April 9, 2012

आखिर इस दिल को क्या कहिये...


एक रोज़ हो जाता है हर कोई नाउम्मीद और बचा हुआ ऐतबार खो जाता है. हालाँकि सब पहले से ही जानते हैं कि किसी दिन यह दोस्तों को सुनाने लायक, एक किस्सा भर रह जायेगा कि किस तरह बोरियत भरे दिनों को इश्क़ विश्क की बातें करके काटा जा सकता है या काम के दिनों को कैसे बरबाद किया जा सकता है या फिर महबूब की बेरुखी की धूप के दौरान पनाह कहां ली जा सकती है. खैर मैंने पाया कि दिल एक बड़ा मूरख साज़ है. इसी फ़लसफ़े में कुछ बेतुकी बेवजह की बातें निकल आई है. मैं चाहता हूँ कि इन बातों को उठा कर मार दूँ दिल के मुंह पर... मगर इस दिल को आता है, हज़ार आंसू रुलाना इसलिए चुप रहता हूँ.

कहवा घरों के कोने में
या मॉल की रेलिंग का सहारा लिए
मेट्रो में आँखें मूंदे हुए या तलघर वाली पार्किंग में
या फिर पार्लर के सोफे पर
अचानक धड़कने लगता है मूर्ख दिल

दिमाग आखिर कब तक,
एक चरवाहे की तरह फिरे, इसके पीछे.
* * *

कार्डियोग्राम देख कर चारागर ने कहा
दिल हुज़ूर,
वह दे रहा है धोखा आपको, अब कर लेना चाहिए किनारा

दिल ने कहा मैं इतना भी मूर्ख नहीं हूँ.
* * *

महबूब बिछाता जाता है मुश्किलें
ठुकराता रहता है, फेर कर नज़र
नहीं करता उसकी आमद का इंतज़ार.

मगर बाधा दौड़ का धावक होता है दिल
हांफता हुआ गिनता है, अब कितनी बची है बाधाएं.
* * *

किताबों में जो दिखाई गयी है दिल की शक्ल
और जो महबूबों ने सोची है पीपल के पत्ते जैसी
मेरे ख़याल से दोनों ही वाहियात है.

कि दिल शायद बना होगा गैंडे की खाल से, ऊंट की प्यास से
शेर की दहाड़ से, बाज़ की आँख से और खरगोश की चाल से

कि हज़ार धोखे खाता है, हज़ार उम्मीदें रखता है.
* * *

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.