरता हुआ हमारे भीतर प्रवेश करता है ऐसा और कोई माध्यम नहीं है. लोकगीतों में हर स्त्री-पुरुष को अपना अक्स दिखाई दे सकता है. मनुष्य का प्रेम रसायन भाषाओं के विकास से पहले का है. इस तथ्य को लोकगीत चिन्हित करते हैं. मेरा रसायन शास्त्र उसी दिन फ़ैल हो गया था जब मैं चुप देखता रहा. जब मैं उसे लिखता रहा था कि तुम बहुत ख़ास हो मगर अफ़सोस कि तब किसी केटेलिस्ट ने काम नहीं किया .

बहुत साल बीत गए हैं और फासला बढ़ता जा रहा है. हम एसएमएस करते हैं. उतनी कीमत में बात हो सकती है लेकिन नहीं होती. समय की पगडण्डी हमें अलग रास्तों पर ले गयी है. इस सफ़र में तुमने बहुत से लोकगीत पढ़े सुने होंगे. आज इसको पढो हालाँकि यह भूख का गीत है. भूख, जिसने हर बार याद दिलाया कि दुनिया में बराबरी होनी चाहिए. यह प्रेम का गीत होता तो भी कुछ ऐसा ही बनता कि प्रेम के लिए आदमी शहतीरों पर उल्टा लटका रह सकता है ...

भूख
भूख आदमी को छत तक चढ़ा देती है
और वह शहतीर से लटका रहता है

जब भूखा नहीं होता मुसलमान, वह कहता है
हमें मना है वानर खाना
पर जब भूखा होता है इब्राहिम
तब खा लेता है बन्दर.

भूख जब सताती है स्त्री को हरम में
वह दिन में ही सडकों पर निकल आती है
भूख पुजारी को उकसाएगी
वह अपने ही देवस्थान में करेगा चोरी.

जब मृत्यु बंद करती है द्वार
भूख खोल देती है उन्हें....
भूख के लिए बेमतलब है ये
कि "मैंने कल ही तो पेट भरा था. "

मेरा डिनर अभी शेष है. मुझे खाने में काफी पोष्टिक चीजें मिलेगी. मेरी भार्या अपने परिवार की बेल के पोषण को प्रतिबद्ध है. वह सुबह पांच बजे जागती है और रात ग्यारह बजे तक सोती है मगर आज उसको मैंने निवेदन किया है कि वह मेरे बगैर खाना खा ले. मैं इस समय एक सस्ते दर्जे कि ज़िन पी रहा हूँ और सोचता हूँ कि अभी शुभरात्रि कह दूं तो कोई हर्जा नहीं होगा शायद...

November 8, 2010

यही मौसम क्यूँ दरपेश है ?

मौसमों की कुंडली में सेंधमारी करके उन्हें तोड़ देने का हुनर अभी आया नहीं है. कुछ दिन बिना पिए रहे, कुछ सुबहों का मुंह देखा, कुछ शामें घर में बितायी, कुछ रातों को देर तक दीये जलाये और आखिर में रविवार को फिल्म देखने के लिए गए. इससे पहले मैंने साल दो हज़ार दो में गुजराती नाटक 'आंधलो पाटो' जैसी फिल्म आँखें देखी थी. वह फिल्म बैंक के एक मैनिक अधिकारी पर केन्द्रित थी. जो तीन अंधे लोगों को बैंक लूटने के लिए मजबूर करता है. इसे अंजाम तक पहुँचाने के लिए नायिका उन्हें दक्ष करती है. उसमे कई सारे शेड्स थे. उस फिल्म को देखे हुए आठ साल हो गए हैं.

आँखें फिल्म से पहले जनवरी सत्तानवे में जयपुर के एक सिनेमा हाल में 'सपने' फिल्म देखी थी. उस फिल्म में गायक एस. पी. बाला सुब्रह्मण्यम ने अभिनय किया था. काजोल पर फिल्माए गए गीत आवारा भंवरे के अलावा मुझे फिल्म से अधिक उस दिन की याद है कि वह बीता किस तरह था. जाने क्यों अँधेरे कमरों में बैठ कर गल्प और अनुभूतियों के तिलिस्मों को देखना कभी रास आया ही नहीं. कितनी ही खूबसूरत फ़िल्में आई. उनको क्रिटिक से लेकर आम दर्शक ने सराहा. मैं फिर भी जाने किस दुनिया में रहता हूँ. घर पर कभी हल्ला होने लगता है और कोई मुझे पूछता भी नहीं कि फिल्म देखने चलोगे ?

कल फिल्म देखने क्यों गया था ? कह नहीं सकता. पत्नी ने कहा आखिर आप हमारे करीब तो आये. ये उसकी शरारत थी क्योंकि मैं घर में सारे दिन उसी से चिपके रहने को बहाने ढूंढता रहता हूँ. सिनेमा हाल में दर्शकों का अजब शोर था. वे समवेत स्वर में चिल्ला रहे थे. फिल्म में एक ही जगह मुझे ऐश्वर्या में अपील लगी मगर उस समय दर्शकों की सीटियाँ बुझी रही तो मुझे लगा कि मेरे सेन्स बराबर नहीं है. फिल्म हमारी उसी पुरातन ख्वाहिश पर आधारित थी कि अगर चांस मिले तो हम जिंदगी को फिर से जीते हुए गलतियों को दुरस्त कर सकें. बकवास फिल्म थी. कितना अच्छा होता कि फिल्म के नायक - नायिका अपने बच्चों के जीवन में कुछ इस तरह अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप करते कि वे उन गलतियों को दोहराने से बच जाएँ.

फ़िल्में नहीं देखना एक फोबिया है और निरंतर फ़िल्में देखना किसी डिस-ऑर्डर का संकेत है. मैं अभी इस ओर हूँ. यानि इससे बच कर खुश रह सकता हूँ. उस ओर होना अधिक घातक होता क्योंकि ये शराब पीने जैसा काम है. आप निरंतर बढ़ता हुआ नशा खोजते हैं लेकिन फिल्म हो या कोई और माध्यम सबकी अपनी सीमायें हैं. हर काम एक दिन आपको सन्यास जैसी किसी अवधारणा की ओर प्रेरित करता है. काम का बोझ और विफलताएं अवसाद से भर देती है फिर हमें एकाएक किसी नए धर्म में आशा की किरणे दिखाई देने लगती है. कोई बनारस के घाटों पर मालाएं धारण कर रहा होता है, कोई मस्जिदों के आहातों में चुप बैठना पसंद करने लगता है तो कोई मोमबत्तियां जला कर प्रार्थनाएं करने में ख़ुशी खोजने लगता है. मुझे ऐसा करने में रूचि नहीं है क्योंकि ये भी एक क्रिया है और एक दिन इससे भी विरक्ति होना स्वभाविक है.

मैं जिस मौसम को बिखेर देना चाहता हूँ. वह अभी ठहरा हुआ ही है.

November 4, 2010

ओ वादा शिकन...

आजकल, जाने क्यों आवाज़ें बड़ी साफ़ सुनाई देने लगी है.
बाहर गली में किसी के पाजेब की रुणझुण कदम दर कदम करीब आती हुई सुनाई पड़ती है फिर किसी के चलने की कुछ आहटें है और कभी दिन भर, सांझ की राग सा बच्चों का शोर खिड़की तक आकर लौट जाता है. कितने सफ़र, कितने रास्ते उलझ गए हैं. बेचैन रहा करने के दिन याद आने लगे हैं. सलेटी जींस और ऑफ़ वाईट शर्ट पहने घूमने के दिन. ऑफिस, घर या बाज़ार सारा दिन होठों को जलाते हुए सिगरेट के कई पैकेट्स पीना ज़िन्दगी के कसैलेपन को ढक नहीं पाता था लेकिन खुद को राख सा बिखरते हुए देखना सुख देता था.

अकेलापन यानि पत्तों के टूटने की आवाज़, टूटन को सुनना माने एक लाचारी. वे उसकी आवारगी के दिन नहीं थे. कुलवंत की दुकान से सुबह शुरू होती और दिन सिगरेट की तरह जलता ही रहता. रात होते ही शराब फिर सवेरे उठ कर बालकनी में आता और देखता कि गाड़ी कैसे खड़ी है. अगर वह सही पार्क की हुई मिलती तो शक होता कि रात को खाना खाने गया ही नहीं. अपने हाथों को सूंघता. अँगुलियों के बीच खाने की खुशबू होती तो लगता कि कल सब ठीक था. सरकारी फ्लेट पर वह इतनी पी चुका होता कि दुनिया के सारे खौफ गायब हो जाते. उसे अपनी पहचान भूलने लगती और अक्सर रोने लगता. बी एल पीठ थपथपाता हुआ, एक गाली देता. 'साली...' फिर एक छोटे से पॉज के बाद कहता "किसी के साथ गुजर कर लो पर एक वही ..." पलकों पर ठहरे हुए आंसू ज्यादा देर ठहर नहीं पाते. बी एल फिर ऐलान करता कि चलो अरोड़ा के...वहीं चिकन खायेंगे और पियेंगे.

वह कुछ भी पी लेता. देसी - विलायती, कच्ची या पक्की. अरोड़ा के ढाबे पर नियमित जाना था तो दो स्टील के ग्लास आ जाते. कांच के ग्लास में पीनी होती तो होटल के ऊपर नौकरों के लिए बने कमरे में जाना होता. ज़िन्दगी भी दो हिस्सों में बंट गई थी जिसके एक तरफ कांच और दूसरी तरफ स्टील के ग्लास थे. जितना पीते जाते उतने ही शालीन होते जाते. दुःख दर्द डूबने लगते. पीते हुए हमेशा होटल के सामने का एस टी डी बूथ ही दीखता रहता. " मैं कल जा रहा हूँ." ऐसा कहते हुए उठने को होता तभी बी एल हाथ पकड़ लेता "रात के बारह बज चुके है अब उसको फोन मत करो..." रात डूब जाये, इससे पहले कुछ और पी ली जाये.

सुबह पांच बजे बस स्टेंड पर टहल रहा होता. जो भी बस मिलती उसमे बैठ जाता. मीलों पसरी हुई रेत, धूप में चमकती. कई सौ किलोमीटर का सफ़र. पानी की तलब साथ चलती रहती. तीन बार बस बदलता और हर बस के आखिरी स्टॉप तक का यात्री हुआ करता. सवारियां उतरती और चढ़ती जाती. सर्दियों में ठण्ड से अकड़े हुए तलवों को अपने जूतों में हिला कर गरम करने की कोशिश करता. कभी बस का ड्राइवर किसी स्टेंड पर जलते हुए अलाव के पास रोकता तब अपने पांव सेकना नहीं भूलता. गरमियां होती तो लू बदन को चीरती रहती. एक गरमी की दोपहर में स्टेंड पर पानी पीने के लिए उतरा तो ड्राईवर ने कहा "भाई ये पानी तुमसे पिया नहीं जायेगा." वह बहुत खारा पानी था जैसे नमक के दो चमच एक ग्लास पानी में घोल दिये गए हों. वह आधा जग पानी पी गया. ड्राईवर ने पूछा "कहां के रहने वाले हो." कहा "इस रेगिस्तान के आखिरी छोर का..."

रंगीन हवेलियों वाले देस में शाम उतरती जाती. बिस्तर पर लेटा हुआ उसे देखता. खिडकियों पर कबूतर बैठे रहते और वह आलू छीलती हुई दो एक बार उजड़ी निगाह डालती हुई अपने काम में लगी रहती. रात बरसती रहती और वह उसकी छातियों में सर रखे हुए रोता ही जाता. ओ वादा शिकन... इन दिनों फिर वही आवाजें है और वह फिर से टूट रहा है.


दो सूखे पत्ते नम मिट्टी में

एक रोज़ कोई कोंपल खिली जैसे नज़र फेरते ही किसी ने बटुआ पार कर लिया हो। एक रोज़ उससे मिला। फिर उससे ऐसे बिछड़ा जैसे खाली बटुए को किसी ने उदासी ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.