June 6, 2012

कठपुतली, मैं काठ की


कुछ दिन सफ़र नए शहर को, कुछ शामें परिंदों से भरी, कुछ फेरे सुकून के... ऐसा ही हो ! दो बेवजह की बातें

कठपुतली

कुछ क़दम सफ़र
डूबता, मन उदास
कौन देस, कौन मुसाफ़िर.

तनहा दरख़्त, सूनी शाख
अबूझ, असीम, अतल प्यास.

वीराना ये तेरी याद का
कठपुतली, मैं काठ की.
* * *

सलामती

भीगी हुई आँखें
सिमटे हुए से पांव
रंग सब बिखरे हुए.

ये ख़यालों की दुनिया नामुराद
और लिपटी धुंए से, अंगुलियाँ.

अचानक बैठी होती है, सामने
वीरान सी एक उदासी शाम की.

बेनूर, ये ज़िन्दगी का आईना !
* * *

[तस्वीर रंगीन और उम्मीदों से भरी हुई कि ज़िन्दगी कैसी भी हो, खूबसूरत होती है. ]

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.