January 4, 2011

बेहिजाब तन्हाई में

उदासियाँ अपने पहलू में सकेरता हूँ
और हथेलियों के आईने में उगती हैं तस्वीरें
फिर बेहिजाब तन्हाई में देखता हूँ कि
तेरे जूड़े में खिलती शाम से धुंधला गए हैं चमेली के फूल
और मैं छीजती शाम की आखिरी कोर पर बैठा हुआ
ओढ़ता हूँ तेरी सांसों के लिबास...

बच्चे जब स्कूल चले जाते हैं
या दफ्तर में अलसायी दोपहर पसरने लगती है
जाने ये कैसे ख़याल आते हैं ...बातें बेवजह हैं और बहुत सी हैं



* * *

सुबहें अब भी जरा देर से हुआ करती हैं. रात को सपने सताते रहते हैं. सपने में जंगल है. संकरे रास्ते हैं. मैं किसी अपघाती सा घूमता हूँ. कुछ टहनियों को हटाते ही खुला मैदान आ जाता है और दो एक पत्तियां सब कुछ अँधेरे से ढक देती है. मेरे साथ कोई है जिसकी शक्ल नहीं दिखती. सपने में दुस्साहस है मगर प्रेम नहीं है, सहवास नहीं है. बेचैनी में जागता हूँ और कोसता हूँ. उजाले में मकानों की पहचान गढ़ता हूँ. उलझे हुए धागों को भूलने के लिए म्यूजिक प्ले कर देना चाहता हूँ. सबकी की एक प्ले लिस्ट होती है मेरी भी है. इसमें शुजात हुसैन साहब की इस ठुमरी को कब से सुन रहा हूँ याद नहीं मगर ये चरवाहे सी है जो सुकून की भेड़ों को घेर लाती है.

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सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.