August 30, 2012

ख़ूबसूरत औरतें


प्रेम तो था मगर अलभ्य सा, ख़ुशी थी मगर नाकाफ़ी थी। अशांत, अप्रसन्न, टूटे बिखरे जीए जा रहे थे कि किसी ने थाम कर हाथ कहा। मैं भी तुम्हारे साथ चलूँ? ख़्वाब ख़ूबसूरत भी होते हैं। बेवजह की बहुत सारी बातें... उसके बारे में नहीं मगर ख़ूबसूरत औरतों के बारे में

कुछ मूर्ख लोग बातें करते हैं
ख़ूबसूरत औरतों के बारे में
कि वे छूते ही बदल जाती हैं प्रेतों में
और छूने वाला हो जाता है
पनीर के पीछे भागता, बिना पूंछ वाला चूहा।
* * *

शक्की आदमी को
हर बार यही संदेह होता है
कि ख़ूबसूरत औरतें घिरी होती हैं संदेहों से।
* * *

यही एक मुश्किल है
कि अँधेरे में डर जाती हैं ख़ूबसूरत औरतें
कि अँधेरा ढक देता है ख़ूबसूरती को।
* * *

हर समय एक नुकीली चीज़
चुभती रहती है ऐसी औरतों को
कि वे ख़ूबसूरत औरतें हैं।
* * *

सुन्दरता की सारी प्रस्तावनाएँ
हो जाती हैं व्यर्थ, ख़ूबसूरत औरतों के बारे में
जब कोई पढ़ रहा होता है
उपसंहार से ठीक पहले की कुछ पंक्तियाँ।
* * *

ख़ूबसूरत औरतें
सुंदर ततैये का घोंसला होती है
उसके अन्दर से खिल कर उड़ती रहती है
हज़ार ख़ूबसूरत औरतें।
* * *

प्रेम करने वाली
ख़ूबसूरत औरतें खतरनाक होती है
जब वे कहती हैं कि प्रेम किया,
उसी वक़्त मुकम्मल हो जाता है उनका प्रेम। 

वे कम ही मौकों पर
इंतज़ार करती ऐसे ही किसी वाक्य का अपने महबूब से।
* * *

तुम यकीन कर सकते हो
इस बात का कि रात के वक़्त ख़ूबसूरत औरत
कोई तारा नहीं बन जाती है.
वह वहीं होती है बिस्तर के दायें या बाएं
जैसे मैं अपनी पत्नी को पाता हूँ।

हालाँकि लगभग सब ख़ूबसूरत औरतें
सुबह गायब होकर
कर रही होती हैं, रसोई की चीज़ों से प्रेम।
* * *

ख़ूबसूरत औरतें नहीं करती हैं
बदसूरत औरतों की बातें
वे उनके गले लग कर रोती हैं। 

दुःख एक से होते हैं, अलग अलग रंग रूप की औरतों के।
* * *

कुछ  ख़ूबसूरत  औरतें
दुकानों के चक्कर काटती रहती हैं
कि वे ले रही होती हैं बदला 
कि आदमी भी उनको
किसी चीज़ की ही तरह देखता है हर वक़्त।
* * *

लोगों ने बेवजह और बहुत सारा सोचा है
ख़ूबसूरत औरतों के बारे में
मगर उन्होंने कभी सुना नहीं गौर से
कि खूबसूरत औरतें लोक गीत का आगाज़ है
और आगे के सारे मिसरे उनके खूबसूरत दुःख।
* * *

षड़यंत्र होती हैं
ख़ूबसूरत औरतें, अपने ही खिलाफ़।
* * *

हर जगह होती हैं, ख़ूबसूरत औरतें
सबसे अधिक, रसोई घर के अन्दर। 
* * *
[Painting Image Courtesy : First sketch : Anjali Mitra Grover]

August 28, 2012

गोशों में बिखरा हुआ अँधेरा


एक रोज़ उड़ ही जाती हैं, सब मुश्किलें और राहतें मगर ये न समझाना किसी को कि ज़िन्दगी को आसानी से जीया जा सकता है। कोई तुम पर यकीन नहीं करेगा। मेरे साथ कोई न था, एक परछाई थी, उसी के बारे में बेवजह की बातें

आवाज़ न दो, उसके नाम को

बेसबब बेबसी
और बेख़याल ज़िन्दगी
कि तनहा पड़ा
रात का टूटा सियाह प्याला।

दिल के हज़ार गोशे
गोशों में बिखरा हुआ अँधेरा
न रौशनी, न रंग कोई,
न नियाज़, न कोई उम्मीद।

जब सर पे था सूरज
एक फ़कीर ने कहा,
चूम कर इस पानी को
लिख दे, दुआ उसके नाम।

अपनी ही परछाई को देख कर
भर ले हैरानी का जादू अपनी आँखों में।
* * *

देखो ये धूप उसकी याद
और तुम्हारा वजूद, बेशक्ल परछाई

जैसे लौटती हुई आवाज़ के टुकड़े.
* * *

एक दरख्त की शाख ने पंछी से पूछा
तुम्हारी आँखों के नीचे ये सियाही सा क्या है?

पंछी ने कहा, सो जाओ चुपचाप
मैं चुरा लाया हूँ,
रोशनी के जादू से बनने वाली परछाई।
* * *

August 24, 2012

हम दोनों चले जायेंगे उत्तरी ध्रुव


किसी प्रेतात्मा को छूकर आई ख़राब हवा थी। किसी आकाशीय जादुई जीव की परछाई पड़ गयी थी, शराब पर। किसी मेहराब पर उलटे लटके हुए रक्तपिपासु की पुकार में बसी थी अपने महबूब की याद। दुनिया का एक कोना था और बहुत सारी तन्हाई थी। मेरे मन में एक ख़याल था कि एक दिन दबा दूँगा, तुम्हारा गला। ऐसे ख़राब हालात में बेवजह की बातें भी ख़राब थी...

मेरा मन एक अजगर
अपनी ही कुंडली में हैरान।

तेरी याद
ताबीज में बंधा भालू का नाखून।
* * *

वो दिन ही ख़राब था
एक ऐसी याद का दिन
जिस पर लिखी हो, क़ैद की उदासी।
* * *

मुझे जंगली खरगोशों से प्यार है
कि उनको जब नहीं होना होता है बाँहों में
वे सभ्य होने की जगह
मचलते रहते हैं, भाग जाने को।

जंगली खरगोश तुम्हारे जैसे हैं।
* * *

और मैं मरा ही नहीं
जीता गया, निरंतर।
* * *

मैंने एक आधारशिला रखी
कि अबकी बरसात में
यहाँ से बहाई जाएगी नदी।

नादाँ लोग हंस कर चले गए, जैसे वे हँसते हैं प्यार पर।
* * *

वहाँ लोग कम और अच्छे हैं,
इसलिए सोचा है मैंने
कि हम दोनों चले जायेंगे उत्तरी ध्रुव।

यहाँ प्रेम करने और कुछ दिन बाद
हमारी नंगी लाशों के
गालियों में पड़े मिलने से बर्फीली तन्हाई बेहतर होगी।
* * *

August 20, 2012

तबेले का धुंधलका



वो पाकिस्तान से चला आया. अपनी बीवी और छोटी बहन के साथ. कई दिनों तक एक पेड़ की छाँव में पड़ा रहा. उससे कंजर अच्छे थे. जिनके पास तम्बू वाले घर थे. उससे भिखारी अच्छे थे. जो किसी प्रत्याशा के बिना मंदिरों के आगे पड़े रहते थे. वह एक ठेला लगाना चाहता था. उसे यकीन था कि एक ठेले के सहारे वह तीन लोगों का पेट भर लेगा. उसके पास सर छुपाने को जगह न थी. देश आज़ाद हुआ था और सेना के ट्रक शांति बहाली के लिए गश्त कर रहे थे. 

वह असंख्य दुखों के बीच भी अपनी जिजीविषा का पोषण करता जा रहा था. जीवन के कष्टप्रद थपेड़े, उसका मनुष्यों के आचरण से परिचय करवा रहे थे. वह सिंध से आया हुआ हिन्दू था. इसलिए वह सिन्धी हिन्दू था. इसलिए वह एक सिन्धी था. अपने वतन से बिछड़ कर नए शहर में अपनी बीवी और छोटी बहन के साथ एक घरोंदे की तलाश में, एक शरणार्थी सिंधी। 

वर्ष 1948 में मनोरंजन पत्रिका में छपी रांगेय राघव की ये कहानी "तबेले का धुंधलका" विस्थापन की पीड़ा का दस्तावेज़ है. इस कहानी में रांगेय राघव ख़ुद कथा के मुख्य पात्र हैं. यानी प्रथम पुरुष ही अपनी कथा कह रहा है. इस तरह की बुनावट कि आपकी साँस निकल जाये. इतनी सरल कि आपके कलेजे के पार उतरता हुआ दो धार वाला चाकू. सोचे गये आगामी अनगिनत भयों की कहानी.

एक दिन पत्नी कहती है। आज बीस एक हिन्दू तुम्हारी बहन को उठा कर ले जाते. मैंने बड़ी मुश्किल से बचाया है. इस सलवार के कारण वे इसे मुस्लिम समझ बैठे थे। कहानी में आखिर एक सेठ का गोदाम, आशा जगाता है. उसके पिछवाड़े में रहने के लिए एक छोटा सा तबेला है. सेठ का आदमी कहता है वह उनको इस जगह पर टिका सकता है. वह किसी काम की तलाश में बाहर जाता और थोड़ी देर बाद अचानक कर्फ़्यू की घोषणा हो जाती है. 

कहीं गोली चलने की आवाज़ सुनाई देती है. वह दौड़ता हुआ अपने तबेले की ओर भागता है. दरवाज़े पर अचानक किसी से टकरा जाता है. दोनों व्यक्ति गिर जाते हैं. ज़मीन से उठते हुये सामने वाला पूछता है, चोट तो नहीं लगी. वह अपनी पत्नी से कहता है, दरवाज़ा बंद कर लो. पुलिस आ रही है. उसकी पत्नी कहती है. सेठ का आदमी आया हुआ है. उधर अँधेरे में. 

वह बैठ जाता है, नहीं वह वहीं गिर पड़ता है. 

पत्नी उदासी से कहती है. 
मैं जानती हूँ तुम इसे सह नहीं सकते. पर... पर वह मुझे पसंद जो नहीं करता था. 
***

पाकिस्तान से आये सिन्धी को तबेले में रुकने देने के एवज में सेठ के आदमी द्वारा उसकी बहन की अस्मत का हर लेना. दुखियारी पत्नी का कहना कि वह अगर उसके साथ राज़ी हो जाता तो वह कभी बहन के साथ न होने देती. फिर ये कहना कि रहने को ठिकाना मिल गया है. परदेस में कैसी इज्ज़त ? यह मनुष्यता नहीं है. मनुष्य का रोज़गार, घर और इज्ज़त के साथ जीवन यापन कर पाना ही सभ्यता में जीने की निशानी होती है. 

कहानी मेरी आत्मा को ठोकर मारती है. मेरे चेहरे पर थूक देती है. मेरे हिरदे को बींध देती है. मैं सुबह के अख़बार के पहले पन्ने पर एक तस्वीर देख रहा हूँ. बेंगलुरु से असम लौटते हुए असंख्य नौजवानों की, या शायद देख रहा हूँ कि हज़ारों सिन्धी पाकिस्तान से चले आ रहे हैं. या मैं पांच हज़ार साल पुरानी सभ्यता वाले इंसान के वतर्मान को देख रहा हूँ. 
***
[Image courtesy : deccanchronicle.com]

August 17, 2012

कुछ बात और है कि...




एक बरसा हुआ बादल था, जैसे दुख से भरी युवती का सफ़ेद पीला चेहरा। एक मिट्टी की खुशबू थी कीचड़ से भरी हुई। एक आदमी की याद थी जो मर कर भी नहीं मरता। एक तुम थे जिसने कभी दिल की बात कही नहीं और एक मैं था कि जाने क्या क्या बकता गया।

साहब क्या खोज रहे हो?

ईमान का एक टुकड़ा बचा था
खो गया है

आचरण के गंद फंद अब कहां मिलेगा.
****

मैडम जी, ये कैसी उदासी?

चप्पल की एक जोड़ी अम्मा ने दी थी
जाने कहाँ गयी है
घर परिवार के झूठ झमेले में अब कहां मिलेगी.
* * *

बेटा जी, किसलिए यूं मुंह फुलाए

मेरे वो, सोशल साईट से विदा हो गए
सेल नंबर भी बंद पड़े हैं
मीका जाने कब गायेगा, तूं छुपी है कहां मैं तड़पता यहाँ
* * *

ओ टकले कारीगर, ये कैसी चिंता

दो रुपये का छोटा रिचार्ज करा कर
बच्चे घर से पूछा करते हैं
बापू, सौ रुपये का खाना लेकर कब आओगे.
* * *

डॉक्टर जी ये हैरत है कैसी

पैंसठ साल की ये बुढ़िया
दिन भर में दस रुपये का कपड़ा सी लेती है
सोच रहा हूँ मोतियाबंद के जालों में से दिखता कैसे है?
* * *

गाँधी टोपी वाले ट्रक डिलेवर रूठे क्यों हों

तुम लोगों ने देश की गाड़ी कंडम कर दी
गियर का भी ग्रीस खा गए.

चरखे सारे टूट गए हैं, गंद कमल पर छाई है,
लाल रंग पर उगा घास फूस, ले देकर एक मैं ही बचा हूँ,

मुझको इस गाड़ी का डिलेवर बनाओ.
* * *

बाबू साहब इतनी चुप्पी क्यों है?

जिन लोगों को है शक्कर की बीमारी
वे सिर्फ़ इशारों में बात करेंगे
वे देश की आज़ादी के लिए सबसे बाद मरेंगे.
* * *

ओ शराबी, तुम ये क्या बकते हो?

मैंने थोड़ी ज्यादा पी ली है
मैं कुछ कुछ थोड़ा बहक गया
सुबह होते ही टैम से दफ्तर जाऊँगा, दफ्तर में चुप होकर सो जाऊंगा.
* * *

[Image courtesy : orkutgallery.com ]

August 3, 2012

कभी सोचा है तुमने?


पिछले कई दिनों से कहानियों के ड्राफ्ट्स को मुकम्मल करने के काम में लगा हूँ। छब्बीस हज़ार शब्दों वाली कुल छः कहानियाँ मेल के जरिये दोस्त को भेज दी थी। कल तक तीन और ड्राफ्ट को पूरा कर लिया। बारह हज़ार शब्द और हो गए, सोचा चलो पूरा हुआ पहली किताब का काम। विंडोज़ सेवन प्लेटफार्म पर एमएस वर्ड में काम कर रहा था। जैसे ही वर्ड को बंद किया तो उसने पूछा आपके क्लिपबोर्ड पर कुछ बहुत ज्यादा इकट्ठा हो गया है। क्या इसे फिर भी सेव किया जाए। मैं कहानियों को कंट्रोल एस करके निश्चिंत था इलिए कहा जाने दो। वर्ड ने मेरा कहना माना और सब किए धरे को वापस असली शक्ल में पहुंचा दिया। 

एक बार जी उदास हो गया। फिर सोचा कि चलो अच्छा हुआ। ये कहानियाँ कौनसी बेस्ट सेलर होनी है। अपना ही लिखा है और मिट जाने से अपन ही उदास हैं। आओ सुकून का काम करते हैं, कुछ बेवजह की बातें करते हैं 


मास्टर के हाथ में डंडा 

यूं तो बड़ी चालाकी से किया था शामिल
उसने बदनीयती को दुनिया में
मगर अब नहीं करता यकीं कोई, खुद उसकी नीयत पर ।

कभी कभी फूटी किस्मत ईश्वर को भी ले डूबती है।
* * *

शाम और रात के बीच का कोई वक़्त 

और भी उबलेगी भट्टी कच्ची शराब की
और भी भुने हुये चनों की खुशबू फैलेगी
कि दुनिया और खिलेगी खूबसूरत होकर।

मगर इस दुनिया से जो चीज़ खो जाएगी, वो मैं हूँ।
* * *

आवाज़ का सत्यापन 

विज्ञान के विद्यार्थी ने कहा 
आवाज़ एक भौतिक चीज़ है
और पिए हुए खरगोश ने उसका मुंह चूम लिया।
* * *
आवाज़ का परिणाम 

उसकी आवाज़ को पहली बार छू लो तो
किसी सूरत न समझ पाओ कुछ
हैरत की उलझनों में होश नाकाम हो जाये.

कि दिल जो चाहे उसे हालात कब चाहा करते हैं
* * *
[Image courtesy : Johnass]

August 2, 2012

मेरी मुट्ठी में सूखे हुए फूल हैं


बदहवास दौड़ती हुई ज़िन्दगी को कभी कोई अचानक रोक ले तो कितना अच्छा हो. हासिल के लिए भागते हुए, नाकामी का मातम झोली में भरते जाना और फिर ज़रा रुके नहीं कि दौड़ पड़ना. याद के वे खाने सब खाली. जिनमें रखी हों कुछ ऐसी चीज़ें कि आखिरी बार सुकून से एक ज़िन्दगी भर साँस कब ली थी, पानी को पीने से पहले ज़रा रुक कर कब देखा था कि मौसम कैसा है. वो कौनसा गीत था जो बजता रहा दिल में हज़ार धड़कनों तक, आखिरी बार कब उठे थे. किसी प्रियजन का हाथ थाम कर... ऐसे सब खाने खाली. 

हमारे भीतर किसी ने चुपके से हड़बड़ी का सोफ्टवेयर रख दिया है. विलासिता की चीज़ों के विज्ञापन उसे अपडेट करते जाते हैं. इस दौर का होने के लिए आदमी ख़ुद को वस्तु में ढालने के काम में मुसलसल लगा हुआ. वस्तु, जिसकी कीमत हो सके. वस्तु, जिसे सब चाहें. वस्तु, जिसके सज़दे में दुनिया पड़ी हो. ऐसा ही हो जाने के लिए भागम भाग.

रेल का फाटक दिन में कई दफ़ा रोक लेता है. हमारे शिड्यूल में रेल का फाटक नहीं होता इसलिए परेशानी, झल्लाहट और बेअदबी भरे वाक्य हमारे भीतर से बाहर की ओर आने लगते हैं. अपना स्कूटर एक तरफ रोक कर फाटक के नीचे से आने जाने वालों के लिए मैं उचित रास्ता छोड़ कर खड़ा हो जाता हूँ. एक तीन पहिये वाले सायकिल रिक्शा पर प्लास्टिक का बहुत बड़ा थैला रखा है. थैले ने पूरा रिक्शा ढक रखा है. इसमें पोलिबैग्स और कागज का कचरा भरा हुआ है. 

मैं अपने सेल फोन के व्हाट्स एप्प पर देखता हूँ किसका स्टेटस अवेलेबल है? एक नन्ही लड़की मेरी पेंट को पकड़ कर खींचती है. "बाबूजी..." वह माहिर सियासतदाँ लोगों की तरह कोई ऐसा वाक्य बोलती है, जिसको साफ़ समझा न जा सके मगर ये मालूम हो जाये कि जो भी देना चाहो, दे दो. काले और लाल रंग के चैक से बनी उसकी फ्रॉक बेहद गन्दी. चीकट और मिट्टी से भरी हुई. बांया कॉलर भीगा हुआ. मैं सोचता हूँ कि ये इसके मुंह में रहता होगा. 

मुझे मुस्कुराता देख कर लड़की फिर से कहती है. "बाबूजी..." मैं उसके सर पर हाथ फेरता हुआ मना कर देता हूँ. उसके बाल किसी उलझी हुई कंटीली झाड़ी जैसे बेहद रूखे और बेजान थे. मैं चाहने लगता हूँ कि बादल बन कर बरस जाऊं. इस लड़की के सर से सारी मिट्टी को धो डालूँ. अचानक से रिक्शे के पास से उसके पांच भाई बहन एक साथ नमूदार होते हैं. एक एक साल के फ़ासले से दुनिया में आये हुए से... तो मन बदल जाता है. अब मैं बादल होने की जगह नसबंदी करने वाला डॉक्टर हो जाना चाहता हूँ. मेरा मन एक पत्रकार के लिए श्रद्धा से भर जाता है, जिन्होंने उम्र भर अख़बार के लिए नसबंदी के लक्ष्यों की रिपोर्टिंग की थी. 

एक लड़की आवाज़ देती है. दूसरी उसके पीछे. रेलवे के गेटमैन के पास पानी की मटकी रखी हुई है. सब उससे पानी पीने लगते हैं. गेटमैन उनको भगा देता है. भागती हुई लड़की, पचास साल के उस आदमी को कहती है, जा रे लंगूर ! लंगूर, देखने लगता है कि रेलगाड़ी आ रही है या नहीं. मैं देखता हूँ कि सेल फोन के स्क्रीन पर क्या लिखा है. मेरे आगे खड़ा हुआ एक दक्षिण भारतीय आदमी, एक स्कूटर वाले को देखते हुए कहता है. आप उस तरफ से कोशिश करिए, उधर शीशा नहीं अटकेगा. 

गोल मोल सी नन्ही बच्ची जो उसकी गोदी में थी. वह मेरी ओर देखती है. रिक्शे वाली लड़कियों का दल, मांगना भूल कर उस नन्हीं बच्ची के हाथ और पैर छूने लगता हैं. वे बहुत दुलार से उसकी अँगुलियों को आहिस्ता से सहलाती है. पीछे से एक मोटरसायकिल वाला कहता है. ये एलपी यहाँ क्यों फंसाई है रे छोरियों. एलपी माने पच्चीस फीट लम्बा ट्रक. लड़कियां उसे नज़रंदाज़ कर देती है. वह फिर कहता है. कोई आदमी हो तो कुछ कहें भी, इन लड़कियों के मुंह कौन लगे? 

एक लड़की कहती है. जा आदमी के मुंह लग. 
मैं उस लड़की को शरारत भरी निग़ाह से देखता हूँ. उसे अहसास करता हूँ कि तुमने अभी अभी मोटरसायकिल वाले को जो गाली दी, उसे मैंने सुन लिया है. लड़की अपना मुंह बड़ी बहन के पीछे छिपा लेती है. बड़ी बहन मुस्कुरा कर मुंह फेर लेती है. मेरे सामने मैले कपड़ों में मुस्कुराता हुआ एक संसार पसर जाता है. बशीर बद्र साहब की याद आती है. मेरी मुट्ठी में सूखे हुए फूल हैं, खुशबू को उड़ा कर हवा ले गई. 

रेलवे फाटक के खुलने का सब इंतज़ार करते हैं. एक दूसरे के चेहरे देखते हुए पहचान कायम करने लगते हैं. कोई भूली हुई बात सोचते हैं. लम्बी साँस लेते हैं. अपने वाहन से उतर कर पैरों पर खड़े होते हैं. सेल फोन पर किसी प्रियजन को याद करते हैं. कोई भूला हुआ हिसाब याद दिलाते हैं. ऐसे ही जब कोई रोक लेता है, बदहवास दौड़ती हुई ज़िन्दगी को तो हम उसके सबसे करीब खड़े होते हैं.

[सांध्य दैनिक राजस्थान खोजख़बर में प्रकाशित कॉलम]
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[Image courtesy : slodive ]

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.