November 27, 2011

अनुपस्थिति


आज मैं तुमको जोर्ज़ बालिन्त की एक कहानी सुनाना चाहता था किन्तु जाने क्यों अब मेरा मन नहीं है. मैंने उस कहानी के बारे में अपनी लिखी हुई बीसियों पंक्तियों को ड्राफ्ट में छोड़ दिया है. मौसम में कोई रंगत नहीं है कि कुदरत के फ्रीज़र का दरवाज़ा अभी खुला नहीं है. मेरी अलमारी में अच्छी विस्की की बची हुई एक बोतल बहुत तनहा दीख रही है. नहीं मालूम कि हिना रब्बानी खान इस वक़्त किस देश के दौरे पर है और अमेरिकी सुंदरी कार्ला हिल्स ने उन्नीस सौ बानवे में जो कहा था कि हम दुनिया में शांति लायेंगे और सबको रहने के लिए घर देंगे, उसका क्या हुआ? फिर भी दिन ये ख़ास है इसलिए इस वक़्त एक बेवज़ह की बात सुनो.

दीवार की ट्यूबलाईट बदल गयी है सफ़ेद सरल लता में
और संवरने की मेज़ का आइना हो गया है एक चमकीला पन्ना.

मोरपंखों से बनी हवा खाने की एक पंखी थी
वो भी खो गई, पिछले गरम दिनों की एक रात.
मेरे सामने रसोई का दरवाज़ा खुला पड़ा है मगर जो चाकू है
वह सिर्फ़ छील सकता हैं कच्ची लौकी.

और भी नज़र जो आता है सामान, सब नाकामयाब है.

कि मेरी दो आँखों से सीने तक के रास्ते में
आंसुओं से भरा एक फुग्गा टकराता हुआ चलता है, हर वक़्त.

वह गयी तो साड़ी में टांकने वाली सब रंगीन सेफ्टी पिनें भी साथ ले गयी. 

November 24, 2011

चैन भी है कुछ खोया खोया...



एकांत के अरण्य का विस्तार क्षितिज तक फैला दीखता है किन्तु इसकी भीतरी बुनावट असंख्य, अदृश्य जटिलताओं को समेटे हुए है. एक विचार जब कभी इस जाल के तंतु को छू जाये तो भीतर रह रही, अवसाद नामक मकड़ी तुरंत सक्रिय हो जाती है. मैं इसीलिए निश्चेष्ट और निरुद्धेश्य समय को बीतते हुए देखता हूँ. उसने कई बार कहा कि आप लिखो. मुझे इसका फ़ौरी जवाब यही सूझता कि हाँ मैं लिखूंगा. लेकिन आवाज़ के बंद होते ही उसी समतल वीराने में पहुँच जाता हूँ. जहाँ जीवन, भुरभुरे ख़यालों की ज़मीन है. दरकती, बिखरती हुई...

संभव है कि विलक्षण व्यक्तियों का लिखा हुआ कई सौ सालों तक पढ़ा जाता रहेगा और पाठक के मन में उस लिखने वाले की स्मृति बनी रहेगी... और उसके बाद? मैं यहीं आकर रुक जाता हूँ. पॉल वायला के जीवन की तरह मैं कब तक स्मृतियों के दस्तावेज़ों में अपना नाम सुरक्षित रख पाऊंगा. मेरे इस नाम से कब तक कोई सर्द आह उठेगी या नर्म नाजुक बदन अपने आगोश में समेटने को बेक़रार होता रहेगा. मैं सोचता हूँ कि कभी उससे कह दूंगा कि मेरा जीवन एक सुलगती हुई, धुंए से भरी लकड़ी है. जिसके दूसरे सिरे पर एक आदिम प्यास बैठी है. वक़्त का बढ़ई अपनी रुखानी से चोट पर चोट करता जाता है.

यह भी सोचता हूँ कि क्या कोई मुझे इसलिए प्यार करता है कि मैं शब्दों को सलीके से रखने के हुनर का ख्वाहिशमंद हूँ. मैं जैसा हूँ वैसा नहीं चलूँगा? मेरा लिखा हुआ दीर्घजीवी हो पायेगा और लोग इससे प्रेम करेंगे. इसे अपने मन का पाएंगे, यह एक धुंधली आशा मात्र है. मैं सिर्फ़ इस उम्मीद में नहीं जीना चाहता हूँ. दुनिया में लिखने का कारोबार बहुत निर्दयी है. यह विनिवेशकों का अखाड़ा है और इसकी रिंग रबर से नहीं बनी है. यह अगर रेशम का बना कालीन है तो भी मुझे इससे मुहब्बत नहीं है. मेरे भीतर के लोकप्रश्न ही मुझे प्रसन्न रख पाते हैं कि "सखिया कबन वन चुएला गुलाब, त चुनरिया रंगाइब हे"

ऐसे प्रश्नों की मादक गंध मेरे भीतर उतरती है. उस समय लगता है कि किसी ने मेरे कंधे पर अपना सर रख दिया है. चीज़ों से दूर होना ऐसे सवालों के करीब लाता है. इस विरक्ति से किसी तरह मुमुक्ष होने का भी आग्रह नहीं है. मेरे अंतस पर वैभव और यश की कामनाएं ठहर नहीं पाती. इसका लेप किस रसायन से बना है, मैं ख़ुद समझ नहीं पाया हूँ. मैं समय की नदी के किनारे आत्मक्षय का ग्राहक मात्र हूँ. इसके निर्विघ्न बहने का साक्षी... जिस तरह मेरा आना अनिश्चित और अनियत है, उसी तरह चले भी जाना चाहता हूँ. इसीलिए पूछता हूँ कि हे सखी वनों में कब खिलेंगे गुलाब और मैं अपनी चुनर को रंग सकूँगा.

मैंने अपने आपको लिखने के बारे में सिर्फ़ इतना ही कहा है कि इस रेगिस्तान की मिट्टी पर नंगे पाँव चल कर बड़े हुए हो तो इसके सुख दुःख जरुर लिखना. यह कहानी कब बनेगी मालूम नहीं है कि मैं एक बेहद आवारा और इस समाज के नैतिक पैमाने से मिस फिट इंसान हूँ. इसलिए भटकता रहता हूँ. यह कुदरत मेरे भीतर बाहर को एकरंग कर दे, यही मेरा निर्वाण है. तुम चख लो मेरी सांसों को यही इस जीवन का आरोहण है. इस पल मैं तुम्हारे बारे में सोचता हूँ, यह सबसे बड़ा सत्य है.

* * *

उफ़क़ का कोई रंग नहीं है, यह भी उतना ही सत्य है जितना कि एक दिन मैं नहीं रहूँगा...
लेकिन उससे पहले आज औचक अपने पास पाता हूँ, मुस्कुराता हुआ चेहरा, एक नन्ही लड़की थामे हुए है चाय का प्याला, अंगीठी मैं सुलग रही है आक पर आई मौसमों की उतरन, तो लगता है कि याद एक कारगर शब्द है.

November 19, 2011

कीकर के पेड़ों पर सफ़ेद कांटे


उस मोड़ पर एक आदमी नई चिलम छांट रहा था. मैंने पीछे मुड़ कर देखा. रास्ता सूना था फिर गाड़ियों की एक कतार मेरी बेखयाली को चीरती हुई गुजरने लगी. मुझे अचरज हुआ कि अभी थोड़ी ही देर पहले मैं कार में बैठा हुआ सिगरेट के बारे में सोच रहा था और अब इस आदमी को देख रहा हूँ. मैंने कई सालों से सिगरेट नहीं पी है. अब भी कोई जरुरत नहीं है. फिर ये क्या खाली हुआ है जिसे धुंए से भरने का मन हो आया है. मैंने उस आदमी के बारे में सोचा कि जब वह चिलम पिएगा तो हर बार उसे और अधिक धुंआ चाहिए होगा. एक दिन वह थक कर लुढ़क जायेगा. उसे समझ नहीं आएगा कि जो चिलम का पावर हाउस था, वो क्या हुआ...

मुझे भी समझ नहीं आ रहा. अचानक चाहा, यही बैठ जाऊं कि मैं बहुत चिलम पी चुका हूँ. फिर देखा दूर तक सड़क खाली थी. नीली जींस और सफ़ेद कुरता पहने हुए खुद को देखा तो उस लड़के की याद आई जो एक शाम चूरू की वन विहार कॉलोनी के मोड़ पर लगे माइलस्टोन पर देर तक बेवजह बैठा रहा. कि उस दिन कोई नहीं था. सब रास्ते शोक मग्न थे. सड़क के किनारे खड़े कीकर के पेड़ों पर सफ़ेद कांटे चमक रहे थे. बुझती हुई शाम में दरख्तों की लंबी छाया घरों की दीवारों को चूम रही थी मगर उस लड़के के पास कोई नहीं था, कोई नहीं...

इस महानगर में आज की शाम आने को है लेकिन सड़कें इतनी वीरान क्यों हैं? मैं आहिस्ता चलना चाहता हूँ. चौपाटी कहलाने वाली जगह के बारे में सोचता हूँ कि वहाँ जाकर रुक जाऊँगा. उसके मोड़ पर एक पेड़ खड़ा है. उस पेड़ के नीचे खड़े हुए पिछली बार सोच रहा था कि शहर कई बार अपने विद्वान नागरिकों की स्मृतियों को बचाए रखने की कोशिशें करते हैं. इस शहर के वास्तुकार विद्याधर जैसा नगर नियोजन कभी नहीं हो पायेगा. लेकिन इस जगह मैं उन्हीं के नाम को हर तरफ पाता हूँ. मैं एक सेंडविच खा सकता हूँ फिर याद आया की बीच में जो समोसे वाला आया था, मैं वहाँ भी तो नहीं रुका.

दो छोटी लड़कियां पैदल चलने वालों के लिए बने रास्ते पर चल रही हैं. उन्होंने बड़ी विनम्रता से चींटियों और मकोड़ों की बाम्बी से रास्ता बदल लिया. इसी सड़क पर आगे मिटटी की मूरतें रखी हैं. सुघड़ मृदा मूरतों में अगर कोई प्राण फूंक दे तो वे दौड़ती हुई सड़क के बीच में चली आएगी. तेज रफ़्तार कारें उनको बचाने के लिए ब्रेक लगायेगी और एक दूसरे के ऊपर चढ जायेगी. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. एक आहट थी कि थोड़ी ही देर में बेहद शांत शाम टाइम स्क्वायर के आगे की चौड़ी सड़क का रंग गहरा कर देगी.

उसकी छत पर ठण्ड उतर आई है. मैं यहाँ गुंजलक और नाकाम चला जा रहा हूँ. सोचता हूँ कि इस शहर में आखिर किस के लिए आया हूँ ?

November 8, 2011

लड़की, जिसकी मैंने हत्या की


उसका नाम चेन्नमा था. उसके माता पिता ने उसे बसवी बना कर छोड़ दिया था. बसवी माने भगवान के नाम पर पुरुषों की सेवा के लिए जीवन का समर्पण. चेनम्मा के माता पिता जमींदार ब्राह्मण थे. सात-आठ साल पहले वह बीमार हो गयी तो उन्होंने अपने कुल देवता से आग्रह किया था कि वे इस अबोध बालिका को भला चंगा कर दें तो वे उसे बसवी बना देंगे. ऐसा ही हुआ. फिर उस कुलीन ब्राह्मण के घर जब कोई मेहमान आता तो उसकी सेवा करना बसवी का सौभाग्य होता. इससे ईश्वर प्रसन्न हो जाते थे.

नागवल्ली गाँव के ब्राह्मण करियप्पा के घर जब मैं पहुंचा तब मैंने उसे पहली बार देखा था. उस लड़की के बारे में बहुत संक्षेप में बताता हूँ कि उसका रंग गेंहुआ था. मुख देखने में सुंदर. भरी जवानी में गदराया हुआ शरीर. जब भी मैं देखता उसके होठों पर एक स्वाभाविक मुस्कान पाता. आँखों में बचपन की अल्हड़ता की चमक बाकी थी. दिन भर घूम फिर लेने के बाद रात के भोजन के पश्चात वह कमरे में आई और उसने मद्धम रौशनी वाली लालटेन की लौ को और कम कर दिया.

वह बिस्तर पर मेरे पास आकार बैठ गयी. मैंने थूक निगलते हुए कहा ये गलत है. वह निर्दोष और नजदीक चली आई. फिर उसी ने बताया कि मैं बसवी हूँ. ईश्वर की आज्ञा है कि मैं मेहमानों की सेवा करूं. यह उनके लिए आदेश की पालना है. मैंने कहा यह तो वेश्या जैसा कार्य है. यह सुन कर उसकी भोंहें चढ़ गयी. नथुने फड़क उठे. बहुत गुस्से में आने वाली स्त्री के मुख पर एक प्रकार भीषणता आ जाती है. वही उसके मुख पर स्पष्ट थी.

इसके बाद रात देर तक हम दोनों ने स्त्री और उसके मान के बारे में चर्चा की. धर्म की आड़ में मनुष्य को इस तरह के नारकीय जीवन में धकेलने वाले अज्ञान और स्वार्थ पर बहस की. लेकिन उसने एक भी बात न सुनी. मैंने पूछा कि इससे पहले तुमने किसी की सेवा की है. चेनम्मा ने सर झुका लिया. मैंने कहा कि अगर तुम खुद को ईश्वर का प्रसाद समझती हो तो ये झूठन हुई ना? और इस तरह झूठन को परोसना पाप ही हुआ ना?

इसी तरह के सवाल जवाब के दौरान चेनम्मा के चेहरे पर सुख दुःख के भाव आते गए. चिंताओं की लकीरें बनती गयी. आखिर उसने मान लिया कि यह मनुष्यता का कोई रूप नहीं है. वह बढ़ कर मेरे पांव छूने को ही थी कि मैंने उसे रोक लिया. अब वह बहुत प्रसन्न थी. किन्तु उसने कांपते हुए कहा "भगवान... अब आगे से ऐसा काम नहीं करुँगी." मुझे लगा कि उसके चेहरे से शांति बह रही थी. मैंने कहा "चेन्ना अब तुम जाकर सो जाओ." दरवाज़े के पास उसका हाथ पकड़ कर कहा कि "तुम्हें मुझसे कोई गुस्सा तो नहीं." फिर उसके माथे को चूम लिया.

मैं विवाहित हूँ. मेरी पत्नी मेरी प्रतीक्षा में हैं. मेरे बच्चे हैं. अगर मैंने दस साल पहले विवाह किया होता तो चेनम्मा जितनी बड़ी मेरी बेटी होती. ऐसी बातें सोचता हुआ मैं सो गया. सुबह जब जागा तो पाया कि करियप्पा ने मुझे पुकार कर जगाया है. बाहर देखा तो हो हल्ला था. चेनम्मा बाग़ के कुएं में गिर गयी थी. मैं बदहवास कुंएं की ओर भागा. उसका शव रखा था. देह में छिपा हिमकण उड़ चुका था.वह पुण्य और पाप से परे हो गया था. बची थी केवल विष की खली.

ये कहानी बहुत विस्तार में है. अन्जपुर के रहने वाले सीताराम ने इसे लिखा था. वे खुद को आनंद लिखा करते थे. विज्ञान में स्नातक पढ़े हुए आनंद साल उन्नीस सौ तिरेसठ में इस दुनिया को छोड़ गए. उनकी कहानी एक तमाचा जड़ कर रात भर जागने को विवश करती है. पाठक की आत्मा को कुरेदती रहती है.
* * *

उस कहानी का शीर्षक ही इस पोस्ट का शीर्षक है.

November 5, 2011

मर्तबान की तलछट में उदासी



प्रेम निर्वृति नहीं है. इसका उद्यापन असंभव है.

एक मांझा सीढ़ियों के किनारे पर अटक गया है. भौतिकी पढ़े बिना किसी बच्चे ने मांझे के तनाव में तरंगों का संसार रच कर अपनी चरखी के लिए अधिकतम हिस्सा बचा लिया होगा. मैंने सोचा कि मेरे पास भी एक साबुत डोर कहां बची है. मुझे ये हुनर क्यों नहीं आया. मेरा धागा तो उलझा ही रहा और चरखी टीन-ऐज़ को अलविदा कहने के दिनों में कहीं खो गयी.

साल डूबते गए और ख़ुशी सकेरने की कोशिश में ज़िन्दगी की डोर का सिरा कितनी ही बार ज़ख़्मी होकर टूटता गया. हम प्रेम कि तलाश में जिस निर्मल और साबुत मन को लेकर निकले थे. वह कितनी ही बार बिखर चुका है और उसका तलछट गंदली स्मृतियों से भर गया है. इस पारदर्शी मर्तबान में रखी आशाएं विनष्ट हो चुकी हैं.

इसी असंभव से नफ़रत करते हुए एक बेवजह की बात.

उन दिनों स्पाई कैम नहीं थे
और जेब खर्च से नहीं खरीदा जा सकता था
एक सीसीडी कैमरा.

इसलिए उसने
खिड़की में बैठे हुए,
फर्श पर लेटे हुए,
बस के सफ़र की नीम नींद में
मेरे होठों पर रखे, नर्म ताजा बोसे.

मेरे सीने पर लिखा
अपने आंसुओं की स्याही से
और आँखों की अचरज भरी रौशनी से बुनी
सम्मोहक विवस्त्र फ़िल्म.

बाद बरसों के अब तक
याद के आलों में रखे 
इसी सामान से होता हूँ, ब्लैक मेल.

आज जाने किसलिए ये बात कही है
यूं तो बातें बेवजह हैं और बहुत सी हैं.
* * *

प्रेम के कवच का रहस्यमयी बीजक आंसू भरी आँखों से ही पढ़ा जा सकता है.
* * *

November 3, 2011

जबकि ऐसी कोई वजह नहीं...



इन सुस्ताई हुई रातों की भोर के पहले पहर में आने वाले ख्वाबों में बच्चों की सेहत और एक उपन्यास जितना लम्बा अफ़साना लिखने के दृश्य होने चाहिए थे. लेकिन आज सुबह बदन में ठण्ड की ज़रा झुरझुरी हुई तब देखा कि एक मुसाफ़िर बाहर वाले कमरे में अपना सामान खोल रहा था. रात घिर आई थी. मुझे किसी सफ़र पर जाना था और चीज़ें सब बिगड़ी हुई थी. ग्यारह दस पर छूटने वाली गाड़ी का कोई मुसाफ़िर मुझे फोन पर पूछता है कि क्या सामने वाली बर्थ आपकी है? सपने की नासमझी पर अफ़सोस हुआ कि किसी मुसाफ़िर को मेरा फोन नम्बर कैसे मालूम हो सकता है.

एक पेढी पर से फांदता हुआ अपने थैले के पास आ जाता हूँ. बोध होता है कि मेरे बैग में बेकार पुराने कपड़े भरे हैं. मैं उनको बाहर कर देने के लिए उसको देखता हूँ. लेकिन उसमें पिछली सर्दियों में लिए गये दो नए स्वेटर खाकी रंग के कागज के लिफाफे में रखे हैं. ये जरुर जया ने किया होगा, ऐसा सोचते हुए भाई की आवाज़ सुनता हूँ. वह मुझे लगातार होती जा रही देरी में भी ट्रेन तक पहुंचा देने के लिए चिंतित है. मेरा टिकट खो गया है. वह सब दराजों और बैग के खानों में तलाश लिए जाने के बावजूद नहीं मिलता. मैं अपने कमीज की जेब से कुछ कागज निकालता हूँ तो मेरा हाथ किसी बनिए की तरह कागजों से भर जाता हैं. ये सब पर्चियां किसी हिसाब की हैं और मुझसे संभल नहीं रही. इनमें खोजने के चक्कर में भय बढ़ता जा रहा है कि गाड़ी निकल जाएगी.

अचानक दूर पिताजी दिखाई दे जाते हैं. मद्धम कदमों से मेरे पास आते हैं. उनका कद मेरे से ऊँचा है. मेरे माथे पर चूमते हैं. इस 'फोरहैड किस' के दौरान सोचता हूँ कि वे बहुत उदास होंगे. जैसे ही मैं अपना सर ऊपर की ओर उठाता हूँ तो पाता हूँ कि उनका मुख प्रसन्नता से भरा है. वे एक ओजपूर्ण निर्मलता से भरे हैं और सौम्य चहरे पर देवीय मुस्कान है. मैं अचरज से भर जाता हूँ कि वे किस बात के लिए आनंद में हैं. अचानक याद आता है कि मैं उनको कब का खो चुका हूँ. कई बरस हुए...  आख़िरी बार मैंने उनको पीले वस्त्रों में हलके उजले रंग में पालथी की मुद्रा में बैठे हुए देखा था.

रेल एक नए ट्रेक से गुजर रही है. स्कूल के दिनों में भाप के इंजन की दिशा बदलने के लिए बनी हुई घूम चक्कर वाली पटरी पर अब नयी पटरी बन गयी है. गाड़ी बहुत धीरे रेंग रही है. कच्ची बस्ती के घरों के बीच से होती हुई अपना रास्ता बना रही है. मैं समझ नहीं पाता हूँ कि क्या सही गाड़ी में आ गया हूँ या फिर इस गाड़ी के सहारे उस गाड़ी तक पहुँच जाऊँगा. दुविधाओं की गिरहों में घिरा हुआ पाता हूँ कि मेरी धमनियां सिकुड़ती जा रही है. रक्त प्रवाह पर किसी अजगर ने कुंडली मार ली है. रात के अँधेरे में सफ़र जारी है. सोचता हूँ कि वह क्या है, जो आने वाला है... ये किस सफ़र की गाड़ी है?

* * *

उसकी सुवासित भुजाओं के बीच अपने होठों को रखते हुए मैंने कहा कि रात बीत गयी है और जीवन जीने का युद्ध अपने चरम पर साबित हुआ है, एक धोखा... बेमौसम हवा में उड़ती आती थी हल्दी वाली क्रीम की गंध, जबकि वे दिन खो गये हैं, चाँद सितारों से परे धूसर अँधेरे में.

* * *
मगर अब भी मैं सोच रहा हूँ कि अनार के नीचे बिखरे फूलों को कोई लड़की चुन लेगी, एक दिन.

November 1, 2011

दूर से लगता हूँ सही सलामत



मैं इससे दूर भागता रहता हूँ कि ज़िन्दगी के बारे में सवाल पूछना कुफ्र है. ये क्या सोचते हो? ऐसे तो फिर जीना कितना मुश्किल हो जायेगा? इस सवाल को रहने दो, जब तक है, अपने काम में लगे रहो... इन गैरवाजिब बातों में सुख है. ज़िन्दगी से प्रेम करने लगो तो डर बढ़ता जाता है. उसी के खो जाने का डर, जिससे प्रेम करने लगे हों. अचानक ऊपरी माले में एक सवाल अटक जाता है कि न रहे तो?

साँस घुटने लगती है. बिस्तर पर झटके से उठ बैठता हूँ. सोचता हूँ बच्चों को बाँहों में भर लूं... पत्नी का हाथ थाम लूं. सीधा खड़ा हो जाऊं. अपने सर को पानी झटकते हुए कुत्ते की तरह हिलाऊँ. अपनी सांसों पर ध्यान दूँ कहीं कोई साँस छूट न जाये. ख़ुद से कहता हूँ कि ये दीवानगी है. सब तो खैरियत से हैं. अभी चीज़ों ने ख़ुद को थाम रखा है. थोड़ी देर रुको सब सामान्य होने लगेगा. वह थोड़ी देर नहीं आती. वह समय मीलों दूर है. दोनों हथेलियों को बिस्तर पर टिकाये हुए मुंह खोल कर साँस लेता हूँ. कुछ लम्बी सांसें...

ऐसे अनगिनत दिनों में भय निरंतर पीछा करता रहा. एक उदास दोपहर में दोस्त ने पूछा फिर कैसे छुटकारा होगा ? वह सेडेटिव, जो आपके मस्तिष्क की गति को धीमा करे. फिर नींद एक भारी लिहाफ की तरह ढक ले. आँख खुले तो चेहरों और चीज़ों के प्रति उदासीनता बनी रहे.
सोचता हूँ कि काश भुला ही सकूँ, तुम्हारा नाम... 

ऐसे ही तुम्हें याद करते हुए किसी शाम
मैं आरामकुर्सी पर एक तरफ झुक जाता हूँ
दूर से लगता हूँ सही सलामत
लेकिन होता हूँ वैसा ही, जैसी वे चीज़ें थीं.

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.