February 4, 2012

सबसे घटिया जुआरी



एक बेवजह की बात है अगली दो बातें महाबार गाँव के धोरों की स्मृतियों से बुनी है.


उन्होंने ज़ब्त कर लिया मेरा पासा
और मुझे यह कहते हुए कर दिया बहिष्कृत
कि मैं सबसे घटिया जुआरी हूँ.

मेरे पासे के सब तरफ लिखा था, एक तुम्हारा नाम.
* * *

पिलाण की पीतल की कूंट में
या अनजाने पिरो लिया मोहरी की राती डोर में
या फिर गोरबन्द की लड़ियाँ ले गयी अपने साथ.

सिर्फ चूमने तेरे हाथ को
एक सस्ती कौड़ी हो गया, मेरा दिल.

पिया सिणगारो कसूम्बल ऊंट
आपाँ उड़ जावाँ, लाल शाहबाज़ कलंदर के सहवन देस.

[पिलाण : ऊंट की काठी; मोहरी : लगाम; राती : लाल; गोरबंद : ऊंट सज्जा को कौड़ियों और सूती रेशमी धागों से बुना सज्जा वस्त्र; सिणगार : श्रृंगार; कसूम्बल : रात जैसा गहरा लाल; आपाँ ; हम दोनों; उड़ जावाँ : उड़ जाएँ; लाल शाहबाज़ कलंदर : सैय्यद उस्मान मरवंडी, एक सूफ़ी संत; सहवन : शाहबाज़ की जगह का नाम]
* * *

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.