July 1, 2012

फूल पर घिरती शाम


कल जून महीने का आखिरी दिन था. रेगिस्तान, आँधियों की ज़द में है इसलिए तापमान कम था. दोपहर के वक़्त, नेशनल हाई वे पर पसरा हुआ सन्नाटा तोडती कुछ गाड़ियाँ. अचानक तेज़ रफ़्तार बाइक पर गुज़रा, एक नौजवान. इस गरमी में भी बाइक के रियर व्यू मिरर में टंगा हुआ, हेलमेट. उसे भूल कर, रास्ते भर सोचता रहा जाने क्या कुछ.... बहुत सारी बेवजह की बातें, मगर तीन पढ़िए... कि किसी दिन आ जाओ  रेगिस्तान की शाम की तरह

गलियों में उतरती
तन्हा शाम के कदमों की आहट
उचटती हुई नींद, तेरे ख़याल की.
* * *

सबसे ऊँची शाख़ पर खिले
इकलौते फूल पर घिरती शाम
जैसे सुरमई होता, इंतज़ार.
* * *

अतीत के धूसर अरण्य के किनारे

खिड़की, जिसे साँस कहते हैं
रोज़नामचा, ज़िन्दगी के नाम का
और हर शाम उसकी याद लिए हुए.
* * *

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.