May 14, 2012

अनंत बिछोह में


मेरे ही हाथ से मिट गयी सारी बातें. कॉफ़ी नहीं, सुकून नहीं, बस एक बेख़याली है. किस आरी से काटूं ऐसे वक़्त को? चिट्ठियां रख दूँ उसके आले में या ज़रा जोर से पुकारूँ नाम या फिर नए सिरे से लिखूं. जो मिटने से बच गया, उसे पढ़िए... बेवजह की बातें

जब डूब रहा होता है सूरज
अधिक चमकने लगते हैं पीले पत्ते
जैसे अनंत बिछोह में
हवेली की खिड़की में खड़ी नायिका.
* * *

एक दिन तूफ़ान ने
ख़ुद को झाड़ पौंछ कर किया साफ़
कि वह अपने साथ उठा लाया था जाने क्या क्या.
एक घर के टुकड़े देख कर
उसे ख़ुद के बेघर होने पर रोना आया.
जैसे कोई रो पड़ता हो सुन कर, महबूब का नाम.
* * *
[Image courtesy : Prateeksha Pandey]

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.