January 7, 2012

रात में घुल आई सियाही है



एक पाँव दूब पर रखे, दूजा कुर्सी पर टिकाये कुछ भी सोचना बेकार था. कल रात के एक ख़याल की याद तारी थी कि उसने अपनी नाक तक ओढ़ रखा है, लिहाफ. मेरी नज़्मों को पढ़ कर दिलाती है याद कि कहानियां लिखा करो. मैं कहानी के किरदारों से दोस्ती करने से डरता हूँ कि उनकी दुनिया से लौटने का मन नहीं होता. यह विपश्यना में जाने से पहले के द्वंद्व में अटक जाने जैसा काम है. मैं बोलता भी नहीं और कई सारे पात्र मुझमें ही बोलते रहते हैं. कथाओं के किरदारों का सरल होना बेहद कठिन है और जीवन की भूल भुलैया के उलझे हुए अप्रत्याशित रास्ते बेहतर है. फ़िलहाल एक और बेवजह की बात कि बरबाद जवानी की इमारत अक्सर वैभवशाली बचपन की खूबसूरत नींव पर ही खड़ी होती है.


वाश बेसिन के आईने से पोंछते बीते दिनों को
भीगे गुलाबी होठों पर आता तो होगा, किसी नज़्म का मुखड़ा
कुरते की सलवटों से झांकती बेचैन नींद और रात की उतरनों को देखते
कभी ये भी आएगा ख़याल
कि उड़ ही जाती है खुशबू उम्र की, उसके बिना या इसके साथ.

जब भी काट लेगा कोई, ज़िन्दगी की जेब से एक दिन
सुकून के सोफे पर पसारे पांव सोचेगी, अब कौन मिलता है राह में.

डायनिंग टेबल पर दिखेगी ऐसे कि खा रही है खाना रात का
और फिर उठ जाएगी वार्डरोब में करीने से रखने, आने वाले कल का दिन
ख्वाहिशों को झटक कर खिड़की से बाहर, खींच देगी कोई एक पर्दा भारी.

मगर फिर भी
मुसलसल बरसती वक़्त की गर्द में बची रह जाएगी, उन दिनों की कोई उम्मीद
बुझ न सकेगा दरवाज़े की आड़ में लिया, इश्क़ के नूर से दमकता हुआ कोई बोसा.

सोचता हूँ कि अब सो ही जाओ तुम कि रात में घुल आई सियाही है
कि बातें बेवजह हैं और बहुत सी है.

* * *
[Painting image courtesy : Marianne Konvalinka]

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.