May 25, 2011

आग के पायदानों पर बैठी स्वर्ण भस्म

तुम उसके दुःख को नहीं समझ सकते. मुस्कान और निर्लिप्तता के तालों में कैद उसकी गहन चुप्पी तक नहीं पहुँच सकते. वह सदाबहार खिले फूलों का तिलिस्म है. आग के पायदानों पर बैठी स्वर्ण भस्म है, वह असंभव और अनंत है. उसे समझने की कोशिशें व्यर्थ हैं. वह अपनी आँखों से तुम्हारे रोम रोम से संवाद करना जानती है. जब भी उससे मिलने जाओ दिल का खाली कटोरा लेकर जाना और चुप से उसके पास धर के बैठ जाना. जब वह उठ कर जाने लगे तब तुम कटोरे को समेट कर देह की झोली में रखना और लौट आना. इसे एक बार फिर दोहराना कि स्त्री असीम और अतुलनीय है.

वह सात समंदर पार से, चीड़ के पेड़ों से भरे पहाड़ से, गंगा के पानी में पांव डाले हुए, नवाबों के शहर में शाम को ओढ़े हुए या महानगरों की उमस भरी छत पर बैठे हुए अपने एक आंसू से प्याला भर देगी और कभी दुखों के विस्तार को समेट कर अपनी हथेली में छुपा लेगी. तुम दस बीस चेहरे लगाने का हुनर जानते हो और उसे उन सभी चेहरों को सब्र के संदूक में करीने से रखने का फ़न आता है. स्त्री के बारे में अगर और ज्यादा जानोगे तो तुम उससे डरने लगोगे. इसलिए वह तुम्हें जानने नहीं देना चाहती, इसीलिए तुम उसकी गहन चुप्पी तक कभी नहीं पहुँच सकते.

मेरे दिल के कटोरे में रखी ये बातें अद्भुत स्त्रियों की ही दी हुई है. ऐसे ही एक शाम हंगरी के मोपासा और अपने समय में विश्व के सबसे प्रसिद्द फ़िल्म संवाद लेखक लायोश बीरो की कहानी पढ़ी. इसका शीर्षक है "वियना का हीरा". कहानी एक भूतपूर्व दरबारी अर्दली मि. शोल्ज, उनकी पत्नी लिजी और उनके तीन बेटों की है. पिछले बाईस सालों से मि. शोल्ज रात को शराब पीकर घर आते हैं. उनसे पहले उनके तीन बेटे संगीत की कक्षा से रिहर्सल कर एक साथ घर में प्रवेश करते हैं. तीनों बेटे माँ को घूरती हुई नज़रों से देखते हैं और उदासीन मुंह बना कर खाना खाकर बिना कुछ बोले अपने कमरे में चले जाते हैं.

उनके बाद उनका पिता आते ही खाना खाने के बाद हर रात अपनी पत्नी को पीटने की तैयारी करता है क्योंकि नरक की आग में जलने से पहले इस धरती पर विधाता ने उसे सजा देने का काम सौंप रखा है. एक अपराध की सजा, कानूनी पति को धोखा देने की सजा. डायनिंग टेबल से उठते ही हर रात वह अपनी पत्नी को घुटनों के बल बैठ जाने हुक्म देता है. स्त्री भयभीत कांपती हुई बैठ जाती है और वह अपनी चमड़े की बेल्ट से उसे थक जाने तक पीटता जाता है. वह आंसू भरे नेत्रों को पौंछे बिना उठती है और अपने स्कर्ट की सलवटें ठीक करने लगती है.

एक रात इस घटनाक्रम के आरम्भ होने के समय उसके बेटे बेहद विचलित होते हैं. वे मानते हैं कि पति को धोखा देना अक्षम्य अपराध है इसलिए वह सजा की हक़दार है लेकिन बाईस साल की अवधि प्रायश्चित्त के लिए किये जा रहे इस अत्याचार के लिए कुछ अधिक है. इसी बेचैनी में एक बेटा दरवाजे की ओट से अपने माता पिता के संवाद को सुनता है.
घुटनों के बल बैठ जाओ.
क्या तुम मानती हो कि तुमने विश्वासघात किया है ?
हाँ.. थरथराती हुई औरत जवाब देती है
तुम्हारे कितने प्रेमी थे ?
एक, मैं कसम खाती हूँ.
वह कौन था ?

उस औरत ने हल्के से जवाब दिया लेकिन दरवाज़े के पीछे खड़े हुए बेटे का मुंह पीला हो गया. उसने अपने भाईयों को वह नाम बताया. वे तीनों दौड़ते हए बाहर आये और अपने पिता को पकड़ लिया. उन्होंने पिता के तमाम प्रतिरोध के बावजूद उनको एक कमरे में ले जाकर बंद कर दिया. शराबी दरवाजा पीटता हुआ सो गया. बेटे अपनी माँ के पास आये और उनसे बैठ जाने का अनुरोध किया. उन्होंने पूछा. माँ वह कौन था ? औरत की थकी पलकें उसकी भीगी पलकों पर छा गई. वह फुसफुसाई, बीथोवन... बेटों ने चौंक कर एक दुसरे को देखा. कौनसा बीथोवन ? औरत ने भीगी पलकें ऊपर की और कहा. वह एक ही था, 'लुडविग फ़ान बीथोवन'. इसके बाद औरत ने उनकी तरफ देखा फिर दूर कहीं देखती रही और धीरे-धीरे उसकी आँखों में कोमल प्रकाश आ गया. कातर, स्वप्निल स्वर में बोलने लगी और तीनों संगीतकार साँस रोके, लालायित, श्रद्धावनत, गहरे भावावेश में सुनने लगे.

शास्त्रीयता और प्रेम का सेतु बीथोवन जब दिल में समा जाता है तब स्त्री असीम हो जाती है. मुझे और कुछ कहने की जरुरत है ?


May 20, 2011

औरत की जगह

बाढ़ के पानी पर बर्फ जम आई थी अब वहां दूर तक स्केट किया जा सकता था. एक दुपहरी में दस लड़कियाँ कन्धों पर स्केट लटकाए, गौरैयों की तरह चहकती हुई झुण्ड में पहुँच गयी. लड़कों को ये बर्दाश्त ही नहीं हुआ कि वहां लड़कियाँ भी स्केट करे. उन्होंने चीखते हुए उन पर हमला बोल दिया. रीयल जिम्नेजियम स्कूल के एक मोटे लड़के ने सबसे आगे खड़ी लड़की के पास पहुँचते ही अपनी बांह एक झटके से हवा में घुमाई और अपनी नाक छू ली. वह छोटी लड़की डर के भाग गयी. उसके पीछे डर कर चीखती भागती लड़कियों को देख कर लड़के ठहाके लगने लगे.

एक लड़की गिर पड़ी. लड़कों ने कहा अगर ऐसा ही होने लगा तब तो औरतें फ़ौजी बैरकों में भी आने लगेंगी, बल्कि लड़ाई के मैदान में लड़ने भी पहुँच जाएगी. औरतों की जगह घर है या फ़िर चर्च... यानोश कांदोलान्यी की कहानी रक्त अनुबंध के इसी भाग पर मैं रुक जाता हूँ. इसलिए कि ईश्वर के रखवाले दुनिया की जिस जगह भी हैं, उन्होंने औरतों के लिए जगहें निर्धारित कर रखी है. मेरे मित्र जब तुम एक सामूहिक ईश्वर के पक्ष में खड़े होते हो तब दुनिया की आधी और जरुरी आबादी के विरोध में खड़े होते हो.

कुछ माह पहले एक पुस्तक का उल्लेख करते हुए मेरी एक मित्र ने सुन्दर लेख लिखा था. उसकी अंतर्निहित भावना थी समानता और बाहरी तौर पर उठाया गया विषय था, आवारागर्दी. इस सतही प्रश्न की गहराई में गंभीर प्रश्न छुपा है. ये किसने तय किया है कि औरतों के काम क्या है और आदमी की असीम आज़ादी का छोर किस जगह पर है ? किस वजह से सभी लड़के इस लैंगिक भेद पर एकजुट क्यों है कि लड़कियाँ बेहतर जगहों पर स्केट नहीं कर सकती, क्यों उनके लिए चूल्हा और बाईबिल को सुनना ही श्रेयस्कर है. जब तुम इसी तरह बोलते या सोचते हो तब कभी ख़याल आया कि सामूहिक ईश्वर किस साज़िश का नाम है.

खैर ये कहानी दो सहपाठियों की है. एक सूखी भिन्डी है और दूसरा मोटा आलू. वे दोनों एक दिन अपनी अँगुलियों पर पिन चुभोते हैं. वे अपनी अंगुलियाँ आपस में मिलाते हैं और उन दोनों का रक्त अनुबंध हो जाता है. यह एक अटूट बंधन का विश्वास है. इसी विश्वास के सहारे बर्फ पर गिरी हुई कस्बे की सबसे सुन्दर लड़की ज़ोन चुपोर को धमका रहे मोटे लड़के को सूखी भिन्डी एक घूँसा जड़ कर गिरा देता है और लड़कों से बगावत कर उस गुलाबी गालों, नीली आँखों और सुनहरे बालों वाली ग्यारह साल की लड़की को अपने साथ भगाता हुआ ले जाता है.

उस दुबले लड़के की धड़कने हर वक़्त ज़ोन चुपोर के लिए कविताएं लिखने लगती है. वह अपने दोस्त को बताता है कि ज़ोन कितनी सुन्दर है और उस दिन के साहस प्रदर्शन के लिए बहुत चाहती है. दोस्त, मैंने उस लड़के को सिर्फ़ इसलिए मार गिराया कि मुझे विश्वास था कि तुम मेरे साथ हो. मैचस्टिक नाम से जाना जाने वाला मास्टर एक दिन उसकी मेज़ के आले की तलाशी लेने का काम उसी दोस्त को सौंपता है जिसके साथ उसका रक्त अनुबंध है. सूखी भिन्डी नामकरण वाला कवि ह्रदय नन्हा प्रेमी जिसका वास्तविक नाम कोलर था, खुश हुआ लेकिन उसके दोस्त ने मेज़ के आले से कविता का पुर्जा खोज कर मास्टर को सौंप दिया.

उस माचिस की तीली जैसे मास्टर ने कविता का पाठ कराया फ़िर कविता के पुर्जे को उसकी हथेली में रख कर पतले फुट्टे से तब तक मारा जब तक कि वह कागज पूरी तरह से फट न गया. मोटे आलू ने ऐसा धोखा क्यों किया ? मेरे पास इसका निश्चित उत्तर नहीं है. संभव है मोटे आलू को लगा हो कि सूखी भिन्डी की प्रेमिका उस मित्रता से उपजे साहस की देन है और उसका असली हकदार मोटा आलू यानि वह खुद ही है.

कहानी के अंत में यानोश कांदोलान्यी ने सूखी भिन्डी के बारे में सिर्फ़ इतना लिखा है कि उसकी आँखों के आगे गहरा काला पर्दा पड़ गया और उसे कहीं कोई नज़र नहीं आया, कोई नहीं. कहानी का आरम्भ इस पंक्ति से होता है. "जीवन की सबसे मूल्यवान वस्तु है मित्रता".

May 18, 2011

तेरी ही तरह सोचता हूँ कि गुमख़याल हूँ.


तेरे होठों के पास की लकीरों में रंग भरता हुआ
मोम कंधों से फिसलता पीठ के कटाव में खो जाता हूँ
फ़िर साँस लेते ही टूट जाता है इच्छाओं के फ़रेब का जादू.

दिन भर सुकून के पानी में प्यास की आग फूंकती
रात भर इश्क़ से भीगे रेशमी फाहे निचोड़ती है तेरी याद...
और ये मौसम बदलता ही नहीं.

तुम दुर्लभ हो, फिनिक्स के आंसुओं की तरह
और मैं अजीर्ण हवस से भरा अशुभ छाया प्रेत.

* * *
जयपुर के चौड़ा रास्ता पर एक दुकान के आखिरी कोने में ऊपर की तरफ रखा हुआ एल्बम दूर से दिख गया था. 'कहना उसे' अब भी कभी-कभी ख़्वाबों में दिखाई देता है. कितने मौसम बीतते गये. शाखों पर नई कोंपलें फूटती रही, फूल खिलते रहे, मगर वो न समझा है न समझेगा. अपने सुनने के लिए उसी एल्बम की ये ग़ज़ल यहाँ टांग रहा हूँ.
फ़रहत शहज़ाद और मेहदी हसन : तन्हा तन्हा मत सोचा कर...

May 16, 2011

वह एक भयंकर ईश्वर था.

पांच हज़ार साल ईश्वर की उपासना करने के बावजूद ज्ञात देवों ने मनुष्य जाति पर कोई महान उपकार नहीं किया है. सब एक ही बात पर पर अटके हुए हैं कि ईश्वर ने मनुष्य की रचना की है इसलिए उसका आभारी होना चाहिए. उनके पास अभी तक इस बात का जवाब नहीं है कि उस महान रचयिता ने क्रूर हत्यारे और वहशी आदमखोर क्यों रचे हैं ? इसके जवाब में भी एक कुतर्क आता है कि अच्छाई के लिए बुराई को रचना जरुरी है. तो क्या ईश्वर कोई बुकी है जिसने अपने आनंद के लिए मनमर्जी के खेल को फिक्स किया है.

कई दिन पहले एक कहानी पढ़ी थी, "पाल वायला'स लाइफ". देसो सोमोरी की इस कथा का मुख्य पात्र पेशे से चित्रकार है. वह कलाकारों के अक्सर गायब हो जाने वाले आनुवांशिक गुण से भरा हुआ है. वह सही मायनों में मस्तमौला है. एक बार लौट कर आया तो दाहिने हाथ की दो अंगुलियाँ नहीं थी. लोगों के पूछने पर इतना सा कहा - कुछ नहीं होता, ऐसे अधिक हीरोइक लगता है. रंगों और ब्रशों के लिए अभी बहुत कुछ बचा है और मैंने अपना उत्साह अभी नहीं खोया है.

एक दिन पाल को नया काम मिला. एक धनी व्यक्ति ने क्राइस्ट का चित्र बनाने का प्रस्ताव दिया. उसने भविष्य के नायाब और व्यक्तिगत ईश्वर के लिए हर दाम देने का वादा भी किया. पाल ने एक मॉडल खोजा जिसे सलीब पर लटकना था. हाथों और पैरों में कीलें और उनसे बह कर जम चुका गाढ़ा खून, सर पर काँटों का ताज. पाल ने धनी व्यक्ति द्वारा दिए गए सारे पेंगोज उस मॉडल को सौंप दिए. इस चित्र के पूरा होने से पहले ही कुछ ठट्ठेबाज, पाल को चौंकाने की गरज से उसे खोजते हुए उसके पांचवे माले के मकान तक पहुँच गए. उन्होंने जो देखा वह भयानक था. मॉडल कई दिनों तक क्रोस पर लटका रहने से मरणासन्न था.

पुलिस के आने तक मॉडल ने दम तोड़ दिया. धनी व्यक्ति ने कहा कि उसने सिर्फ़ तस्वीर बनाने को कहा था. इस तरह का कृत्य करने के लिए ये चित्रकार ही ज़िम्मेदार है. पाल ने कहा मैं उस ईश्वर की घोर यंत्रणा कैसे व्यक्त करता अगर मैं उसे अपने सामने तड़पते हुए नहीं देखता ? मैंने सारे सौ-सौ पेंगोज के नोट उसके कदमों में रख दिए थे, वहीं तड़पने के लिए, डटे रहने के लिए ताकि मैं निश्चिन्त होकर काम कर सकूँ. सोमोरी की इस कथा के नायक का जीवन बस इतना ही था कि बाकी सारी उम्र उसे जेल में बितानी पड़ी.

इस कहानी में मनुष्य ही ईश्वर है. एक भयंकर ईश्वर. देसो ने अंपनी युवावस्था लन्दन और पेरिस के उस काल में बितायी थी जिसमें मनुष्य ने एक आधुनिक विश्व के निर्माण का मार्ग प्रशस्त होते हुए देखा था. कबीलाई जीवन और आखेट से मुक्त होकर समाज ने नवीन मानव कलाओं को अंगीकार किया था. उनकी इस कथा में त्रासद जीवन और घोर गुंजलक विचारों वाले पात्र, विद्रोही सत्य के पक्षधर हैं. वहीं हृदयस्पर्शी भाषा में सख्त जीवन की चिंगारिया है. पुलिस कप्तान जब पाल के कमरे में दाखिल होता है तो बनी हुई तस्वीर और मॉडल के बारे में देसो लिखते हैं.

वह एक भयंकर ईश्वर था... मुरझाये व्यक्ति की तीखी नग्नता, उभरती हुई नसों की विभीत्सता, तनी हुई मांसपेशियों के साथ क्रोस पर लटका हुआ. उसके खुले हुए विकृत होठों से सफ़ेद झाग निकलते हुए. जो उसके समूचे चेहरे के चारों और रजत परिवेश बना रहे थे. जैसे आत्मबलिदान की चीत्कार. सुर्ख और भयभीत आँखें किसी स्वर्गिक आश्वासन की ओर टकटकी लगाये हुए थी.


* * *

May 11, 2011

टिमटिमाती हुई रोशनियों में

मैं शायद कभी भूल भी जाऊं मगर अभी तो याद है कि रात के आँगन में उतरने के वक़्त हम लगभग रोज ही बात किया करते थे. एक दिन अचानक इससे तौबा हो गयी. उस दिन के बाद भी मैं वैसे ही हर रात को ऑफिस में होता. कुछ ग्रामोफोन रिकार्ड्स के केट्लोग नंबर दर्ज करता. रिक्रेशन रूम के पिजन बोक्स से ग्लास निकालता और ऑफिस की सीढियों पर आकर बैठ जाता. कभी मन होता तो छत पर चला जाता. वहां से पहाड़ी के मंदिर, आर्मी केंट, एयरफोर्स बेस और शहर से आती रोशनियों को देखता. उन टिमटिमाती हुई रोशनियों में मुझे तुम्हारी आवाज़ सुनाई देती थी. ऐसी आवाज़ जो मेरे बेहद करीब होती. मैं उससे लिपट कर खुशबू से भर जाया करता.

वे रातें नहीं रही. जिन सीढियों पर बैठ कर तुमसे बात किया करता था, उन पर तन्हाई के आने से पहले ही ऑफिस छोड़ दिया करता. विगत दो महीने से फ़िर शाम की शिफ्ट में हूँ मगर करता क्या हूँ ये ठीक से याद नहीं है. हाँ सात दिन रेत में धूप का सफ़र करते हुए बीते हैं. परसों की धूप बड़ी तल्ख़ थी. तापमान चवालीस डिग्री था और लू के थपेड़ों में कई सारे वाहन गाँव जाने वाले रास्ते में सुस्ता रहे थे. पगरखी से ऊपर उघडे हुए मेरे पांवों को लू जला रही थी. ऐसा लगता था कि सड़क हेयर ड्रायर में तब्दील हो गयी है और मैं उसके भीतर चला जा रहा हूँ.

घर लौटते हुए सोच रहा था कि इंसान का अगले पल होना तय नहीं है फ़िर भी वह कितनी दुश्वारियों की गठरी उठाये हुए दौड़ता-हांफता जाता है. मेरा भी क्या तय है ? लेकिन फ़िर भी आशाओं से भरा दिल हुए ख्वाबों को बुनता जाता हूँ. अपनी रातों को अक्सर नुसरत साहब की आवाज़ के कदमों में डाल कर चाँद-तारे देखा करता हूँ. दिन चाहे जितने गरम हों रात गए छत पर ठंडी हवा आती है. चारपाई पर बैठा हुआ हाल ही मैं पढ़ी गयी कहानियों के बारे में सोचता हूँ और खुद भी कुछ और लिख लेने के इरादे बांधता हूँ. कई बार लगता है कि कहानी संग्रह के लिए काम कर लूं, लेकिन फ़िर याद आता है कि नसीब में सब आधा अधूरा ही लिखा है... रहने दो !

इन दिनों कोई सलीका नहीं है. मन उदास सा है. पीने के लिए वाईट मिस चीफ है और पढने के लिए दो चार किताबें रखी हैं. एक कहानी में उलझा हुआ हूँ. शीर्षक है 'कई रंगों वाला शाल'. इसके लेखक ज़िगमोंद मोरित्ज़ को हंगरी का डिकेंस कहा जाता है. मुझे इस कहानी में पूर्वोत्तर की किसी जागीर की गंध आती है और मेरा अनुमान है कि मोरित्ज़ को मैं और पढ़ पाया तो शायद कह सकूँगा कि वे हंगरी के शरत चन्द्र है. मैं इस कहानी के बारे में कुछ कह नहीं पाउँगा. वैसे कई रंगों वाला शाल प्रेम के धोखे में आई एक युवती का बुढ़ापे में अपने बेटे लिए किया गया तकाज़ा है. इस कथा के सारे तत्व समीचीन हैं. पात्रों के चरित्र भी सुघड़ हैं. लेखनी से आभास होता है कि गरीबी के इस चित्रकार ने अपनी कलम की नोक को व्यर्थ में नहीं घिसा है.

सच कहूं तो मैं अब भी अस्पष्ट हूँ कि इस कहानी के बारे में क्या लिखूं ? बस किताब को उलट-पुलट कर देखता हूँ. उसमें कोई खुशबू आती है. वही अजनबी खुशबू जो कल्पनाओं में बुनी गयी है. जिसे एक रात उसने इल्यूजन कहा था. मैं सोचता रह गया कि मेरे सुख भी कितने सहज उपलब्ध हैं कि सिर्फ़ भ्रम के सहारे महसूस किये जा सकते हैं.

May 6, 2011

तेरे खाके भी मेरे पास नहीं रह सकते...

अब भी वहां तन्हाई की खुशबू बसी हुई है. एक खेजड़ी के पेड़ के नीचे थोड़ी देर सुस्ताने के लिए बैठने पहले मैं दो किलीमीटर पैदल चल चुका था. दोपहर के दो बजे भी कुदरत मेहरबान थी. लू बिलकुल नहीं थी जबकि तापमान बयालीस डिग्री के आस पास था. मैं जिस हेलमेट के सहारे धूप से बचाव का सोच आया था वह बाइक के साथ पीछे छूट चुका था. मोटे किन्तु बेहद हलके तलवों वाले सेंडल में हर कदम पर रेत भर रही थी. मैं अपने ब्रांडेड चश्में से दिखती आभासी छाँव में देखता कि सामने कोई घर, कोई आदमी दिख जाये.

खेजड़ी की छाँव में बैठे हुए दूर बिना साफ़ा बांधे एक आदमी आता हुआ दिखाई दिया. मैं रास्ता पूछने के लिए उसका इंतजार नहीं कर सकता था कि वो पौन किलोमीटर दूर था. आगे किलोमीटर भर की दूरी पर हरे पेड़ दिख रहे थे और उनके बीच किसी का घर होने की आशाएं भी. आखिर मैं नदी की रेत में उतर गया. कोई पांच साल हो गए फ़िर भी सूखी उड़ती हुई रेत में नदी के बहाव का फैलाव साफ़ दीखता था. नदी अपने रास्ते के सब सुख दुःख बहा कर ले गयी थी.

किनारे पर बचे हुए पुराने पेड़ों और झाड़ियों की ओट से हरिणों का एक समूह अचानक मुझ से चौंक कर भागा. पेड़ों पर दुबके बैठे हुए पंछी चुप ही थे. धूल बेहद नरम थी पाँव अन्दर की ओर धंसते ही जाते लेकिन मैं उस घर तक पहुँच ही गया. वहां पानी के कुएं से ट्रेक्टर भरते हुए एक आदमी के पास से घूंघट की आड़ में स्त्री मेरी तरफ देख रही थी. अक्षय तृतीया अबूझ सावा है. इस दिन हर घर विवाहों के निमंत्रण से भर जाता है तो यकीनन मुझे भटका हुआ ना समझ कर राही ही जाना होगा.

मैं जब ठीक उनके पास पहुंचा तो उन्होंने अपना घूंघट उठा दिया और वे ख़ुशी से मुस्कुरा उठी. वे मेरी बुआ थी. पापा की रीयल कजिन. मैंने कहा रास्ता भूल गया हूँ. पापा के ननिहाल जाना था. लेगा परिवार भी यहीं आस पास रहते हैं. बुआ ने कहा थोड़ा आगे चले आये हो. आराम करो मैं चाय बनाती हूँ. मैं छपरे में रखी हुई चारपाई पर अधलेटा सा हो गया. अब तक पापा थे तो वे इस रेगिस्तान के बीच दूर दराज के अपने सभी रिश्तेदारों के यहाँ सुख दुःख में शामिल हो जाया करते थे. उनके इस आत्मीय व्यवहार के कारण ही हमें सभी बहुत प्यार से बुलाते हैं.

धूप में पानी के हौद की गंध और दूर तक फैली निर्जनता मेरी आँखों में बस रही थी. बुआ के घर ठंडा पानी और एक कटोरी गरम दूध पीने के बाद मैंने अपना चश्मा साफ़ किया और सफ़र पर चल पड़ा. रास्ते में उसकी याद आई तो लगा कि पास कुछ भी न हो तो बेहतर है. साहिर भी याद आये. देख इस अरसागाह-ए-मेहनत-ओ-सरमाया में, मेरे नगमें भी मेरे पास नहीं रह सकते, तेरे जलवे किसी ज़रदार की मीरास सही, तेरे खाके भी मेरे पास नहीं रह सकते... कि इस श्रम और धन के युद्ध के मैदान में मेरे पास कुछ नहीं रह सकता, तूं किसी अमीर की एस्टेट सही मेरे पास तो तेरे स्केच भी नहीं रह सकते.

शाम चार बजे पापा के ननिहाल से निकला और रेत में नौ किलोमीटर और सफ़र करके अपने गाँव पहुँच गया. मुझसे पंद्रह साल छोटी बहन के घर में शादी थी. उसका दूल्हा बना हुआ बेटा महज चार साल था. उसकी दुल्हन की उम्र के बारे में पूछा तो मालूम हुआ कि कोई दो या ढाई साल की होगी. मैंने बुजुर्गों के बीच जगह बनायीं और रेत में चलने के कारण अकड़ गए पांवों को सीधा कर लेना चाहा. वही खुशबू थी हलुए और काले चनों की.

बाल विवाह, इस नाम से हज़ार घोड़े दौडाए जाते हैं. सरकारें चौकन्ना हो जाती है. रोकथाम के उपाय किये जाते हैं क्योंकि ये कानून सम्मत नहीं है. आज भी समाज का सबसे बड़ा तबका बदहाली में जी रहा है. गरीबी के इस समाज तक अभी वे कानून पहुंचे ही नहीं है. उनके पास शिक्षा के अभाव में बेड़ियों को तोड़ने का साहस नहीं है और सरकार उनसे सुधर जाने की अपेक्षाएं करती हैं. शिक्षा का निजीकरण, सरकारी नौकरियों में निरंतर कटौती, स्वच्छ पानी नहीं, रोज़गार के साधन नहीं है. मौसम आधारित खेती है और उससे साल भर की कमाई मात्र बारह बोरी बाजरा, चार बोरी मूंग और मौठ. ऐसे में कोई नवजागरण कैसे संभव है. सिर्फ़ एक ही रास्ता दीखता है, लकीर पर चलने का.

कानून को लागू करने की प्राथमिकतायें होनी चाहिए. जैसे पहली हो कि सबको रोटी मिले... जब रोटी की आश्वस्ति हो जाएगी तो बड़े होने पर पर भी दुल्हे-दुल्हने मिलने लगेगी. बाल विवाह का मोह आप जाता रहेगा. जीवन वैभव से भरा और सामन्ती सुविधाओं से सजा आनंदी का सुसुराल नहीं. गले की फांस है इसलिए जो निपट जाये वही जीत है.

क्या अपनी पसंद और समझ से शादियाँ करने वालों का जीवन कष्टविहीन और खुशहाल हुआ करता है ? शायद नहीं, फ़िर भी मैं बाल विवाह के विरुद्ध सिर्फ इसलिए हूँ कि संविधान में आस्था रखता हूँ साथ ही इक्कीस बाईस साल की उम्र के बच्चों का विवाह करने का एक और फायदा है कि विवाह जैसी संस्था के गलत साबित हो जाने पर उन्हें भी गलती का भागीदार बनाया जा सकता है.

विवाह संस्था का जन्म डर और लाचारी से होता है. साहस और ज्ञान से सन्यास जन्म लेता है.


May 1, 2011

जली तो बुझी ना, कसम से कोयला हो गयी हाँ...

वे हर साल क्लासिक हो जाने को बेताब रहा करते थे. मोहिनी अट्टम के बाद टी एस इलियट की कविता पर लघु नाटिका, शेक्सपीयर के नाटक के बाद भरत नाट्यम ले कर आते और सुदूर किसी अफ्रीकी देश के लोक नृत्य को करने के लिए कोवों के पंखों से बना ताज पहन, कमर पर पत्ते बाँध कर आदिवासी समुदायों के लोक नृत्य लूर जैसा प्रदर्शन करते हुए वैश्विक हो जाया करते. अंग्रेजी नाटक करते हुए बच्चों में माईकल मधुसुदन दत्त जैसा ब्रितानी एसेंट कभी नहीं आता लेकिन वे शब्दों को खोखले मुंह से गले में ब्रेड फंसी बिल्ली की तरह बोलते जाते.

मैं हर बार तो नहीं जा पाता हूँ लेकिन कई बरसों से विद्यालय प्रबन्धन समिति का सदस्य होने के नाते प्रेमपूर्ण निमंत्रणों को निभाने की कोशिश करता हूँ. इस शाम के तीन घंटे बड़े सुन्दर  होते  हैं. मैं प्रतिभागी बच्चों से संवाद करने में ये समय बिता दिया करता हूँ. मेरी जिज्ञासाएं अक्सर उनकी वेश भूषा और आइटम के कंटेंट को लेकर होती है.

साल दर साल बच्चे, शिक्षक और प्राचार्य बदलते रहते हैं लेकिन वह खुशबू नहीं बदलती. अभिभावक कहते हैं कोई पढाता ही नहीं है. प्राचार्य अपने उद्बोधन में कहते हैं इस रेगिस्तान में पीने के पानी का प्रबंध करने के लिए उनको कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा और अंत में वी एम सी अध्यक्ष कार्यक्रम की सराहना करते. विद्यालय के प्रबंधन और विद्यार्थियों को परिश्रम पर शाबासी देते और अपने पावर से अगले एक दिन का अवकाश घोषित कर दिया करते.

कल रात मेरे आगे बैठी हुई पहाड़ी महिला अपने हाथ में ली हुई एक छोटी बुगची में रखे हुए स्नेक्स अपने पति को बड़े प्यार से खिला रही थी. ये मेमल्स के बिहेवियर का हिस्सा है कि नर अक्सर बच्चों के लालन-पालन में बेहद उदासीन होते हैं और उनसे जुडी छोटी बातों पर बड़ा गुस्सा करते हैं. वे अपनी सहभागिता पर अहसान से अकड़ जाया करते हैं. मेरी पत्नी ने इस समस्या से कुछ इस तरह छुटकारा पाया है कि वह अपनी किसी सखी को राजी कर लेती है और उसके साथ इस तरह के कार्यक्रमों का आनंद उठाया करती है. कल भी वह ऐसे ही आगे की किसी पंक्ति में बैठी थी.

दिन के तापमान में गिरावट हुई है और वह चालीस के आस पास आ गया है. इस वजह से शाम की हवा सुकून भरी थी. मंच से क्लासिक आइटम गायब थे. मंगल पांडे, तात्या टोपे और झाँसी की रानी के बलिदान पर नाटिकाएं मंचित हुई. मंच के पीछे से सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता पढ़ते हुए स्कूल टीचर भावुक हो गयी. मंगल पांडे वाली नाटिका तैयार करवाने वाले सर, ये कहते हुए रोने जैसे हुए जा रहे थे कि सब दर्शक रो रहे हैं. इसके बाद भी आज़ादी की स्मृतियों और चेतावनियों का सिलसिला जारी रहा. बच्चों ने एक कव्वाली गई "आज़ादी मुफ्त नहीं मिला करती..." और इसके बाद भी एक और देशभक्ति भरा गीत.

कार्यक्रम में एक ही विचार हावी था, आज़ादी. हम सब के भीतर इस विचार ने करवटें लेनी आरम्भ कर दी है. विद्यालय के टीचर्स और प्राचार्य ने यकीनन ये थीम न बनाई होगी किन्तु भ्रष्ट होती व्यवस्था और बढती जा रही विषमताओं के विरूद्ध सबका मन एक होता जा रहा है. मंच पर एक गीत के दौरान चिकनी मिट्टी से अपने सर को महात्मा गाँधी जैसा बनाये हुए और लंगोटी धारण किये एक नन्हा बालक लाठी लिए खड़ा हुआ था, पास में दुगनी ऊँचाई वाला एक क्रांतिकारी था और उसके पास में उससे भी लम्बा एक टोपी वाला सरदार खड़ा था, भगत सिंह. मैंने प्रिंसिपल साहब की खैर मनाई कि इस बढ़ते हुए क्रम पर दिल्ल्ली से कोई स्पष्टीकरण न आ जाये.

मैं बेमन से कार्य्रक्रम में गया था किन्तु उसके विपरीत अदम्य साहस से भर कर लौटने को था कि प्राईमरी विंग की नन्ही बच्चियों का समूह मेरे पास से गुजरा. इन्होने एक्शन रीप्ले फिल्म के गाने पर बेहद चार्मिंग डांस किया था. एक दक्षिण भारतीय परिवार की काले घुंघराले बालों वाली पिंक ड्रेस पहने सुदर सी गुड़िया को मैंने रोका और आंग्ल भाषा में कहा. "तुम कमाल हो, ऐश्वर्या से अच्छा नाचती हो." आओ एक स्टेप फ़िर से हो जाये... लगी है बुझे ना कसम से तौबा हो गयी हाँ, मिला ना कोई ऐसा मेरे सपनों के जैसा, छान के मोहल्ला सारा देख लिया...

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.