May 30, 2012

गुज़रे हुए कदमो के निशान...


मुहब्बत भी जाने कैसी चीज़ है कि एक अरसे से ख़ुद के अहसासों को दर्ज़ करता जा रहा हूँ. अब एक किताब जितने शब्द हो गए हैं. दोस्तों, इस आत्ममुग्धता का कोई चाहने वाला हो, तो बताना. "बातें बेवजह" एक ऐसा विचार था कि मैं जो लिख रहा हूँ, वह सिर्फ़ मेरे मन की बात है. यह दूसरो के लिए बेवजह ही होगा. लेकिन मैं लिखता रहा महबूब को चिट्ठियां कि चीज़ें और दुनिया कैसी दिखती है. जो सीख रहा हूँ, वो क्या है?

दोस्तों, एक प्रकाशक की खोज में हूँ. जो रेगिस्तान के एक आम आदमी की डायरी में दर्ज़ कुछ बेहद छोटी कविताएं किताब की शक्ल में छाप सके. खैर, संजीदा न होईये. कुछ बेवजह की बातें पढ़िए

कोई जगह नहीं बनी है
कहीं जाने के लिए
सब सिर्फ़ मुसाफ़िरों के अचम्भे के खातिर है.
* * *

गुज़रे हुए कदमो के
निशान देख कर सोचता है, आवारा पत्ता.

जो आये थे, वे क्या हुए ?
* * *

थके हुए मुसाफिरों ने की थी सीढियां ईजाद
जब वे थक कर हार गए
तब आखिरी सीढ़ी बनायीं, सिर्फ़ कुछ हाथ नीचे
जिसमें रखा जा सके एक आदमकद बक्सा.
* * *
[Painting Image Courtesy : Arthur Rackham ]

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.