April 4, 2012

स्मृति का उजाड़ रेगिस्तान...


ज़िन्दगी में जब भी कोई चीज़ आगे नहीं बढती तो उस पर धूल और काई जमने लगती है. हम छटपटाने लगते हैं. नयेपन की चाह में ये ठहरा हुआ लम्हा बोझ बन जाता है. हाँ बोझ.... ये कुछ बेवजह की बातें भी आगे नहीं बढ़ पा रही थी. ये सारी बातें अलग अलग समय लिखी गई हैं. इनके विषय जुदा हैं और ये बेहद कच्ची हैं. ड्राफ्ट में बेतरतीब पड़े रहने से बेहतर लगा कि आज इनको यहाँ टांग देता हूँ. और हाँ मैं अपने ख़यालों की दुनिया के पात्रों से मुहब्बत करता हूँ. वे हर जगह मेरे साथ होते हैं. उस वक़्त भी जब मेट्रो में देख रहे हों किसी अजनबी को या सोच रहे हों अपने महबूब के बारे में... और तब भी जब वे कायदे से मुझे कह चुके हों अलविदा.

किताबों के कोने से नहीं टपकती शराब
कवर नहीं होते गरम और लज्जा भरे गुदगुदे
और फिर मरे हुए लोगों के अनुभव से
किस तरह संवरती, ज़िन्दा आदमी की तकदीर.

तुम्हारी कसम सब रहा नाकाम, जो लिखा था किताबों में.
* * *

प्रेम में मुझे रुलाने का कोई फायदा नहीं है
कि एक दिन हर कोई भूल जाता है, बुरे दिनों को.
* * *

कई बार लगता है ऐसा
कि बार बॉय उठा ले जाये सारे प्याले,
सिगरेट कि डिबिया को फैंक दे कचरे में
पौंछ डाले टेबल पर रखा शीशा
सेल फोन की कॉल हिस्ट्री को कर दें डीलिट
बाहर निकल आयें सड़क पर और पूछें
कि यहाँ से सफ़दर हाशमी रोड पहले आएगी या संसद मार्ग
कि आदमी के खून का रंग कैसा है ?
* * *

[तस्वीर ऋषिकेश शहर की एक गली में खड़े हाथ ठेले की है.]

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.