April 27, 2013

प्यासे तारे कूद पड़े दो प्यालों में

अभी कुछ देर पहले कुदरत ने आसमान के बीच खींची बादल से एक रेखा। मैंने कहा मेरा महबूब उस पार, मैं इस पार। कुदरत ने उसे मिटा कर बना दिये असंख्य पहाड़। मैंने कहा मैं इस चोटी पर वो उस चोटी पर। उसने पहाड़ों पर घुमाया हाथ और बना दी असमतल ज़मीन। मैंने कहा मेरे भी पाँवों में छाले, महबूब के पाँवों में भी छाले। मैं भी थक गया उसकी ओर चलते, वह भी थक गया मेरे पास आते। कुदरत ने सब कुछ मिटा कर बना दिये असंख्य तारे। मैंने दो प्यालों में भर ली महबूब की याद भरी शाम। उस पर डूबते सूरज से चुराई नींबू की तरह गोल एक फांक को रख दिया। सब प्यासे तारे कूद पड़े इन दो प्यालों में। आखिर कुदरत कब तक करती किसी महबूब का मुक़ाबला।

मेरा महबूब तो बालकनी में मेरे पाँवों पर खड़ा हो कर चूम भी सकता है मुझे। और मेरी खूबी ये है कि मैं सिर्फ उसी से प्रेम करता हूँ।


25 अप्रैल 2013 
पूरे चाँद की रात 
मैं छत पर बिछाता हूँ एक सूती दरी। किनारे पर रख देता हूँ खाली प्याला और चाँदनी में गुम हुई स्याही के बीच जगमगाता है, मेरा अतीत। फिर आहिस्ता से दिन की लू में झड़े हुये कुंभट के हिलारिये, केर के सुर्ख ढालू और रोहिड़े के फूल हवा के साथ उड़ते चले आते हैं। मेरी छत भर जाती है अनगिनत रंगों और स्वाद से। रेगिस्तान की हर शे को फिक्र है मेरी कि मैंने सीखा है प्रेम करना इसी की गोदी में। वही प्रेम जो सौंप दिया है, तुमको... 

बालू की भंवर से टकरा कर सरगोशियाँ रचता हुआ हवा का अनदेखा जादूगर मुझे हमेशा भर लेता है अपने सम्मोहन के बाहुपाश में। तब वह पूछता है महबूब के बारे में और मैं कुछ बेवजह की बातें कहता हूँ। दुनिया के सबसे प्यारे इंसान, मेरे महबूब के बारे में बातें... 
* * *

20 अप्रैल 2013 
क्ले से मेम बना देती है खरगोश के कान, 
जिराफ़ की गरदन, बंदर की पूंछ और एक काओला की मुस्कान। 
मैं क्ले और तुम मेम। 

उसने कहा कि इस मंत्र के बाद बोलो अपने महबूब का नाम। वो चोर पंडित चाहता था कितनी बड़ी दक्षिणा।

मैं एक परिंदे का दिल ले जाऊंगा रफ़ूगर के पास। इसके बदले वह मुझे अपनी चोंच उधार देगा, प्रेम करने के लिए। तुम क्या कहते हो, कर लूँ ये सौदा? 

मैं शाम के कान में कहता हूँ वही बात जो तुमने मुझसे कही थी। कि हम फिर मिलेंगे। शाम भीगी आँखों से मुसकुराती है। 

बादल की तिरछी रेखा के नीचे, शाम की आखिरी टहनी से, कूद जाता है तेरी याद का लम्हा, मेरे गले लगने को। तुम सचमुच बहुत प्यारे हो। 

प्रेम के मुकुट में जो तुम्हारी हंसी का मोरपंख लगा है, उसे देखने के लिए आंखे नहीं चाहिए। मन काफी है। 

ज़ख्म सीले थे और कुदरत मुझ पर नाराज थी। इसलिए बादल ने किया धूप की चादर में छांव का सुराख, धरती के जिगर की उमस ने पी लिया बादल को। रात की झोली ने सोख लिया पानी और आंधियों के पास नहीं थी कोई दवा इसलिए उन्होने ढ़क दिया ज़ख़्मों को रेत से। 

मैंने कहा शुक्रिया! 
पूरब की ओर से सुबह फिर आई है, तुम अपनी बेरुखी पर नाज़ कायम रखो कि ज़ख्म अब भी वहीं है, रेत की चादर के नीचे, तुम्हारी खुशी के लिए। 
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19 अप्रैल 2013 

हर सुबह चिड़िया देती है अर्ज़ी तुम्हारी छुट्टी की, चाय के प्याले में आँख की परछाई लिख देती है, मंजूर। कायदे से चल रहा है कारोबार इंतज़ार का। 

दिन सूना खाली चेहरा था और मौसम में कोई खुशबू ही न थी। और फिर किसको पुकारें, जाएँ कहाँ कि आवाज़ देने को कोई खिड़की ही न थी। बस शाम हुये बारिश ने जी को एक थपकी दी है। बूंदों की आवाज़ें अब भी पर्दे से छन कर आती है, तुम न बोलो तो न ही सही... 
* * *

18 अप्रैल 2013 

गरम सांस सी लू की लहर ने चूमा बदन, इंतज़ार में खिले आक के फूल बिछ गए ज़मीं पर। ओ महबूब ! रेगिस्तान प्यारा है कि तुम इसकी हर शै में हो। 

तपती रेत पर रख दिये हैं रात ने अपने होठ, मैंने पौंछ ली है, गर्द सेल फोन के स्क्रीन से। बिजलियाँ तेरी याद की, बादल मेरी चाह के। 
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April 24, 2013

दुछत्ती से उलटा लटका मकड़ा


बेरी पर खिले हैं कच्चे हरे पत्ते और कोमल कांटे। तुम्हारे बदन के अनछुए कच्चे रंगों की नक़ल उतारी है कुदरत ने। वक़्त के सितम तक के लिए। इस सुबह की किनारी पर लिखे हुये हैं तुम्हारी आलस भरी अंगड़ाई से पहले के मेरे बोसे। बासी मुंह मगर दम-ताज़ा आत्मा की पक्की मुहर वाले। ऐसा क्यों है कि तुमने गिरा रखा है खिड़की पर पर्दा, मैं पलट रहा हूँ याद के एल्बम से कई तस्वीरें। सूने रास्ते, नए मकान, और शाम। 
मैं तुम्हारे इंतज़ार के धागे से बंधा हुआ इस वक़्त दुछत्ती से उलटा लटका हुआ मकड़ा हूँ। तुम अदृश्य हवा की तरह दे रही हो मेरी ज़िंदगी को झूला। मैं तुम्हें न पाकर घबरा जाता हूँ। जबकि सुबह के इस वक़्त मेरी माँ पौंछ रही है उदासी, पिता की याद की। मैं सोचता हूँ कि पिता हमेशा के लिए जाने की जगह यहीं रह कर माँ को रुलाते तो भी अच्छा था। जैसे तुम नए बहाने से रुलाते जाते हो हर दिन मगर तुम होते हो इसी बात से खुशी आ जाती है। 
मैं क्या करूँ कि गिर रहे हैं परिंदों के कोमल पंख हवा में तैरते हुये। दिन की तपन बढ़ती ही जा रही है। रेगिस्तान का मौसम जाने किस उदास आदमी ने लिखा था। यहाँ वक़्त की सबसे बड़ी मंडी में खूब तंगी हैं इन दिनों कि तुम्हारी याद के ज़रूरी काम में डूबा हुआ हूँ। 
पानी के मटके से टपकती है बूंद। हर आवाज़ के साथ मेरा दिल डूबता जाता है। समय छीज रहा है। 
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April 21, 2013

शायर और अफ़साना निगारों के बारे में कुछ झूठी बातें।


असल में शायर कुछ नहीं होता, वह आफत की दुलत्ती, हराम की आदत, ख़्वाहिशों, रास्तों, मुश्किलों और तकलीफ़ों से निजात के लिए अपने ख़यालों में तवील बोसे और आला दर्ज़े की शराब बुन रहा, एक मामूली आदमी होता है और हम उसे समझ बैठते हैं, शायर दिल। उसकी छोटी तकलीफ़ें बहुत सारी होती हैं जैसे सलाम न बजाने वाला जमादार, टेढ़ी निगाहों से देखने वाला सूदखोर या साथ सोने से इंकार कर देने वाली औरत जिसे वह कई वजहों से समझता रहा है, बेईमान। और बड़ी तकलीफ़ एक ही हुआ करती है उसके साथ सोने के बाद उसकी आँखों के प्याले में बेरुखी भर कर चली जाने वाली नक़ली महबूबा। 
ठीक ऐसे ही अफ़साने कहने वाला आदमी वो जानवर होता है जो जीए हुये की जुगाली करने में, जीने से ज्यादा मजा पाता है। वह अपने आप के साथ सोया रहता है रात - दिन और जब इस हमज़ाद सेक्स से उकता जाता है तब बैठ जाता है पीने के लिए और सोचता है ज़िंदगी में आए उन किरदारों को, जिनके बारे में वह इसलिए नहीं लिख पाता कि अब भी जकड़ा होता है, मुहब्बत के बेड़ियों में।
इस दौर में भी पुराने ज़माने की तरह शायर/शाईरा या अफ़साना निगार हो जाने को दो तीन बच्चों वाली माँ या चालीस पार के एक अधेड़ उम्र वाले आदमी से प्यार करने की हिम्मत चाहिए जो किसी फिरे हुये सिर में ही होती है। ऐसे आदमी और औरतों के बारे में खयाल आते ही मुझे याद आता है वह तमाशेबाज़, जो अपनी पीठ पर कोड़े बरसाता हुआ हर सुबह गलियों में घूम कर, बच्चों का मन बहलाता सिर्फ इस बात का रखता है ख़याल कि कोड़े की आवाज़ जाए दूर से दूर तक। 
असल में मुझे लिखना कुछ और था मगर मेरी रूह की खाल जिस कसाई से उतार रखी है, उसकी याद से बाहर आना बड़ा मुश्किल है। फिर हर लम्हे को नहीं डुबोया जा सकता शराब में कि सुबह के वक़्त शराब ऐसी लगती है मुझे, जैसे किसी आदमी की आत्मा को नंगा देख लेने के बाद महबूबा छिप जाती है अफ़सोस के पलंग के नीचे और कोसती रहती है अपनी हवस को।
लेकिन मुद्दे की बात ये है कि जिस औरत की नाभि को बीच से सीधा काटती हुई एक लकीर जाती है उसकी छातियों तक, मैं उसी की मुहब्बत में जी रहा हूँ। वरना अब तक मेरी खाक उड़ कर ढ़क देती तुम्हारी पेशानी की तमाम सलवटें और तुम अगर भले आदमी या औरत होते तो दो पल के लिए रो देते मेरे नाम को।
इन बीते महीनों में मैंने कुछ लिखा नहीं है कि मैं लिख सकने के लायक ही नहीं हूँ अगर मैं अफ़साना निगार हो सकता तो लिखता कि ऐसी लकीर सिर्फ उस महबूब को ही याद रहती है जिसने अपनी ज़िंदगी पर बख़ुशी लगा दी हो ज़िबह हो जाने की मुहर। इस वक़्त मैं तड़प रहा हूँ बाज़ की चोंच से घायल परिंदे की तरह।मगर यूं कब तक मैं बचा रहूँगा शराब से और नई औरतों से मालूम नहीं मगर इतना तय है कि जब तक बाकी है तेरी याद शायर दिल कुछ नहीं होता और अफ़साना निगार होना कोई अच्छी बात नहीं है।
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ये पेंटिंग गूगल से ली गयी है। इसके बारे में मुझे कोई समझ नहीं है कि सारे पेंटर हर रोज़ अपनी आत्मा को ढ़क देते हैं नए रंग में।

April 19, 2013

सब चारागरों को चारागरी से गुरेज़ था

मैं जयपुर से जोधपुर के लिए रोडवेज की बस में यात्रा कर रहा था। गरम दिनों की रुत ने अपनी आमद दर्ज़ करवा दी थी। ये काफी उमस से भरा हुआ दिन था। शाम के सवा छह बजे चली बस से बाहर के नज़ारे देखने के लिए अधिक समय नहीं मिला। कुछ ही देर बाद सड़क पर रोशनी की चौंध और आस पास से गुजरती हुई गाड़ियों के हॉर्न की आवाज़ों के सिवा सब कुछ कुदरत ने अपनी स्याही में छिपा लिया था। यात्री एक विध्यार्थी होता है। वह अनजाने ही अनगिनत चीज़ें सीखता रहता है। शायद इसीलिए पुरखों ने कहा होगा कि घर से बाहर निकल कर देखो कि दुनिया क्या है? लेकिन मैं पुरखों की सलाह के लिए नहीं बना हूँ। मुझे अकसर एक ही जगह पर बैठे रहना सुखकर लगता है। लेकिन ऐसा हमेशा संभव नहीं होता है। ज़िंदगी है तो गति भी है इसलिए मैं बस की पाँच नंबर सीट पर बैठा था। अचानक कुछ यात्री इस बहस में थे कि सात और आठ नंबर सीट किसके लिए है। जो यात्री बैठे थे उनका दावा था कि उन्हें टिकट खिड़की से कहा गया है कि इसी सीट पर बैठा जाए। एक सज्जन कह रहे थे कि ये सांसद कोटे की सीट है। कंडेक्टर ने बैठे हुये लोगों को उठाया और उनकी जगह एक वृद्ध दंपति ने ले ली। उन दोनों को देखते ही लगा कि उन्हें सीट ज़रूर मिलनी चाहिए थी। वे देश के वरिष्ठ नागरिक थे और उनकी सेहत का हाल खास अच्छा नहीं था। उम्र के गिरते हुये साल उनकी तस्वीर पर अनेक परछाइयाँ छोड़ गए थे। जिन पाँवों से उन्होने अनिगिनत मील सफ़र तय कर लिया था वे अब एक एक पग रखते हुये डगमगा रहे थे। उनके बाजू हाथ में पकड़ी हुई छड़ी से पैरों को सहारा दे रहे थे। मैं इस दंपति को भूल कर इस ख़याल में खो गया कि सांसद अथवा विधायक कोटे की सीट पर मैंने आखिरी बार कब किसी विधायक या सांसद को सार्वजनिक परिवहन सेवा का उपयोग करते हुये देखा था। मुझे कई बार रेल यात्राओं के दौरान विधायक और सांसद यात्री के रूप में मिले हैं लेकिन बस में इस उम्र के दौरान किसी को नहीं देख सका। अचानक से मेरे दिमाग में अनेक एसयूवी गाडियाँ घूमने लगी। ऐसी गाडियाँ कि जिनका डील डौल देख कर ही एक आम आदमी की हवा निकल जाए। वे किसी गेंडे या अफ्रीका के विशालकाय टस्कर के रूप सी भव्यता लिए हुये होती हैं। उनको देखते हुये मेरे जैसे छह फीट लंबे आदमी को लगता है कि वह एक शक्तिशाली चीज़ के पास खड़ा है। ये गाडियाँ मुझे सिर्फ विलासिता की ही नहीं वरन रुआब की प्रतीक लगती है। मैं बेहद उदास हुआ कि मैंने कभी बस में हमारे चुने हुये जन प्रतिनिधियों को सफ़र करते हुये नहीं देखा। मैंने सोचा कि काश वे कभी बस की यात्रा करते और देखते कि बसों का सफ़र कैसा होता है। राज्य के लोगों को कैसी परिवहन व्यवस्था मिल रही है।

अजमेर से एक भद्र महिला बस की एक नंबर सीट पर आयी। उनके हाव भाव और सहयोगी को देखकर मुझे लगा कि वे प्रशासनिक सेवा के किसी ग्रेड की नयी अधिकारी होंगी। इस बस में सवार कुछ परीक्षार्थियों से उन्होने उसी दिन हुई परीक्षा का पर्चा मांगा। दो तीन लड़के उन मैडम के इर्द गिर्द जमा हो गए। मैडम और बच्चों की शिकायत थी कि रीजनिंग वाले हिस्से ने बहुत सारा वक़्त खा लिया था। इसके बाद वे अपनी सीट पर बैठी हुई टेब से कुछ सर्फ करती हुई इधर उधर देखती रहीं। उन्होने अपने पाँवों को बेलौस सामने के काँच के पास लगी हत्थी पर टिका लिया था। वे किसी की परवाह किए बिना अपनी धुन में थी। बस का कंडक्टर एक भला आदमी दिखता था। लेकिन रात के अंधेरे में उसकी भलाई को नींद आ गयी होगी कि उस महिला को कहना पड़ा। कंडक्टर साहब अपना हाथ ठीक से रखिए। इस घटना के बारे में मुझे मेरे पासवाली सीट पर बैठे हुये यात्री ने बताया था। उनक कहना था कि देखिये आजकल कितना सख्त कानून है फिर भी पढे लिखे सरकारी सेवक भी अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आते। मुझे बेहद दुख हुआ कि एक महिला अधिकारी के सामने भी इस तरह के हादसे पेश आते हैं। मैं उन अनपढ़ महिलाओं के बारे में सोचने लगा जो दिल्ली से जोधपुर आ रही रेल में सवाई माधोपुर के आस पास कहीं से जनरल डिब्बे में चढ़ी थी। उनके पास लकड़ियों के गट्ठर थे। कंडक्टर को इस बात पर आपत्ति थी। जब बहस होने लगी तो मैंने भी सामान रखने की जगह पर बैठे हुये देखना शुरू किया। कंडक्टर ने उन नौजवान महिलाओं के साथ बदसलूकी शुरू कर दी थी। आधी रात के बाद के वक़्त में रेल डिब्बे के शौचालय के पास कंडक्टर उनसे शारीरिक छेड़ खानी किए जा रहा था। वे औरतें बहुत देर तक बर्दाश्त करती रही। आखिरकार उन सब ने एक होकर कंडक्टर को पीटना शुरू कर दिया। जब एक महिला कंडक्टर के सर के बाल पकड़े हुये उसे दबा रही थी और दूसरी पीटने लगी तब डिब्बे में बैठे हुये पुरुषों ने उन औरतों का साथ देना शुरू किया। आखिर मार खाया हुआ सरकारी सेवक माफी मांग कर डिब्बे से उतर सका। मैंने सीखा कि अपनी लड़ाई को खुद ही लड़ना चाहिए और अपमान को बर्दाश्त करते जाने से बेहतर है कि उसका शुरुआत से ही प्रतिरोध किया जाए। ये सबक मुझे अनपढ़ मजदूर औरतों ने सिखाया था।

हम जिस सुंदर समाज की कामना करते हैं वह हमें मुफ्त में चाहिए। हम कोई संघर्ष, कोई प्रतिरोध और कोई श्रम किए बिना उसे पाना चाहते हैं। हमारे भीतर बस पाने की चाहना है। त्याग को हम भूल चुके हैं। हमें रुतबा चाहिए, एसयूवी गाडियाँ चाहिए, नाज़ उठाने को नौकर चाहिए, सलाम बजाने को जनता चाहिए। ये हम कैसे हो गए हैं और इससे आगे निरंतर कैसे होते जा रहे हैं। रात एक बजे मैं अपने भाई के घर आकर सो गया। सुबह मेरी जब आँख खुली तो रात की उदासी पर एक बहुत बड़ी खुशी रखी हुई थी। समाचार पत्रों में जिस खबर पर नज़र गयी वह एक आम दिखने वाली किन्तु बेहद उम्मीदों से भरी खबर थी। राजस्थान उच्च न्यायालय के दो माननीय न्यायाधिपतियों ने अपनी गाड़ी से लाल बत्ती हटा लेने का फैसला किया था। मेरा मन उनके प्रति असीम प्यार से भर गया। मैंने चाहा कि मैं ऐसे लोगों को ठीक से सेल्यूट कर सकूँ। पावर के पीछे भागती हुई दुनिया को हम रोज़ देखते हैं। ऐसे उद्धरण कहीं नहीं दिखते कि अधिकारों से लेस जिम्मेदार आदमी एक आदमी की तरह जीने के संकल्प ले। अच्छा न्याय करना श्रेष्ठ गुण है लेकिन उच्च आदर्श स्थापित करने के लिए सुखों का त्याग करते जाना उससे भी बड़ा है। आज मैंने खाना खाने के बाद अपनी थाली को धोते हुये आभा से कहा कि अगर हम सब अपनी अपनी थाली को साफ रख सकें तो सींक के बासी बर्तनों से भरे होने की समस्या कभी नहीं होगी। वह मुस्कुरा रही थी। शायद उसने मन में कहा होगा कि कितने दिन? लेकिन सचमुच हम कर सकें अपने हिस्से का काम तो हमारा देश सबसे सुंदर हो जाए। फ़ैज़ साहब कहते हैं- "सब चारागरों को चारागरी से गुरेज़ था/ वरना हमें जो दुख थे बहुत लादवा न थे"
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April 18, 2013

कुदरत ने बख़्शी है मुझे खुशियाँ

मैंने घर बनाने के लिए चीन्ही हुई ज़मीन पर बची हुई पगडंडी से गुज़रने की गलती की थी। बालकनी में खड़े हुये देखा कि कोई उठा रहा था दीवार और दो टुकड़ों में बंट रही थी पगडंडी। जिस रास्ते से हम गुज़रे थे उसे मिटते हुये देख कर आई उदासी से बाहर आने के लिए उस कच्चे रास्ते को भूल कर पक्के डिवाइडर तक गया। जहां कभी हम दोनों बैठे थे। मैं लिखना चाहता था कि चाहे किसी भी धुंध से गुज़रना हो, मैं गुज़रूँगा तुम्हारे प्यार से भरा हुआ दिल लेकर। ज़िंदगी के निशान न दिखेंगे, वक़्त की आहट न सुनाई देगी, मौसम बेनूर हो जाएगा मगर मुझे कोई न कर सकेगा तन्हा कि साथ चलता रहेगा, तेरा नाम...

खुशी अल्हड़ दिनों की याद का नाम है और उदासी ज़िंदगी की जेब से गिरा हुआ मुहब्बत भरा लम्हा।
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हैरत के पिंजरे में खामोश एक चिड़िया, मौसम से बेखयाल हवा का चुप्पी का राग। ये दोनों बातें हैं हमारे ही बारे में।
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मैं रात की नमी सा किसी पलक पर बसा हूँ, तुम हो मन में खिल रहे, उजाले की मानिंद। कुदरत ने हमारे बीच ये कैसा फासला रखा है।
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किनारे से फटा हुआ ज़िंदगी का नोट लिए सीढ़ियों पर उदास बैठा रहता हूँ। कई बार मन के खोटे सिक्के को टटोलता हूँ। कई बार जब तुम होते नहीं हो।
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तुम एक गहरे सागर हो, मैं हूँ एक उथला दरिया। मेरी मिट्टी को छान कर तुम, मुझे अपने दिल में रख लो।
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हवा की गिरहों में देखा है तुमको, कभी पाया है चिड़ियों के गीत में। कुदरत ने बख़्शी है मुझे खुशियाँ ये कैसी कैसी।
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पहाड़ पर सुबह की रोशनी उतरने को है, दुनिया के किसी कोने में कहीं कोई शाम उतरती होगी। ज़िंदगी हवा में उछाला हुआ एक सिक्का भर है।
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वक़्त ने बुहार दी है हर शे, झड़ कर बुझ चुके, फूल सारे दिन और रात के। मगर याद के बूटे पर, तेरी आधी खिली मुस्कुराहट जगमगाती है।
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मैंने पी ली है इतनी कि भूल जाऊँ दुनिया को, इतनी भी नहीं कि महबूब न रहे मुझको याद।
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तुम यहाँ होते तो देख सकते थे, अपने महबूब के मुक़ाबिल एक सूरज। लेकिन पहाड़ की ओट में डूबता हुआ। 
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[Painting Image Courtesy : Daniel Chiriac]

April 9, 2013

कई दफ़ा और रूआँसा लड़की

मैं मीना कुमारी हो जाता हूँ। मेरे दोनों नाम नाकाम हो जाते हैं। मैं न महजबीन बानू होता हूँ और न मीना कुमारी। मैं अपने प्याले को भरते हुये एक ऐसे आदमी के बारे में सोचता हूँ जिसे किसी मौलाना ने कहा था कि चूम लेना, साथ सो जाना हराम नहीं है, मुहब्बत की क़द्र करना हराम है। मैं प्याले को भरते हुये कहता हूँ- जुगनू की उम्र उसके पीछे दौड़ रही रोशनी है। इसी रोशनी में अपनी दायीं टांग से जींस को ज़रा ऊपर कर लेता हूँ। मैं गिर पड़ता हूँ। 

मुझे लगता है जैसे मीना गिर पड़ी हैं। या मैं ही मीना कुमारी हो गया हूँ। मेरी कार का ड्राईवर सीढ़ियाँ चढ़ कर आता है और कहता है बीबी आपको सहारा दूँ। मैं कहती हूँ- "नहीं, मुझे यूं ही आँगन पर गिरे पड़े रहने दो।तुम मेरी जगह खिड़की में खड़े हो जाओ और देखो धर्मेंद्र की गाड़ी आ रही है क्या?" वह नहीं आता। नए लौंडों को भी कितना गुमान होता है, अपने होने का। देखना मैं एक दिन ऐश की रोशनी और चाहतों के नूर से दमक रहे ज़िंदगी के इस बेनियाज़ प्याले को ठोकर मार दूँगी। बिखरी हुई शराब और गिरे पड़े प्यालों के बीच कुछ गहरी नज़्में मैं सौंप दूँ किसी ऐसे आदमी को जिसको दुनिया में बड़े नाम की तलाश हो। जो खुद को मशहूर देखना चाहे। मुझे बस एक उसी से मुहब्बत है। उसका नाम लेने से उसका घर बरबाद हो जाएगा। इसलिए मैं फिलहाल चाहती हूँ कि मेरे प्याले को फिर से कोई भर दे। कोई देखता रहे कि किसी कार की हैडलाइट इस ओर मुड़ती है क्या?


रूआँसा बैठी हुई लड़की
भरे हुये जलतरंग जैसी होती है
आप उसके गालों के ठीक पास
लहरों के आलोड़न से पूर्व की कंपन सुन सकते हैं
अगर आपने कभी पिया हो उदासी का समंदर।

और रूठा हुआ महबूब साँप की बांबियों में
हाथ डालता हुआ सपेरा होता है
ज़हर और दांत के बीच का बारीक फर्क
टटोलता है, सिर्फ किस्मत के सहारे।

मैं अभी ऑफिस से आया हूँ और सोच रहा हूँ
कि कासे में कॉफी की जगह अच्छी विस्की
या जिंदगी में किसी की जगह कोई होता तो क्या फर्क पड़ता?

मौत एक दिन सबको आनी है
प्याले एक दिन सब खाली हो जाने हैं।

बस तुम रहा करो।
* * *

कई दफ़ा
आवाज़ों की दुनिया में
एक चुप्पी सी तारी हो जाती है
कई दफ़ा टूटी मेहराबें बाते करती हैं।

कई दफ़ा
कितनी ही चीज़ें
पूरब से उगती हैं
और मेरे दिल में आकर बुझ जाती हैं।

कई दफ़ा
ये चाँद सितारे खो जाते है
सूरज भी मद्धम हो जाता है
कई दफ़ा
चलते चलते धरती भी रुक जाती है।

कई दफ़ा
रातों की स्याही पर
पंखों से उड़ानें लिखता हूँ
कई दफ़ा चुप्पी की टहनी पर बैठा
यादों के अक्स उतारा करता हूँ।

कई दफ़ा
मौसम सीला होता ही नहीं
और एक बूंद टपक सी जाती है
कई दफ़ा काँटों से लिखता हूँ
और अंगुली से मिटाया करता हूँ।

कई दफ़ा
सोचा है सबसे कह दूँ
गुलशन किसके नाम से खिलता है
कई दफ़ा ख़ुद से भी
तेरा नाम छुपाता जाता हूँ।

कई दफ़ा
इस दुनिया की कॉपी के पन्नों से
ख़ुद का नाम हटाता हूँ
कई दफ़ा ऐसे मरदूद ख़यालों के साये में,
तन्हा मैं डर जाता हूँ।

कई दफ़ा मैं अपने ही घर से उठता हूँ
और कहता हूँ, मैं अपने घर को जाता हूँ।

कई दफ़ा
ये चाँद सितारे, सूरज धरती
टूटी मेहराबें, रात की स्याही
पूरब से उगती हुई चीज़ें
सीला मौसम, फूल और कांटे
तनहाई और मेरे आँसू
सब कुछ गूंगे, सब कुछ बहरे

कि कई दफ़ा
जब तुम होते ही नहीं, होते ही नहीं...
* * *
[Painting Life as life - Courtesy - Olexander Sadovsky]

April 6, 2013

तुम्हारा इंतज़ार है...

चिड़िया ने दो बार कमरे का फेरा लगाया और आखिर पर्दे पर लटक कर कमरे का मुआयना करने लगी। दूसरी चिड़िया ने दोपहर में पढ़ी जाने वाली कोई दुआ पढ़ी। मेरी बेटी ने कहा पापा देखो ये चिड़ियाएं। उसने हाथ से इशारा किया और उनको उड़ा दिया। वे रोज़ दरवाज़ा खुला देखते ही घर में आने लगी। कल सुबह मैंने चिड़िया से कहा कि ये घर न होता तो शायद यहाँ कोई पेड़ खड़ा होता और तुम उस पर अपना घर बना लेती। लेकिन ये संभव नहीं है क्योंकि सब प्राणियों को रहने के लिए किसी आसरे की ज़रूरत होती है। ये घर मेरा आसरा है। मैं तुम्हारे लिए एक घर बालकनी में बना दूंगा। चिड़िया अकेली थी। उसने कुछ कहा जो मैं समझ नहीं पाया। 

घर के पीछे खाली ज़मीन पर पेड़ बनने की उम्मीद में खड़े हुये कुछ पौधे हैं। कुछ वाइट स्पाएडर लिली और कहीं कहीं आशाओं के टुकड़ों जैसी दूब बची हुई है। वहीं एक टीन की छत वाला कमरा है। इसमें पापा की मोटर सायकिल जैसे कई समान पड़े हुये हैं। इस सारे सामान में चीज़ें कुछ ऐसी है कि उनको ठुकरा दिया गया है मगर किसी रिश्ते की याद की तरह बची हुई हैं। वे चुप और मुखर होने के बीच के हाल में हैं। डायनिंग टेबल पर खाना परोसने के काम आने वाले हॉट केस और कटोरियाँ देखते ही मुझे लगा कि इनसे एक छींका बनाया जा सकता है। मैंने माँ को आवाज़ दी। माँ मैं एक ऐसा छींका बनाना चाहता हूँ जिसमें चिड़िया अपना घर बना सके। माँ और मैं मिलकर कई सारी चीज़ों को देखते हैं। सबसे आखिर में हमें एक मिट्टी का ऐसा कुल्हड़ मिल जाता है जो सबसे अधिक उपयोगी हो सके। मैं और माँ मिलकर घर के पहले माले पर बालकनी में लगी जाली में सबसे ऊपर उस कुल्हड़ को तिरछा बांध देते हैं। वह चिड़िया कपड़े सुखाने के लिए बांधे हुये तार पर बैठी ये सब देखती रहती है। मैं चिड़िया के लिए बनाए इस नए घर की तस्वीर लेने के बाद आभा से कहता हूँ एक मेरी भी फोटो ले लो। 
* * *

पीले रंग के तलवों और हरे रंग की पट्टियों वाली चप्पल पहने हुये। अजरक प्रिंट का सलवार कुर्ता पहने, हाथ में काले फ्लिप कवर वाला मोबाइल और पीठ पर एक कैरी बैग टाँगे हुये एक औरत बस के पीछे से अहमदाबाद जाने वाली सड़क पर बढ़ गयी। जयपुर जाने वाली बस ने हल्का सा हॉर्न दिया और मैं बेवजह उस औरत को देखते जाने के खयाल से बाहर आया। सुबह के सात बजने को थे। मैं बंद पड़ी दुकानों के आगे पेढ़ी पर बैठा हुआ था। मुझे कुछ फलों का रस चाहिए था। कल से मेरे बेटे की तबीयत ठीक नहीं है। वह शाम को रो रहा था। उसे बेहद तकलीफ थी कि कुछ खा भी न सका। वह खाली पेट था इसलिए उसे कल पूरी दवा भी नहीं दी जा सकी। 

हर शाम सूरज के डूब जाने के वक़्त पश्चिम में पहाड़ से चार हाथ ऊपर एक तारा उगता है। वह लम्हा मुझे बेहद प्रिय है। इतने बड़े आसमान में एक अकेला तारा। वह किसी निर्मल प्रेम की तरह इकलौता आसमान में जड़ा रहता है। मैं उसे अपलक निहारता हूँ। थोड़ी ही देर बाद एक छोटा तारा नुमाया हुआ करता है। इसके बाद मैं आसमान में तारे देखना बंद कर देता हूँ। मुझे लगता है कि महबूब के पास अब बहुत सारे लोग आ बैठे हैं। अब चलो फिर से तन्हा हो जाएँ। 

इधर बेटे के गालों से आँसू पौंछे और उधर से एकलौते तारे का जवाब आया। तुम यहाँ से चले जाओ। मैं मनाता रहा मगर वह नहीं माना। उस बातचीत के बीच में बेटे को प्यार किया कि प्रेम से बड़ी कोई दवा नहीं है। मैंने बार बार खुद को याद दिलाया शांत रहो। डोंट गिव अप। मैंने इस बीच कई बार बेटे के गालों को सहलाया। जबकि मुझे भी ऐसी ही ज़रूरत थी। मैंने खुद से कहा कि इस तनाव में याद रखो कि तुम्हें फिर से उन्हीं गुलाबी गोलियों के पास नहीं जाना है। तुमको किसी पर चिल्लाना नहीं है। बेटे को प्यार करते जाओ। अपना कूल बनाए रखो। अवसाद की बारीक रेखा के इस और उस पार होती हुई, शाम ढलती रही। मैंने वर्तमान की झूलती हुई रस्सी पर अतीत के अनुभवों के बांस को थामे रखा। 

शाम बीत गयी। अकेला तारा असंख्य तारों के बीच टिमटिमाने लगा। मैं हताश और असहाय, खुद को देखने लगा। छत पर शहर की रोशनी थी। ये चाँद के देरी से आने के दिन हैं। ये गरम दिन हैं। मगर मेरे प्यारे दोस्त केसी ये फिर से उलझ जाने के दिन नहीं है। कोई लाख सताये तो तुम लाख बरदाश्त करते जाओ। अचानक वह फिर पुकारता है। मैं बेटे को मना लेता हूँ कि कमरे का ऐसी चला लेना चाहिए। तुमको आराम आएगा। आज की शाम बहुत गरम है। वह मान जाता है। मैं खिड़की और दरवाज़े पर परदा टांग देता हूँ। 
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दिन में कुल्हड़ के बांधते ही चिड़िया ने उसका मुआयना किया और तुरंत अपनी चोंच में घर बनाने का सामान लेकर आ गयी। मैं खुश हुआ। मैंने शायद किसी को आसानी से जीने में मदद की थी। मैंने सोचा कि आत्मा जैसी कोई चीज़ होती होगी तो प्रसन्न हो जाएगी। चिड़िया मुझे दुआ देगी। माँ खुश रहेगी। शाम के वक़्त इस खुशी की याद भर बाकी थी। मैं बहुत उदास था। गुंजलक ख़यालों में छत पर टहलता हुआ। मुझे याद आया कि हाँ अच्छी विस्की और बेहतरीन वोदका रखी हुई है। विस्की दिल्ली की एक दोस्त ने मनोज के हाथों भिजवाई थी। मनोज ने अपनी पसंद की ऐबसोल्यूट वोदका भी उसी के साथ भिजवा दी थी। मेरे पास शाम थी, मन नहीं था। बेटा रोते रोते सो गया था। मैंने उसे पेट दर्द कम करने की एक दवा खाली पेट ही दे दी थी। मैं छत पर घूम रहा था। मैं सोच रहा था कि ज़िंदगी की ये शाम कितनी बेकार शाम है। फिर खयाल आया कि इससे अधिक बेकार हो जाने की खूब जगह है इसलिए शाम तुम्हारा शुक्रिया कि तुम इतनी ही बेकार हो। 
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सुबह के ग्यारह बज गए हैं। बेटा ठीक है। उसने फलों का रस पी लिया है और मूंग चावल की खिचड़ी भी खाई है। मैं कुछ लिखने और सोच पाने के बीच उलझा हुआ अब तक जाने क्या कुछ लिख चुका हूँ। बार बार उठकर बाहर बालकनी में जाता हूँ और देखता हूँ कि चिड़िया ने अपना घर कितना बना लिया है। लेकिन वहाँ कल दोपहर से एक ही चिड़िया है अपने साथी के इंतज़ार में... मैं डर रहा हूँ।
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[तस्वीर में जो चिड़िया है, इसके लिए दुआ की ज़रूरत है] 

April 5, 2013

हम जाने क्या क्या भूल गए

आज सुबह से इतिहास की एक किताब खोज रहा था। किताब नहीं मिली। इस किताब में यात्री के द्वारा लिखे गए ब्योरों में उस काल का इतिहास दर्ज़ था। पिछले साल ही इस किताब को फिर से पढ़ा था। श्री लंका के सामाजिक जीवन में गाय के महत्व का विवरण लिखा था। गाय पूजनीय प्राणी था। इतना पूजनीय कि मनुष्य से उसका स्थान इस जगत में ऊंचा था। यात्री ने लिखा कि गोवध एक अक्षम्य अपराध था। मेरी स्मृति और ज्ञान के अनुसार रेगिस्तान के जिस हिस्से में मेरा जन्म हुआ वहाँ मनुष्य के हाथों या किसी अपरोक्ष कारण से मृत्यु हो जाना क्षमा न किए जाने लायक कृत्य था। मृत गाय की पूंछ को गले में डाल कर हरिद्वार जाने के किस्से आम थे। ये दंड का एक हिस्सा मात्र था। इसके सिवा जिसके हाथों गाय की मृत्यु हुई हो उसको अपना जीवन समाज सेवा और गायों की भलाई के लिए समर्पित करना होता था। किन्तु उस पुस्तक में उल्लेख था कि मनुष्य के हाथों गाय की मृत्यु होने पर उसी गाय की खाल में लपेट कर हत्यारे को ज़िंदा जला दिया जाता था। यह रोंगटे खड़े कर देने वाला विवरण या उल्लेख हमें कदाचित भयभीत कर सकता है अथवा हमें मनुष्य को दी जाने वाली इस सज़ा के विरुद्ध खड़ा कर सकता है। इस जगत में किसी भी प्रकार की हत्या का मैं विरोधी हूँ। हत्या अगर दंड के रूप में कहीं भी किसी के लिए भी हो मैं उसका पुरजोर विरोध करता हूँ। अचानक से हो सकता है कि आप इस किताब को पढ़ते हुये सब्जी मंडी में या शहरों की सड़कों पर रास्ता रोक कर बैठे हुये गाय के वंशजों को याद करने लगें। आपको गोबर से भरा हुआ हिंदुस्तान नज़र आए। आप किसी खास तरह की गंध से नाक को सिकोड़ लेना चाहें। लेकिन मेरी स्मृतियों में और जीवन में अब भी गाय एक बेहद प्रिय प्राणी है। वह अपने नख से लेकर शिख तक और जन्म से लेकर स्वाभाविक मृत्यु के पश्चात भी मनुष्य के दाता के रूप मे हैं।

मुझे सड़कों पर बैठे हुये आवारा पशुओं से प्रेम नहीं है। मैं इनको देख कर कभी अच्छा महसूस नहीं करता हूँ। मैं इनको देखते ही एक अफसोस करता हूँ कि लालची और स्वार्थी मनुष्य ने जानवरों से इस दुनिया में उनके हिस्से की ज़मीन छीन ली है। हम कंक्रीट के शहर खड़े करते जा रहे हैं मगर ये कभी नहीं सोच पाते हैं कि आखिर गाय और अन्य प्राणियों के लिए दुनिया में जो जगह थी उसे छीन क्यों रहे हैं। हमने चारागाहों को बेच दिया। उन पर कब्जा कर लिया। उनको नेस्तनाबूद कर दिया। हमने जंगल को निगल लिया है। हमने सब प्राणियों को अपने भक्षण की सामग्री समझ लिया है। हमने कुदरत के नियमों को तोड़ मरोड़ दिया है। हम सह अस्तित्व और सहजीवन की अवधारणा को भुला कर इसी एक बात पर आ गए हैं कि इस दुनिया में रहें तो सिर्फ हम ही रहें। इस नई दुनिया में सभी प्राणियों की तरह गाय का जीवन आज हमारे जीवन से बदतर है। हमें इसकी चिंता नहीं मगर हम इस बात के लिए रोना ज़रूर रोते हैं कि नक़ली दूध पीने वाली पीढ़ी की आँखें चौंधिया रही हैं। उनका पोषण गड़बड़ाता जा रहा है। बच्चे यूरिया से बना हुआ, वाशिंग पाउडर वाला दूध पी रहे हैं। गाय नहीं चाहिए मगर दूध चाहिए। वह भी ऐसा दूध कि गाय के बच्चे मर जाएँ मगर हमारे बच्चे जीएं। कुदरत का मखौल उड़ाने वाली इस सोच के जैसे अनेक नमूने हमारे जीवन का ज़रूरी हिस्सा हो गए हैं। न हम प्रेम करना जानते हैं, न जानना चाहते हैं। क्या गाय को पालने वाले हमारे पुरखे मूरख थे। हम आधुनिक कहलाना पसंद करने वाले लोग समझदार भी कहलाना चाहते है।

कुछ दिन पहले फेसबुक पर एक स्टेटस अपडेट देखा। आओ मेले चलें। मेला शब्द हमारे जीवन के सितार के खुशी भरे तार को छेड़ जाता है। मेले में जाना और अनेक सुख बटोर लाना भारतीय संस्कृति का एक ज़रूरी तत्व है। मेला एक ऐसा आयोजन है जो उत्साह और आनंद के चरम को बुन सकता है। ये स्टेटस अपडेट डॉ नारायण सिंह सोलंकी का था। मैं उनको जानता हूँ इसलिए समझ गया कि ये तिलवाड़ा में आयोजित होने वाले मल्लिनाथ पशु मेले में चलने का आह्वान था। मालाणी के घोड़ों और थारपारकर नस्ल की गायों के लिए प्रसिद्ध इस मेले में उत्तर भारत के कृषक अब भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। डॉ सोलंकी को अक्सर थारपारकर नस्ल की गायों के वंश को बचाने और बढ़ाने के लिए कार्यशालाओं को संबोधित करते हुये देखा सुना जा सकता है। वे एक पेशे से कुशल पशु चिकित्सक ही नहीं वरन अपने दिल में सभी जानवरों के लिए असीम दया का भाव भी रखते हैं। थार मरुस्थल में पशुपालन जीवन यापन का जरिया है। यहाँ इस पेशे की वजह से कहा जाता रहा है कि दूध आसानी से मिल जाता है मगर पानी मिलना मुश्किल है। डॉ सोलंकी पशुपालन विभाग की योजनाओं के बारे में बात करते समय कभी औपचारिक नहीं लगते। उनकी बातों में एक अदम्य उत्साह होता है जो मनुष्य और जानवर के सहजीवन का प्रबल पक्षधर होता है। इन सीमावर्ती जिलों में थारपारकर नस्ल की गायों के लिए खूब प्रयास किए गए हैं। बहुत सारे समाज सेवकों ने इस कार्य को आगे बढ़ाया है। लेकिन इस बदलते हुये तकनीक के दौर में सिर्फ तकनीक के सहारे ही जीया जाना बिलकुल असंभव है। क्या हम इन्टरनेट को दूह कर गाय का दूध निकाल लेंगे। इसके लिए हमें अपने वास्तविक जगत की ओर देखना ही होगा। हमें नई पीढ़ी को ये समझाना होगा कि गाय को किसी एक धर्म विशेष के पूज्य प्राणी की तरह देखने की जगह उसकी खूबियों को समझना होगा। क्रांतिकारी युवा नेता चे ग्वेवारा को दुनिया के असंख्य युवा अपना आदर्श मानते हैं। चे जब भारत आए थे तो उन्होने तस्वीरें खींचने के शौक और डायरी लिखने के काम में, सड़क पर बैठी गायों और फैले हुये गोबर की तस्वीरें ली। उन्होने लिखा कि ये असुविधाजनक और अच्छा न लगता हो कि सड़कों पर इस तरह जानवरों का कब्ज़ा हो मगर भारतवर्ष में गाय मनुष्य का सबसे सच्चा मित्र है। गाय की उपयोगिता अतुलनीय है। दोस्तों हम कैसी दुनिया बना रहे हैं? हमें सब भ्रांतियों से हट कर एक कॉमरेड की उस नज़र को देखना और समझना चाहिए कि भारत और गाय का रिश्ता कितना सुंदर है।
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[पेंटिंग तस्वीर सौजन्य : चित्रकार विशाल मिस्रा - कान्हा, गायों के चरवाहे के रूप में सबसे बड़ा मायावी] 

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.