December 30, 2011

नी मुईये, मैला मन मेरा...

इस साल की सुराही में एक बूँद बची है. जो पी लिया वह ये था कि प्रायोजित गांधीवाद के एक तालिबानी नेता ने साल भर लड़ाई लड़ी. उसके सामने नूरा कुश्ती के पहलवान भारतीय राजनेता थे. परिणाम ये रहा कि देश की जनता फिर हार गयी. मैं नहीं जानता कि नूरा कुश्ती के जनक कौन है मगर पाकिस्तान में यह बहुत फेमस है. इसमें कुश्ती लड़ने वाले दोनों पहलवान पहले से तय कर लेते हैं कि कोई किसी को हराएगा नहीं. दांव पर दांव चलते रहते हैं. दर्शक परिणाम की उम्मीद में हूट करते रहते हैं. आख़िरकार नाउम्मीद जनता अपने ढूंगों से धूल झाड़ती हुई घर को लौट जाती है. पहलवानों के समर्थक विपक्षी की नीयत में खोट बताते हुए अगली बार की नयी लडाई के वक़्त देख लेने की हुंकार भरते रहते हैं.

हमारी निष्ठाएं यथावत रही. भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ कोलाहल रचते रहे, कामचोर बने रहे, सरकारी फाइलें अटकी रही. देश फिर भी आगे बढ़ता रहा. टाइम मैगजीन के लोग रालेगण सिद्धि में इंटरव्यू करने को आये. देश का बड़ा तबका धन्य हो गया. हमारे आदर्श बड़े भ्रामक हैं. टाइम मैगजीन के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ कि मनुष्य का भला करने वाली किसी घटना या व्यक्ति को सालाना कवर के लिए चुना गया हो. उन्नीस सौ सत्ताईस से लेकर दो हज़ार ग्यारह तक मात्र एक बार महाविनाशक रोग एड्स पर शोध के लिए ताईवानी वैज्ञानिक डेविड हो को पर्सन ऑफ़ द ईयर चुना गया है. शेष सभी अमेरिकी और रूसी राष्ट्राध्यक्ष, लड़ाईखोर, धार्मिक उन्माद फ़ैलाने वाले अयातुल्लाह खुमैनी जैसी लोग रहे हैं. टाइम मैगजीन मनुष्यता की नहीं वरन उथल पुथल की दीवानी है. ऐसे ही एक खुशफहमी ये भी रही कि भारतीय मिडिया को अन्ना प्रिय हैं और यूपीऐ का चेहरा काला दिखाना, जनता की पक्षधरता का प्रमाण है. वास्तविकता ये है कि मिडिया को किसी से प्रेम नहीं है. उन मनुष्यों से भी नहीं जिन्होंने बारह घंटे की शिफ्ट में अमानवीय कार्य करके गला काट प्रतिस्पर्धा में अपने समूह को नयी पहचान दी है. मिडिया के मालिक सिर्फ़ पैसा और सत्ता में अघोषित हिस्सेदारी के एजेंडा पर ही कार्य करते हैं.

हमारा देश सभी संस्कृतियों और विचारों का दिल खोल कर स्वागत करता है. जिनको कहीं पनाह नहीं मिलती वे हमारे यहाँ राज करते रहे हैं. पिछले कुछ एक सालों में आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक के सौजन्य से सप्रयास दुनिया भर के विकासशील देशों में सिविल सोसायटी की अवधारणा को अमली जामा पहनाया जा रहा है. इसका पहला उद्देश्य है कि वहाँ के संविधान के समानांतर एक समूह तैयार किया जाये. जो उसे निरंतर चुनौती देता रहे. इस कार्य को ऐसे समझा जा सकता है कि पिता के विरुद्ध परिवार के एक सदस्य को खड़ा किया जाये. इससे निरंकुश पिता परिवार को गर्त में न धकेल सके. इसके परिणाम क्या होंगे यह तो हम रेगिस्तान में भेड़ें चराने वाले लोग भी जानते हैं. देश में जंतर मंतर करने वाले इसे और बेहतर जानते ही होंगे. फिर भी शराबियों को खम्भे से बांध कर पीटने वाले इस तालिबानी गाँधीवादी से देश को बहुत उम्मीदें हैं. हम भ्रष्टाचार से मुक्त होना चाहते हैं, हम लूट के राज से बाहर आना चाहते हैं. हम सुकून और इज्जत से जीना चाहते हैं.

हमारा संविधान कहता है कि चुनी हुई सरकार जनता के लिए है. सरकार ने पाया कि चुन कर जनता के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, भोजन, जनसंचार और आवागमन की सुविधाएँ जुटाने में लगे रहना कोई राज करना थोड़े ही होता है. असली राज है कि आदेश हमारा चले, काम कोई और करे. इसलिए जनता की सभी जरूरतों का निजीकरण कर दिया गया है. पानी चाहिए पैसे दो, बीमार हो तो पैसा दो, आने जाने को साधन चाहिए तो पैसे दो, बच्चों को पढ़ाना है तो पैसे दो... अनवरत, सब जरूरतों का हल है पैसा. जेब में नहीं है तो कमा के लाओ. रोज़गार नहीं है अब क्या करें? सरकारों के पास इसका भी जवाब है कि पूरी दुनिया में नहीं है क्या करें? इन सवालों और जवाबों के कुचक्र में इतना तो तय है कि इस भ्रष्टाचार का आका निजीकरण है. मेरे प्यारे तालिबानी गाँधीवादी उसके ख़िलाफ़ नहीं लड़ेंगे कि ऍनजीओ के लिए पैसा बड़े मुनाफाखोरों की तिजोरियों से आता है.

इस साल के लिए एक दुआ थी कि थोड़ी सी शराब बरसे. दुआ कुबूल हो गई. साल भर लाजवाब स्वाद का सिलसिला चलता रहा. शराब बहुत काम आई कि स्मृतियों के उत्सव मनाने में आसानी रही. देश की आत्मा कही जाने वाली संस्कृति के अनमोल तत्व सिलसिले से बिछड़ते गए. मक़बूल चित्रकार, रुपहले परदे के नायाब सितारे, आवाज़ों से अमृत बरसाने वाले फ़नकार, किताबों के रचयिता इस लोक को अलविदा कह गए. उनके अमूल्य योगदान पर बरबस आँखें भीगती रही मगर देश, दिल्ली और दिल्ली की गलियों में स्वांग रच रहे लोगों के समूहों को देखता रहा. एक यकीन फिर भी बना रहा कि लोकपाल के लिए पैंतरे चला रहे लोग किसी के दिल में नहीं धड़क सकेंगे. वहाँ सिर्फ़ जगजीत जैसी मखमली आवाज़ें होंगी. कोई साज़ याद दिला रहा होगा कि बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं, तुझे ऐ ज़िन्दगी हम दूर से पहचान लेते हैं...

इस साल मंदिरों के तहखानों में दबी अविश्वसनीय अकूत धन सम्पदा देखी, पहली बार टीवी पर करोड़ों का ईनाम जीतता आम आदमी देखा, नक्सलियों की पैरोकार को कुर्सी पर बैठते देखा, अट्ठाईस साल बाद क्रिकेट के नए अवतार देखे. ऑटो रिक्शा में लाया जा रहा कबड्डी का विश्व कप देखा, तैतीस साल बाद झुका हुआ लाल झंडा देखा और सदी का सबसे बड़ा पूर्ण सूर्य ग्रहण देखा. सच, इस साल की सुराही में भरा पेय अद्भुत था कि बगलें झांकता विपक्ष देखा, मात दर मात खाता पक्ष देखा. दो चार के सिवा नेताओं का कुछ नहीं बिगड़ा बस आम आदमी को पस्त देखा. दिन भर कैमरे घूमते रहे तिहाड़ के आस पास और उनको रात में किसी बार में मस्त देखा. हाँ, शायद इसीलिए इक़बाल साहब ने कहा था, कुछ और बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी...

एक दुआ थी कि बहुत सारा सुकून बरसे, कुबूल नहीं हुई. जिनको अपना कहते हैं, उन मेहरबानों की मेहरबानियाँ बरसती रही. उन्होंने ज़ुबान पर लगे चाँदी के वर्क को उतार दिया और अपने नाखूनों को धार देते रहे. सब दुआएं कहां कामयाब होती है? मंदिरों में खड़े पुराने वृक्षों की डाली डाली पर और मस्जिदों की जालियों के हर कोने में बंधे हुए मन्नतों के धागे कब खुलते हैं. ऐसे ही सब रंग बिरंगी दुआएं समय की धूप में बेनूर हो जाया करती है. कमबख्त दुनिया का कारोबार चलता रहता है. इस सुराही से खट्टा मीठा जो भी बरसता है, वही ज़िन्दगी की नियाज़ है. किसी दिन ज़िन्दगी की सुराही रीत जाएगी. उस दिन हम भी बेनियाज़ हो जायेंगे.

* * *

नए साल में भले ही शराब न बरसे मगर एक लम्बी कहानी लिखनी है, उसे लिख सकूँ. कुछ किताबें, कुछ आवाज़ों का जादू बना रहे. जिन पर क्रश है, वे पहलू में हों. हिंदुस्तान जैसे विरले देश की हर गली में असंख्य किस्सागो, संगीतकार, चितेरे और अनूठी कलाओं के धनी रहते हैं. उन सब का हुनर सितारों में चाँद सा रोशन हो. जिन मित्रों ने साल भर मेरी इन कच्ची बातों को पढ़ा है, अलभ्य खुशियां उनका पता पूछती फिरे. वे अपनी चौखट पर महबूब को बोसे देता हुआ देखें... इसके बाद होने वाली तकलीफों को आंसू भरी आँखों और मुस्कुराते हुए होठों से बरदाश्त भी कर सकें. वैसे अभी इस साल की सुराही में एक बूँद बाकी है. उस्ताद सुल्तान खां साहब को याद करते हुए, श्रेया की दिल चुराने वाली आवाज़...

December 27, 2011

पीले रंग का बैगी कमीज़ : पेट्रिसिया लोरेन्ज

यह पीले रंग का बैगी शर्ट मुझे उन्नीस सौ चौसठ में मिला था. पूरी आस्तीन वाले इस कमीज़ के चार जेबें थी. कई सालों तक पहने जाने के कारण इसका रंग बहुत कुछ उड़ चुका था किन्तु अब भी ये बहुत अच्छी हालात में था. यह उन दिनों कि बात है जब मैं क्रिसमस अवकाश के दिनों घर पर आई थी. माँ ने कुछ पुराने कपड़ों के ढेर के बारे में बात करते हुए कहा था कि तुम इनको नहीं पहनने वाली हो ना? तब उनके हाथ में एक पीले रंग वाली कमीज़ थी. उन्होंने कहा कि "इसे मैंने उन दिनों पहना था जब तुम और तुम्हारा भाई इस दुनिया में आने वाले थे. यह साल उन्नीस सौ चौवन की बात है.

"शुक्रिया माँ मैं इसे अपनी आर्ट क्लास में पहनूगी" कहते हुए, मैंने उस पीले रंग के कमीज़ को अपनी सूटकेस में रख लिया. इसके बाद से यह कमीज़ मेरे वार्डरोब का हिस्सा हो गया. स्नातक उत्तीर्ण करने के बाद जब मैं अपने नए अपार्टमेंट में आई तब मैंने इसे पहना. इसके अगले साल मेरी शादी हो गयी. मैंने इस कमीज़ को बिग बैली दिनों में पहना यानि उन दिनों जब हमारे घर में नया बच्चा आनेवाला था. इस कमीज़ को पहनते हुए मैंने अपनी माँ और परिवार के लोगों को बहुत याद किया. मैं कई बार इसलिए बरबस मुस्कुरा उठती थी कि इसी कमीज़ को एक माँ ने कई साल पहले ऐसे ही दिनों में पहना था.

क्रिसमस के अवसर पर मैंने भावनाओं से भर कर उस पीले रंग के बैगी शर्ट को एक सुन्दर लिफाफे में बंद करके के माँ को भेज दिया. इसके जवाब में माँ ने पत्र लिख कर बताया कि ये एक रीयल गिफ्ट है. मुझे इससे बहुत प्यार है. इसके बाद उन्होंने कभी इसका ज़िक्र नहीं किया. हम अपनी बेटी के साथ अगले साल फर्नीचर की खरीदारी के सिलसिले में लिए माँ और पापा के यहाँ गए थे. लौट कर आने के कुछ दिनों बाद जब हमने खाने की मेज पर की हुई पेकिंग को खोला तो वहाँ लिफाफे में बंद कुछ पीले रंग का चमक रहा था. यह वही कमीज़ था

इसके बाद एक सिलसिला चल पड़ा.

अगली बार जब हम माँ और पापा के यहाँ गए मैंने चुपके से उसी शर्ट को माँ के बिस्तर के गद्दे के नीचे छुपा दिया. मुझे नहीं मालूम कि वह कितने दिन तक वहाँ छुपा रह पाया होगा. लेकिन कोई दो साल बाद इसे मैंने हमारे लिविंग रूम के लेम्प के नीचे पाया. फिर उन्नीस सौ पचहत्तर में मेरा तलाक हो गया. मैं जब अपना सामान बाँध रही थी, अवसाद ने मुझे बुरी तरह घेर लिया. मैं दुआ कर रही थी कि इस सब से उबर सकूँ. मुझे लगा कि वह पीला कमीज़ जो मेरी माँ का प्यार है वास्तव में वही ईश्वर का दिया हुआ उपहार है.

बाद में मुझे रेडियो में एक अच्छी नौकरी मिल गई. एक साल बाद एक थैले में मुझे वह पीला कमीज़ मिल गया. उस पर कुछ नया लिखा था. यह उसके सीने वाली जेब पर था. “आई बिलोंग टू पेट.” इस बार माँ ने उस पर मेरा नाम लिख दिया था. मैंने अपना कशीदे का सामान लिया और उसके आगे कुछ और अक्षर लिख दिए. अब यह हो गया था. “आई बिलोंग टू पैट्स मदर” मैंने इसे दूर रह रही अपनी माँ को भेज दिया. मेरे पास कोई तरीका नहीं था कि ये जान सकूँ कि उस पार्सल को खोलने के बाद माँ के चेहरे पर क्या भाव थे.

मैंने साल सत्तासी में फिर विवाह कर लिया. हमारी शादी के दिन मैं अपने पति की कार में बैठी थी. मैं आराम के लिए तकिया खोजने लगी तभी मुझे विवाह के अवसरों पर उपहार में दिए जाने जैसी पैकिंग में एक लिफाफा मिला. उसे खोलते ही पाया कि वह वही पीले रंग का बैगी कमीज था. ये पीला बैगी शर्ट, मेरी माँ के द्वारा दिया गया आखिरी उपहार था. इसके तीन महीने बाद सत्तावन साल की उम्र में वे चल बसी.

सोलह साल तक चला प्यार का खेल जो मैंने और माँ ने खेला, अब खत्म हो गया था. मैंने तय किया कि मैं इस पीले बैगी शर्ट को अपनी माँ की कब्र पर भेज दूं. लेकिन मुझे खुशी है कि मैंने ऐसा नहीं किया. एक और भी बात है कि मेरी बेटी इन दिनों कॉलेज में है और वह कला पढ़ रही है. कला के सब विद्यार्थियों को एक पीले रंग का बैगी कमीज चाहिए होता है जिसमें चार बड़ी जेबें हो...

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इस कहानी के आखिर में एक पंक्ति लिखी है. "सच्चा दोस्त वह है. जो आपके हाथों को छुए तो लगे कि दिल को छू लिया है"

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पेट्रिसिया लोरेन्ज की लिखी ये कहानी साल दो हज़ार पांच के क्रिसमस से पहले अट्ठारह तारीख़ को 'डॉन काजर' ने मुझे भेजी थी. मेरे मेल बॉक्स मैं रखी हुई बहुत सी यादगार चीज़ों में से एक है. मैंने अपनी उस दोस्त को कभी कुछ कहा नहीं. मैं आज छः साल बाद इस कहानी को लौटा रहा हूँ. इस तरह कहानी को एक दूसरे तक पहुंचाने का खेल एक रोज़ ख़त्म हो जायेगा. मेरी मृत्यु के पश्चात् पीले बैगी कमीज़ को याद करते हुए, वह इस कहानी को गंगा में बहाने की जगह अपने किसी और प्रिय दोस्त को दे देगी. विलासिता के तमाम उपहार होठों पर रखे उस चुम्बन की तरह है जो दिल तक पहुंचे बिना अगले पल दम तोड़ देते है. जबकि हमारे आत्मीय प्रेम भरे संबंधों को एक पीले रंग का बहुत पुराना बैगी कमीज़ अपनी चार बड़ी जेबों में भर कर रख सकता है.

[Fairy mom and daughter painting : courtesy artist Nichole Wong]

December 23, 2011

मेहरबानों के घर के बाहर


उस रात अमावस्या को गुज़रे हुए कोई दो तीन दिन ही हुए होंगे. सब तरफ अँधेरा ही अँधेरा था. आकाश तारों से भरा था. धरती के ज़रा दायीं तरफ दक्खिन की ओर जाती हुई दिप-दिपाते हुए तारों की एक लम्बी श्रृंखला आसमान के ठीक बीच नज़र आ रही थी. वह पांडवों का रास्ता है. हाँ, वही होगा जिसे वड्सवर्थ ने मिल्की वे कहा है. उसने इस सब को इतने गौर से कभी नहीं देखा था. वह सिर्फ़ सोचता था कि तारे कहां से निकलते हैं और किधर ड़ूब जाते हैं. उसने ये कभी नहीं सोचा कि अँधेरा भी ख़ुद को इतनी सुन्दरता से सजा लेता है. उसने अपना हाथ किरण के कंधे पर रखे हुए कहा. "तारों को देखो किरण.."

मुझे जाने क्यों सहसा सुख हुआ कि भले ही सुबह ओपरेशन के बाद वह बचे या नहीं मगर यह उसके जीवन के अनन्यतम श्रेष्ठ क्षणों में से एक क्षण है. मैं राजशेखर नीरमान्वी की कहानी पढ़ रहा था. कई दिनों से मैं रास्ता भटक गया था. मेरे जीवन जीने के औजार खो गए थे. इस जीवन में जिधर भी देखो आस पास कई सारी शक्लें जन्म से लेकर मृत्यु तक मंडराती रहती है. उनमे से कई हमारे जन्म से पूर्व प्रतीक्षा में होते हैं और कई हमारी मृत्यु के पश्चात् भी हमारी स्मृतियों में डूबे रहते हैं. इन चेहरों को समाज अपना कहता है. मैं सोचने लगता हूँ कि ये अपने किसलिए होते हैं? ये किस तरह की खुशियां लेकर आते हैं अथवा हमारे जीवन पथ के शूल कब कब बुहारते हैं. क्या ऐसा होता भी है कि ये हमारे उघड़े हुए दुखों पर अपनी आत्मीयता का पैबंद भी रखते हैं. अचानक मेरे भीतर से कोई नकार जागता है. अनुभव कहते हैं कि अपना तो कोई कोई ही होता है बाकी सब समाज के छद्म जाल हैं.

मैं जो कहानी पढ़ रहा था उसका नायक अपने पिता को कोसता है कि उन्होंने अपने स्वार्थ अथवा दुनिया की लकीर को बचाए रखने के लिए शादी करने को बाध्य किया. उसे अनेक अवसरों पर बाल्टी भर कर आंसू बहाने वाली अपनी माता भी याद आई. एक ऐसी माता जो जन्म देने का प्रतिफल चाहती थी. उसे वे सब दयनीय चेहरे याद आये जो समाज की रीति की वेदी पर सिक रहे थे. उसे याद आता है कि वह स्वयं कितना कमजोर था कि जिस समय रूढी की दीवार को ठोकर मारनी चाहिए थी, उसने आत्मसमर्पण कर दिया था. इस समय वह कृशकाय हो चुका था और चिकित्सकों का कहना था कि आंतें सूख चुकी है जीवन का कोई भरोसा नहीं है. ऐसे में लिपे पुते हुए चेहरे वाली उसकी धर्मपत्नी अपनी सहेलियों के साथ उसे देखने आई है.

नायक का मन इस कदर घृणा से भरा होता है कि वह पत्नी के द्वारा किये गए स्पर्श के लिए कोई प्रतिक्रिया करने के स्थान पर सोचता है कि इसके आंसुओं को रुक जाना चाहिए ताकि क्रीम पाउडर उतर न जाये. इस नकली चेहरे को सजाने में ख़राब हुआ समय और धन बेकार न चला जाये. नायक की इस मनोदशा के बारे में पढ़ते हुए मैं सोचता हूँ कि शादी का अर्थ होता है ख़ुशी. यह किस तरह की ख़ुशी है जिसमें एक तरफ घोर उपेक्षा और दूजी तरफ एक घृणा का बसेरा है. मुझे इससे भी अधिक अफ़सोस इस बात का होने लगता है कि समाज या जो अपने कहलाते हैं वे सब इन्हीं स्थितियों को बनाये रखने के लिए मरने को तैयार हैं. उनकी आँखें आंसुओं से भरी है. उन्होंने मुंह फेर लिए हैं कि उनका अपना इस बंधन से मुक्त क्यों होना चाहता है. ये अपने हैं क्या ?

कहानी इस समाज की विवाह व्यवस्था के आस पास की है. लकीर को पीट रहे समाज की क्षणिक तस्वीर दिखाती है. एक ऐसा समाज जिसमें माँ, पिता और तमाम सगे सम्बन्धी विवाह की रट लगाये रहते हैं. उस वक़्त से ही जब बच्चा बोलना सीखता है. गोया कि बच्चे पैदा करना और उनका विवाह कर के मर जाना ही एक मात्र शास्त्रीय कार्य है और स्वर्ग का आरोहण कर रही गाय की पूंछ है. वे ऐसा किसलिए कर रहे हैं? उनके पुरखों ने भी ऐसा ही किया था. उनके पिता भी माता को पीटते हुए और माताएं पिता को उपहास के झूले में झुलाते हुए जीती रही हैं. जब उनके साथ ऐसा ही हुआ तो फिर उनकी संतान क्योंकर खुश होकर अपनी पसंद के बंधन चुन और त्याग सकें.

यह ढपोर शंखों की दुनिया है. इसकी सब आवाजें खो गयी है. बचा हुआ सुर है वह एक सरीखी रेंक है. चौतरफ बंधन हैं, ख़ुद के भ्रम से रचे गए बंधन. जन्म पर उल्लास की नदियाँ बहा देने वाले और मृत्यु पर शोक के विशाल पर्वतों की श्रृंखला रच देने वाले नासमझ इंसानों के समूह का आचरण, जिसे हम सामाजिकता कहते है, बड़ा खोखला, कुंठित और निर्दयी है. समाज की इस अवस्था के बारे में सोचता हुआ मैं फिर से कहानी में लौट आता हूँ. राजशेखर की यह कथा छठे दशक के हिंदुस्तान की कहानी है. सोचता हूँ पढ़ लिख कर बेहतरी की ओर बढ़ रहे समाज की हालात में अभी तक कोई परिवर्तन आया है. कहानी लिखने के बाद के इन पचास सालों में हमारी रूढ़ियाँ और समझ उसी खूंटे के चक्कर काट रही है जिस से हमारे पुरखे बंधे हुए थे.

उस दौर की माँ केपिटलिस्ट थी. जिसने सब अधिकार अपने कब्ज़े में कर लिए थे और पिता इसके विरोध में कम्युनिस्ट हो कर लड़ते रहे. पत्नियाँ आंसुओं की दुकानें थी और राशन कार्ड के हिसाब से उचित अवसरों पर यथायोग्य स्टाक कंज्यूम किया करती थी. पति भावनाओं से भरे वे श्रमजीवी थे जो कभी अपने अधिकारों के लिए लड़े नहीं और इसका दोष अपनी भार्याओं पर मढ़ते रहे. उन्होंने जिससे प्रेम किया वे उनकी पत्नियाँ नहीं थी और जो पत्नियाँ थी, उन पर प्रेम आता नहीं था. क्योंकि प्रेम एक रूमानी चीज़ है और रुमान क्षणभंगुर होता है. वह अल्टरनेट करंट की तरह आता है. जबकि पत्नी हमेशा साथ रहने के कारण डायरेक्ट करंट का ग्रिड बनी रहती है. आज भी सब कुछ वैसा ही है. आदम ने जो सहजीवन का झूला दिया था वह विवाह की आकाशीय पींगों में तब्दील हो गया है. हम चिल्लाने वाले को कौतुहल से देखते हैं और उसे कुटिल दिलासा देते हैं कि झूला नीचे आते ही सब सामान्य हो जायेगा. लेकिन सदियों से समाज इसका प्रतिकार करता है कि झूला रुक जाये.

खैर, वो जो किरण है. जिससे नायक कहता है. इस चांदनी को देखो... वह एक अभागी स्त्री है. जिससे नायक को इसलिए विवाह नहीं करने दिया गया था कि वह सोशल लेयर में नीचे थी. वह इस आखिरी घड़ी में तमाम बाधाएं पार कर किसी की परवाह किये बिना अस्पताल चली आई है. नायक को सहारा देकर खड़ा करती है. वह बाहर खुली हवा में घूम लेने के बाद अपने बिस्तर पर लौट आता है. नायक अमावस्या के बाद की अँधेरी रात में देखता है कि शुक्र तारा ऊपर जा रहा है. वह अपने रिश्तेदारों के बारे में सोचता है कि इन मेहरबानों से मुक्ति नहीं है. इन मेहरबानों के घर के बाहर क्षितिज से परे क्या है, यह देखने की इच्छा है. कभी कभी इस कब्र सी भूमि पर पड़े हुए आकाश की चादर को फाड़ कर भूमि और आकाश को एक कर देने की इच्छा होती है. अगले ही क्षण मेरा अस्तित्व धूल हो जाता है.

क्या सबके जीवन में कम से कम एक ऐसा क्षण आएगा कि घनघोर अँधेरे दिनों में कोई एक चांदनी की किरण होगी. सुबह जब नायक को स्ट्रेचर पर लिटा दिया गया तब उसने पाया कि माँ की आँखों में आंसू थे, पिता सांत्वना दे रहे थे और पत्नी किसी भाव को मुख पर लाने का प्रयास कर रही थी. लेकिन उसने इन मेहरबानों के बीच तय किया कि मर गया तो मेरी इच्छा पूर्ण होगी और बच गया तो... बस... जीवन अर्थपूर्ण ही बीतेगा. मुझे लगा उसने तय कर लिया है कि वह अपने इस जीवन को खोखले चेहरों और सड़ी-गली रवायतों के लिए बरबाद नहीं करेगा.

* * *

इस कथा के नायक सदृश्य असंख्य नायिकाएं भी इसी धुंए में घुट रही है. समय का सूचक हमारा घड़ियाल कहीं ठहर तो नहीं गया है या फिर हमने अपनी अक्ल पर नासमझी को पहरेदार बना लिया है. "मेहरबानों के घर के बाहर" राजशेखर नीरमान्वी की इस कन्नड़ कथा के जरिये मैं इस नए दौर के कथित सभ्य समाज को लानतें भेजता हूँ. हम अभी भी घूरे के ढेर पर बैठे हैं, जाने हमारे दिन कब फिरेंगे?

December 18, 2011

सोच के उनको याद आता है...


अक्सर एक निर्वात में खो जाता हूँ. वहाँ असंख्य कथाओं का निरपेक्ष संचरण होता है. उसमें से एक सर्वव्याप्त कथा है कि जिनका मुश्किल दिनों में साथ दिया हों वे अक्सर ज़िन्दगी आसान होने पर एक काली सरल रेखा खींच, मुंह मोड़ कर चल देते हैं. इस सरल रेखा के बाद, उससे जुड़ी जीवन की जटिलतायें समाप्त हो जानी चाहिए किन्तु मनुष्य अजब प्राणी है कि दुर्भिक्ष में पेड़ से चिपके हुए कंकाल की तरह स्मृतियों को सीने से लगाये रखता हैं.

जोर्ज़ बालिन्त की एक खूबसूरत रूपक कथा है. 'वह आदमी रो क्यों रहा था." रंगमंच या किसी उपन्यास में रुलाई उबाऊ और भावुकता भरा प्रदर्शन लगती है परन्तु सचमुच की ज़िन्दगी में रोना एक अलग ही चीज़ है. क्योंकि ज़िन्दगी में रोना वातावरण पैदा करने वाला भौंडा प्रदर्शन नहीं होता. जैसे सचमुच के जीवन में डूबते हुए सूरज की ललाई किसी पोस्टकार्ड की याद नहीं दिलाती बल्कि बेहद आकर्षक और रहस्यमयी लगती है. ठीक इसी तरह सचमुच के जीवन में शिशु का रिरियाना मोहक नहीं लगता बल्कि ऐसा लगता है मानो वह बहुत पुरातन कोई अदम्य आदिम व्याकुलता व्यक्त कर रहा हो.

इस कथा के नायक का नाम लीफे था. वह राजमार्ग पर बैठा, अपने घुटनों में सर डाले हुए रो रहा था. किन्तु वहाँ से गुज़रते हुए किसी व्यक्ति ने उस पर ध्यान नहीं दिया. कथाकार उसके रोने के कारणों के बारे में कई कयास लगाता हुआ हमारे सुखों को छल लिए जाने को अनावृत करता है. मनुष्य ने अपने जीवन पर छलावों के झूठ का सुनहला का पानी क्यों चढ़ाया है. क्या हमारे दुःख आदिम है? और क्यों हम मनुष्य के रोने से परे हुए जा रहे हैं? एक जगह मन को छू जाने वाला कयास है कि शायद किसी ने लीफे को पूछा हो कि "आप कैसे हैं?" और वह रो पड़ा हो. हम अक्सर जिनसे अपना हाल दिल से पूछे जाने की अपेक्षा करते हैं, वे हमारे पास नहीं होते.

जीवन की अटूट विश्रृंखलता का अपना विधि विधान है. जीवन के कारोबार में रोने का मोल समसामयिक नहीं होता है. दुःख का कारवां, हमारे जीवन को उथले पानी में फंसी मछली जैसा कर देता है. रोने के भंवर से बाहर आने के लिए जिस स्पर्श की जरुरत होती है. वह समय की धूप में सख्त हो चुका होता है. वस्तुतः रोते समय हम अपनी शक्ल खो देते हैं इसलिए जोर्ज़ की कथा के नायक का चेहरा नहीं दिखाई देता. उसके वस्त्रों से वह साधारण जान पड़ता है. साधारण मनुष्यों के रोने के लिए खास जगहें नहीं होती. वे सड़कों के किनारे ऐसी जगहों पर बैठे होते हैं जहाँ ऊपर की ओर हाईमास्ट कलर्ड लाइट्स लगी रहती हैं.

ये रौशनी का समाज अँधा है. इसकी दीवारें बहरी है. यह अपने मृत दिवसों की खाल को ओढ़े हुए उत्सवों में मग्न रहना चाहता है. इसलिए भी इस कथा में अगर लीफे शाम होने तक उसी जगह बैठा रोता रहा तो वह किसी को दिखाई भी नहीं देगा. उसके सर के बीसियों फीट ऊपर रंगीन रौशनी की जगमगाहट होगी. वह रंगीनी के तले अंधेर में खो जायेगा... घिर घिर कर प्रश्न सताएगा कि फिर वह आदमी रो क्यों रहा था? ऐसे ही मैंने भी कई बार पाया कि लीफे की तरह बेशक्ल, घुटनों में सर डाले हुए हम सब कितनी ही बार उनके लिए रोते रहे हैं, जिनको हमारी परवाह नहीं थी. आज सोचता हूँ कि उस रोने का मोल क्या था? और क्या सचमुच ऐसे कारण थे कि रोना आ जाये...

* * *

जोर्ज़ बालिन्त की मात्र सैंतीस साल की उम्र में नाज़ी श्रम शिविर में मृत्यु हो गयी थी. हम भी भौतिकता के नाज़ीवाद में घिरे हैं. इस दौर में हम दबाव वाली जीवन शैली के नाज़ी शिविर में कैद हैं फिर भी मैं एक दुआ करता हूँ कि हम सीख सकें प्रेम से बाहर आना ताकि प्रेम हमारे भीतर आ सके.

December 11, 2011

कुछ ये याद किया...


एक बड़ा दरवाज़ा है. मजबूत सलाखों के पार दुनिया की रफ़्तार है. सांझ घिर आई तो बाहर सड़क पर चलती फिरती शक्लें लेम्पोस्ट से गिरती रौशनी में कुछ देर दिखती और फिर बुझ जाती. दफ्तर के अंदर गरमी है, बासी लम्हों के शोक से भरी गरमी. खुले में हवा की ठंडी झुरझुरी याद का तिलिस्म खोलती है. गुड़हल के पास हेजिंग के लिए मेहँदी और रेलिया की लम्बी कतार और कैन से बुनी कुर्सी पर स्मृतियों का कारोबार. बचपन के दिनों की अकूत खुशबू और रात के अद्भुत सिनेमा के रिपीट होने का ख़्वाब. वह सिनेमा कुछ ऐसा था कि उन दिनों माँ अक्सर आँगन के बीच दो चारपाई डाल कर हम तीनों भाइयों को सुला देती थी. उस अँधेरे में चारपाई पर लेटे हुए ऐसा लगता था कि काँटों की बाड़ के पार कुछ आवाज़ें हैं. दिन के समय उस तरफ वाले लम्बे खाली मैदान में बेतरतीब उगी हुई कंटीली झाड़ियाँ फैली दिखती थी. उन झाड़ियों के बीच पैदल चलने से बने हुए रास्ते थे, जिनकी दिशाएं खो चुकी थी.

रात के समय दिन भर का निरा शोर एक विचित्र काले सन्नाटे में समा जाता. किसी मायावी घटना के होने की बेशक्ल उम्मीद मुझे छू कर अँधेरे में गुम जाती. मैं हर रात तय करता कि सुबह होते ही बाड़ के आगे के पूरे इलाके की छानबीन करूँगा, मगर हर सुबह भूल जाता. रात के इकहरे रंग वाले इफेक्ट अद्भुत तरह का सम्मोहन रचते थे. मैं एक असम्भव दुनिया को अपने आस पास महसूस करने लगता. दिन भर कूड़े के ढेर पर माचिस की खाली डिबियों को चुनते फिरते लड़के कहते थे कि प्यासी जनाना रूहें गलियों के मोड़ों पर भटकती रहती हैं. वे खास तौर से पानी के हौद, बिजली के खम्भे और स्टेडियम वाले मोड़ के आस पास हुआ करती थी. मुझे कभी नहीं लगता था कि रात एक ज़ोरदार कहकहा लगा पायेगी. वह सिर्फ़ अजगर की तरह कुंडली कसती रहेगी. ऐसा ख़याल आते ही कभी हाथ के रोयें खड़े हो जाते. मैं अपनी हथेली से उन रोयों को छूकर देखता. वे ओस भीगे बाजरा के सिट्टों को छूने जैसा अहसास देते थे. उस अँधेरे से मेरे बहुत से आग्रह थे. उनमें सबसे गोपनीय था, एक कमसिन गंध... मेरे मस्तिष्क में वह कमसिन गंध उसी तरह आई होगी जैसे मिट्टी से बने घोंसले में बैठे हुए ततैये के बच्चे उड़ने का हुनर साथ लेकर आते हैं.

रात बदस्तूर हर शाम के बाद आती और माँ उसी तरीके से चारपाइयाँ बिछा देती. मैं अपने उसी सम्मोहन में खो जाता. गरमी के पूरे मौसम में अनजान अदृश्य दुनिया नींद आने से पहले आबाद रहती. वन बिलाव पेड़ की शाख़ पर दो तरफ टाँगे लटकाए हुए सोया रहता हो, उसी तरह मैं भी चारपाई की ईस पर सोता था. उस मोटी लम्बी ईस पर लेटे हुए सामने बाड़ और नीचे गोबर से लिपा हुआ आँगन दिखता था. रात गहराती रहती थी. आवाज़ों पर सन्नाटे का पहरा बैठ जाता. दबे पांव नींद फिर घेर लेती. सुबह आँख खुलती तो देखता कि झाऊ चूहे कि तरह गोल होकर चारपाई के बीच में सिमटा हुआ हूँ. रात के काले से सम्मोहन भरे कांटे गायब हो चुके होते. स्नानघर के ठन्डे फर्श पर पगथलियों में गुदगुदी हो रही होती फिर इसके बाद दिन खाली गलियों में दौड़ते भागते हुए बीत जाया करता था. कभी दोपहर को खुली खिड़कियों से कमसिन गंध की टोह लेता रहता था.

रात से मुहब्बत के सफ़र में अल्पविराम की तरह कुछ रातें आती रही. तब खुले आँगन में सोने नहीं दिया गया. ये प्यासी रूहों की गिरफ्त में आने से भी बड़ा खतरा था. उस रात दम भर के लिए चाँद को अँधेरा डस लेता. माँ तीलियों से बने एक सूप में गेंहूं भर कर छत पर रख आती. रात के भोजन को साँझ होते ही करना पड़ता. सवेरे झाड़ू लगाने वाली एक बूढी औरत घर के सामने आती और जोर से आवाज़ लगती "बाई जी, गरण दिराईजो..." माँ वे गेहूं उसकी झोली में डाल देती. मुझे वह रात कभी अच्छी नहीं लगती थी. उस रात अँधेरे की आवाज़ों का वाध्यवृन्द बंद हो जाया करता था. मुझे थपकियाँ देने वाली रूहें बंद कमरे में नहीं आ पाती थी. भटकने की आदत पर दीवारों की लगाम कस जाती. उनके पार सोचने को कुछ नहीं बचता था.

एक अरसे तक रात का अपना ओपरा कंसर्ट चलता रहा. अद्वितीय आवाज़ें जादू की दुनिया रचती रही. शहतीर के नीचे लटके हुए झीने परदे के पार से प्रीमा डोना यानि ओपरा कंसर्ट में गाने वाली मुख्य गायिका मेरी ओर बढ़ी आती. वाह वाही की प्रतीक्षा करते हुए निरंतर अपने सुर को बचाती हुई मुझसे अँधेरे कोने तक आने का मादक संकेत करती थी. उस वक़्त मैं नीम नींद से भरा रात की लहर पर सवार होता था जबकि ज़िन्दगी से जिरह कर के हार चुकी दुनिया के लोग अपने बिस्तरों में मरे पड़े रहते. मैं नींद में जाने से पहले इसी अद्भुत दुनिया में खोया रहता. मुझे अपनी पलकें आहिस्ता से झुकाते हुए एक साथ बंद करने का काम बहुत पसंद था. ऐसे नींद आया करती थी और ऐसे ही उतर आता था जादू रात की आँख से...

याद के आने के वक़्त का ये किस्सा कल शाम का है. जब हवा कुछ ठंडी थी और हरे रंग के बिना बाजू वाले स्वेटर के अंदर धड़क रहे दिल को कुछ खास काम नहीं था. चाँद को ग्रहण था तो सूरज के ढलते ही वोदका की गंध देसी बबूल की खुशबू से मिल कर अधिक नशीली हो गई. आवाज़ों का भूला बिसरा रोमांस दफ्तर के गलियारों में टहलता रहा. मैं सीढ़ियों के पास बनी पटरी पर दीवार का सहारा लिए बैठा रहा. यादों के साये, बचपन के भूले बिसरे आँगन से उड़ कर इस देह पर बिखरते रहे. रात कुछ बेवजह की बातें की और कुछ ये याद किया कि रात ने वो कमसिन गंध किस जगह छुपा रखी है? 

* * * 

[Painting : Counterweight; Image courtesy : Andrea Beech]

December 3, 2011

किस्से ज़ेहन में


इस स्कोटिश कहावत को भले ही गंभीरता से न लिया जाये मगर बात पते की है कि "हम जब तक ज़िन्दा हैं हमें खुश रहना चाहिए क्योंकि बाद में हम लम्बे समय के लिए मरने वाले हैं." ये मेरे अनुवाद का दोष हो सकता है या फिर स्कोट्लैंड के लोग भी मानते होंगे कि जीने का चांस फिर मिलेगा. यह भी एक तरह से ख़ुशी भरी बात है. इस तरह जीवन को बार बार पाने की चाह तो हम सब में है किन्तु इसी एक जीवन को प्रसन्नता से बिताने की कोई इच्छा नहीं है.

प्रसन्नता के बारे में अपनी इस बात को आगे बढ़ाने के लिए मैं रुढ़िवादी, अज्ञानी और आदिम दम्भी लोगों के समूह के लिए उचित 'एक शब्द' लिखना चाह रहा था और मेरे दिमाग में आया, तालिबानी. इसके बाद मुझे गहरा अफ़सोस हुआ कि मैंने अपने भाषाई ज्ञान पर वातावरण में उड़ रही गर्द को जम जाने दिया है. तालिबान होने का अर्थ है विद्यार्थी होना. इस शब्द का उपयोग निरंतर अमेरिका के पाले हुए उस समूह के लिए हो रहा है, जिसे सोवियत रूस के विरुद्ध खड़ा किया गया था. अब इस शब्द का सहज लिया जाने वाला आशय कठमुल्लों का वह समूह है, जो कबीलाई दुनिया के ख़्वाब देखता है और कोड़े और बंदूक का राज कायम करना चाहता है. खैर मैं ऐसा ही एक शब्द सोच रहा था जिससे यह कहा जा सके कि हम अपनी प्रसन्नता को निरंकुश हुक्मरान होने जैसी अवस्था में ही साबुत पाते हैं. किसी की असहमति या कोई एक मतभेद हमें असहज और प्रतिगामी बना देता है.

हम अधिकारों का कूड़ेदान हो गये हैं. हम अड़ियल टट्टू हो गये है. इसी में हमें प्रसन्नता है. ऐसे होने का आशय हुआ कि वास्तव में जो कुछ सामान्य रूप से हमें घेरे हुए है, वही हमारा प्रतिबिम्ब निश्चित करता है. यह इन्टेलेक्च्युलिज़्म की अवधारणा है. यह उस मूल विचार के आस पास केंद्रित है, जो कहता है कि हमें अननोटिस्ड चीज़ें रूल करती हैं. जबकि ख़ुशी एक प्रत्याशित चीज़ है इसलिए हाथ नहीं आती. बौद्धिकतावाद के प्रमुख नाम हेनरी डेविड थ्रौउ, नेचुरल हिस्ट्री के भी जरुरी नाम है. उनकी आत्मकथा वाल्डेन या जंगल में जीवन, छिछले समझ कर त्याग दिए गये अनुभवों की खासियतों का महीन रेशम बुनती है. उन्होंने प्रसन्नता के बारे में कहा कि "ख़ुशी एक तितली की तरह है. आप जितना इसका पीछा करते हैं वह उतना ही आपको छलती जाती है. जब आप दूसरे कामों में ध्यान लगाते हैं तो वह कोमलता से आपके कंधे पर आकर बैठ जाती है."

मैं इस बात के किसी भी सिरे को पकडूँ, पहुंचना वहीं है कि जब हम खुश रहना ही नहीं चाहते हैं तो एकाधिक बार के मनुष्य जीवन के प्रति आकर्षित क्यों होते हैं. मृत्यु जैसा शब्द सुनते ही क्यों हम जीवन के पाले में खड़े हो जाते हैं. हमारी आस्थाएं इतनी संवेदी है तो ये किन तंतुओं के जाल में उलझ कर निष्क्रिय हो गई है. हम अपने इस लम्हे को चीयर्स क्यों नहीं कह पाते हैं. यही बात कहने के लिए उसका इंतजार है, जिसका आना अनिश्चित है. शायद हम एक भव्य लम्हे की प्रतीक्षा में हैं ताकि हमें ख़ुशी भरा देख कर कोई इसके मामूली होने का भ्रम न पाल ले. अर्थात हम खुश भी उनके लिए होना चाहते हैं जिनको हमसे कोई गरज नहीं है. हम अपनी हेठी होते न देखें, इस आशा में खुश होना त्याग देते हैं.


"खुश रहा करो" यह हर बात में कहना अच्छा लगता है मगर दिक्कत ये है कि ख़ुशी अन्दर से और अवसाद या दुःख बाहर से आना चाहिए. किन्तु हमने इसे लगभग उलट दिया है. ख़ुशी को हम बाहर खोजते हैं और अवसाद को भीतर सहेजते हैं. मेरा बेटा अंकगणित में पांच और नौ उल्टा लिखता था. हम उसे सही करवाते मगर फिर एकांत में वह उसे अपने ही तरीके से लिखता. उसे कहते कि आपने क्या गलत लिखा है पता लगाओ. तो वह उलटे लिखे हुए पांच और नौ को कभी पहचान नहीं पाता था. जब हम उन अंकों पर अपनी अंगुली रखते तब उसे वे दिखाई देते थे. उसने धीरे धीरे उन गलतियों को दुरुस्त कर लिया मगर मैं वहीं अटका रह गया कि ख़ुशी बाहर और दुःख भीतर... हमारी ये उलटी गणित भी ठीक होनी चाहिए.

* * *

मेरे सेलफोन में एक मेसेज रखा है. ख़ुशी, एक जादू का तमाशा है. यह सत्य है या भ्रम, हम कभी नहीं जान पाते हैं.

* * *


जोर्ज़ बालिन्त की जो कहानी मैं सुनाने वाला था. वह ख़ुशी के बारे में नहीं है. वह मनुष्य के अकेलेपन और उजाड़ मन पर आई खरोंचों के प्रतीक, रोने के बारे में है. मेरी आत्मा इन आंसुओं में बसती है. खैर ! मैंने अब तक वह कहानी लिखनी शुरू नहीं की है. उस कथा के पात्रों की पदचाप सुनाई देने लगी है. वे जब बातें शुरू करेंगे तो मैं लम्बे वक़्त के लिए गायब हो जाऊँगा. उनकी दुनिया के तिलिस्म में अकूत बेचैनी और अकुलाहट होगी. दो दिन से बुखार है. बदन दर्द और हरारत से भरा है... फिर भी याद की लालटेन में जलता - बुझता हुआ एक चेहरा काफी बड़ी ख़ुशी है. इस पोस्ट के आखिर में तुम्हारे लिए प्यारे शाईर गौतम राजरिशी का शेर.


किताबें बंद हैं यादों की जब सारी मेरे मन में,
ये किस्से ज़ेहन में माज़ी के रह-रह कौन पढ़ता है.

November 27, 2011

अनुपस्थिति


आज मैं तुमको जोर्ज़ बालिन्त की एक कहानी सुनाना चाहता था किन्तु जाने क्यों अब मेरा मन नहीं है. मैंने उस कहानी के बारे में अपनी लिखी हुई बीसियों पंक्तियों को ड्राफ्ट में छोड़ दिया है. मौसम में कोई रंगत नहीं है कि कुदरत के फ्रीज़र का दरवाज़ा अभी खुला नहीं है. मेरी अलमारी में अच्छी विस्की की बची हुई एक बोतल बहुत तनहा दीख रही है. नहीं मालूम कि हिना रब्बानी खान इस वक़्त किस देश के दौरे पर है और अमेरिकी सुंदरी कार्ला हिल्स ने उन्नीस सौ बानवे में जो कहा था कि हम दुनिया में शांति लायेंगे और सबको रहने के लिए घर देंगे, उसका क्या हुआ? फिर भी दिन ये ख़ास है इसलिए इस वक़्त एक बेवज़ह की बात सुनो.

दीवार की ट्यूबलाईट बदल गयी है सफ़ेद सरल लता में
और संवरने की मेज़ का आइना हो गया है एक चमकीला पन्ना.

मोरपंखों से बनी हवा खाने की एक पंखी थी
वो भी खो गई, पिछले गरम दिनों की एक रात.
मेरे सामने रसोई का दरवाज़ा खुला पड़ा है मगर जो चाकू है
वह सिर्फ़ छील सकता हैं कच्ची लौकी.

और भी नज़र जो आता है सामान, सब नाकामयाब है.

कि मेरी दो आँखों से सीने तक के रास्ते में
आंसुओं से भरा एक फुग्गा टकराता हुआ चलता है, हर वक़्त.

वह गयी तो साड़ी में टांकने वाली सब रंगीन सेफ्टी पिनें भी साथ ले गयी. 

November 24, 2011

चैन भी है कुछ खोया खोया...



एकांत के अरण्य का विस्तार क्षितिज तक फैला दीखता है किन्तु इसकी भीतरी बुनावट असंख्य, अदृश्य जटिलताओं को समेटे हुए है. एक विचार जब कभी इस जाल के तंतु को छू जाये तो भीतर रह रही, अवसाद नामक मकड़ी तुरंत सक्रिय हो जाती है. मैं इसीलिए निश्चेष्ट और निरुद्धेश्य समय को बीतते हुए देखता हूँ. उसने कई बार कहा कि आप लिखो. मुझे इसका फ़ौरी जवाब यही सूझता कि हाँ मैं लिखूंगा. लेकिन आवाज़ के बंद होते ही उसी समतल वीराने में पहुँच जाता हूँ. जहाँ जीवन, भुरभुरे ख़यालों की ज़मीन है. दरकती, बिखरती हुई...

संभव है कि विलक्षण व्यक्तियों का लिखा हुआ कई सौ सालों तक पढ़ा जाता रहेगा और पाठक के मन में उस लिखने वाले की स्मृति बनी रहेगी... और उसके बाद? मैं यहीं आकर रुक जाता हूँ. पॉल वायला के जीवन की तरह मैं कब तक स्मृतियों के दस्तावेज़ों में अपना नाम सुरक्षित रख पाऊंगा. मेरे इस नाम से कब तक कोई सर्द आह उठेगी या नर्म नाजुक बदन अपने आगोश में समेटने को बेक़रार होता रहेगा. मैं सोचता हूँ कि कभी उससे कह दूंगा कि मेरा जीवन एक सुलगती हुई, धुंए से भरी लकड़ी है. जिसके दूसरे सिरे पर एक आदिम प्यास बैठी है. वक़्त का बढ़ई अपनी रुखानी से चोट पर चोट करता जाता है.

यह भी सोचता हूँ कि क्या कोई मुझे इसलिए प्यार करता है कि मैं शब्दों को सलीके से रखने के हुनर का ख्वाहिशमंद हूँ. मैं जैसा हूँ वैसा नहीं चलूँगा? मेरा लिखा हुआ दीर्घजीवी हो पायेगा और लोग इससे प्रेम करेंगे. इसे अपने मन का पाएंगे, यह एक धुंधली आशा मात्र है. मैं सिर्फ़ इस उम्मीद में नहीं जीना चाहता हूँ. दुनिया में लिखने का कारोबार बहुत निर्दयी है. यह विनिवेशकों का अखाड़ा है और इसकी रिंग रबर से नहीं बनी है. यह अगर रेशम का बना कालीन है तो भी मुझे इससे मुहब्बत नहीं है. मेरे भीतर के लोकप्रश्न ही मुझे प्रसन्न रख पाते हैं कि "सखिया कबन वन चुएला गुलाब, त चुनरिया रंगाइब हे"

ऐसे प्रश्नों की मादक गंध मेरे भीतर उतरती है. उस समय लगता है कि किसी ने मेरे कंधे पर अपना सर रख दिया है. चीज़ों से दूर होना ऐसे सवालों के करीब लाता है. इस विरक्ति से किसी तरह मुमुक्ष होने का भी आग्रह नहीं है. मेरे अंतस पर वैभव और यश की कामनाएं ठहर नहीं पाती. इसका लेप किस रसायन से बना है, मैं ख़ुद समझ नहीं पाया हूँ. मैं समय की नदी के किनारे आत्मक्षय का ग्राहक मात्र हूँ. इसके निर्विघ्न बहने का साक्षी... जिस तरह मेरा आना अनिश्चित और अनियत है, उसी तरह चले भी जाना चाहता हूँ. इसीलिए पूछता हूँ कि हे सखी वनों में कब खिलेंगे गुलाब और मैं अपनी चुनर को रंग सकूँगा.

मैंने अपने आपको लिखने के बारे में सिर्फ़ इतना ही कहा है कि इस रेगिस्तान की मिट्टी पर नंगे पाँव चल कर बड़े हुए हो तो इसके सुख दुःख जरुर लिखना. यह कहानी कब बनेगी मालूम नहीं है कि मैं एक बेहद आवारा और इस समाज के नैतिक पैमाने से मिस फिट इंसान हूँ. इसलिए भटकता रहता हूँ. यह कुदरत मेरे भीतर बाहर को एकरंग कर दे, यही मेरा निर्वाण है. तुम चख लो मेरी सांसों को यही इस जीवन का आरोहण है. इस पल मैं तुम्हारे बारे में सोचता हूँ, यह सबसे बड़ा सत्य है.

* * *

उफ़क़ का कोई रंग नहीं है, यह भी उतना ही सत्य है जितना कि एक दिन मैं नहीं रहूँगा...
लेकिन उससे पहले आज औचक अपने पास पाता हूँ, मुस्कुराता हुआ चेहरा, एक नन्ही लड़की थामे हुए है चाय का प्याला, अंगीठी मैं सुलग रही है आक पर आई मौसमों की उतरन, तो लगता है कि याद एक कारगर शब्द है.

November 19, 2011

कीकर के पेड़ों पर सफ़ेद कांटे


उस मोड़ पर एक आदमी नई चिलम छांट रहा था. मैंने पीछे मुड़ कर देखा. रास्ता सूना था फिर गाड़ियों की एक कतार मेरी बेखयाली को चीरती हुई गुजरने लगी. मुझे अचरज हुआ कि अभी थोड़ी ही देर पहले मैं कार में बैठा हुआ सिगरेट के बारे में सोच रहा था और अब इस आदमी को देख रहा हूँ. मैंने कई सालों से सिगरेट नहीं पी है. अब भी कोई जरुरत नहीं है. फिर ये क्या खाली हुआ है जिसे धुंए से भरने का मन हो आया है. मैंने उस आदमी के बारे में सोचा कि जब वह चिलम पिएगा तो हर बार उसे और अधिक धुंआ चाहिए होगा. एक दिन वह थक कर लुढ़क जायेगा. उसे समझ नहीं आएगा कि जो चिलम का पावर हाउस था, वो क्या हुआ...

मुझे भी समझ नहीं आ रहा. अचानक चाहा, यही बैठ जाऊं कि मैं बहुत चिलम पी चुका हूँ. फिर देखा दूर तक सड़क खाली थी. नीली जींस और सफ़ेद कुरता पहने हुए खुद को देखा तो उस लड़के की याद आई जो एक शाम चूरू की वन विहार कॉलोनी के मोड़ पर लगे माइलस्टोन पर देर तक बेवजह बैठा रहा. कि उस दिन कोई नहीं था. सब रास्ते शोक मग्न थे. सड़क के किनारे खड़े कीकर के पेड़ों पर सफ़ेद कांटे चमक रहे थे. बुझती हुई शाम में दरख्तों की लंबी छाया घरों की दीवारों को चूम रही थी मगर उस लड़के के पास कोई नहीं था, कोई नहीं...

इस महानगर में आज की शाम आने को है लेकिन सड़कें इतनी वीरान क्यों हैं? मैं आहिस्ता चलना चाहता हूँ. चौपाटी कहलाने वाली जगह के बारे में सोचता हूँ कि वहाँ जाकर रुक जाऊँगा. उसके मोड़ पर एक पेड़ खड़ा है. उस पेड़ के नीचे खड़े हुए पिछली बार सोच रहा था कि शहर कई बार अपने विद्वान नागरिकों की स्मृतियों को बचाए रखने की कोशिशें करते हैं. इस शहर के वास्तुकार विद्याधर जैसा नगर नियोजन कभी नहीं हो पायेगा. लेकिन इस जगह मैं उन्हीं के नाम को हर तरफ पाता हूँ. मैं एक सेंडविच खा सकता हूँ फिर याद आया की बीच में जो समोसे वाला आया था, मैं वहाँ भी तो नहीं रुका.

दो छोटी लड़कियां पैदल चलने वालों के लिए बने रास्ते पर चल रही हैं. उन्होंने बड़ी विनम्रता से चींटियों और मकोड़ों की बाम्बी से रास्ता बदल लिया. इसी सड़क पर आगे मिटटी की मूरतें रखी हैं. सुघड़ मृदा मूरतों में अगर कोई प्राण फूंक दे तो वे दौड़ती हुई सड़क के बीच में चली आएगी. तेज रफ़्तार कारें उनको बचाने के लिए ब्रेक लगायेगी और एक दूसरे के ऊपर चढ जायेगी. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. एक आहट थी कि थोड़ी ही देर में बेहद शांत शाम टाइम स्क्वायर के आगे की चौड़ी सड़क का रंग गहरा कर देगी.

उसकी छत पर ठण्ड उतर आई है. मैं यहाँ गुंजलक और नाकाम चला जा रहा हूँ. सोचता हूँ कि इस शहर में आखिर किस के लिए आया हूँ ?

November 8, 2011

लड़की, जिसकी मैंने हत्या की


उसका नाम चेन्नमा था. उसके माता पिता ने उसे बसवी बना कर छोड़ दिया था. बसवी माने भगवान के नाम पर पुरुषों की सेवा के लिए जीवन का समर्पण. चेनम्मा के माता पिता जमींदार ब्राह्मण थे. सात-आठ साल पहले वह बीमार हो गयी तो उन्होंने अपने कुल देवता से आग्रह किया था कि वे इस अबोध बालिका को भला चंगा कर दें तो वे उसे बसवी बना देंगे. ऐसा ही हुआ. फिर उस कुलीन ब्राह्मण के घर जब कोई मेहमान आता तो उसकी सेवा करना बसवी का सौभाग्य होता. इससे ईश्वर प्रसन्न हो जाते थे.

नागवल्ली गाँव के ब्राह्मण करियप्पा के घर जब मैं पहुंचा तब मैंने उसे पहली बार देखा था. उस लड़की के बारे में बहुत संक्षेप में बताता हूँ कि उसका रंग गेंहुआ था. मुख देखने में सुंदर. भरी जवानी में गदराया हुआ शरीर. जब भी मैं देखता उसके होठों पर एक स्वाभाविक मुस्कान पाता. आँखों में बचपन की अल्हड़ता की चमक बाकी थी. दिन भर घूम फिर लेने के बाद रात के भोजन के पश्चात वह कमरे में आई और उसने मद्धम रौशनी वाली लालटेन की लौ को और कम कर दिया.

वह बिस्तर पर मेरे पास आकार बैठ गयी. मैंने थूक निगलते हुए कहा ये गलत है. वह निर्दोष और नजदीक चली आई. फिर उसी ने बताया कि मैं बसवी हूँ. ईश्वर की आज्ञा है कि मैं मेहमानों की सेवा करूं. यह उनके लिए आदेश की पालना है. मैंने कहा यह तो वेश्या जैसा कार्य है. यह सुन कर उसकी भोंहें चढ़ गयी. नथुने फड़क उठे. बहुत गुस्से में आने वाली स्त्री के मुख पर एक प्रकार भीषणता आ जाती है. वही उसके मुख पर स्पष्ट थी.

इसके बाद रात देर तक हम दोनों ने स्त्री और उसके मान के बारे में चर्चा की. धर्म की आड़ में मनुष्य को इस तरह के नारकीय जीवन में धकेलने वाले अज्ञान और स्वार्थ पर बहस की. लेकिन उसने एक भी बात न सुनी. मैंने पूछा कि इससे पहले तुमने किसी की सेवा की है. चेनम्मा ने सर झुका लिया. मैंने कहा कि अगर तुम खुद को ईश्वर का प्रसाद समझती हो तो ये झूठन हुई ना? और इस तरह झूठन को परोसना पाप ही हुआ ना?

इसी तरह के सवाल जवाब के दौरान चेनम्मा के चेहरे पर सुख दुःख के भाव आते गए. चिंताओं की लकीरें बनती गयी. आखिर उसने मान लिया कि यह मनुष्यता का कोई रूप नहीं है. वह बढ़ कर मेरे पांव छूने को ही थी कि मैंने उसे रोक लिया. अब वह बहुत प्रसन्न थी. किन्तु उसने कांपते हुए कहा "भगवान... अब आगे से ऐसा काम नहीं करुँगी." मुझे लगा कि उसके चेहरे से शांति बह रही थी. मैंने कहा "चेन्ना अब तुम जाकर सो जाओ." दरवाज़े के पास उसका हाथ पकड़ कर कहा कि "तुम्हें मुझसे कोई गुस्सा तो नहीं." फिर उसके माथे को चूम लिया.

मैं विवाहित हूँ. मेरी पत्नी मेरी प्रतीक्षा में हैं. मेरे बच्चे हैं. अगर मैंने दस साल पहले विवाह किया होता तो चेनम्मा जितनी बड़ी मेरी बेटी होती. ऐसी बातें सोचता हुआ मैं सो गया. सुबह जब जागा तो पाया कि करियप्पा ने मुझे पुकार कर जगाया है. बाहर देखा तो हो हल्ला था. चेनम्मा बाग़ के कुएं में गिर गयी थी. मैं बदहवास कुंएं की ओर भागा. उसका शव रखा था. देह में छिपा हिमकण उड़ चुका था.वह पुण्य और पाप से परे हो गया था. बची थी केवल विष की खली.

ये कहानी बहुत विस्तार में है. अन्जपुर के रहने वाले सीताराम ने इसे लिखा था. वे खुद को आनंद लिखा करते थे. विज्ञान में स्नातक पढ़े हुए आनंद साल उन्नीस सौ तिरेसठ में इस दुनिया को छोड़ गए. उनकी कहानी एक तमाचा जड़ कर रात भर जागने को विवश करती है. पाठक की आत्मा को कुरेदती रहती है.
* * *

उस कहानी का शीर्षक ही इस पोस्ट का शीर्षक है.

November 5, 2011

मर्तबान की तलछट में उदासी



प्रेम निर्वृति नहीं है. इसका उद्यापन असंभव है.

एक मांझा सीढ़ियों के किनारे पर अटक गया है. भौतिकी पढ़े बिना किसी बच्चे ने मांझे के तनाव में तरंगों का संसार रच कर अपनी चरखी के लिए अधिकतम हिस्सा बचा लिया होगा. मैंने सोचा कि मेरे पास भी एक साबुत डोर कहां बची है. मुझे ये हुनर क्यों नहीं आया. मेरा धागा तो उलझा ही रहा और चरखी टीन-ऐज़ को अलविदा कहने के दिनों में कहीं खो गयी.

साल डूबते गए और ख़ुशी सकेरने की कोशिश में ज़िन्दगी की डोर का सिरा कितनी ही बार ज़ख़्मी होकर टूटता गया. हम प्रेम कि तलाश में जिस निर्मल और साबुत मन को लेकर निकले थे. वह कितनी ही बार बिखर चुका है और उसका तलछट गंदली स्मृतियों से भर गया है. इस पारदर्शी मर्तबान में रखी आशाएं विनष्ट हो चुकी हैं.

इसी असंभव से नफ़रत करते हुए एक बेवजह की बात.

उन दिनों स्पाई कैम नहीं थे
और जेब खर्च से नहीं खरीदा जा सकता था
एक सीसीडी कैमरा.

इसलिए उसने
खिड़की में बैठे हुए,
फर्श पर लेटे हुए,
बस के सफ़र की नीम नींद में
मेरे होठों पर रखे, नर्म ताजा बोसे.

मेरे सीने पर लिखा
अपने आंसुओं की स्याही से
और आँखों की अचरज भरी रौशनी से बुनी
सम्मोहक विवस्त्र फ़िल्म.

बाद बरसों के अब तक
याद के आलों में रखे 
इसी सामान से होता हूँ, ब्लैक मेल.

आज जाने किसलिए ये बात कही है
यूं तो बातें बेवजह हैं और बहुत सी हैं.
* * *

प्रेम के कवच का रहस्यमयी बीजक आंसू भरी आँखों से ही पढ़ा जा सकता है.
* * *

November 3, 2011

जबकि ऐसी कोई वजह नहीं...



इन सुस्ताई हुई रातों की भोर के पहले पहर में आने वाले ख्वाबों में बच्चों की सेहत और एक उपन्यास जितना लम्बा अफ़साना लिखने के दृश्य होने चाहिए थे. लेकिन आज सुबह बदन में ठण्ड की ज़रा झुरझुरी हुई तब देखा कि एक मुसाफ़िर बाहर वाले कमरे में अपना सामान खोल रहा था. रात घिर आई थी. मुझे किसी सफ़र पर जाना था और चीज़ें सब बिगड़ी हुई थी. ग्यारह दस पर छूटने वाली गाड़ी का कोई मुसाफ़िर मुझे फोन पर पूछता है कि क्या सामने वाली बर्थ आपकी है? सपने की नासमझी पर अफ़सोस हुआ कि किसी मुसाफ़िर को मेरा फोन नम्बर कैसे मालूम हो सकता है.

एक पेढी पर से फांदता हुआ अपने थैले के पास आ जाता हूँ. बोध होता है कि मेरे बैग में बेकार पुराने कपड़े भरे हैं. मैं उनको बाहर कर देने के लिए उसको देखता हूँ. लेकिन उसमें पिछली सर्दियों में लिए गये दो नए स्वेटर खाकी रंग के कागज के लिफाफे में रखे हैं. ये जरुर जया ने किया होगा, ऐसा सोचते हुए भाई की आवाज़ सुनता हूँ. वह मुझे लगातार होती जा रही देरी में भी ट्रेन तक पहुंचा देने के लिए चिंतित है. मेरा टिकट खो गया है. वह सब दराजों और बैग के खानों में तलाश लिए जाने के बावजूद नहीं मिलता. मैं अपने कमीज की जेब से कुछ कागज निकालता हूँ तो मेरा हाथ किसी बनिए की तरह कागजों से भर जाता हैं. ये सब पर्चियां किसी हिसाब की हैं और मुझसे संभल नहीं रही. इनमें खोजने के चक्कर में भय बढ़ता जा रहा है कि गाड़ी निकल जाएगी.

अचानक दूर पिताजी दिखाई दे जाते हैं. मद्धम कदमों से मेरे पास आते हैं. उनका कद मेरे से ऊँचा है. मेरे माथे पर चूमते हैं. इस 'फोरहैड किस' के दौरान सोचता हूँ कि वे बहुत उदास होंगे. जैसे ही मैं अपना सर ऊपर की ओर उठाता हूँ तो पाता हूँ कि उनका मुख प्रसन्नता से भरा है. वे एक ओजपूर्ण निर्मलता से भरे हैं और सौम्य चहरे पर देवीय मुस्कान है. मैं अचरज से भर जाता हूँ कि वे किस बात के लिए आनंद में हैं. अचानक याद आता है कि मैं उनको कब का खो चुका हूँ. कई बरस हुए...  आख़िरी बार मैंने उनको पीले वस्त्रों में हलके उजले रंग में पालथी की मुद्रा में बैठे हुए देखा था.

रेल एक नए ट्रेक से गुजर रही है. स्कूल के दिनों में भाप के इंजन की दिशा बदलने के लिए बनी हुई घूम चक्कर वाली पटरी पर अब नयी पटरी बन गयी है. गाड़ी बहुत धीरे रेंग रही है. कच्ची बस्ती के घरों के बीच से होती हुई अपना रास्ता बना रही है. मैं समझ नहीं पाता हूँ कि क्या सही गाड़ी में आ गया हूँ या फिर इस गाड़ी के सहारे उस गाड़ी तक पहुँच जाऊँगा. दुविधाओं की गिरहों में घिरा हुआ पाता हूँ कि मेरी धमनियां सिकुड़ती जा रही है. रक्त प्रवाह पर किसी अजगर ने कुंडली मार ली है. रात के अँधेरे में सफ़र जारी है. सोचता हूँ कि वह क्या है, जो आने वाला है... ये किस सफ़र की गाड़ी है?

* * *

उसकी सुवासित भुजाओं के बीच अपने होठों को रखते हुए मैंने कहा कि रात बीत गयी है और जीवन जीने का युद्ध अपने चरम पर साबित हुआ है, एक धोखा... बेमौसम हवा में उड़ती आती थी हल्दी वाली क्रीम की गंध, जबकि वे दिन खो गये हैं, चाँद सितारों से परे धूसर अँधेरे में.

* * *
मगर अब भी मैं सोच रहा हूँ कि अनार के नीचे बिखरे फूलों को कोई लड़की चुन लेगी, एक दिन.

November 1, 2011

दूर से लगता हूँ सही सलामत



मैं इससे दूर भागता रहता हूँ कि ज़िन्दगी के बारे में सवाल पूछना कुफ्र है. ये क्या सोचते हो? ऐसे तो फिर जीना कितना मुश्किल हो जायेगा? इस सवाल को रहने दो, जब तक है, अपने काम में लगे रहो... इन गैरवाजिब बातों में सुख है. ज़िन्दगी से प्रेम करने लगो तो डर बढ़ता जाता है. उसी के खो जाने का डर, जिससे प्रेम करने लगे हों. अचानक ऊपरी माले में एक सवाल अटक जाता है कि न रहे तो?

साँस घुटने लगती है. बिस्तर पर झटके से उठ बैठता हूँ. सोचता हूँ बच्चों को बाँहों में भर लूं... पत्नी का हाथ थाम लूं. सीधा खड़ा हो जाऊं. अपने सर को पानी झटकते हुए कुत्ते की तरह हिलाऊँ. अपनी सांसों पर ध्यान दूँ कहीं कोई साँस छूट न जाये. ख़ुद से कहता हूँ कि ये दीवानगी है. सब तो खैरियत से हैं. अभी चीज़ों ने ख़ुद को थाम रखा है. थोड़ी देर रुको सब सामान्य होने लगेगा. वह थोड़ी देर नहीं आती. वह समय मीलों दूर है. दोनों हथेलियों को बिस्तर पर टिकाये हुए मुंह खोल कर साँस लेता हूँ. कुछ लम्बी सांसें...

ऐसे अनगिनत दिनों में भय निरंतर पीछा करता रहा. एक उदास दोपहर में दोस्त ने पूछा फिर कैसे छुटकारा होगा ? वह सेडेटिव, जो आपके मस्तिष्क की गति को धीमा करे. फिर नींद एक भारी लिहाफ की तरह ढक ले. आँख खुले तो चेहरों और चीज़ों के प्रति उदासीनता बनी रहे.
सोचता हूँ कि काश भुला ही सकूँ, तुम्हारा नाम... 

ऐसे ही तुम्हें याद करते हुए किसी शाम
मैं आरामकुर्सी पर एक तरफ झुक जाता हूँ
दूर से लगता हूँ सही सलामत
लेकिन होता हूँ वैसा ही, जैसी वे चीज़ें थीं.

October 28, 2011

होश कहां होता है, इज़्तराब में...



मैंने चाहा कि लेवेंडर की पत्तियां अपनी हथेली में रख कर मसल दूँ. मैं झुक नहीं पाया कि मेरे कमीज़ और हथेलियाँ में कोई खुशबू भरी है. फुरसत के चार कदम चलते हुए जब हसरतों के कुरते की सलवटों में छिपे हुए बेक़रार रातों के किस्सों को पढना चाहें तो आधा कदम पीछे रहना लाजिमी है. ज़रा आहिस्ता चलता हूँ कि अपने कौतुहल में लिख सकूँ, ज़िन्दगी की लहर का किनारा क्या उलीचता और सींचता रहता है. इस लम्हे की खुशबू के उड़ जाने के डर के बीच ख़याल आता है कि क्या मेरा ये लम्हा किनारे की मिट्टी पर बिखरे हुए सीपियों के खोल जैसी किसी स्मृति में ढल कर रह जायेगा.

मैंने फूलों और चीज़ों को उदासीन निगाहों से देखा और फ़िर सोचा कि रास्तों के फ़ासलों की उम्र क्या हुआ करती है? खुशबू की ज़द क्या होती है? इस वक़्त जो हासिल है, उसका अंज़ाम क्या है? मुझे याद आया कि ईश्वर बहुत दयालु है. वह सबके लिए कम से कम दो तीन विकल्प छोड़ता है. उनमें से आप चुन सकते हैं. मेरे पास भी दो विकल्प थे. पहला था कि मैं वहाँ रुक नहीं सकता और दूसरा कि मैं वहाँ से चला जाऊं. एक आम आदमी की तरह मैंने चाहा कि शिकायत करूँ लेकिन फ़िर उसके आराम में खलल डालने का इरादा त्याग दिया. उसे मुहब्बत से अधिक गरज नहीं है. उसके रोजनामचों में ऐसी बेढब हरकतों के बारे में कुछ दर्ज नहीं किया जाता कि इस दुनिया में हर पल असंख्य लोग खुशबुओं की चादरें सर पर उठाये हुए मुहब्बत की पुरानी मजारों की चौखटें चूमते रहते हैं.

खो देने का अहसास कुछ ऐसा होता है जैसे समय की धूल में गुम हुआ कोई शहर याद आये. उस शहर की गलियों की तसवीर दिखाई दे और ऐसा लगे कि इस जगह पर हम पहले भी थे. या किसी कालखंड में यही जीवन पहले जीया जा चुका है. आस पास पहियों के शोर पर भागता हुआ शहर किसी थ्री डी फ़िल्म सा असर जगाता है लेकिन मैं सिर्फ़ एक निरपेक्ष दर्शक हूँ. नाकाम और बेदखल दर्शक. चुप खड़े पेड़ों के टूटे पत्तों की आहटों के साथ अजनबी रास्तों पर बेवजह टहलते हुए बिछड़ने के बाद के हालात के बारे में सोचता हूँ. एक गहरी उदासी के साथ घबराहट बेआवाज़ कदमों से बढ़ी आती है.

भूल जाता हूँ कि इस मंथर काल में भी सब कुछ अद्वितीय है. इसे दोहराया नहीं जा सकता. यह बीतता हुआ लम्हा और ठहरा हुआ दृश्य अजीर्ण है. यह सवालों का कारखाना है कि इस जीवन रसायन के केटेलिस्ट क्या हैं? जो एक सहज, सरल प्रेम विलयन को बनाते हैं. ज़िन्दगी के अज़ाबों से लड़ते हुए कुछ सख्त हो चला चेहरा किस तरह निर्मल उजास से भर जाता है. दुनिया की सिखाई हुई मायावी समझ के मुखौटे को उतार कर अपने असली वजूद में लौट आता है. प्रेम का सघन रूप किस तरह इतना पारदर्शी होता है.

उसने कहा कि लैवेंडर के इन पत्तों पर बैंगनी फूल नहीं खिलेंगे...

मौसम बदल रहा है. हवा का रुख भी. धूप खिला करेगी और नए फूल उम्र का सफ़र तय करते रहेंगे. मालूम नहीं अपने प्रेम के एकांत को संवारने के लिए वह पार्क के कितने चक्कर काटेगी. लोग टहल कर निकल जाया करेंगे और बैंचों की हत्थियों के नीचे कुछ ओस की बूँदें बची रह जाएगी जैसे बचा रह जाता है एक आंसू... जिसकी नातमाम बातें हथेलियों पर खिल उठेंगी. नाभि के पास तितलियों के घोंसले में हवा की सरगोशी गोया किसी किस्से से आती एक रूमानी अज़ान. बेचैनी दर बेचैनी. ये किसने पुकारा है मुझे... वक़्त का सिरा कहां खो गया है. मैं कौन हूँ... आओ लौट कर. मुझे मेरी पहचान बख्श दो.

* * *
इज़्तराब : उद्विग्नता, विह्वलता, ANXIETY.

October 14, 2011

चाँदनी रात में


ढ़लान शुरू होने की जगह पर बने घर का हल्की लकड़ी से बना दरवाज़ा टूटा हुआ था. उसकी ढलुवाँ छत पर रौशनी बिखरी थी कि ये डूबते चाँद की रात थी. वह दरवाज़ा थोडा खुला, थोडा बंद ज़मीन और चौखट के बीच अटका हुआ था. जैसे कोई उदासीन प्रेम एक तयशुदा इंतज़ार में दीवार का सहारा लेकर बैठा हो.

घर की दर ओ दीवार को बदलती हुई रुतें चूमती निकलती है. बरबाद हुए कोनों को झाड़ने पौंछने और मटमैली दीवारों को सफ़ेद चूने से रंगने के काम वाले इन्ही दिनों घाटी में मौसम की पहली बर्फ गिरा करती है. रेगिस्तान की रातें भी ठण्ड से भर जाती है और पानी से भरी हवा वाली सुबहें खिला करती है. दो रात के बाद इस बार रुत कायम न रह सकी. चाँद पूरब में हाथ भर ऊंचा खिला हुआ है. मैं अपनी छत के ठीक बीच में चारपाई लगा कर उस घर को याद करता हूँ, जो ढ़लान शुरू होने की जगह पर बना है.

उस घर में कौन रहता था? नहीं मालूम कौन...

* * *

नीचे लॉन में खिले हुए पौधों पर चांदनी गिरती है तब उनको देखना अच्छा लगता है. किन्तु पड़ोस की छतों पर लोग जाग रहे होते हैं. उम्मीदें और अनसुलझे सवाल उनकी नींदें चुराए रखते हैं. वे क्या सोचें कि मैं किसलिए रात को अपनी छत पर भटक रहा हूँ? इसलिए अपना ये इरादा त्याग देता हूँ. चारपाई पर बैठ कर सोचता हूँ कि अच्छा क्या था. कोई बोसा, कोई स्पर्श या फ़िर कोई मदहोशी से भरा जाम....

मैंने कहा. "तुम जाया हो गये हो." थोड़ी देर चुप रहने के बाद इसका मतलब समझ नहीं आया. जाया होना क्या होता है. ये जो सुबह सुबह तिल पर सफ़ेद फूल खिले होते हैं या मोठ की तिकोनी सी पत्तियां मुस्कुराती है ना, सब एक दिन में खो जाते हैं. ऐसे ही उस घर के अंदर की चांदनी चली गयी. अब बस भीगी हुई छत चमकती है, रात भर...

* * *

चाँद ने रात का आधा सफ़र तय कर लिया. मैं सो जाऊं और तुम भी आज की रात के लिए लुढ़का दो, अरमानों की सुराही... इस वक्त मैं एक छतरी तान लेना चाहता हूँ कि रौशनी का लिबास चुभ रहा है. 

October 8, 2011

जबकि वो उस शहर में नहीं रहती...




मैं मर गई हूँ. तुम भी अपने बिस्तर में मर जाओ.
उसने पहली बार देखा कि मरने के बाद चाँद तारों को देखना कितना अच्छा लगता है. नींद की प्रतीक्षा नहीं रहती. हवा और पानी की जरुरत ख़त्म हो जाती है. ब्रेड के बासी हो जाने या सर्द दिनों में दही के सही ढंग से जमने की चिंता से भी मुक्त हो जाते हैं. सबसे अलग बात होती है कि मरने के बाद कोई आपका इंतजार भी नहीं करता. वो इंतजार, जिससे उकता कर हर रात हम अपने बिस्तर में मर जाते हैं. ये सोचते हुए कि चाँद कायम रहा और सूरज रोज़ की तरह उगा तो सुबह देखेंगे कि हवा में ठंड कितनी बढ़ गयी है.

इन दिनों मैं यहाँ नहीं था, यह सच है.
मैं अजनबी भूगोल की सैर पर था. अपनी समझ खो चुके एक भटके हुए यात्री की तरह मेरी जिज्ञासाएं चरम पर थी. मेरे लिए वह नयी जगह थी. वहाँ पर बहुत सामान्य और उपेक्षा योग्य चीज़ें भी मुझे डरा रही थी. मैं एक पहली कक्षा का बच्चा था, जो दर्शनशास्त्र की किताब पर बैठा हुआ था. उस शहर में मेरा कोई नहीं रहता. उत्तर-पूर्व के ऊंचे पहाड़ों का रास्ता उसी जगह से जाता है. हाँ, बीस एक साल पहले मेरी एक बहन जोरहट में रहा करती थी. उसके फोन आया करते थे लेकिन मैंने कभी पूछा नहीं कि पहाड़ों के शहर कैसे दिखते हैं. अब सोचता हूँ कि हमें पूछते रहना चाहिए कि हमारी नियति का वेब जटिलता से गुंथा है. इसके अलग अलग सिरे हमारी प्रतीक्षा में होते हैं. संभव है कि इसे पढ़ते हुए तुम्हें भी ये ख़याल आये कि कभी इस रेगिस्तान में आना होगा.

कभी कभी हमें,
उन जगहों का मुआयना कर लेना चाहिए, जहाँ आने वाले कुछ सालों में जाना होता है.
मैंने देखा कि वहाँ हरे रंग की चादर बिछी है. घुमावदार रास्ते हैं. शहर से बाहर किन्हीं दो छोटी पहाड़ियों पर एक चौकोर हवेली खड़ी है. उसकी अनगिनत खिड़कियाँ बंद हैं. मैंने अग्नि दिशा की एक खिड़की को खोल कर देखा था. दूर तक चुप्पी पसरी थी. निर्जीव चुप्पी. मुझे उस हवेली में एक बड़ी अजीब सी अनुभूति हुई. जब मैं खिड़की से बाहर देखता तो लगता कि ये ऊंची नीची घाटियों वाला चुप सा स्थान है लेकिन जैसे ही मैं खिड़की बंद करता, एक भरा पूरा निर्जन रेगिस्तान दिखाई देने लगता.

साया अक्सर तनहा क्यों होता हैं? ये मुझे अब तक समझ नहीं आया.
उस हवेली में भी कोई था. ऐसा कोई जिसे कई सालों बाद वहाँ आना है. किसलिए? ये मालूम नहीं. मैं एक अफ़साना बुनने लगा. विस्मृत हो चुके दिनों का अफ़साना. इसकी सही शुरुआत के लिए मैं अपने होस्टल के कमरा नम्बर तीन सौ सात में चला आया. उसकी बालकनी में सिगरेट के टोटे पड़े थे. मुझे धुंए की तलब ने घेर लिया. मैं तीसरे माले से नीचे की ओर जाती हुई सीढियों की तरफ बेतहाशा भागने लगा. उस कमरे में आज भी जरुर किसी नौजवान की गंध बसी होगी लेकिन मैं अपने अतीत के दृश्यों को देख कर घबरा गया था. मुझे लगा कि मैं कितना बीत चुका हूँ.

उसकी आवाज़ सबसे अधिक रोमांस से भरी तब लगती जब वो बागीचे में घूमते हुए बात करती. मुझे ओल्ड केम्पस के सामने वाली रुई धुनने की दुकान में उड़ते हुए फाहे याद आने लगते. मैं सोचने लगता कि उसकी सांसें नर्म नाजुक फाहों की तरह आस पास उड़ रही है और वह उनको करीने से रखने के जतन किये जा रही है. सुबह और शाम बागीचे की हवा मेरे साथ चलती है. रात को आकाश में तारों की वो ज्यामितीय संरचना फ़िर अपने पास बुला लेती है. जिसमें एक तने हुए धनुष बाण का आभास होता है. अचानक आवाज़ फ़िर से आई, शायद यही कहा था. मैं मर गयी हूँ...

कई बरस हुए उसका फोन नहीं आया मगर अब उसे कभी ऐसा न कह सकूँगा कि मैं सिलीगुड़ी नहीं गया.

September 30, 2011

आखिर थक कर सो जाओगे



अँधेरे में दीवार का रंग साफ़ नहीं दिख रहा था.
पच्चीस कदम दूर, उस दीवार की ईंटें बायीं तरफ से गिरी हुई थी. फ्रिल वाली स्कर्ट पहनी हुई नवयौवना उस लड़के तक जाना चाहती थी. लड़के का मुंह पूरब दिशा में था और वह उसके पीछे की तरफ थी. भौतिक चीज़ों से जुडी अनुभूतियों के साथ मेरा दिशा बोध जटिलता से गुंथा हुआ है. चीज़ें एक खास शक्ल में सामने आती है. जब भी मैं किसी दीवार पर बैठे हुए लड़के के बारे में सोचता हूँ तो तय है कि लड़का जिस तरफ देख रहा है, उधर पश्चिम है. लड़के के पैरों के नीचे की ओर ज़मीन बहुत दूर है. वह लड़का एक उदासी का चित्र है. इसलिए डूबते हुए सूरज की ओर उसका मुंह हुआ करता है. जिस तरफ वह देख रहा है उधर कोई रास्ता नहीं होता. घात लगाये बैठा समंदर या फ़िर पहाड़ की गहरी खाई लड़के के इंतजार में होती है. लड़के के थक कर गिर जाने के इंतजार में...

मैं उसे नवयौवना ही समझ रहा हूँ किन्तु लिखने में लड़की एक आसान शब्द है. दरवाज़े के साथ एक जालीदार पतला पल्ला है. इसके आगे कुर्सी रखी है और फ़िर खुली जगह में रेत है. इस पर कुछ पौधे उगे हुए हैं. इन सबके बीच वह डिनर टेबल कहां से आई, मैं समझ नहीं पाता हूँ. अचानक चली आई दीवार और उस पर बैठा लड़का भी अविश्वसनीय है. मुझे तुरंत लगा कि मैं इस विचार को यहीं त्याग दूँ. मैं इस लड़की के लिए, उस लड़के के बारे में और नहीं सोचना चाहता हूँ. हालाँकि डिनर टेबल पर कोहनियाँ टिकाये बैठी लड़की चुप थी और सिर्फ़ मैं ही उसके लिए सोच रहा था.

इस बार लड़का पूरब की और देख रहा था. इसलिए वह अधिक देर तक मेरे साथ नहीं रहा. मेरे ख़यालों में आने वाले सब झूलों की पींग पूरब की ओर उठती है. झूला दोलन का सुंदर प्रतीक है. दोलन, विचलन का और विचलन, यात्रा का अंश है. और मुझे यात्रायें कम पसंद है इसलिए मैंने लड़के को गायब कर दिया. हवा की रंगत बदली हुई थी. इसके स्पर्श में मादकता थी फिर भी जाने क्यों मैं सो नहीं पा रहा था.

बैडरूम से बाहर अँधेरे में जाने का सोचते ही लगता कि मैं चीज़ों से टकराने लगूंगा. मैंने सिर्फ़ आवरण को पढना सीखा है. अर्थात जब उजाला चीज़ों के औरा को समाप्त कर उनकी ज्यामितीय शक्ल को दिखाता है, तब मैं उन्हें समझ पाता हूँ. उनसे बराबर की दूरी बना कर रख सकता हूँ. अँधेरा पढना आता नहीं इसलिए अपने ही स्थान पर चीज़ों के बीच रास्ता खो गया है. मैंने अपने आवरण को सीखा, जाना है. बाहर के अँधेरे की तरह मेरे भीतर घना अंधकार है. जब अपने भीतर झांकता हूँ तो घबरा कर लौट आता हूँ.

इस घबराहट में सब शक्लें बुझा देना चाहता हूँ. लड़के के बहाने फ़िर से दिशा और उससे जुड़ी चीज़ों का बोध मेरे सिरहाने चला आता है. सोचता हूँ कि मैंने जब भी किन्हीं सीढियाँ के बारे में सोचा, वे उत्तर की ओर मुंह किये हुए क्यों दिखाई दी? जाने क्यों, हमेशा ऐसा लगता रहा कि सीढियाँ चढ़ते हुए मैं दक्खिन में ऊपर की ओर बढ़ रहा हूँ. मेरे ख़यालों में टूटी हुई इमारतें, मेहराब, कंगूरे, घर, चुंगियों के दफ्तर और खत्म हुए रास्ते से दिखाई देते हैं लेकिन सीढियाँ साबुत ही रहती हैं. जैसे उनकी गिनती पूरी हो रही है. वे मुकम्मल होने का अहसास दे रही है.

रात के बारह पचास...
अब मेरे पास ख़यालों की खुशबू के गोदने थे. उनमें बस इतना बचा रह गया है कि दीवार पर बैठा रहने वाला लड़का हसरतों का वजूद था. जिसके कंधों पर लड़की की आँखों के ख़्वाब टिके रह सकें. मगर वो लड़की कौन थी? हवा का झोंका फिर दस्तक दे गया है. मैं जानता हूँ कि बाहर दरवाजे के पार काली रात है फ़िर भी उस लड़की का गोरा बदन देख लेना चाहता हूँ, अगर वह वहां बैठी है तो... उनींदा दीवार से गिरने से पहले के सम्मोहन में घिरा हुआ, तकिये के नीचे अपनी कोहनी को डाल कर उसे थोड़ा और ऊपर कर लेता हूँ.

फ्रिल वाली स्कर्ट पहने लड़की के ख़्वाब जाने क्या हुए. दरवाज़े के पार अँधेरा प्यासा ही खड़ा रहा और मैं अपनी प्यास के चार जानिब एक दीवार चुनता गया.

September 29, 2011

ये मग़रिब से आती हवा न थी...



अँधेरे में रहस्य का आलाप है. इसमें सिहर जाने का सुख है.
वहां एक कुर्सी रखी है. बादलों के बरस जाने के बाद वह कुर्सी खुली जगह पर चली आया करती है. सर्द दिनों में धूप का पीछा करती रहती है. गरम दिनों की रुत में सीढ़ियों के नीचे के कोने में दुबकी हुई थोड़ी कम गरम हवा का इंतजार करती है. उस पर एक कुशन रखा है. कुशन पर रंगीन धागों से ढोला-मारू की तस्वीर उकेरी हुई है. दौड़ते हुए ऊंट की गरदन टेढ़ी है यानि वह संवाद कर रहा है. कहता है. "मुहब्बत की कोई काट नहीं है, वह ख़ुद एक बिना दांतों वाली आरी है."

मैं अभी भी कमरे में लेटा हुआ हूँ. रात के बारह बजे हैं. सोच रहा हूँ कि इस कुशन पर रेत के धोरों की तस्वीर धागों से बन जाती तो और सुन्दर दिखता. दौड़ते हुए ऊंट की पीठ पर सवार ढोला अपनी प्रेयसी मरवण से मुखातिब है. जिस वक़्त अपने कंधे पर प्रेयसी का हाथ नहीं पाता है, घबरा जाता है. प्रेम के लिए भागते जाने के इस अनूठे आयोजन का विस्तार असीमित है. अबूझ धोरों पर रेत की लहरों के बीच सुकून और बेचैनी की एक बारीक रेखा साथ रहती है कि इस रेगिस्तान में पकड़ा जाना मुश्किल है और अधिक मुश्किल है, बच पाना. ऊंट जितना तेज दौड़ता है, डर भी उतनी ही तेजी से उसका पीछा करता है. डर है कि भरी भरी छातियों और गुलाबी गालों वाली सुघड़ नवयौवना का साथ न छूट जाये. इसका तीखा नाक किसी और की नाक के नीचे न आ जाये. इसके लम्बे खुले हुए केश जो रात को और अधिक गहरा कर रहे हैं, उनसे कोई और न खेलता हो. कोई इसके एक आंसू को अपने शराब भरे प्याले में उतार न ले.  

आज की रात के इस लम्हे के बारे में मैंने कभी सोचा नहीं था कि ऐसे हवा दस्तक दे रही होगी. मैं लकड़ी के तख़्त पर लेटा हुआ, बाहर भाग जाने का सोच रहा होऊंगा. हम इसी तरह अपने जीवन को जीते हैं. ठीक इसी पल को थाम लेना चाहते हैं. आनेवाले पल की सूरत दिखती नहीं इसीलिए उसके प्रति आशंका है. उसके लिए आग्रह है कि जाने कैसा होगा? इसलिए जो ये पल है, अच्छा है. बस एक छोटी सी नौकरी, चंद शब्दों और आवाज़ का सफ़र... यश, प्रसिद्धि, बल, अधिकार, सामर्थ्य, प्रेम, दौलत और ऐसी ही सब चीज़ों के सफ़र में कुछ भी स्थायी नहीं है, फिर भी आने वाले लम्हे से कई वहम है. भय और लालच से बुनी गयी इस दुनिया में बस एक इंतज़ार स्थायी है, आखिरी वक़्त जब दुनिया से थक-हार जायेंगे तब भी बचा रहेगा.

बाहर के अँधेरे की ओर फ़िर से नज़र जाती है. वहाँ दीखता कुछ नहीं. बस सोचता हूँ कि क्या होता अगर वे कभी इस तरह न भाग पाते? क्या भूल ही जाते? वह पहली नज़र की मुहब्बत जेठ महीने में कितनी आँधियों और रेत के बगुलों के बाद मिट पाती? ऐसे सवालों के बीच, मैं अलग तस्वीरें बुन रहा हूँ. एक में किसी डायनिंग टेबल पर पंद्रहवीं सदी में पहने जाने वाली फ्रिल वाली स्कर्ट पहने हुए एक भरी देह की नवयौवना बैठी है. उसने अपने एक पैर को दूसरे पर चढ़ा रखा है. उसकी कोहनियाँ टेबल के किनारों पर टिकी है. जैसे वह अभी अभी कोई बात अधिकारपूर्वक कहने ही वाली हो. उसके भरे हए गाल गरदन के पास साफ दिखते हैं. जैसे मौसम का पहला फल इंतज़ार में और भारी हो गया है. बस मैं इतना दृश्य ही सोच पाता हूँ. मेरे ख़यालों से घटना या संवाद अक्सर गैर हाजिर रहते हैं.

अचानक अँधेरे के संसार की सोच में इस तरह के बेतरतीब ख़याल कैसे चले आते हैं, समझना मुश्किल है. लेकिन दूसरे दृश्य में एक नन्हा टोरनेडो है. जिसे मैं बतुलिया कहता हूँ. वह गोल चक्कर काटता हुआ मैदान में पड़े पत्तों, कागजों और ऐसे ही कचरे को अपनी बाँहों में गोल गोल घुमा रहा है. सम्भव है कि ये वर्तुल लालसाओं और कामनाओं का बिम्ब है जो सिर्फ़ रेत से भरा हुआ जूता खाने के योग्य है. हो सकता है कि इसी तरह के किसी अंधे वर्तुल ने ढोला के कसूम्बल रंग के ऊंट का रास्ता रोक लिया हो. या शायद ऐसे ही नन्हे टोरनेडो ने उस लड़की की स्कर्ट की फ्रिल को हवा में उड़ा दिया हो... और वह बहुत देर तक ये सोचती रही हो कि वो लड़का कौन था. जो अक्सर आधी टूटी दीवार पर बैठा रहता था. उस दीवार में लगी ब्रिक्स के लाल रंग पर जमी हुई धूल झरती रहती थी.

वो लड़का कौन था? क्या वहाँ कोई लड़का था... 
हवा फ़िर से दस्तक दे गयी है. जैसे कोई अपने गीले बालों को झटकते हुए गुज़रा हो. 

 * * *

September 28, 2011

रात की स्याही से भीगी हवा



यह कुछ ऐसा ही है जैसे ये सोचना कि दीवार के उस पार क्या है?
मैं अपने बिस्तर पर कभी औंधा लेटा हुआ आँगन को देखता या पीठ के बल सोते हुए छत को ताकता सोचता हूँ कि बाहर की हवा में ठण्ड है. अचानक कोई झोंका आता है. हवा इस तरह से बदन को छूती है जैसे कोई आहिस्ता आहिस्ता दस्तक दे रहा हो. वह असंगत लय है. अभी एक बार छुआ थोड़ा रुक कर तेजी से दो तीन बार फ़िर से छू लिया. मैं एक छोटे से इंतजार के बाद उसे भूलने को ही होता हूँ उसी वक़्त हवा फ़िर से दस्तक देती है. जैसे किसी ने अपने ठन्डे हाथ धीरे से गाल पर रखे और वापस खींच लिए.

ये कौन है? जो मेरे मन को दरवाज़े के बाहर खींच ले जाता है. वहां अँधेरा है. मैं उस जगह को रोज़ देखता हूँ, वहाँ कोई नहीं रहता. उस खुली जगह पर कोई नहीं है तो फिर वहां पर मेरा मन क्यों चला गया है. सूरज की रौशनी के बुझते ही शोर जब अपनी दुम को अपने ही मुहं में दबा कर सो जाता है तब क्या कोई दबे पांव वहाँ आकर रहने लगता है? संभव है कि चीजें जादुई हैं और वे हर घड़ी अपना रंग बदलती रहती है. हो सकता है क्योंकि हमारा रंग भी हर पल परिवर्तित होता रहता है. जैसे मन का रंग, सामर्थ्य का रंग, व्यवहार का रंग, आशाओं का रंग और भी हर तरीके से हम स्थूल और सूक्ष्म बदलाव को जीते रहते हैं. 

मेरा मन बाहर ही अटका है और हवा की छुअन एक बहाना भर है. संभव है कि किसी अजाने की प्रतीक्षा है और मैं उसे अपने आप से छुपा रहा हूँ. या फिर भीतर कुछ आलोडित है और बाहर भाग जाना चाहता हूँ. कुछ इस तरह की उम्मीदें भी हो सकती है, जिनके बारे में दिन को सोचना मुमकिन न हों. अब तक के सीखे और एकत्र किये गये अनुभव की स्मृति कहती है कि खुली हवा में साफ़ आसमान के नीचे पसरे अँधेरे में भय की सिहरन बिछी हुई होगी. सिहरन उत्तेजना और शिथिलता के बीच की बारीक और प्रभावी रेखा है.

बाहर अँधेरा है. अँधेरा हवस से भरा है क्योंकि कौमार्य को बचाए रखने के लिए जिसका प्रतिकार करना है वह हवस ही है. लेकिन अँधेरे का जादू बुला रहा है. वहाँ प्रतिपल आशंकाएं है. अँधेरे का चरम उत्कर्ष हर तरफ से चूमने लगेगा. सिहरन बढती जाएगी. क्या यही कामना मुझे बाहर बुला रही है. हवा फ़िर से छू गयी है. 

दरवाज़े के पार अँधेरा है.

September 25, 2011

फ़िर भी हेप्पी बर्थडे...



ख्वाहिशों की तितलियाँ बेक़रारी की आग को चूम कर उड़ जाती हैं. जाने किस नगर, किस देश को. झपकती हुई पलकों से देखे किसी अचरज की टिमटिमाती हुई याद रह जाती है. उन तितलियों के पंखों के कुछ रंग आस पास छूट जाया करते हैं.

ऐसे में कुछ शामें बेसबब स्टेडियम की पेवेलियन में बैठे हुए, कई सुबहें सूजेश्वर के पहाड़ी रास्ते वाले शिव मंदिर की सीढ़ियों पर, कई दोपहरें बेखयाल नीम के पेड़ों की छाँव में बीतती रही. वहां हसरतों के घोंसले न थे. बस ज़रा खुला खुला सा लगता था. उन्हीं जगहों पर मैं महसूस करता था कि आवाज़ की सुंदर तितलियाँ, खुशबुओं को छूकर आई है और लम्हों की उतरन को मेरी कलाई पर रखती हुई मुस्कुराती है.

वहीं बैठा हुआ जाने किस बात पर... अचानक किसी शोरगुल भरी कक्षा में पहुँच जाता हूँ. जहां विज्ञान के माड़साब किसी दर्शनशास्त्र के प्रोफ़ेसर में तब्दील हो कर बड़ी गहरी उदासी से बताते कि तितलियों की उम्र चौबीस घंटे हुआ करती है. वे गंभीर होकर खो जाते. जीवन के बारे में कोई ख़याल उनके दिमाग में अटक जाता था. इससे बाहर आने के लिए वे एक झटका सा देते हुए उस ख़याल को नीचे गिरा कर आगे पढ़ाने लग जाते थे.

अव्वल तो बची हुई स्मृतियों की तफ़सील में जाना नामुमकिन है और फिर मुझे प्राणिशास्त्र के रिसालों में भी खास दिलचस्पी कभी नहीं रही. डूबते डूबते ग्यारहवीं पास की और विज्ञान से तौबा कर ली. फिर तौबा का अफ़सोस इसलिए भी नहीं हुआ कि विज्ञान को आज भी मालूम नहीं कि मरने से पहले आदमी किस तरह मर जाता है...

रात को सोकर सुबह जागता हूँ तो बस ज़रा अजाने ही अपनी कलाई को फिर सूँघता हुआ सोचता हूँ कि शायद बचा हो कोई पता. मगर दिन और रातों की खुशबुएँ उड़ जाती है, उन्हीं रंगीन तितलियों की तरह... बेक़रारी नहीं जाती, खिलती रहती है रेलवे क्रीपर की तरह सदाबहार, उपेक्षित और इंतज़ार के हल्के सफ़ेद रंग में या याद के गुलाबी, बैंगनी रंग में...

और वह मुहब्बत भरी आवाज़ चुप्पी में ढल जाती है. तुम्हारे लिए कुछ बेतरतीब पंक्तियाँ लिख कर अपनी इस बात को पूरी कर रहा हूँ.

कभी कभी घर के बाथरूम से भी आने लगती है
होटल के कमरों जैसी गंध
और कभी डूबते समय सूरज
सबको बराबर कंदीलें नहीं बांटता है.

उन दिनों,
हमें
ख़ुद ही लाना होता है, घर की गंध को वापस
और रौशनी के लिए जलाना पड़ता है लाल रंग का दिल.


* * *

मैं हर जगह देख रहा हूँ मगर तुमने जाने कहां रख दिया है, अपना हेयर क्लिप... कि रात बहुत गहरी हो गयी है. वैसे इकतालीस साल काफी होते हैं फ़िर भी हेप्पी बर्थडे किशोर कि तुम अभी तक ज़िन्दा हो.

September 18, 2011

अग्नि के आचमन से

मैं ये जाने कब से सोच रहा हूँ कि तुमसे प्रेम करते हुए, मुझे देवीय कोप से भयभीत मनुष्यों की गरज नहीं है. मेरे पिता एक ऊँचे कद वाले और चौड़े हौसले वाले इंसान थे. उस भद्र पुरुष ने एक रात मुझे कहा था कि मैं अग्नि के आचमन और जल के अभिषेक से जन्मा हूँ. उस समय उनकी पेशानी पर बल थे. उनके तीखे नाक पर चमकता हुआ कोई उजाला छिटक रहा था. छोटी सी आँखों की लम्बी कोर के किनारे प्रेम से भीगे हुए थे. ऐसा देखते हुए मैंने पाया कि मैं एक नन्हा बच्चा हूँ. जो किसी की गोद में लेटा हुआ आँचल की ओट से ये सब देख रहा है.

कल मैंने एक ख़याल बुना. इसे जागती आँख का सपना कहा जा सकता है. सपना इसलिए कि इसमें सोचा गया सब कुछ अविश्वसनीय है. मैं देखता हूँ कि राजपथों जैसी चौड़ी सड़क के किनारे एक कार में तुम बैठी हो. उस कार के बंद दरवाजों पर, शीशों पर, छत पर बेशुमार बारिश गिर रही है. बरसात के शोर में कई सारी आवाज़ें खो कर मौन में ढल गयी है. एक ऐसा मौन, जिसमें शोर ही मुखर है मगर सुनाई कुछ नहीं देता.

बारिश की फुहारों और काली ऊदी घटाओं के बीच कोई उम्मीद नहीं झांकती. एक अरूप दर्द है. जिसका कोई ओर छोर नहीं, जिसकी शक्ल का खाका सही नहीं समझा जा सकता. जिसके होने की वजहों से अधिक दुःख इस बात का होता है कि बारिश की लय की तरह इसके अनेक रूप हैं. भीगे सीले इस ख़याल को थोड़ी ही देर में मुसलसल बारिश और भयावह बना देती है. मैं देखता हूँ कि बारिश का पानी अब कार के पहियों को ढक चुका है.

मुझे कई तरह के वहम और गुमाँ होने लगते हैं. कार तैरने लगेगी और एक सपनीली नाव में बदल जाएगी. लहरों पर सवार कार के मद्धम लयहीन हिचकोले, तुम्हें बचपन की किसी बैलगाड़ी जैसी यात्रा की याद दिलाएगी और तुम अपने सबसे खूबसूरत वक़्त में लौट जाओगी. वहाँ माँ की चुनर से एक मुकम्मल घर बनाया जा सकेगा. पिता की पीठ दुनिया का सबसे ऊँचा और मजबूत ठिकाना होगी. तुम लौटने लगोगी अपने अविस्मर्णीय सुनहरे वक़्त में. एक ऐसा वक़्त जिसमें रिश्तों को दुःख बुनना नहीं आता हो.

इस वक़्त मैं अपने पिता की याद के जंगल में किसी उदात्त घोड़े की हिनहिनाहट से भर उठा हूँ. ओ सफ़ेद दांतों और गुलाबी होठों वाली लड़की तुम्हारा भाल उन्नत है, तुम्हारा वक्ष उभरा हुआ है, घाटियों की शिखरों की तरह. तुम्हारी आँखों में बसा है तितलियों का घोंसला, तुम्हारी आवाज़ का कौमार्य अभी शेष है... आ कि अग्नि के आचमन और जल के अभिषेक से जीवन मुस्कुराता है, आ मेरी बाँहों में आ...

September 12, 2011

किसी ज़ीने पर पुराने दिन बैठे होते...

अच्छा रहता कि बारिश होती और एक दूजे का हाथ थामें सड़क के किनारे कार में बैठे रहते. इस तरह बहुत सा वक़्त साथ में बिताया जा सकता था. हम जरुर एक दूसरे को देख कर हतप्रभ चुप हो जाते. फ़िर थोड़ी देर बाद कार के पायदानों के नीचे से सरक कर कई बातें हमारे बीच आ बैठती. इस तरह मिलने के अचरज को हम गरम कॉफ़ी की तरह सिप करते जाते और इस स्वाद को दुनिया का लाजवाब स्वाद बताते.

विलासी चौराहों की ओर देखते हुए या फ़िर रिक्शा धोते हुए आदमी के बारे में कुछ भी सोचे बिना, इस पर भी बात की जा सकती थी कि उन शहरों को लोग क्यों याद नहीं रख पाते जहाँ उनका कोई महबूब न रहता हो. बातचीत का विषय ये भी हो सकता था कि किस तरह कई बार वे दीवारें भी स्मृतियों में जगह बनाये रहती है. जिनके सहारे चिपक कर एक बार चूमा गया हो. या पूछ ही बैठते कि क्या दीवारें तुम्हारी ओर धक्का देने का गुपचुप हुनर भी जानती हैं?

धूल हवा के पंखों पर सवार रहती और सूरज फूंक मार कर गोल-गोल धूल का खेल खेला करता था. अक्सर तनहा कमरे में दोपहर के वक़्त प्यार करने के ख़्वाब देखने में इतना समय जाया होता रहता था कि ख़ुद पर चिढ होने लगती थी. आले में रखी किताबें और रजिस्टर में महबूब की तारीफ में लिखी हुई चंद बेढब पंक्तियाँ सुस्ताती रहती थी. बड़े कमरों में रखी हुई चीज़ें अपने आकार से अधिक छोटी जान पड़ती थी. इससे प्यार की जगह और बढ़ जाती थी. आपस में बांटने के लिए ऐसी ही कितनी ही बातें बची हुई है.

इन दिनों बहुत बारिशें हो रही हैं. मैं आज वहाँ होना चाहता हूँ. दो बाँहों में न समाने जितने बड़े 'बुके' लिए हुए. जिनमें कुछ कार्ड्स रखें हों. उन पर लिखा हो कि प्रेम की हरीतिमा पहाड़ों को ढक सकती है, बाँध लेती है उड़ती रेत को, पानी के रंग को कर देती है, हरा. मेरे दो हाथों में कुछ नर्म गुदगुदे खिलौने भी हों जिनको संभालते हुए तुम्हें चूमना लगभग असंभव हो जाये.

* * *
गुज़ारिशों के बाद भी बारिश नहीं हुई. कितना अच्छा होता कि किसी ज़ीने पर हमारे पुराने दिन बैठे होते और हम मिलते पहली पहली बार फिर से...

September 8, 2011

क़ैदख़ाने में सुंदर पीठ वाली लड़की

मैदान में हरे रंग के पत्ते एक दूसरे की बाहें थामें हुए ऊँचे झांक रहे थे, यहीं कुछ महीने पहले धूल उड़ा करती थी. छत डालने के काम आने वाले सीमेंट के चद्दरों से दुपहिया वाहनों के लिए शेड बना हुआ है. यहाँ बैठा हुआ, सेटेलाईट डाटा रिसीविंग डिश के पार नीले आसमान में तैरते हुए बादलों के टुकड़ों को देखता हूँ. सप्ताह भर से लगातार बारिश हो रही है. अक्सर फाल्ट होने से पावर कट हो जाया करता है फिर स्टूडियोज़ के बंद कमरों में सीलन और ठहरी हुई हवा भारी होने लगती.

नाउम्मीद बैठे हुए अचानक तेज बारिश होने लगी. शेड के तीन तरफ पानी, फुहारें, एक लयबद्ध शोर, किनारे पर अटका एक भीगा हुआ पंख. दुनिया सिमट गयी है. यहीं बैठ कर इंतज़ार करो. सहसा आभास हुआ कि बारिश अपने साथ बहा ले जा रही है. मन की सतह का रंग बदल रहा है. अभी एक आवाज़ सुन रहा था. ताज़ा सीलन से भरी दोशीज़ा आवाज़. टूटती, बेदार और हिचकियों से भरी हुई... बारिश भी ऐसे ही गिरती है.

* * *
परसों रात
उस बंदीगृह के फर्श का बनना अभी बाकी था. सीमेंट मिली बजरी की रेतीली सूखी परत पर कई जगह बिछाने के लिए बारदाने या फ़िर फटी हुई कम्बलें रखी थी. उसकी पीठ मेरे हाथ के बहुत करीब थी. मैंने उसे छूकर देखा. अचानक सपनों में आने वाला समझदारी भरा सवाल सामने आया कि ऐसा कैसे हो सकता है कि इस बंदीगृह में स्त्रियाँ और पुरुष दोनों को एक साथ रखा गया है.

अगले पल मुझे अपने पड़ोस का एक लड़का दिखाई दिया. वह किस जुर्म में यहाँ बंद था. यह मालूम होने से पहले एक आदमी उस लड़की के बारे में बताने लगा. "हाँ वो लड़की जो अस्पताल में मर गयी थी." मुझे नहीं मालूम कि उस लड़की के मरने के पीछे की असली वजह क्या थी. मैंने कयास लगाया कि संभव है इस लड़की ने उसे ज़हर दे दिया होगा. इस सुडौल चिकने कंधों वाली लड़की का मुंह उसकी पीठ से मेल नहीं खाता था.

बंदीगृह के दरवाज़े और खिड़कियाँ किसी भी सूरत में कैदख़ाने की शक्ल नहीं बुन पा रहे थे. उस आधे खुल सकने लायक दरवाज़े से कोई बाहर निकल गया. मैंने खिड़की की ओर देखा. उसमें लगी लोहे की ग्रिल आम तौर पर बाज़ार निर्मित और भद्र घरों में लगने वाली सी थी. उसमें लगे शीशे के कुछ पल्ले खुले थे. मैं खड़ा हुआ सोच रहा था कि इसके बीच से निकल कर भागा जा सकता है. मुझे उन लोगों पर अफ़सोस हुआ जिन्होंने इतनी कमजोर जगह को चुना था.

बंदीगृह में. मैं अपने आपको अपराधी ठहराए जाने को मान नहीं पा रहा था. मुझे एक खास किस्म की जल्दी थी. मेरा कोई काम बाकी था जिसे किया जाना जरुरी था. मुझे लगता था कि इस बंदीगृह में मेरा वक़्त जाया हो रहा है. दृश्य बदल गया. अब मैं सड़क पर चल रहा था. वही पडौस का लड़का जो कैदख़ाने में बंद था सामने आता दिखाई दिया. मैंने उससे पूछा. "तुम कैसे आये ?" वह बोला. "आपको मालूम नहीं कि माँ के नाम पर वहाँ से छूट सकते हैं. मैंने यही किया."

लड़का चला जा रहा था. मैंने पाया कि शाम घिर आई है. सड़क की वह ट्यूबलाईट जल चुकी है जिसके नीचे भीलों के लड़के अक्सर रात बारह बजे तक खेला करते हैं.

* * *

कल रात
बहुत पुराना समय है. ऐसा कि जिसमें किताबों के पन्नों का रंग काफी काला हो चुका हो. कोई इंगलिश्तानी लेखिका है. जिसके जूड़े में गुंथे हुए बालों का आकार उसके पूरे उपरी भाग को ढक रहा है. कंधों तक फैला हुआ जूड़ा किसी मछली पकड़ने के जाल में कसा हुआ है. वह अपना सर झुकाए हुए है. दो पन्नों पर छपे हुए गध्य से मेरा कुछ वास्ता है जबकि इसी सिलसिले में मुझसे कोई बात करना चाह रहा है.

वह मुझसे कोई बात नहीं करती वरन उसकी मौजूदगी भी एक तस्वीर की ही शक्ल में हैं.

मैं समझने की कोशिश करता हूँ कि मैंने किया क्या है ? किस तरह मेरा वास्ता उसके लिखे से हो सकता है. मगर यहाँ भी अपराधी हूँ और इससे बाहर आने को बेचैन हूँ. यह बहुत मंद गति का सपना है. चलता ही नहीं. बस वही दो पन्ने और वही तस्वीर सामने आती रहती है.

* * *
जब उस शेड के नीचे बारिश को देख रहा था तब मैं तुम्हें फोन करना चाह रहा था कि अब घर के लिए निकल रहा हूँ. आज याद आया कि कैदख़ाने में जो लड़की थी. उसकी शक्ल एन (Anne Bronte) से मिलती थी. जो सिर्फ़ उन्नतीस साल की उम्र में दुनिया और हमारे लिए बहुत सी खूबसूरत कविताएं छोड़ गयी.

September 5, 2011

मरक़दों पे तो चिरागां है शब-ओ-रोज़

मैं एक अजनबी की तरह पार्क में दाखिल हुआ.
वहां कुछ जगहों पर दूब नहीं थी और खास तौर से जिस जगह पर कसरत करने के लिए दो 'बार' लगी थी वहां बिलकुल भी नहीं थी. उस नौजवान आदमी ने बार पर टिकी हुई हथेलियों पर अपने शरीर को सीधा उठाये हुए मेरी तरफ देखा. जबकि उसकी पीठ मेरी ओर थी. उस आदमी की उम्र कोई पच्चीस साल रही होंगी. इसके बाद मैंने एक नन्हे बच्चे को देखा जो ज़मीन और बार के बीच जाने किस चीज़ पर बैठा था. वह बच्चा चूँकि बैठा हुआ था इसलिए उसके कद और उम्र के बारे में कुछ कहना मुश्किल होगा किन्तु वह चार साल की उम्र से छोटा ही रहा होगा. उसके पास एक लड़की खड़ी थी. इन तीनों को एक साथ देखने से लगा कि वह निश्चित ही एक परिवार है. अर्थात पति, पत्नी और उनका बेटा.

सूखी हुई घास की तरफ बढ़ते समय मेरी चाल निरुद्देश्य सी दिखती होगी लेकिन जल्द ही उन सब के पास पहुँच गया. जैसे अभी अभी बिना मकसद के चल रहा था और अभी अभी लगता है कि किसी ख़ास काम के सिलसिले में इन्हीं से मिलने आया हूँ. वह लड़की निरंतर मेरी ओर देख रही है, ऐसा मुझे लगता है. इसलिए कि मैं निरंतर उस नौजवान को देख रहा हूँ. जो वर्जिश में लगा है.

"हाँ मुझे बताया." ऐसा कहते हुए उस नौजवान ने किसी का नाम नहीं लिया, ना ही किसी ओर देखा. मगर मुझे लगा कि वह पास खड़ी युवती के बारे में कह रहा था. जो अब बिना किसी संशय के उसकी पत्नी समझ आने लगी. इस बागीचे से मेरा घर साफ़ दीखता है. मैं यहाँ बहुत कम आता हूँ. उसने थोड़ी देर में कहा. "आपके लिए जरुर करेंगे." मैं उसको धन्यवाद तक नहीं कह पाया.

मैंने करवट ली होगी, शायद करवट... कि जगह बदल गयी.
अब एक उंची आलीशान बिल्डिंग के आगे की चौड़ी सड़क थी. बिल्डिंग ऐसी कि किसी महानगर के संभ्रांत रिहायशी इलाके में खड़े शोपिंग मॉल सरीखी. उसके आगे की चौड़ी सड़क के पार एक पतली गली में घरों की कतार है. उनके आगे से गुज़रते हुए एक दोमंजिला मकान को मुड कर देखता हूँ. मकान के पास खाली छूटी हुई ज़मीन है. इस पर एक घर बनाया जाना अभी बाकी है. मकान वाली पंक्ति के सामने के घर के आगे लगे पेड़ के पास वही नौजवान बैठा है और लड़की खड़ी है.

अगले पल लड़की उस दोमंजिला घर के अन्दर दिखाई देती है जबकि नौजवान जा चुका होता है. शायद फ़िर करवट ली.

खुले मैदान जैसी जगह है. जो व्यस्त शहर के उसी मॉल की ओर जाती है. भारी भरकम सामान ढ़ोने वाला एक विशालकाय वाहन अचानक मुझे अपने सर के ऊपर दिखाई देता है. इसमें स्टील के चद्दर है. जो किसी झाड़ू की तरह रगड़ खाते हुए पीछे आ रहे हैं. मैं उनके बीच ख़ुद को इस तरह पाता हूँ जैसे किसी विशाल स्तम्भों पर खड़ी छत के नीचे हूँ. मैं अपनी ओर बढ़ते आते चद्दरों से कट जाने से बचने के लिए आखिरी प्रयास करता हूँ.

मैं चूमने जितने फासले से बाहर आ जाता हूँ. अब रौशनी है. एक रुकी हुई साँस है. मैं अपने पांवों पर खड़ा हूँ. वहां एक सड़क बन रही है...

कल रात की नींद में सपनों के सिनेमाघर की ये तीसरी फ़िल्म थी. इससे पहले की दो फ़िल्में मैंने जानबूझ कर याद नहीं रखनी चाही कि वे खास उत्साह नहीं जगाती थी. इसमें ऐसा लगता था कि वो लड़की तुम हो !

September 3, 2011

आज की एक रात रुक जाओ...

ढोला तमीणे देस में म्हें दीठा तीन रतन, एक ढोलो दूजी मरवण तीजो कसूम्बल रंग !

ओ माणीगर रेवो अजूणी रात, पूछों रे मनडे़ री बात
माणीगर रेवो अजूणी रात
थांरे कारणिये ढो़ला जीमणियो जिमाऊं, जीमणिये रे मिस आवो रे बादिला
माणीगर रेवो अजूणी रात, पूछों रे मनडे़ री बात
थांरे कारणिये केलूडी़ रोपाओं, दांतणिये रे मिस आवो रे बादीला
माणीगर रेवो अजूणी रात, पूछों रे मनडे़ री बात...

ओ प्रिये तेरे देश में मैंने तीन रत्न देखे हैं, एक प्रिय दूसरी प्रियतमा और तीसरा कसूम्बल रंग

ओ सौदागर आज की एक रात रुक जाओ तो मन की बात पूछूं
आपके लिए एक भोज का आयोजन करूँ, भोजन के बहाने से आ जाओ ओ हठीले
ओ सौदागर आज की एक रात रुक जाओ...
आपके लिए केलू का पौधा लगवा दूँ, दातुन के बहाने से आ जाओ ओ हठीले
ओ सौदागर आज की एक रात रुक जाओ...

रेगिस्तान में रात जब लाल रंग में घिरने लगती है तो उसे कसूम्बल रंग कहते हैं. मैं ऐसे ही रंग की रातों को ओढ़ कर सो रहा हूँ. विरह की उदासी से घिरी बैठी किस प्रेयसी ने ऐसे लोक गीतों को जन्म दिया होगा कि ज़िन्दगी बस उसके साथ की एक रात का ख़्वाब बन कर रह गयी. गफूर और उसके साथियों के गाये इन लोकगीतों में सुकून है. जिस दिन तुम्हें भूल जाऊँगा उस दिन कहूँगा. गफूर अब तुम घर जाओ, इन गीतों को किसी और के लिए रख लो !

मैं दिल को लाख समझाता हूँ. उसको हज़ार ऐसे किस्से सुनाता हूँ कि तुमसे दिल टूट जाये. ये मेरी सुनता ही नहीं. आज की रात जितनी पी सकता हूँ उतनी शराब पीने के लिए तय है कि मैं बहुत थक गया हूँ.


August 26, 2011

कोई भुला भी न सके...

भीगी हुई आँखों से देखते हुए अपने पांवों को समेटने लगी. उसने ख़ुद को इस कदर सौंप रखा था कि सिमट जाना असंभव था. वह रंग थी और बिखर गयी थी. ख़यालों की नामुराद दुनिया आँखों के सामने उग आई. अब वह उन धुंए से लिपटी रहने वाली अँगुलियों को छू कर देख सकती थी. कितने ही बरस पहले जिन खुशबुओं को हवा अपने साथ उड़ा ले गयी. वे अचानक काले घने बालों से उतर कर लम्बे लाल रंग के सोफे पर बैठी थी.

एक शाम बुझते हुए साये दीवार पर छूट गए. सालों तक दीवार का वह हिस्सा उतना ही ताज़ा बना रहा. वह आते जाते अंगुली के नर्म नाजुक पोरों से दीवार की उसी जगह पर एक अदृश्य रेखा खींचती हुई चलती थी. उसी दीवार से छन कर बेग़म अख्तर की आवाज़ आती थी. न जाने उसका मुहब्बत में हश्र क्या होगा जो दिल में आग लगा ले मगर बुझा न सके...

कुछ नहीं हुआ साल गिरते गए और जे एल ऍन मार्ग पर मौसमों के साथ नए फूल खिलते गए.

सफ़ेद संगमरमर के लम्बे चौड़े फर्श पर प्रार्थनाओं के बचे हुए शब्द बिखर गए. उसके बालों में हाथ फेरते हुए लड़की ने कहा. इधर आओ मेरे पास, यहाँ मेरी धड़कनों के करीब. तुम यहाँ रहते हो. गिरहों से उठती खुशबू से परे लड़का बरसों पहले की किसी गंध की तलाश में झुकता गया. उसने ज़रा और झुक कर अपने महबूब के पांवों को चूम लिया.
लड़की ने पांव पीछे खींच लिए. लड़के ने ऊपर की ओर देखा, जहाँ आसमान बीच से ठीक दो अलग टुकड़ों में बंट जाता है.

बारिश गिरती ही गयी...

August 20, 2011

ऐ ज़िन्दगी गले लगा ले

सिंधी केम्प बस अड्डे की सुबह बादलों की ढाल से ढकी हुई हल्की उमस बुन रही थी. मैन गेट के आगे सायकल रिक्शे कतार में खड़े थे. उनके मालिक कम पानी वाले बूढ़े दरख्तों जैसे थे. जिन्होंने इस शहर को पाँव पसारते हुए देखा, जिन्होंने मजदूरी के लिए जयपुर की बूढ़ी गलियों से आशिकी कर रखी थी. उनके काले धूप जले चेहरों पर सफ़ेद तिनके उगे हुए थे. एक रिक्शे की तिरपाल से बनी छत पर प्लास्टिक के दो पुराने चप्पल रखे थे. उसमें सोये हुए आदमी को देखते हुए ख़याल आया कि वह बहुत निर्जीव किन्तु रिक्शे सा ही वाचाल हो सकता है.

इधर सड़क पर चलने को तैयार खड़े रिक्शे के पास चालीस पार उम्र के दो आदमी खड़े थे. दोनों में एक समानता थी कि उनकी हड्डियों पर मांस नहीं था. एक का चेहरा लम्बा और सीधा था. दूसरे का गोल और पीठ के साथ नीचे की और झुका हुआ. लम्बे वाले के चेहरे पर कुछ शिकायतें रखी थी. वे लहरों की तरह होठों के पास से उठती और कान की तलहटी तक जाकर समाप्त हो जाती. उसके होठों के ऊपर चिपकाई हुई नाक के ऊपर दो आँखें रखी थी. उन्होंने दुनिया की चकाचौंध से डर कर गहरे खड्डों में छुप जाने की आदत बना रखी थी. मैंने सोचा कि इस आदमी को अगर अपनी आँखें साफ़ करनी हों तो उनको अँगुलियों से खोज कर बाहर लाना पड़ता होगा.

जिस आदमी का चेहरा गोल था. उसकी शक्ल सूजी हुई थी. उसकी आँखें मेंढकों की तरह बाहर की ओर किन्तु लटकी हुई सी जान पड़ती थी. जैसे शामियाने में प्लास्टिक के गोलों में बुझे हुए बल्ब लगे होते हैं. उन आँखों के बारे में बहुत सोचने पर भी मेरे पास कोई उचित संभावना नहीं थी कि वे ऐसी क्यों हैं ? अपने आप को इस विचार से बहलाया कि वे आँखें दुनिया के और स्वयं के प्रति बेहद उदासीन है. जैसे किसी के पास जीने की कोई वजह ही न हो.

मुझे एकाएक लगा कि मैं यहाँ बैठ कर अपनी उस भेड़ की कहानी को लिख सकता हूँ जो नैतिकता के दार्शनिक ह्यूम से बातें करती थी. जिसने मनुष्यों के बहकावे में आकर अपनी चार में दो आँखें हमेशा के लिए खो दी थी और अब नीचे वाली दो आँखों के सहारे सर झुकाए हुए गोल घेरे की संरचना में जी रही थी. इस गोल चेहरे वाले ने भी भेड़ की तरह नीची नज़र से रिक्शा खींचते अपने अधिकतर साल सड़क की किताब पर लिख दिए होंगे. संभव है कि वे आँखें सड़कों की नैतिकता से आजिज़ आ गयी हों.

वहां तब तक तीसरा आदमी आया नहीं था. वे दोनों किसी नियमित रहस्य पर आपस में मितव्ययी संवाद कर रहे थे. चाय की थड़ी वाले कांच के ग्लास को धोते समय पतले चेहरे वाले ने कोई अत्यंत उदासीन बात कही. वह एक तिरस्कार भरा वाक्य भी हो सकता था. मैंने सिर्फ़ इतना ही पाया कि वे शब्द कसैले थूक का गोला थे. जिन्हें निहायत जल्दी में थूक दिया गया.

वे दोनों सड़क पर खड़े रिक्शे को छोड़ कर दूसरी पंक्ति में खड़े एक रिक्शे तक आये. प्लास्टिक के देसी के पव्वे से एक तिहाई ग्लास में डाला. थोड़ा सा पानी मिला कर पीते समय पतले चेहरे वाले के मुंह में फ़िर कुछ शब्द आ गए. उनको भी किसी खास तवज्जो के बिना सड़क की किताब पर लिख दिया. उन शब्दों कि निर्बाध उत्पत्ति का स्रोत चालीस साल का उसका इतिहास रहा होगा.

तीसरा आदमी मेरी और पीठ किये खड़ा था. उसका कद उन दोनों से कम था और सर के बाल श्याम से श्वेत होने की प्रक्रिया के अंतिम पायदान पार थे. वह निरंतर कुछ संकेत करता हुआ बोल रहा था. जब गोल चेहरे वाले ने ग्लास को मुंह से लगाया तो कोई लहर उसकी सूरत की झील में नहीं जगी. वह उसी तरह झुका रहा. उसने ग्लास को प्रेम की जगह एक लघुतम शुकराना अदा करने के अंदाज़ में देखा या हो सकता है कि वह सड़क को ही देख रहा था.

गोल चेहरे वाले की मौन कुंडली में कुछ और गिरहें पड़ गयी. उसका मुंह शायद बंजर हो चुका था. वहा तिरस्कार न था, कोई लगावट भी न थी और फसलें क्या शब्दों की खरपतवार के निशान भी नहीं थे. पतले चेहरे वाला अब सायकिल के डंडे पर बैठा था और उसकी कमर किसी कूबड़ वाले इंसान जैसी हो गयी थी. ये ज़िन्दगी की कैसी शक्ल है. इसका तर्जुमा कैसे किया जाय ?

तीसरे आदमी ने उस ग्लास का क्या किया. इस पर उन दोनों ने कोई ध्यान नहीं दिया. तीसरे आदमी का ज़िक्र करते हुए मुझे रोटी से खेलने वाले तीसरे आदमी की याद आई जिसके बारे में मेरे देश की सांसद मौन थी. सुबह साढ़े पांच बजे इस तरह बोतल से उगते हुए सूरज को देखना कैसा लगता है, इसे मैं वहीं रिक्शेवालों के बीच बैठ कर लिखना चाहता था. तभी जिस रिक्शे की छत पर चप्पलें रखी थी. उसमें आधा सोया आदमी पूरा जाग गया.

उसने एक गाली दी. वह किस गिरी हुई नैतिकता से आहत था, कहना मुश्किल था. मगर उसके अंदाज़ से वह एक बहुत निरपेक्ष गाली थी क्योंकि उसने बकते समय अपने आस पास किसी की ओर नहीं देखा था.

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.