March 24, 2011

कितनी ही बातें, तेरी खुशबू की याद दिलाती है

आरोन तामाशी की कहानी के पन्ने आँखों के सामने खुले हुए हैं. तीन सौ मीटर दूर से थार महोत्सव की सांस्कृतिक संध्या से बिखरी हुई सी आवाज़ें आ रही हैं. मेरे पास में नुसरत साहब गा रहे हैं. दो सप्ताह के सूखे के बाद सामने एक आला दर्ज़े की शराब रखी हुई है. पीना अभी शुरू नहीं किया है. बस कहानी को पढ़ते हुए दो बार आँखें पोंछी और फ़िर तीन बार बरबस मुस्कुराया हूँ. इतालवियों द्वारा बंदी बनाये गए सैनिकों के केम्प से छूट कर आये सिपाही की इस अद्भुत कहानी को पढ़ते हुए जोधपुर के चिरमी बार की एक शाम सामने आ खड़ी हुई. उस रात पहली बीयर पी चुकने के बाद, मैंने उसे फोन किया और कहा कि हम कब मिलेंगे ? उसने पूछा किसलिए ? मेरे मुंह में रखा हुआ बीयर का स्वाद बेहद कसैला हो गया था. मैंने फ़िर से पूछा कि तुम मुझसे नहीं मिलना चाहती ? उसने इस सवाल का क्या उत्तर दिया था याद नहीं लेकिन वो हमारी आखिरी बातचीत थी।

फ्लेश बैक में कई साल गुजरने लगे. बस स्टेंड पर रिज़र्वेशन की लाइन में लगी हुई, सिनेमा हाल के बाहर मुझे छाया में खड़ा कर के टिकट लेने के लिए भीड़ को चीरती हुई, अपने दो हाथों में फ्रेंच फ्राइज़, टमाटो केच-अप के पाउच, दो आइसक्रीम और बहुत से पेपर नेपकिंस पकड़े हुए एक मुस्कुराती हुई लड़की घूमने लगी थी. ये भी याद आया कि सात साल में कोई एक लम्हा ऐसा न था जब मैं इसे भूल गया था या इसने हर तीसरी शाम मुझे फोन न किया हो. आरोन का नायक अपने घर लौट रहा था और इस ख़ुशी को एक ही पंक्ति में कोई विलक्षण कथाकार ही व्यक्त कर सकता है. जब मैं उसके पास जा रहा होता था तब की उस ख़ुशी को व्यक्त करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हुआ करते थे लेकिन महान कथाकारों के पास होते हैं. अच्छा फीचर लिखने के लिए मुझसे सिखाया गया था कि पाठक एंट्रो पढ़ कर ही उसका भविष्य तय कर देता है कि आगे पढ़ा जायेगा या नहीं. इस कहानी का आरम्भ इतना ही रॉकेट इंजन जैसी उर्जा लिए हुए है. उसकी हर एक पंक्ति मेरी गति को बढाती जाती है.

जैसे पेट्रोल इंजन को, उसी तरह उल्लास उसे धकेले लिए जा रहा था. बिना टोपी की चिथड़ा वर्दी और भारी फौजी बूट पहने. अत्तिल्ला के हूणों का ठेठ वंशधर. इतालवी बंदी शिविरों में तीन साल बिता कर वह वापस घर लौट रहा था. मोड़ पर पहुँचते ही अचानक ठिठक कर खड़ा हो गया. उसके सामने गाँव फैला पड़ा था. आँखों ही आँखों में जैसे समूचा दृश्य लुढ़क कर उसके दिमाग में समां गया, सिर्फ गिरजाघर की मीनार बाहर रह गयी थी. उसकी आँखों के कोनों में आंसू तिर आये. अपनी झोंपड़ी के पिछवाड़े पहुँच कर वह रुका. किसी तरह फेंस पर चढ़ कर आँगन में कूद गया, कूदते ही बोला "मेरी झोंपड़ी" और उसकी आवाज़ में हंसी की खनक थी.

कथा के नायक ने अपनी झोंपड़ी के बाहर के आँगन में बेतरतीब उग आई खरपतवार से आशंकित होते हुए आवाज़ लगाई, शारी... दोस्तों वहां उस नायक को उत्तर देने वाला कोई नहीं था. शारी भी उसी तरह जा चुकी थी जैसे पिछले सात सालों से साथ रह रही मेरी उस दोस्त ने मुझे पहचानने से इंकार कर दिया था. गोविन्द त्रिवेदी के साथ हरी लान वाले टूरिस्ट बार में बैठ कर बीयर पीते हुए मुझे दुनिया हसीं लग रही थी और एक फोन के बाद सब उजाड़ हो गया. मैंने अगली दो बीयर सिर्फ इसलिए पी कि मुझे नशा हो सके मगर नशा उस समय नहीं होता है जब आप टूट बिखर रहे होते हैं. जब आपको सुनने और थामने वाला कोई नहीं होता.

रात बारह बजे जोधपुर से रेगिस्तान की ओर जाने वाली ट्रेन शांत खड़ी थी. मैंने अपने सारे काम निरस्त कर दिए थे. पीठ पर बांधे जाने वाले काले रंग वाले छोटे बैग के साथ बेंच पर बैठा हुआ सिगरेट पी रहा था. रेलवे स्टेशन सुस्ताया हुआ जान पड़ता था. सारा कोहराम मेरे भीतर घुस आया था. शोर करते और एक दूसरे को ठेलते हुए विचार मेरे दिल और दिमाग में टकरा रहे थे. आँखों में आंसू थे और दिमाग कहता था कि तुम उसके दिल का बोझ थे और अच्छा हुआ कि उतर गए. इसे हर बार ख़ारिज किया और अपने सेल की तरफ देखता रहा कि वह अभी चमकने लगेगा.

ओ मेरे नसरुद्दीन, तुम्हें पता है ? आरोन की कथा का नायक अपनी प्रेयसी के जाने के बाद एक गधा खरीद कर लाता है और उससे प्रेम करता है. मैं इसे पढ़ते समय मुस्कुराता हूँ. चिरमी बार बुझ जाती है किन्तु उस महबूब की आँखें फ़िर भी मेरे पास चमकती रहती है.

March 20, 2011

देख कर उस हसीं पैकर को...

वे छोटे छोटे प्यार याद रखने लायक नहीं होते है. उनका आगमन अचानक हुआ करता है. जीवन में अनमनी सी हताशा, भारीपन और बोझिल होते हुए पलों में कभी प्यार करने के ख़याल मात्र से रोयें मुस्कुराने लगते हैं. रत्नजड़ित मुकुट की जगह मोरपंख जैसे छोटे और अनिवार्य प्यार की तुलना नदी के रंगीन पेबल्स से की जा सकती है. उनका आकर और रंग रूप हमें लुभाता है. उनमे एक और बड़ी खूबी होती है कि वे बहुत नए होते हैं, सर्वथा नए. चूँकि उस नन्हे प्यार की अधिक उम्र नहीं होती इसलिए छीजत अप्रत्याशित हुआ करती है फिर भी कुछ बचा रहा जाता है. उसको याद करते हुए हम अपनी भोहों को थोड़ा नीचे करते हुए और होठों के किनारों को अपनी ठुड्डी की ओर खींचते हुए सोचते हैं कि उसका नाम क्या था ?

इस तरह कितने ही प्यार खो जाते हैं. इस नुकसान पर आप भी खुश हो सकते हैं कि शरारत भरी आँखों से देखा, मुस्कुराये और भूल गए. इससे भी अधिक हुआ तो उसकी नर्म हथेली को कुछ एक्स्ट्रा सोफ्टनेस से और थोड़ी अधिक देर के लिए थामा. वक़्त ने साथ दिया तो ये भी कह दिया कि आप बहुत खूब हैं. इसे नासमझ लोगों का प्यार कहा जाता है कि इसकी अनुभूति क्षणभंगुर होने से बस थोड़ी सी अधिक होती है. ये संक्षिप्त प्रेम ओस की बूंदों की तरह असर दिखाते है. घड़ी भर को लगता है, जीवन कितना भीना और मनभावन है लेकिन पास ही धूप इंतजार में होती है कि आपका अपना मौसम लौटा लाये.

उन दिनों मेरी उम्र कोई अट्ठाईस साल थी. केन्द्रीय विद्यालय में रीजनल कल्चरल मीट थी और सांस्कृतिक प्रतियोगिता के निर्णायक के रूप में मुझे आमंत्रित किया था. साँझ ढले आरम्भ हुए इस कार्यक्रम की अध्यक्ष थी एयर फ़ोर्स के बेस कमांडर की वाइफ मिसेज नरुका. शायद मैंने उनका सरनेम ठीक से याद कर लिया है. आयोजन के समाप्त होने के बाद वे मुझे जिज्ञासा भरी निगाहों से अविराम देख रही थी. डिनर हाल में वे मेरे पास आई और अभिवादन किया. मेरे चेहरे की ओर देखते हुए कहने लगी. "मैंने आपको कहीं देखा है. मैं पिछले दो घंटे से आपको देखते हुए रीकग्नाईज करने की कोशिश कर रही हूँ." उस भद्र महिला ने सुरुचिपूर्ण वस्त्र धारण किये हुए थे और भाषा मृदुल थी. हमारी आरंभिक बातचीत का हासिल ये था कि हम दोनों ने एक दूसरे को पहली बार देखा था. उन्होंने मेरे पास बैठ कर डिनर लिया. इस दौरान भी वे बात करती रही. विद्यालय प्रबंधन जब हमें विदा कर रहा था तब उन्होंने बेहद आत्मीयता से कहा "मुझे लगा कि मैं आपको बहुत समय से जानती हूँ."

वहां से लौटते समय बहुत से ख़याल मंडराते रहे. जैसे कि उन्हें कोई दूर के रिश्ते का छोटा भाई याद आया होगा या कोई पांच सात जमात पीछे पढने वाला लड़का स्मृतियों में बचा रहा होगा. मैं खुश था. इसलिए कि जब आपकी उपस्थिति से किसी को अपना सा फील होता है, उस पल आप आनंद से भरने लगते हैं. मैं इसे एक कम अवधि का छोटा प्रेम समझता हूँ. ऐसे असंख्य किस्से मेरे ज़ेहन में हैं. वे किस्से एक अल्पकालीन अनुभव के प्रतिनिधि हैं किन्तु वे कभी अवधिपार यानि एक्सपायर नहीं होंगे. वे इतने निर्मल हैं कि मैं उनकी वासना भरी जुगाली नहीं कर सकता हूँ. इसी तरह के कुछ प्यार जब साल भर से अधिक लम्बे हो जाते हैं तो आप आशंकाओं से घिरने लगते हैं. कहीं मुझे इसकी आदत न हो जाये, कहीं ज़िन्दगी वे चित्र न उकेरने लगें जिनसे हम हमेशा डरते हैं.

मुझे नहीं मालूम कि आपने कितनों से कहा होगा कि मैं तुमसे प्रेम करता हूँ. मैंने ऐसा उस हर एक को कहा है, जिसने ज़िन्दगी के रूखे कवच पर अपने नाजुक अहसासों को रखा हुआ है. विज्ञान के रहस्यों का गंभीर अध्ययन करने वाले फ्रिजेश कारिंथी हास्यकार, दर्शनशास्त्री और मनोवैज्ञानिक थे. उनकी एक बड़ी क्लिष्ट कहानी है, एकतरफ़ा प्यार. इस कथा का मुख्य पात्र जिससे प्रेम करता है उससे विवाहित है. उसके साथ रहते हुए भी उससे दूर है. वह उसे प्रेम करना चाहता है किन्तु समझता है कि वासना की उपस्थिति ने उसे निम्न श्रेणी में धकेल दिया है. वह चाहता है कि अपनी पत्नी से कहे "मैं तुमसे बहुत प्रेम करता हूँ" लेकिन वह ऐसा कह नहीं पाता और अपने मित्र को बताता है कि वह उससे सच्चा प्यार उसकी मृत्यु के बाद ही कर पायेगा.

फ्रिजेश कारिंथी ने पहला विवाह एक अभिनेत्री एटेल जुडिक से किया था और उसका असामयिक निधन हो गया था. इसके पश्चात् उन्होंने मनोचिकित्सक अर्नका बोहम से विवाह किया. उनकी इस कहानी के अनुरूप ही उनका दाम्पत्य जीवन भी देखा जा सकता है. नायक के मन के छद्म अवतार का ये कहना कि वह अपनी पत्नी से सच्चा प्रेम उसकी मृत्यु के बाद कर ही कर पायेगा. यह विवशता वास्तव में खोयी हुई पत्नी से अगाध प्रेम की रूपक है. फ्रिजेश का प्रेम तमाम जटिलताओं के बाद भी एकाग्र है. वहां पत्नी होने या पति होने से कोई फर्क नहीं है.

March 17, 2011

कोस्तोलान्यी का लुटेरा

छोटे गरीब बच्चे की शिकायतें, इस कविता संग्रह या स्कायलार्क उपन्यास के कारण देजो कोस्तोलान्यी को जाना जाता है. मुझे ये दोनों शीर्षक पसंद है. बुझे हुए तमाम सालों की राख में बस इतना ही याद आया कि इसे कहीं किसी पन्ने पर पढ़ा होगा. घनीभूत होते हुए ख़यालों और बवंडर से उड़ते आते सवालों के बारीक टुकड़ों के बीच पिछला पखवाडा बीता है. हर काम को ठीक कर देने के तय समय पर कई और काम सिर पर आ पड़ते रहे हैं. विगत साल की गरमी बड़ी दिल फ़रेब थी कि मैं कई चिंताओं से आज़ाद रहा और शामें बेफिक्र आइस क्यूब को पिघलते हुए देखने में बीत गई थी. इधर पाता हूँ कि शाम हुए छत पर गए एक अरसा हो गया है. चारपाई पर बैठे हुए मैंने अपने पांवों को दीवार पर रखा और हंगेरियन कहानियां पढने लगा.

जो कहानी सबसे पहले पढ़ी उसका शीर्षक था, लुटेरा. मैंने इसे एक साँस में पढ़ा. शीर्षक पढ़ते समय मैं कहानी के भीतरी तत्वों के बारे में नहीं सोचता हूँ क्योंकि मैं खुद अपनी कहानियों के लिए एबस्ट्रेक्ट से उन्वान चुनता रहा हूँ. देजो की इस कहानी को ह्रदय परिवर्तन की कथा कह कर उसके मनोवैज्ञानिक तत्वों की हत्या नहीं करना चाहता हूँ. ये वास्तव में ह्रदय के अन्वेलिंग की कथा है. मैंने असंख्य कहानियों के बारे में लिखा हुआ पढ़ा है कि कथा के पात्र का ह्रदय परिवर्तित हो गया. ये एक नासमझी की बात है क्योंकि मेरे विचार से ह्रदय के कोमल और इंसानी कोनों पर पड़ा हुआ पर्दा हटा करता है.

कथा का नायक किसी आवेग से दूर रहते हुए घटते जा रहे के प्रति निरपेक्ष बना रहता है. यह सहज प्रवाह परिस्थितियों को सुगमता से गढ़ता है. मैं बहुत बार खुद को किसी काम या रिश्ते के बीच में जैसा हूँ वैसे छोड़ दिया करता हूँ. चीज़ों में हस्तक्षेप के लिए समय को चुनता हूँ कि वही तय करे मेरे लिए उचित क्या होगा और आगे रास्ता किधर जाता है ? ज़िन्दगी और कहानियों में कोई सामीप्य हो जरुरी नही है लेकिन दोनों ही अनुमानों से परे होने के कारण ही प्रिय हुआ करती है. देजो की इस कथा में एक गहरी सुरंग है. जिसमे वारदात को किया जाना है. ये स्थान एक संकेत है कि हर एक की ज़िन्दगी में हताशा भरा, अँधेरा समय आता है और उसी समय जीवन के बड़े हादसे घटित होते हैं.

लुटेरा पाठक के भीतर ही छिपा बैठा है. उसके पास पर्याप्त उपस्करण हैं और उचित कार्य योजना है. शिकार के लिए सावधानी से बुना हुआ जाल भी है. मुख्य पात्र एक रेल यात्रा के दौरान किसी कमजोर स्त्री को लूटना और उसकी हत्या कर देना चाहता है. जैसा कि हम प्रति दिन किया करते हैं. हमारा दिन एक लालच भरी आशा के साथ उगता है. उसमें हम उन सभी कामों को रेखांकित होते देखना चाहते हैं जो औरों के लिए किये जा रहे हैं. हम अपने दिन को प्लान भी करते हैं. एक परफेक्ट प्लान जिसमें सर्वाधिक फायदा हमारा अपना हो. इस तरह दुनिया भर के मासूम लुटेरे अपने ही हाथों शिकार होकर शाम ढले खुद के बिस्तर पर मृत पाए जाते हैं एक लालच भरी अगली सुबह के लिए... इस कहानी में ये सब नहीं लिखा है बल्कि ऐसा कहानी को पढ़ते हुए बुझती हुई शाम के सायों में महसूस किया है.

कथाएं मेरी संवेदनाओं को जीवन स्पर्श देती हैं. देजो कोस्तोलान्यी के बारे में सोचते हुए मुझे इस कठिन दौर के पत्रकार याद आने लगते हैं, जो अपनी रचनाशीलता को कार्पोरेट प्रबंधन के नीचे दम तोड़ देने के स्थान पर कहानी और कविता की तरफ मोड़ देते हैं. खैर इस कहानी पर लिखे इन शब्दों को मैं उन लुटेरों के नाम करता हूँ. जो बिना कारण कुछ नहीं करते या जिनके बेहतर ज़िन्दगी के फूलप्रूफ प्लान अभी पाइप लाइन में हैं. सच तो ये है कि हम लोग समर्पण किये हुए बंदी सिपाही की तरह जी रहे हैं. अपना खुद के हिस्से का समय लुटेरों को सौंप चुके हैं. लूट के विचार से प्रेरित इस दुनिया से मैं इत्तेफाक नहीं रखना चाहता हूँ. मेरी ख्वाहिश अपने लिए किसी शराबखाने की आवारा शाम बुनना है.

March 16, 2011

ज़िन्दगी मैंने गँवा दी यूँ ही...

जो बाहर था वह अब भीतर सिमट रहा है. रूपायित होने की क्रिया अपने आप में बड़ी कष्टकर होती है. मैं भी खुद को खो देना चाहता हूँ. अपने आप के बाहर से भीतर आने के इन प्रयासों में पाता हूँ कि मेरा बोझा उतर रहा है. जिसे मैं भटकना समझ रहा था वह वास्तव में रास्ता पा लेने की अकुलाहट है. यह प्रक्रिया सम सामायिक न होकर विभिन्न स्थितियों से प्रेरित हुआ करती है. किसी विशेष संवाद के बाद, इस अंदर बाहर के खेल में जब स्थूल के करीब होता हूँ तब अपनी सोच और समाज की दी हुई समझ को उसी मौलिक स्वरूप में बचाए रखने के प्रयास करता हूँ किन्तु सब निरर्थक जान पड़ते हैं.

खुशियाँ लौकिक हुआ करती हैं. उनके सारे कारण भौतिक स्वरूप में हमारे पास बिखरे से दिखते हैं. इससे बड़ी ख़ुशी वह होती है, जो भौतिक न होकर मानसिक हो. फिर इससे भी बड़ी ख़ुशी होती है, मन और मस्तिष्क का खाली हो जाना. अपने आप को नए सिरे से देखना. ऐसा करते हुए हमें लगता है कि रंगों पर जमी हुई गर्द छंट गई है. मैं इस साफ़ तस्वीर में देखता हूँ कि मेरी चिंताएं और मेरा अस्तित्व क्षणभंगुर है. मैं वास्तव में बेवजह विचारशील हूँ. मेरी तमाम बदसूरती बाहर से आई है जिसे मैं अपने भीतर की जान बैठा था. हर व्यक्ति का दुनिया को खूबसूरत देखने का ख़्वाब वस्तुतः दुनिया की बदसूरती से खुद पर आये असर से पीछा छुड़ाने का ख़्वाब है.

जिस संयोग से मेरा जन्म हुआ है. उसके किसी एक तत्व के विघटित होते ही वियोग का जन्म होगा. इस अनिवार्य रासायनिक क्रिया के बाद शेष शून्य में बदल जायेगा. बरसों तक जीये गए ऐसे विचारों के कारण मैं नास्तिक हूँ और किसी धर्म के परायण में यकीन नहीं रखता हूँ. इसलिए मैंने एक कविता में कहा भी था कि काश दिल से हिन्दू हुआ होता तो अगले जन्म की आस में ख़ुशी से मर सकता था. फिर इस संयोग के बने रहने तक किसी को चाहने या नफ़रत करने के अहसास को अपने पास रखता चाहता हूँ कि दूसरी कोई दुनिया नहीं है, दूसरा कोई जन्म नहीं है. प्यार करने का बस यही एक लम्हा है जिसे अगले कुछ पलों के बाद ज़िन्दगी के नाम से पुकारा जायेगा.

सिल्विया प्लेथ, मरीना, रिल्के, माय्कोवेसकी, पर्स्तेनक, देज़ो... जितनी सुंदर रचनाएँ ना लिखो. उनकी तरह अपनी ज़िन्दगी को न ढालो. कहवा घरों और चायखानों में शामें न बिताओ. प्रेस क्लबों की लम्बी तक़रीरों में हिस्सा न लो और भले ही अरब देशों से आती खुशबू पर अपनी नाक को विपरीत दिशा में मोड़ लो लेकिन मेरे प्यारे बच्चे किशोर याद रखो कि जब तुम किसी से प्रेम करते हो बस वही एक पल दुनिया का सबसे हसीन पल होता है. तुम सदा अपने किये पर खुश रहो कि ज़िन्दगी में हज़ार मुश्किलों, उदासियों और अज़ाबों के साथ जीते जाना ही इस फ़ानी दुनिया का आखिरी सच है और ये भी सच है कि सुखकारी प्रेम सदा अनिर्वचनीय होता है. तुम अपने परिजनों, मित्रों और सह जीवियों से बांधी गयी तमाम आशाओं को मिटा दो कि आशा रहित प्यार ही सच्चा प्यार होता है.

सब यहीं छूट जाने हैं और अफ़सोस कुछ भी नहीं कि ज़िन्दगी मैंने गँवा दी यूँ ही...

March 15, 2011

साया दीवार पे मेरा था, सदा किसकी थी ?

उस ऐसी डिब्बे में मेरे पास रात गुजार देने के अलावा एक ही काम था, बीते हुए दो सालों को याद करना. हम बस ऐसे ही मिले थे और घंटों बातें करते रहते थे. सुबहें अक्सर अख़बारों के बारे में बात करते हुए खिला करती थी, यदाकदा इसमें अपने बिछड़े हुए प्रियजनों की सीली स्मृतियों की बरसातें हुआ करती थी. मैंने लिखना बरसों पहले छोड़ दिया था. इसकी वजहें गैर मामूली थी जैसे मुझे उस समय के छपने वालों से सख्त नफ़रत थी. वे निहायत दोयम दर्ज़े के लेखक थे. उनका व्यक्तित्व चापलूसी, घटियापन, लफ्फाजी से बना हुआ था. ऐसे लोगों के साथ अपना नाम देखने से बेहतर था कि फुटपाथ पर उबले हुए अंडे बेचने वाले के ठेले के पीछे खाली छूट गई जगह पर रखी बेंच पर बैठ कर एक पव्वा पी लेना. न लिखने की एक और भी खास वजह थी कि दुनिया के हर कोने में बेहद सुंदर कहानियां मौजूद थी.

रेल कोच के भीगे से मौसम में रूखे और बेढब देहयष्टि वाले सह यात्रियों में किसी भी तरह का आकर्षण नहीं था. मेरी उत्सुकता और स्मृतियां ही निरंतर साथ देती रही. मैं कई सालों के बाद इस तरह अकेला सफ़र पर था. रेगिस्तान के एक छोटे क़स्बे में रेडियो पर बोलते हुए, कहानियां पढ़ते और शराब पीते हुए बच्चों को बाँहों में भरते और जया के साथ खट्टे मीठे पल बिताते हुए जीवन की बैल गाड़ी चल रही थी लेकिन मेरी ऊंट जैसी ऊँची गर्दन के ऊपर वाले खाने में कुछ कुलबुलाता रहता था. ये जब हद से अधिक बढ़ जाता तो मैं मनो चिकित्सक से परामर्श ले रहा होता कि मरने का भय कितना बड़ा फोबिया हैं ? डॉ रांका हंसते हुए कहते शाम को दो पैग लेकर सो जाया करो. मैं फिर उन्हें कहता कि मैं सीरियस हूँ तो वे कोई सेडेटिव लिखते. मैं उसे कई दिनों तक लेता और फिर मेरी चिंताएं छंट जाती.

रेल की खटर-खटर के संगीत से बाहर आने के बाद सुबह ग्यारह बजे आवाज़ सुनाई दी. इधर से लिफ्ट है. मैं तीसरे माले पर ही उतर गया. ऊपर से फिर आवाज़ आई. आप नीचे रह गए हैं लेकिन कोई बात नहीं सीढियों से आ जाईये. जिस सोफा पर मैं बैठा था उसके सामने महान चित्रकार की पेंटिग रखी थी. पेंटिंग पर एक आत्मीय संदेश लिखा था. जैसे किसी पिता ने अपने प्यारे बच्चे के लिए पेंट कर के उसे तोहफा दिया हो. पिछले चौदह घंटों से जिन यांत्रिक आवाज़ों में खोया हुआ था वे शांत हो गई थी. मेरी आँखें भीगने को थी. उस दोस्त को सामने बैठे देखना ऐसा था जैसे किसी पवित्र धर्मगुरु के एकांत में प्रवेश कर लिया हो और अब तक सुनी गई दुआओं की विनम्र स्मृतियों के फाहे आस पास बिखर रहे हों.

धूप निकल आई थी. रसोई में गेहूं के सिकने की खुशबू थी. खिड़कियों के पार फैला हुआ शहर कुछ दूर जान पड़ता था. नीचे गली में बकरियों के झुण्ड के साथ गुजरती हुई लड़कियाँ लोक सुर में गाते हुए फाल्गुन की गंध को गाढ़ा कर रही थी. इस मौसम में अपनी बेढब बातें, शिकवे और अर्ज़ियाँ याद आने लगी. वे सब बेहिसाब थी. उनके सैलाब से बचना भी मुमकिन न था और उसका सामना भी आसान न था. सीढ़ियां पीछे रह गई थी. मेरे सन-ग्लासेज के पार दिखते हुए दृश्यों में बेसबब छू गए उसके कंधों के साथ सब पीछे छूटता जाता. ओटो वाले तक पहुँचने की याद के सिवा कोई याद न थी. मैं ठहर जाना चाहता था. मैंने खुद को इतना भारी कभी महसूस न किया. मुझको किसी नशे ने इस तरह नहीं घेरा था कि आँख खुली थी और कुछ सूझता न था.

मेरे पास हंगारी कहानियों का संग्रह था, उड़न-छू गाँव.

March 7, 2011

आपके कोट में अब भी एक पेन्सिल रखी है

उन दिनों हम
कॉपी, किताबों में बेढब तस्वीरें बनाते,
पिताजी स्कूल से मुस्कुराते हुए लौटते
और दादी निराकार दुआएं पढ़ा करती.

माँ घर को करीने से बसाते हुए
दम ताज़ा दिनों को
सुबह शाम उम्र की बरनी में रखती जाती थी.

कई सालों बाद

एक दिन माँ के हाथ से आग छूट गई
कि उम्र की बरनी में रखने के लिए
पिताजी के हिस्से का दिन कहीं नहीं मिला.
* * *

चार एक दिन पहले माँ ने आपके एक कमीज को फिर से तह किया है. और आपके कोट में जाने किसने रखी मगर अब भी एक पेन्सिल रखी है.

बच्चे खुश है. वे दादाजी को हमेशा याद करते हैं. याद तो कौन नहीं करता कि गली में दूर तक जाकर नज़र ठहर जाती है. कि आप आते होंगे. मगर आप नहीं आते. आँखों में एक हलकी नमी उतर आती है. इस सब के बावजूद ज़िन्दगी बहुत खूबसूरत है. चीयर्स, लव यू.

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March 2, 2011

तेरी याद का एक लम्हा होता हैं ना, बस वह...

रात नसरुद्दीन अपने गधे को पुकारता रहा लेकिन गधा भड़भूंजे की भट्टी से बाहर फैंकी गई राख में लोटता रहा. नसरुद्दीन उससे नाराज़ हो गया. सुबह गधे ने उदास सी रेंक लगा कर कहना शुरू किया.

रात, मैंने एक कहानी पढ़ी है. उसका शीर्षक है धूप के आईने में और इसका अर्थ लगाया है कि खिले हुए दिन में जो साफ़ दिखाई देता है. इस कहानी में कहा है कि महबूब का घर दिल में होता है तो फिर इंसान क्या खोजता फिरता है ? कहानी में एक मोची है, वह दुनिया के आम आदमी का प्रतिनिधि. मुझे लगता है कि वह मैं हूँ. ऑफिस जाता हुआ, माँ को अस्पताल ले जाता, बच्चों को हौसला देता. पत्नी के सुखी और संपन्न परिवार के सपने को पूरा करता हुआ. उस सपने को अपने विश्वास से सींचता हुआ. हाँ मैं वही मोची हूँ जो सफ़र के लिए सुरक्षित पांवों की चाह वाले लोगों की मदद करता है.

जो अपने जूते और मजबूत करवा लेना चाहती है वह मेरी आत्मा है. उसके बारे में मुझे कुछ खास मालूम नहीं है कि ये हमेशा बेचैन रहती है. इसकी फितरत ऐसी है कि हमेशा धोखे खाता रहता हूँ. मेरी आत्मा मुहब्बतों के छलावे में दर्द और फ़िराक की सौदागर है. मैं अपने दुनियावी परिवार की हिफाज़त में लगा होता हूँ तब ये नए हादसे लेकर आती है. ऐसे सौदे पटाती है कि मुझे खुद हैरानी होती है. मन के मुसाफिर खाने के प्रियजन मुझे इसरार और इक़रार के बारे में याद दिलाने में जुट जाते हैं. ये वही है जिन्होंने कभी वादा किया होता है कि मेरी चाहत सिर्फ़ तुम हो इसके सिवा कोई चाहना नहीं है.

कहानी में एक लड़का था, जिसको पीले फूलों के खिले होने का गुमान होता है. वे पीले फूल वसंत के मादक नशे के कारण उसे दिखाई देते हैं. वह थक कर इसलिए बैठ जाता है कि आपको सिर्फ़ वे लोग ही नहीं समझते जो आपके सबसे अधिक करीब होते हैं. वह आसेबज़दा है यानि प्रेतों से घिरा हुआ. वे प्रेत वस्तुतः उसके घर में रहने वाली असंख्य इच्छाओं के है. एक प्रेत ऐसा है जो कहता है कि आज़ादी की हत्या करके ही एक विश्वसनीय घर की पहचान होती है. इन प्रेतों का ये भी कहना है कि घरों में उदास या खुश रहना हालाँकि मना नहीं है परन्तु एक आवश्यक शर्त है कि ख़ुशी या उदासी के सबब परिवार से बाहर नहीं होने चाहिए.

कहानी में रंगीन लिबास की एक लड़की है, ये सृष्टि है. उसे चूमती और संवारती है. उसे नया रचने के लिए प्रेरित करती है. उसे कहती है, वसंत का आना सकारण है. तुम्हारे भीतर सूखते जा रहे पत्तों को झड़ जाने दो. अपनी खुद की तलाश में निकलो. ऐसा करने से तुम बचे रहोगे. सृष्टि उसे कहती है कि मेरी ये अभिलाषा इसलिए है कि तुम मेरे लिए उतने ही जरुरी हो जितना कि मेरा होना. लड़का उसके रंगीन लिबास में छुप जाता है यानि वह सृष्टि को अपने पास महसूस करता है. मन के पराग कणों के संचरण से उपजी इस दिव्य अनुभूति से सुकून उमगता है.

गधे ने मजबूर आँखों से नसरुद्दीन को देखा और एक लम्बी सांस लेते हुए कहा. मैं बहुत मामूली हूँ. मुझे भी उतनी ही तकलीफें, व्यस्तताएं और जिम्मेदारियां मिली हुई हैं जैसी तुम्हारे पास हैं. मेरे पास अविश्वसनीय शक्तियां नहीं हैं. मैं अदृश्य होने का हुनर नहीं जानता हूँ. मेरे पास मायावी जिस्म भी नहीं है कि अपनी धुंए जैसी पूंछ की एक फटकार से ऐसे लोक की रचना कर दूं जहां सब सुख बरसते हों. किसी काल्पनिक जीवन में भरोसा भी नहीं है, जो जी रहा हूँ वही सच है कि मुझे कई जोड़ी आँखें सवाल करती हैं. वे आँखें मेरी चुप्पी पर उदास हो जाती हैं. मेरे हंसने पर मुस्कुराती है. उन आँखों में भी मेरा इंतज़ार है इसलिए मैं सदा अपने को परदे या एकांत में नहीं रख सकता हूँ.

नसरुद्दीन ने गधे को कहा मुझे कहानियों से कोई मतलब नहीं है. मुझे जब तुम्हारी जरुरत होती है तब तुमको होना चाहिए. ऐसा कहते हुए वह गधे के लम्बे राख भरे कानों को सहलाने लगा. उसकी धूल सनी गरदन को बाँहों में भर लिया और बहते हुए नाक से थोड़ा आगे जबड़े के पास चूमने लगा.

छीजने की आहट

मन एक तमाशा है  जो अपने प्रिय जादूगर का इंतज़ार करता है। शाम से बालकनी में बैठे हुए सुनाई पड़ता है। तुम कितने कोमल हो सकते हो? खुद से पूछने पर...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.