June 4, 2011

हर किसी का खेल नहीं है...

शाम अभी आई नहीं थी. दूर पेड़ों की टहनियों पर पंछी चौंक जाने की तरह चहकते और चुप हो जाते थे. ये एक लम्बी बेंच थी जिस पर कोई भी बैठ सकता था. वह भी बैठी थी. सामने रखे पानी के आईने में डोलती हुई परछाइयों को देखती हुई. कभी हवा का झोंका आता तो सीढ़ियों की धूल गोल गोल नाचती और फिर ठहर जाती. ऐसी ही एक शाम उसने ख़त में लिखा था कि तुम मेरा साथ कभी मत छोड़ना...

उसे लगा कि वह फिर से सुन पा रही है. मैं चिड़ियों के लिए रखे चुग्गे की तरह बिछ जाऊं तुम्हारी राह में, झील के किनारे की सख्त और गीली सीढ़ियों में ढल जाऊं, हो जाऊं उड़ता हुआ पंख, तुम्हारी बेटी के हाथ जितना कोमल... आवाज़ किसी अनजान दिशा में खो गई. जैसे मुहब्बत खो जाया करती है, रेगिस्तानी पगडंडियों की तरह. फिर कहीं से बादल घिर आये और उसके चेहरे को ढांप दिया.


अगर मैं बना सकता शब्दों को चाकू
और खरज की आवाज़ से गढ़ सकता मजबूत मूंठ
तो पीछे से बाँहों में भरता हुआ
तुम्हारे कान में टूटे पत्तों के हल्के शोर सा बजने लगता
आई लव यू... आई लव यू... आई लव यू...
और फिर गाल और कान के बीच चूमता हुआ
रेत देता तुम्हारा गला.

और इस तरह मैं दुनिया का पहला आदमी हो जाता
जिसने पहली ही बार में कर ली थी सफल आत्महत्या.

तुम इसकी तफ़सील में न जाना
कि मैं कभी कभी ऐसा सोचता हूँ, कि बातें बेवजह हैं और बहुत सी हैं

* * *
फ़रीद अयाज़ साहब को सुनोगी ?

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हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.