February 28, 2011

लौट कर मन की हवेली में जाना

कोई खुशबू उसको लाई होगी या फिर उसको कुछ याद आया होगा कि कल रात चार मेहराब की हवेली के आंगन में एक मुसाफिर तनहा घूम रहा था. ये रात भी कुछ काली थी और कुछ उसके चेहरे पर गहरी उदासी भी पसरी थी. किसके सीने से लगने को तड़पता होगा, किसकी याद के हिस्सों को चुनता होगा, किसके लिए यूं फिरता होगा, किस के लिए मुसाफिर बाद बरसों के उस आँगन में आया होगा ?

एक कांपते हुए पत्ते को छू कर बोला
हवेली जगा अपने ख़यालों की जन्नत, बुला जवां साजिंदों को,
हवा में घोल दे संदूकों में रखे पैरहन की खुशबू,
तलवार भोहों से कह दे गिराएँ बिजलियाँ,
रख दे उन रुखसारों पे लरज़िश कि मैं शराब पीते पीते थक गया हूँ.

आधी रात को उदास आवाज़, छोटी सिसकियाँ और लम्बी चुप्पी को सुनने के बाद, आपके पास अपना कुछ नहीं रह जाता. ऐसे में सोचता हूँ ज़िन्दगी की इस गाड़ी का रूट चार्ट बड़ा वायर्ड है. दो पल को धड़कनें सुनने को आदमी ज़िन्दगी भर नाउम्मीदी को हराने में लगा रहता है. ओ मुल्ला नसरुद्दीन के कमअक्ल गधे आँख खोल कि सामने कहवा का प्याला रखा है. जो शराब थी वो उतर गई, जो ख़याल था वो डूब गया...

February 24, 2011

हर शाम उसका यूं चले आना

अभी बाहर मौसम में सीलन है. कपड़े छू लें तो अचरज होता है कि किसने इतना पानी हवा में घोल दिया है. यहाँ बारिशें इस तरह आती थी जैसे खोया हुआ महबूब बरसों बाद सडक के उस पार दिख जाये. सात साल में एक बार यानि कुदरत का हाल भी कमबख्त दिल सा ही था और दिन तो बिस्तर पर रह गये टूटी हुई चूड़ी के टुकड़े से थे. दूर तक सूना आसमान या फिर काँटों से भरे सूखे पेड़ खड़े होते. जिन सालों में बारिशें नहीं थी तब दुःख भी ज्यादा दिन तक हरे नहीं रहते थे. सालों पहले की शामें अक्सर तन्हाई में दस्तक देती और मन के घिसे हुए ग्रामोफोन से निकली ध्वनियाँ अक्सर भ्रमित ही करती.

सोचने को चेहरे और बुनने को याद के कुछ धागे हैं. हाथ में लिए दिनों को फटकते हुए पाया कि शाम के इन लम्हों के सिवा पूरा दिन जाया हुआ. जब तक अपने भीतर लौटता हूँ, मेरा हमसाया दो पैग ले चुका होता है. अव्वल तो पहचानने से इंकार कर देता है और मंदिर के बाहर जूते रखने के खानों में करीने से रखे जूतों की तरह दुआ सलाम को रखता जाता है. पुरानी बची हुई शिनाख्त के सहारे मैं उसे कहता हूँ कि तुम को खुद नहीं पता कि तुम्हारे कितने चहरे हैं ? अभी जो मुस्कुराते हो, दम भर पहले यही सूरत उदास थी. ये किसके मुखोटे हैं ? वह नहीं सुनता. मैं उसे देखता रहता हूँ कि जब वह पी लेता है तो बड़ा सुंदर दिखता है. चुप होने लगता है. और ज्यादा चुप. एक ख़ामोशी मुखरित होती जान पड़ती है.

उसके पास कोई सलीका नहीं है. ज़िन्दगी की सब चीजें ओवरलेप हो गई हैं. वह जितने काम करना चाहता था, उसमें से उसे दो काम करने नहीं आये. एक तो प्यार और दूसरा कविता. ये लाजिम ही था क्यों कि कविता के लिए प्यार का होना जरुरी है. इन दो कामों के न होने से बचे हुए स्पेस को वह आला दर्जे की शराब से भरता जाता है. शराब पीने से एक अच्छा काम ये होता है कि दिमाग में घूम रही कहानियों से मुक्ति मिल जाती है. किसी के बेहद निकट होने की चाहना से उपजी हुई कहानियों से सिर्फ़ एकांत रचा जा सकता है. यह एकांत खुद के ही दो हिस्सों के बीच काल्पनिक सौन्दर्य व सहवास की इच्छाएं और उलझनें गढ़ता है. इसका हासिल है एक और पैग... और बेशर्मी से जवां होती रात.

पूरब की ओर खुलने वाली अलमारी में रखी विस्की कई शामों से उदास है. वह कल रात को जिन पी रहा था. मैंने पूछा कोई खास बात ? अपनी छोटी सी पहाड़ी लोगों जैसी आँखों को और ज्यादा मींचते हुए बोला "मुझे लगता है कि हम सबके भीतर एक रूह होती है." मैं उससे हर शाम कुछ खास किस्म की बातें करता हूँ. उनमें दो एक बातें कहानियों के बारे में होती है. रूह के बारे में कहे एक वाक्य के बाद वह चुप था लेकिन अचानक उसने कहा "मैं एक भेड़ हूँ, काले मुंह वाली भेड़. मुझे शराब की लत है और गोल घेरे की संरचना से नफ़रत है. इस बारे में नैतिकतावाद के प्रिय दार्शनिक ह्यूम से बात करना चाहती हूँ."

उसकी पनियल उदास आँखों में चमकती ख़ुशी के एक कतरे को देख कर मैं लौट आया. सीढियां उतरते समय जो टूटी फूटी आवाज़ मुझ तक आई उसका आशय था कि प्रेम करने के लिए उसके होठों को चूमने की जरुरत नहीं है. मुझसे कोई उत्तर न पाकर उसने जोर देते हुए कहा. क्या तुम भी मेरी तरह कासानोवा को नहीं जानते ?


February 19, 2011

कुछ ख़त जेब से गिर जाते हैं

तुम्हारी भाषा को संवारने की जरुरत है.

छोटी चेरी जैसे नाक वाली सुंदर लड़की, मैं तुम्हे सबसे प्रिय लगने वाले नाम से पुकारना चाहता हूँ. लेकिन बरसों से मेरी भाषा में ऐसे शब्दों ने स्थान बना लिया है जो सिर्फ देश, काल और घटनाओं के सूचक मात्र हैं. इनमें सिर्फ ठण्ड है. ऐसे में संवाद करते समय मेरे अवचेतन की भाषा मुझे उसी रास्ते हांक कर ले जाती है. सम्भव है कि गहरे प्रेम के शब्द खो गए हैं और मैं स्थूल प्रकृति वाले शब्दों से ही काम चलाता रहा हूँ. इसी तरह मेरी भाषा निर्जीव होती चली गई है. लड़कियाँ अपनी बाँहों से परे धकलते हुए गालियां देंगी, इसलिए उनसे छुप गया. दुकानदार मुझे शराबी न समझे इसलिए मैं ऑफिस के ड्राईवर से ही आर सी मंगाता रहा हूँ. ऐसे कई फोबियाओं से घिरे होने ने मुझे नए शब्दों से वंचित रखा है.

मुझ में अधैर्य भरा है. खुद को धूसर रंग की ठहरी हुई चीजों से घिरा हुआ पाता हूँ. प्रकृति की जिस सुंदर तस्वीर से तुम बात करना चाहती हो, जिस नीले आसमान की तुम महबूबा हो, दरियाओं के जो गीले किनारे तुम्हारे दिल के कोनों से टकराते हैं, पंछियों का कलरव या बारिश की धुन या फिर तुम्हारे बालों को छू कर गुजरे हुए हवा के झोंके जैसे अहसास के लिए सबकी ज़िन्दगी में स्पेस नहीं होता है. मैं उन दीवारों को देखते हुए आँख खोलता हूँ. जिन पर आसमान सा ही रंग पुता हुआ है. लेकिन वह रंग खिड़की से दिखते उस छोटे टुकड़े से मेल नहीं खाता, जो दूर चमकता रहता है.

बरसों से स्वनिर्मित यातना गृह के रोशनदानों से आते हुए रौशनी के छल्ले देखते हुए कभी चौंकता नहीं हूँ. बस उठता हूँ कि सूरज चढ़ आया है. मैं बाहर नहीं जाता हूँ. अपनी कहानियों के जरिये बाहर को अपने भीतर लाता हूँ. इस तरह नुकसान की भरपाई करने की कोशिशों में लगा रहता हूँ. मेरी कविताओं में सिर्फ उदासी है. वे उन स्मृतियों के टुकड़े हैं, जो मैंने कभी जीये ही नहीं. उन कविताओं की प्रोपर्टी को देखना कि मैं अपने भीतर कितनी कम और उदास चीजें जमा कर के बैठा हूँ. उनमें शाम, रेत, हवा, किसी लड़की का ख़याल, चांद और शराब के सिवा कुछ नहीं है. ये वास्तव में अंधरे की आरज़ू है. जो तुम्हारी बाँहों में होने के विचार का प्रतिबिम्ब है.

मैं अच्छे और महान लेखकों की तरह नहीं सोच पाता हूँ. मेरे मस्तिष्क में इनसे बेहतर सवाल नहीं आते हैं कि क्या तुम्हारी बाहें हरी और सुवासित है ? क्या उनकी छुअन से उपजे अहसास का संचरण कठोर आवरण में कैद बीज के अंदर तक जाता है ? क्या वे सदानीरा नदी की तरह गीली हैं और उनमें गुदगुदी मछलियों के स्पर्श सी तैरती है ? मुझे इन सवालों के उत्तर नहीं मालूम है. ये क्या जरुरी है कि जैसा हम सोचते हैं, वह कुछ होता होगा. सम्भव है कि यह सब एक घना निर्वात है. जिसका अंदर और बाहर अलग नहीं किया जा सकता. मैं इसी विचार में अपनी शाम को बुझा देता हूँ.

मैं लेखन को व्यवसाय अथवा प्रतिष्ठा के तौर पर नहीं अपनाना चाहता हूँ. मैं पढना भी नहीं चाहता हूँ कि सामन्यतया पुस्तकें मुझमें आकर्षण नहीं जगाती हैं. वे ब्योरों से भरी होती हैं. उनमें दहकते हुए बोसे नहीं होते बस उनका हल्का फुल्का विवरण हुआ करता है. वे पुस्तकें नाकारा हैं, इंसानों के बारे में कुछ नहीं बता पाती हैं. यहाँ तक कि पालतुओं की थूथन की नमी के बारे में लिखते समय स्नेहभरी आँखों और बांहों में आ जाने को खुजा रहे पंजों को भूल जाती है. तुम बहुत सुंदर लिखती हो इसलिए समझ सको कि मुझे अपनी भाषा को संवारने के लिए ऐसी पुस्तक की जरुरत है. जो तुम्हारे रोम-रोम के पुलकित और फिर निस्तेज हो जाने के बारे में लिखी हो.

February 17, 2011

पलकन की चिक डाल के साजन लेऊं बुलाय

एक ही बहाने को कई बार उलट पुलट कर देखा और समेट कर वैसे ही रख दिया. वो खुशबू जो भीगे मौसम का आभास देती थी, अभी तक मेरे कमरे में बसी हुई है. फरवरी में भी बारिशें गिर रही हैं. यकीन नहीं होता कि उसी रेगिस्तान में रह रहा हूँ जिसने आसमान को तकते हुए कई बरस सूखे गुज़ार दिये थे. बेवक्त आँखें उदास हो जाती है और पिछले पल सुनी गई आवाज़ की स्मृतियां बरसों पुरानी लगने लगती है. सुबह जागते ही रोजनामचा खुल जाता है.

लोककथा के रास्ते एक दिन हो जाऊंगा स्मृति शेष

मुझे ख़ुशी है कि किसी भी वजह से आता है तुम्हारा ख़याल
जिसके भी किसी से हैं प्रेमपूर्ण संबन्ध, उसके पास पर्याप्त वजहें हैं रोने के लिए.

आज कल घरों की छतों को चूमते हुए चलते हैं बादल
चमकती रहती हैं बिजलियाँ रात और दिन
गरजती पुकारती स्मृतियों के झोंके उतने ही वाजिब है, जितनी वे पुरानी है.

इस बेवक्त के भीगे सीले मौसम में भी
अभी आया नहीं है वह दौर जब हर कोई अपनी पसंद की लड़की के साथ हो सके
इसलिए मेरी छोटी सी आत्मकथा को नीम बेहोशी में पढना कि
तुम इसमें हर उस जगह हो जहां लिखा है उम्मीद
और मैं वहां हूँ जहां लिखा है स्मृति शेष.

एक अरसे से सोच रहा हूँ कुछ महीनों के लिए छोड़ दूं पार्टी का दफ्तर
फ़िलहाल पेशेवर क्रांतिकारियों की जरुरत नहीं है
इसलिए तुम्हारे तवील बोसों की स्मृतियों में रहना कोई गुनाह नहीं है.

* * *

कल रात से लिखने की सब तरकीबें फ़ैल हो गई हैं. हाँ, कुछ ड्राफ्ट में इजाफा जरुर हुआ है. सुबह से ज़फर हुसैन खां साहब और साथियों को सुन रहा हूँ.


February 10, 2011

बस यही माल मुसाफिर का है...

तुम्हारी अँगुलियों में ये खुशबू कैसी है ?

रात एक ख़ुशबाश ख़्वाब को बिना सिलवटों के समेटते हुए नीद आ गई थी. कॉफ़ी के खाली कासे को खुली खिड़की में रखने के बाद सुबह की आँख खुली तो सामने घूमेश्वर महादेव मुस्कुरा रहे थे. इस मुस्कराहट के ऊपर एक बड़ा पीपल खिला हुआ था जिसकी एक बाँह डिवाइडर के उस पार तक जाती थी. फूल वाला भी पीपल की छाँव का बराबर का हिस्सेदार था. सुबह की धूप में फूलों को पिरोता हुआ बिजली के ट्रांसफार्मर के नीचे रखी टोकरियाँ संभालता जाता. उसकी ज़िन्दगी का ख़याल पीठ में बैठे महादेव रखते हैं. हल्के हरे रंग के सेल्फ प्रिंटेड सलवार कुरते में आई अधेड़ महिला मंदिर में विराजमान महादेव के लिए घंटी बजाती है. मैंने सोचा अब वह झुक कर नंदी के कान में अपनी अर्जी रख देगी लेकिन उसने हाथ जोड़े और विनम्र भाव से मुड़ गई. उसके मोजों का रंग मेरी ट्राउज़र से मिलता था.

मौसम में नमी थी. पीपल के पत्तों के बीच से आते धूप के टुकड़े मेरी आँखों पर गिरते और मैं ख़यालों से लौट आता. घूमेश्वर महादेव के पार चौराहे पर आधुनिक शिल्प की प्रतिनिधि जोधपुरी लाल पत्थर की मूरत खड़ी है. दो लम्बी पत्तियां एक दूसरे से सर्पिल ढंग से लिपटी हुई है. उनके बीच के गोल हिस्से किसी जिनोम कोड से दिखते हैं. सम्भव है कि ये प्रेम का प्रतीक है या हो सकता है कि बरसों के बिछोह के बाद का आलिंगन या फिर शोधकर्ताओं को खुदाई में मिले आलिंगनबद्ध दो मनुष्य कंकालों की स्मृति. चाय वाला मेरी ओर अर्ध प्रश्नवाचक सा था किन्तु मैं अपने काले जूतों पर जम आई गर्द पर अटका हुआ था.

कांच के भद्र दरवाज़ों के पार सीढ़ियों के ऊपर गोल टेबलें रखी थी. रंगों के कोलाज वाला कुरता पहने हुए खुले बालों में लड़की बैठी थी. हैरत से भरी नम आँखों को संभालती हुई. ज़रा सा हाथ को आगे किया तो सामने बैठे लड़के ने थाम लिया. मैं अपनी नज़रें कहीं और रखता हूँ मगर वे लौट कर उसी ओर मुड़ जाती है. लड़की गालों को छू रहे बालों को दाहिने हाथ से कान के पीछे करती है लेकिन वे फिर से हर बार उसके गालों को चूमने लगते हैं. इस बार देखा तो पाया कि लड़का कुछ कह रहा है शायद उसने कहा मैं तुमसे बहुत प्रेम करता हूँ. लड़की अपनी अँगुलियों में खेलती हुई कुछ और अँगुलियों को देखती है. वह पोरों की नर्म नाजुक रेखाओं को डिकोड कर लेना चाहती है.

ब्लेक चोकलेट पेस्ट्री के बाद की कॉफ़ी पीते हुए पास से गुजरी किसी गाड़ी के शीशे से आई चमक टेबल पर क्षणभर बिखर कर चली गई. मुझे फूलवाले की अँगुलियों का ख़याल आया. शाम होने बाद उसकी प्रेयसी कभी खुशबू भरी उन अंगुलियों को चूमती होगी तो क्या सोचती होगी ? क्या फूल वाला उसके बदन को अपने हाथों में उन्हीं नाजुक फूलों की तरह सम्भालता होगा ? कांच का दरवाज़ा खुला और वे बाहर निकल रहे थे.

सड़क पर दुआ देती भिखारिन से लड़का हँसते हुए कहता है, दुआ करो कि हमारी जोड़ी बनी रहे. लड़की उसकी कोहनी को छूती हुई मुस्कुराती है. सोचता हूँ कि घर जाते ही लड़का शहर में भीड़ बहुत है कहता हुआ सोफे में धंस जायेगा, लड़की उड़ती हुई धूल को कोसती हुई अपनी आँखें पौंछेगी. ऐसी मुलाकातों के बाद ऊदी घटाओं का मौसम घेर लेता है. एकांत में आँखें मूँद किये गए बोसों की याद रुलाती रहती है. फूलवाले के पास से गुजरते हुए, मैं एक लम्बी सांस लेता हूँ. घूमेश्वर महादेव निर्विकार बैठे हैं. संजय को फोन करने के लिए सेल को कान के पास रखते ही चौंक जाता हूँ कि मेरी अँगुलियों में ये खुशबू कैसी है ?

अँगुलियों में बची हुई जो खुशबू है, बस यही माल मुसाफिर का है !

February 5, 2011

ऊपरी माले में टंगी झोली में अर्ज़ियाँ नहीं, कुछ अनगढ़ ख़्वाब रखे हैं

तुम कहां खोये रहते हो ?

मैं खिड़की के पल्ले को थामे हुए देखता हूँ कि नीली जींस और सफ़ेद शर्ट में खड़ा हुआ दुबला सा शख्स कहीं देखा हुआ है. कुनमुनी स्मृतियों की गंध में इसकी पहचान नहीं बनती मगर कुछ है जो अपनी ओर खींचता है. उसको आवाज़ देता हूँ तो लगता है कि खुद को बुला रहा हूँ. ऐसे बुलाना कितना मुश्किल है फिर भी बाहर झांकता हुआ कहता हूँ. तुम नीचे क्यों खड़े हो ? उपर आओ ना ! देखो कि ये किस याद का लम्हा हैं जो चुभता जाता है.

इस रास्ते कोई खुशबू नहीं आई. बस वक़्त था जो राख़ होकर बरसों से बाँहों पर जमता गया. लाल कत्थई रंग के चोकोर खानों वाला सोफे का मैटी कवर भी गर्द से भर गया है. दीवारों की सुनहरी रंगत और चिकने पत्थर की करीने से बनी सीढ़ियों पर चढ़ते हुए क्या वह फिर से बीच में बैठ कर सुस्ताने लगेगा, क्या उसे रेलवे अस्पताल के आगे खड़े इमली के पेड़ की हरी पत्तियां याद आयेगी, क्या वह घर बदल गए दोस्त के पुराने मकान के दरवाजे को आर्द्र उदासी के साथ देखने के दिनों को याद करेगा... मैं उसे कहां बैठने को कहूँगा ?

मेरे पास बैठेगा तो कहूँगा कि सुना है जन्नुतियों से ख़ुदा पूछता है, धरती पर सबसे अच्छा क्या था ? हालाँकि शराबियों को जन्नत नसीब नहीं होती पर उनकी अर्ज़ियाँ सुनी जाती है. हाजिरी के वक़्त देवदूत उसे देख कर मुस्कुरा रहे होते हैं और ख़ुदा की आँखों में शरारत भर आती है लेकिन मैं कहूँगा. मेरे मौला... एक आवाज़ थी जिसमें बहुत प्यार छुपा था.

वह
कुछ और नहीं पूछेगा सिर्फ मेरे शानों पर जमे जाया सालों की ओर देखेगा मगर मैं कहना चाहूँगा कि कोई जल्दी नहीं थी यहाँ आने की बस लगता था कि दिन रात टूट कर गिरते जाते थे. मौसम ने पुराने सालों की खुशबू को ड्रॉप कर दिया था और नए सौदे लिए आता था, आसमान पर पौछा मारने के बाद भी बीस की उम्र वाली वह रंगत नहीं देख पाता था यानि कुछ ख़त्म हुआ जाता था. ऐसे में खुद से कहा. होने दो, सहेजना, सकेरना नहीं है .. बस तैयार रहो, झाड़ लो जींस पर लगी धूल.

आह ! इस हैरत से देखो कि अब तो जान भी नहीं बची.

दो सूखे पत्ते नम मिट्टी में

एक रोज़ कोई कोंपल खिली जैसे नज़र फेरते ही किसी ने बटुआ पार कर लिया हो। एक रोज़ उससे मिला। फिर उससे ऐसे बिछड़ा जैसे खाली बटुए को किसी ने उदासी ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.