October 31, 2013

दिल के कबाड़खाने में

जोधपुर रेलवे स्टेशन से सोजती गेट और वहां कुंज बिहारी मंदिर की ओर के संकरे रास्ते पर नगर निगम के ट्रेक्टर अपनी हैसियत से ज्यादा की सड़क को घेर कर खड़े होंगे. नालियों से बाहर सड़क पर बह रहे पानी से बचते हुए दोनों तरफ की दुकानों पर हलकी निगाह डालते हुए चलिए. एक किलोमीटर चलते हुए जब भी थोड़ी चौड़ी सड़क आये तो उसे तम्बाकू बाज़ार की गली समझ कर दायीं तरफ मुड़ जाइए. ऐसा लगेगा कि अब तक ऊपर चढ़ रहे थे और अचानक नीचे उतरने लगे हैं. कुछ ऐसी ही ढलवां पहाड़ी ज़मीन पर पुराना जोधपुर बसा हुआ है. तम्बाकू बाज़ार एक भद्र नाम है. घास मंडी से अच्छा. गिरदीकोट के आगे बायीं तरफ खड़े हुए तांगे वाले घोड़ो की घास से इस नाम का कोई वास्ता नहीं है. ये उस बदनाम गली या मोहल्ले का नाम है जहाँ नगर की गणिकाएँ झरोखों से झांकती हुई बड़ी हसरत से इंतज़ार किया करती थीं. त्रिपोलिया चौराहे को घंटाघर या सरदार मार्केट को जोड़ने वाली सड़क तम्बाकू बाज़ार है. नयी सड़क और त्रिपोलिया बाज़ार के बीच की कुछ गलियां घासमंडी कहलाती रही है. घासमंडी और तम्बाकू बाज़ार के बीच एक सड़क का फासला है जिसको 'सिरे बाज़ार' कहा जाता है.ऐसी ही ढलवां, संकड़ी और टेढ़ी मेढ़ी गलियों में घरों के आगे बने चौकों पर दल्लों की निगाहें बदन की भूख के मारों के लिए गली के आर पार देखती रहती थी.

हमें शर्म आती थी. अब भी आती है. इसलिए घास मंडी जैसा शब्द नहीं बोलते. हमें उस इलाके को तम्बाकू बाज़ार कहते हुए अच्छा लगता है. अब वे गणिकाएँ शहर के बाहरी हिस्सों में चली गयी हैं. यहाँ से गुज़रते हुए आपको सिर्फ तम्बाकू की गंध आएगी. ये खुशबू इसलिए है कि आप छींक लें या फिर मेरे जैसे आदमी इसे सूंघने के लिए ज़रा आहिस्ता चल सकें. मैंने साल सत्तासी में पहली दफ़ा तम्बाकू का इस्तेमाल किया था. उसके बाद ये प्यार सालों साल चलता रहा. इतना चला कि डॉक्टर ने कहा देखिये आपके फेंफडों में काला टार जम चुका है. इस हाल में आपके फेंफडे कितने दिन तक ये काम करेंगे इसकी कोई गारंटी नहीं है. मैं हांफ जाता था. चलते हुए, बोलते हुए और बिना कुछ किये हुए भी. साल दो हज़ार छः की एक सुबह पापा ने कहा किशोर साहब बुरी आदतें छोड़ने के लिए हर दिन शुभ दिन है. उन दिनों विल्स नेविकट का पेकेट शायद चौबीस रुपये में आता था. मैंने जब इसे पीना शुरू किया था तब इसकी कीमत बारह रुपये हुए करती थी. अच्छा ऐसा करते हैं सिगरेट पीना छोड़ देते हैं. रोज़ के तीस रुपये बचा करेंगे. सेहत भी हो सकता है बेहतर होने लगे. तो मैंने उस प्यार को अलविदा कह दिया. हिसाब लगाऊं तो याद आता है कि कोई सात साल हो गए हैं किसी तरह के तम्बाकू को छुए हुए. एक रात मैंने सपना देखा. मैं बेहिसाब दीवानगी के साथ सिगरेट पी रहा हूँ. मैं चौंक कर उठ बैठा. मैंने अपनी अँगुलियों को सूंघा. वहां वह उत्तेजक गंध नहीं थी. प्यार को अलविदा कहने के बाद भी सपने में उसका लौट आना कोई नयी बात नहीं है.

मैं अक्सर जोधपुर आता हूँ तो पैदल ही इस शहर की तंग गलियों में भटकना ज्यादा पसंद करता हूँ. तम्बाकू बाज़ार वाली गली नीचे उतरते हुए गिरदीकोट पर ही ख़त्म होती है. इसे ज्यादातर लोग बोलचाल की भाषा में घंटा घर कहते हैं. घंटाघर गिरदीकोट के अन्दर बना हुआ है. वैसे ये सरदार बाज़ार है. घंटाघर के चारों ओर लगभग गोलाकार बाज़ार में दुकानें बनी हुई हैं. इनके आगे हाथ ठेले वाले खड़े रहते हैं. उनके भी आगे कुछ ज़मीन पर बैठकर सामान बेचने वाले. मेरे ताउजी इसी गिरदीकोट पुलिस चौकी में इंचार्ज हुआ करते थे. इसके बाद जब मैं अपने छोटे भाई मनोज के साथ जोधपुर विश्वविध्यालय में पढता था तब हम सिटी बस से कभी इस जगह तक आते थे. घंटाघर के पास खड़े होकर जोधपुर के किले को देखने का जो अतुल्य सुख है वह मुझे किसी और जगह से कभी नहीं मिला. यहाँ से ऐसा लगता है जैसे किले की प्राचीर से कोई एक बेहद छोटे से सुन्दर बाज़ार को देख रहा है. इसी दृश्य को मैंने किले के ऊपर जाकर भी देखा. ये अद्भुत है. लाजवाब है. नीले रंग के शहर के बीच एक लाल झाईं लिये हुए बाज़ार. परकोटे में घिरा कई सारे सोजत-मेड़तिया दरवाजों वाले इस शहर की ज़ुबान दिल फरेब है. तांगे वाले घोड़े की टापों को वक़्त का पहिया अभी तक कुचल नहीं पाया है. एक तरफ पेरिस की सड़कों जैसा हाल दिखाई पड़ता है कि पुलिस वाले सायरन की आवाज़ वाली मोटरसायकिल नई सड़क पर गश्त में लगी हुई है दूसरी तरफ रेगिस्तान के मजदूरों के बचे हुए घोड़े टप टप किये दौड़े जाते हैं. मैंने और मनोज ने इसी जगह पर पैदल चक्कर काटे और बाद में वह पुलिस ऑफिसर हुए तो जोधपर में पहली पोस्टिंग एसीपी सिटी रही. ये शहर की तंग गलियों वाला असल जोधपुर ही है जिसमें कभी भूरी जींस और सफ़ेद कमीज में घूमने वाला भाई खाकी वर्दी में नीली टोपी पहने घूमता रहा. मुहब्बत जिस शहर से हो वह अपने पास किसी न किसी तरीके से बुला लेता है.

गिरदीकोट के आगे की ढलान में पुलिस वाले धूप में खड़े थे. केमरा होता तो ये तस्वीर एक ऐसे नगर की यादगार बन जाती जो इक्कीसवीं सदी में भी भरे बाज़ार ऐसा दीखता है जैसे कोई अट्ठारहवीं सदी का का मंज़र है. मैं ज़रा ऊँचाई से देखता हूँ और मुझे मंदिर वाली प्याऊ के आगे इतिहास की गोद में बैठा हुआ जोधपर का एक सबसे पुराना चौराहा दीखता है. काल और क्षय से परे अपने पुरातन रूप में, नए चटक रंगों के साथ. यहीं एंटीक आइटम्स की दुकाने भी हैं. मैं एक दोस्त के इंतज़ार में सोचता हूँ कि सारा शहर ही एंटीक है क्या क्या न दिल में रख लो. पूर्वी टापुओं पर बसे हुए देशों में चलने वाले इको फ्रेंडली तीन पहिया वाहनों जैसा एक रिक्शा नई सड़क के किनारे पर खड़ा सवारियों का इंतजार करता है. सिटी बसें मौज में आई बछडियों की तरह बेढब भागी जाती हैं. लगता है कोई अब नीचे आया कि अब आया. खाकी वर्दी पहने कंडक्टर हर किसी को आखलिया चौराहे तक ले जाने को ज़िद में अड़ा रहता है. मैं अपनी दोस्त से कहता हूँ इस पुराने जोधपुर से सिर्फ प्रेम किया जा सकता है सुकून से बैठने के लिए किसी सीसीडी में चलते हैं.
* * *

कल मेरे बेटे का जन्मदिन था. बीते हुए कल के दिन बहुत सारे प्यारे लोग जन्मदिन मनाते हैं. जैसे दुष्यंत की दो चाचियाँ, मेरा दोस्त संजय और सत्तावन साला नौजवान कवि कृष्ण कल्पित भी. दिल के कबाड़खाने में सिर्फ बरबादी ही नहीं कुछ अच्छे लोग और शहर भी बसे हुए हैं.

October 25, 2013

वो दुनिया मोरे बाबुल का घर

ज़माना बदल गया है. जिंदा होने का यही सबसे बड़ा सबूत है. किताबें भी बदल गयी हैं. आजकल बहुत कम लोग अपने थैले में किताबें लेकर चले हुए मिलते हैं. कई बार मुझे ये लगता है कि किताबों से हट कर कुछ लोग अपने मोबाईल में खो गए हैं. जैसे मोहल्ले भर की हथाई को सास-बहू के सीरियल चट कर गए हैं. अब हथाई पर आने वाली गृहणी सिर्फ सास बहू सीरियल का संवाद लेकर ही हाजिर हो सकती है. जैसे पहले के ज़माने में किसी का अनपढ़ रह जाना कमतरी या बड़ा दोष गिना जाता था. उसी तरह आजकल हर जगह की हथाई में हाजिर गृहणी के लिए सास बहू सीरियल का ज्ञान और ताज़ा अपडेट न होना कमतरी है. उसकी जाहिली है. इसी तरह का कानून सोशल साइट्स पर भी लागू होता है. अगर किसी के पास फेसबुक, ब्लॉग या ट्विटर जैसा औजार नहीं है तो वे कमतर हैं. लेकिन कुछ चीज़ें कभी भी अपना रस और आनंद नहीं छोड़ती. वे सुस्त या खोयी हुई सी जान पड़ती है मगर उनका रस कायम रहता है. चौबीस अक्टूबर का दिन और दिनों के जैसा ही होता होगा मगर कुछ तारीखें कुछ लोगों की याद ज़रूर दिलाती है. जैसे उर्दू की फेमस अफसानानिगार इस्मत चुग़ताई का इसी दिन गुज़र जाना. ये पिछली सदी के साल इकानवे की बात है जब उर्दू कहानी का ये बड़ा नाम हमसे विदा हो गया था. वह अपने पीछे ऐसे अफसाने छोड़ गया जो हमें गुदगुदाते हुए रुलायेंगे. हम जब भी उनकी व्यंग्य भरी चुटीली भाषा को पढेंगे तो पाएंगे कि रसीले आमों कि टोकरी सदा भरी भरी है. उन्हीं आमों के बीच कडवे करेले भी रखे हैं. जिस समाज को आप और हम इस्मत चुग़ताई के अफसानों में पढ़ते आये हैं वह भी अपने हाल से अभी तक टस से मस नहीं हुआ है. हमारी आदतें और लालची प्रवृतियाँ, हमारी छुपी हुई हसरतें और ओछी हरकतें और हम सब का अपनों के लिए है नहीं वरन परायों के दुःख से भी दुखी हो जाना. हम ऐसे ही हैं. हम कभी बदलने वाले नहीं है. हम सन्यास से लेकर भोग के बीच के हर हिस्से में समाये हुए हैं.

मैंने परसों जोधपुर की यात्रा की थी. सुबह रेलगाड़ी से जाना था और वापस शाम को उसी कालका से लौट आना था. बड़ी भव्य रेल है. मैं इसके सम्मोहन में हमेशा घिरा रहता हूँ. अक्सर घर की छत पर होता हूँ तब गर्मी के दिनों में धुंधलका होने और रात के घिर आने के बीच ये शानदार गाड़ी मेरे सामने से गुज़रती है. सर्द दिनों में इसकी रौशनी मेरे दिल से होकर गुज़रती है. इसका पहला सिरा जब रेल स्टेशन को छू रहा होता है तब इसकी पूँछ कोई आधा किलोमीटर पीछे कुछ बिल्डिंग्स के पिछवाड़े में दबी होती है. इसी ट्रेन से लौटते हुए आप सचमुच बेहिसाब आनंद ले सकते हैं. खाली डिब्बों में एक रहस्यमयी वातावरण पसरा रहता है. रेल के चलने की आवाज़ इस जादू को और गहरा करती है. मैंने यात्रा के लिए अपने साथ इस्मत चुग़ताई का कथा संग्रह ले लिया. ये कहानियां ऐसी हैं कि आप इन्हें बार बार पढ़ सकते हैं. लिहाफ कहानी के बारे में ज्यादा लोग जानते हैं. इसी कहानी की वजह से इस्मत पर मुक़दमा चलाया गया था और इसके सिवा पांच पांच मुकदमे वाले सिर्फ मंटो थे. इस्मत चु’ग़ताई का जन्म बदायूं में हुआ लेकिन वे पली बढ़ी जोधपुर में. इसलिए जोधपुर जब भी जाओ कहीं किसी कोने से इस्मत के अफ़साने का एक किरदार बच्छू  फूफी हर कहीं दिख जाता है. मीठी मीठी गालियाँ देता हुआ. मैंने उनके अनेक किरदारों को रेलगाड़ी और जोधपुर की गलियों में पाया है. बम्बा मोहेल्ले में चले जाओ तो हर अक्स कुछ वैसा ही दिखाई देता है. बम्बा रुई को कहते हैं और ये रुई धुनने वाले गद्दे भरने वाले लोग अपनी शक्ल सूरत से इस्मत आपा की रची हुई दुनिया जैसे हैं.

सुबह मालूम हुआ कि प्रबोध चन्द्र डे नहीं रहे और वही चौबीस अक्टूबर का दिन. वैसे हम सब उनको मन्ना डे के नाम से ही जानते हैं. पहला ख्याल आता है कि कोई गा रहा है- ऐ मेरे प्यारे वतन, ऐ मेरे बिछड़े चमन... बस और दिल भर आता है. उनकी पहचान उनकी आवाज़ है. हमेशा कायम रहने वाली दिलकशी गायकी उनकी पहचान है. मैंने साल तिरानवे में चूरू एफएम पर काम शुरू किया था. वहां जिस दुकान से किराणा का सामान आता था उसके मालिक सलीम साहब थे. वे एक दिन बड़ी हसरत से बोले कि एक काम कर देंगे आप? मैंने कहा कहिये. वे बोले मन्ना डे साहब के जितने भी गीत आपकी इस आकाशवाणी में हैं सब रिकार्ड कर के दे दीजिये. वे पहले इन्सान थे जिनसे मेरा इस दीवानगी से सामना हुआ. बाद के सालों में मुझे मालूम हुआ कि मन्ना डे के चाहने वालों के बारे में जानने के लिए मेरी उम्र बहुत कम है. बस, लागा चुनरी में दाग में छुपाऊं कैसे की तरह इस आवाज़ की गिरहें हर किसी को अपने पास बाँध कर रख लेती थी. मुझे शास्त्रीय संगीत की समझ नहीं थी और शास्त्रीय संगीत पर आधारित फ़िल्मी गीतों का एक विशेष कार्यक्रम हर सप्ताह हुआ करता था. मैं अपनी नासमझी से बचने के लिए हर बार मन्ना डे की शरण में चला जाया करता. उनका गाया हुआ हर गाना मेरे लिए शास्त्रीय संगीत आधारित था. यूं सभी गायक गायिकाएं रागों पर ही आधारित कम्पोजीशन में गाया करते हैं. मगर जो बात मुझे इस आवाज़ में लगती रही वह और कहीं न थी. चौबीस अक्टूबर के ही दिन इस्मत आपा की तरह हमारे प्यारे मन्ना दादा भी गुज़र गए. उनके संगीत को दिए योगदान के बारे में बात करते हुए कई ज़माने और गुज़र जायेंगे. हिंदी और बंगाली भाषा के पास आज उनकी आवाज़ अतुल्य पूँजी है. आपने भी शायद कभी साहित्य और संगीत के रस की एक अनूठी मिसाल देखी हो. मुझे लगता है कि वह आपके ख़ुद के पास होगी ही. हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला, मन्ना डे की आवाज़ में. हमारे बस में अगर कुछ होता तो हम सब कुछ बचा कर अपने पास रख लेते लेकिन सच है कि जिंदा चीज़ें यकीनन गुज़र ही जाती हैं. लेकिन कुछ फनकार ऐसे होते हैं जो हमारे लिए ऐसी विरासत छोड़ जाते हैं कि वे हमेशा हमारे बीच जिंदा रहते हैं. उनके शब्द, उनकी आवाज़ हमेशा कानों में शहद घोलती रहेगी. कोरी चुनरिया आत्मा मोरी, मैल है मायाजाल, वो दुनिया मोरे बाबुल का घर, ये दुनिया ससुराल.

October 18, 2013

ये धुंआ सा कहाँ से उठता है.

जीवन सरल होता है. वास्तव में जीवन परिभाषाओं से परे अर्थों से आगे सर्वकालिक रहस्य है. युगों युगों से इसे समझने की प्रक्रिया जारी है. हम ये ज़रूर जानते हैं कि हर प्राणी सरलता से जीवन यापन करना चाहता है. मैं एक किताब पढते हुए देखता हूँ कि कमरे की दीवार पर छिपकली और एक कीड़े के बीच की दूरी में भूख और जीवन रक्षा के अनेक प्रयास समाये हुए हैं. जिसे हम खाद्य चक्र कहते हैं वह वास्तव में जीवन के बचने की जुगत भर है. एक बच जाना चाहता है ताकि जी सके दूसरा उसे मारकर अपनी भूख मिटा लेना चाहता है ताकि वह भी जी सके. जीवन और मृत्य की वास्तविक परिभाषा क्या हुई? कैसे एक जीवन के मृत्यु के प्राप्त होने से दूसरे को जीवन मिला. इस जगत के प्राणियों का ये जीवन क्रम इसी तरह चलता हुआ विकासवाद के सिद्धांत का पोषण करता रहा है. विज्ञानं कहता है कि हर एक जींस अपने आपको बचाए रखने के लिए समय के साथ कुछ परिवर्तन करता जाता है. कुछ पौधों के ज़हरीले डंक विकसित हो जाने को भी इसी दृष्टि से देखा जा रहा है. ऐसे ही अनेक परिवर्तन जीवों में चिन्हित किये गए हैं और उन पर वैज्ञानिक सहमती बनी हुई है. क्या एक दिन कीड़ा अपने शरीर पर ज़हर की परत चढा लेगा. क्या छिपकली को अपने पाचन तंत्र में उसी ज़हर का असर खत्म करने का हुनर चाहिए होगा? बस ऐसे ही ख्यालों में मनुष्य के श्रेष्ठ होने की याद दिलाती हुई कहानियां मनुष्य के शोषण, उत्पीडन और पतन की भी याद दिलाती हैं. अमेरिका साम्राज्यवाद का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है. इसी अमेरिका के दो लेखक मार्क ट्वेन बीहड़ों के जीवन और मनुष्य के जीवट को उकरने वाले रहे हैं. उन्हीं के समकालीन थे जैक लंडन. अट्ठारह सौ छिहत्तर में जन्मे जैक लंडन को जिजीविषा का कथाकार कहा जाता है. जिजीविषा का अर्थ होता है जीवन जीने की इच्छा. जीवन को मिटने से रो़कने के सतत प्रयास करने की कामना. एक मामूली कीट-पतंगे से लेकर एक जंगल के राजा कहलाने वाले जीव शेर को भी अपने जीवन की रक्षा के लिए अंतिम समय तक प्रयास करते हुए देखा जाता है. हम सब जीवों में कुदरत की दी हुई एक जैविक क्रिया होती है कि हम अपने जीवन की रक्षा करें. लेकिन अब हमारा मन हार मानने से इंकार करे वाही वास्तव में जिजीविषा है.

किसी आदमी को मारना, जैक लंडन की एक कहानी है. ये कहानी कई अर्थों में साम्राज्यवाद के उदय और उसकी नीयत के बारे में बात करती है. कथा का नायक एक अच्छे खाते पीते घर में घुस आया है. रात के वक्त इस हवेलीनुमा घर में हल्के अंधियारे में वह मकान मालकिन से टकराता है. अजनबी को सामने पाकर ज़रा डर गयी मालकिन उससे पूछती है तुम कौन हो और यहाँ किस तरह आये? मैं इस भूल भुलैया में भटक गया हूँ और अगर आप कृपया करके मुझे बाहर का रास्ता दिखा दें तो मैं कोई गदबा नहीं करूँगा और चुपचाप फूट लूँगा. महिला ने उससे पुछा कि तुम यहाँ कर क्या रहे थे? वह आदमी कहता है- चोरी करने आया था मिस जी और क्या? देख रहा था कि यहाँ से क्या क्या बटोरा जा सकता है. इसके बाद चोरी करने के लिया आया आदमी और घर की मालकिन के बीच कई तरह की चालबाजियां और बातें होती हैं. मालकिन अपने ही घर में हैं और चोर को दयालु पाकर ज़रा अकड जाती हैं. वे हर समय एक ही सपना देख रही होती हैं कि इस चोर को पकडवा देने से कल उनका नाम बहादुर और श्रेष्ठ महिला के रूप में लिया जायेगा. इसलिए वे हर संभव प्रयास करती हैं कि चोरी करने आये आदमी को पकड़ा जा सके. आदमी के हाथ में एक रिवाल्वर है. लेकिन आदमी के दिल में अभी भी स्त्रियों के प्रति सम्मान है. जब मालकिन पूछती है कि क्या तुम मुझे गोली मार दोगे तब वह कहता है नहीं मुझे आपकी ठुकाई करनी पड़ेगी. आदमी अपनी जान को बचाने के लिए उसकी जान लेने तक नहीं जाना चाहता है. औरत पूछती है क्या तुम एक स्त्री पर हाथ उठाओगे? वह कहता है इसके सिवा कोई रास्ता नहीं है कि मैं आपका मुंह कसकर बंद कर दूं.

इसी कहानी में आगे मकान मालकिन उसको शराब पीने का ऑफर देती है और उस बहुत सारी बातें करते हुए समय को गुज़ारती हैं ताकि आलसी नौकर या पुलिस तक खबर की जा सके. वह आदमी अपने बारे में पूरा अहतियात बरतते हुए वाहन से निकल पाने के बारे में सोचता रहा है. इसी बातचीत में वह आदमी कहता है कि मैं कोई चोर नहीं हूँ वरन सताया हुआ आदमी हूँ. कहानी का एक संवाद कुछ इस तरह है- देखिये मैम, मेरे पास एक छोटी सी खदान थी. ज़मीन में ज़रा सा छेद भर समझ लीजिए. एक घोड़े से चलने वाली मशीन थी. उस इलाके में इस्पात की भट्टियों का सारा कारोबार काबू में कर लिया गया और उसी जगह पर एक कारखाना बैठा दिया गया तो मैं चें बोल गया. मुझे घाटे से जूझने और बचने की कोशिश का मौका ही नहीं मिला. इस कहानी में सत्य कितना और कल्पना कितनी है ये समझ पाना कठिन है. लेकिन हम ये समझ सकते हैं कि लघु उद्योगों पर बड़े कारखानों की मार किस तरह एक आदमी को तोड़ देती है. किस तरह हम आने जीवन यापन के साधनों को खो देने से बदहवास हो जाते हैं. हमें ये भी समझ आया है कि ज़मीन और जंगल से बेदखल किये हुए लोग किस रास्ते को चुनने को मजबूर किये जा रहे हैं. आज जंगल में कानून को चुनौती देने वाली आवाजें हैं. उन आवाजों के पीछे भी एक हारे हुए टूटे हुए आदमी की व्यथा को सुना जा सका है. जैक लंडन आज से सौ साल पहले के कथाकार हैं. हम आज जिस हाल में जी रहे हैं वह सौ साल बाद भी वैसा ही है. शोषण और उत्पीडन का सिलसिला कुछ ऐसा है कि लोग अपने ही घर, ज़मीन और जंगल से बेदखल कर दिए जा रहे हैं. किसी आदमी को मारना, कहानी का नायक उस औरत को इसलिए नहीं मारता कि वास्तव में वह इंसान होने की कद्र करता है. बाहर जाते हुए उस आदमी पर वह औरत इसलिए गोली नहीं चलाती कि एक जान लेते हुए उसके हाथ कांपने लगते हैं. लेकिन अब किसी के हाथ नहीं कांपते. मीर तकी मीर कहते हैं- देख तो दिल की जां से उठता है, ये धुआं सा कहाँ से उठता है.

October 17, 2013

साये, उसके बदन की ओट किये हुए

लड़की एक अरसे से
जो जी रही है, उसे नहीं लिखती
वजह कुछ भी नहीं है.

लड़का एक अरसे से
जो नहीं जी रहा है, उसे लिखता है
वजह कुछ भी नहीं है.

हो सकता है ये दोनों बातें उलट ही हों.

मगर ये सच है कि
हर एक कंधा गुज़रता है धूप की चादर से
साये उसके बदन की ओट किये चलते हैं.

* * *

कोई फिक्रमंद होगा
सुबह के वक्त की पहली करवट पर
की होगी उसने कोई याद.

बुदबुदाया होगा आधी नींद में
कि जिसको धूप की तलब है उसी बिछौने
उतरे आंच ज़िंदगी की अहिस्ता.

जो पड़े हुए हैं रेत की दुनिया में
उन पर बादलों की मेहर करना.

हिचकियाँ बेवक़्त आती हैं अक्सर, उलझी उलझी.

* * *

जिस जगह अचानक
छा जाता है खालीपन
हरी भरी बेलों के झुरमुट तले
चमकती हो उदासी.

जहाँ अचानक लगे
कि बढ़ गयी है तन्हाई
बाद इसके
कि बरसों से जी रहे थे तनहा
तुम समझना कि
कुछ था हमारे प्रेम में और टूट गया.

मैंने सलाहों और वजीफों से इतर
एक दुनिया सोची है
जहाँ जी लेने के लिए
एक अदद जिंदगी भर की ज़रूरत होती है
वहाँ प्रेम हो सके तो समझना
कि जो टूटा वह एक धोखा था.

उसका नाम
कुछ भी लो तुम
मगर असल सवाल होता है
कि क्या तुमको
सचमुच इल्म है मैंने किस तरह चाहा है तुम्हें.




October 11, 2013

फ्रोजन मोमेंट

फोटो के निगेटिव जैसे फिल्म के सबसे छोटे फ्रेम में जादू के संसार की एक स्थिर छवि कायम रहती थी। गली में अंधेरा उतरता तो उसे लेंपपोस्ट की रोशनी में देखा जा सकता था और दिन की रोशनी में किसी भी तरफ से कि नायक नायिका हर वक़्त खड़े रहते थे उसी मुद्रा में।

ये फ्रोजन मोमेंट बेशकीमती ख़जाना था। बस्ते में रखी हुई न जाँचे जाने वाली कॉपी में से सिर्फ खास वक़्त पर बाहर आता था। जब न माड़साब हो न कोई मेडम, न स्कूल लगी हो न हो छुट्टी और न जिंदगी हो न मृत्यु। सब कुछ होगया हो इस लोक से परे।

रास्ते की धूल से दो इंच ऊपर चलते हुये। पेड़ों की शाखाओं में फंसे बीते गरम दिनों के पतंगों के बचे हुये रंगों के बीच एक आसमान का नीला टुकड़ा साथ चलता था। इसलिए कि ज़िंदगी हसरतों और उम्मीदों का फोटो कॉपीयर है। बंद पल्ले के नीचे से एक रोशनी गुज़रती और फिर से नयी प्रतिलिपि तैयार हो जाती।

रात के अंधेरे में भी नायक और नायिका उसी हाल में खड़े रहते। ओढ़ी हुई चद्दर के अंदर आती हल्की रोशनी में वह फ्रेम दिखता नहीं मगर दिल में उसकी एक प्रतिलिपि रहती। वह अपने आप चमकने लगती थी।

बड़े होने पर लोग ऐसे ही किसी फ्रेम में खुद कूद पड़ते हैं। आँसू भरी आँखें लिए फ्रीज़ हो जाते हैं। उस वक़्त तक के लिए जब तक कच्चे रास्तो पर कोई डामर न कर दे। पेड़ों की शाखाओं को मशीन छांट न दे। आसमान और आँख के बीच गगनचुंबी इमारतें खड़ी न हो जाए। जब तक कि ठोकर मार कर चला न जाए महबूब या ज़िंदगी का फोटो कॉपीयर नष्ट न हो जाए।

प्रेम असल में एक लंबी ज़िंदगी का सबसे छोटा फ्रेम है।

[जिन बातों पर तुमको यकीन नहीं है, वे सब बातें मैं वापस लेता हूँ। मैं मुकर जाता हूँ। मुझ पर आरोपित कर दो जो भी करना है। दो कहानियाँ पूरी करके देनी है और दिल इस काम में लग नहीं रहा।]

* * *


धूप एक तलब नहीं मजबूरी है और मुसाफ़िर चलता रहता है रास्तों पर तन्हा। कि सिले हुये हैं उसके होठ रेत के पैबंद से और जाने कौन कब से गैरहाज़िर है ज़िंदगी से।

* * *

चुप्पी, अबोला नहीं है। न बतलाना या आवाज़ न देना तिरस्कार नहीं है।
मेरे भीतर कुछ टूट जाता है लेकिन क्या करूँ कि शिकायत करने की आदत कुदरत ने दी नहीं। हम सबके भीतर कुछ न कुछ टूटता रहता है। जैसे आज ऑफिस जाते समय रास्ते के नीम से पीली पत्तियाँ झड़ रही थी। ये उनका खत्म हो जाना नहीं वरन पूर्ण हो जाना था। इसी तरह कई बार संवाद का कोई हिस्सा पूरा हो जाता है। उसके बाद निर्विकार चुप्पी होती है। चुप्पी ही निर्विकार हो सकती है इसलिए कि संवाद खूब सारे विकारों से ग्रसित होते हैं। अच्छा है कि चुप्पी है, अच्छा है कि ये अबोला नहीं है।

प्रेम सिर्फ अनुभूत करने के लिए बना है।

* * *

किसी के पास नहीं है दुखों का मरहम मगर सबके पास है इस लम्हे को खुशी से बिता देने का सामान।
जैसे मैंने तुम्हारे बारे में सोची एक ज़रा सी बात और मुस्कुरा उठा।


[Water color by   Kris Parins]

October 7, 2013

ज़ाहिदों को किसी का खौफ़ नहीं

पिछले कुछ दिनों से बादलों की शक्ल में फरिश्ते रेगिस्तान पर मेहरबान हो गए थे। उन्होने आसमान में अपना कारोबार जमाया और सूखी प्यासी रेत के दामन को भिगोने लगे। हम सदियों से प्यासे हैं। हमारी रगों में प्यास दौड़ती है। हमने पानी की एक एक बूंद को बचाने के लिए अनेक जतन किए है। हमारे पुरखे छप्पन तौला स्नान करते आए हैं। छप्पन तौला सोना होना अब बड़ी बात नहीं रही। लेकिन छप्पन तौला पानी से  रेगिस्तान के एक लंबे चौड़े आदमी का नहा लेना, कला का श्रेष्ठ रूप ही है। वे लोग इतने से पानी को कटोरी में रखते और बेहद मुलायम सूती कपड़े को उसमें भिगोते। उस भीगे हुये कपड़े से बदन को पौंछ कर नहाना पानी के प्रति बेहिसाब सम्मान और पानी की बेहिसाब कमी का रूपक है। 
 
बादल लगातार बरसते जाते हैं और मैं सोचता हूँ कि काश कोई धूप का टुकड़ा दिखाई दे। मेरी ये ख़्वाहिश चार दिन बाद जाकर पूरी होती है। चार दिन बरसते हुये पानी की रिमझिम का तराना चलता रहा। इससे पानी के प्यासे लोग डर गए। उनका जीना मुहाल हो गया। गांवों में मिट्टी के बने कच्चे घर हैं। उनमें सीलन बैठती जा रही थी। कुछ क़स्बों में हवेलियाँ हैं। पुराने वक़्त की निशानियाँ। सदियों पुरानी पेढ़ियाँ हैं। भूल भुलैया जैसी तंग घुमावदार गलियों में बने हुये घर हैं। इन सब में लोग रहते हैं। वे सब लोग इस तरह के सीले मौसम के बने रहने से डरते जाते हैं। गाँव के किसान अपनी खेती से डरते हैं। रेगिस्तान जो पानी का प्यासा है पानी से डर जाता है।

रेगिस्तान के लोगों का ये डर अमेरिका में बजट को लेकर राजनीतिक गतिरोध के चलते करीब अट्ठारह साल बाद पहली बार सरकारी विभागों में कामकाज ठप हो जाने से बड़ा डर था। जबकि वह दुनिया का सबसे ताकतवर देश है। हम सब बड़े घर के संकट को देखकर खुद को दिलासा देते हैं कि उनका भी ये हाल हुआ तो हम लोगों की बिसात क्या है। मैं देखता हूँ कि मीडिया खबरों के ऐसे शीर्षक देता है जैसे अमेरिका दिवालिया हो गया है। वह साफ बात बताता ही नहीं है। वह पाठक और दर्शक को कभी समझाता नहीं कि ये माजरा क्या है। मैं कुछ बातें टटोलता हूँ तो मालूम होता है कि यह संकट मुख्यरूप से राष्ट्रपति बराक ओबामा के महत्वाकांक्षी स्वास्थ्य सुरक्षा कार्यक्रम पर खर्च को लेकर विपक्षी रिपब्लिकन एवं सत्तारूढ डैमोक्रेट सांसदों के बीच घरेलू मतभेद के चलते खड़ा हुआ है। इस बार दोनों ओर से किसी पक्ष के अपने रूख से न झुकने का फैसला किया हुआ है। इसके कारण राष्ट्रपति भवन को आदेश जारी करना पड़ा कि संघीय सरकार की एजेंसियों का कामकाज बंद किया जाता है। इस आदेश से हजारों सरकारी कर्मचारियों को फिलहाल अवकाश पर जाना पड़ा है और कई सेवाओं में कटौती कर दी गई है। 
 
इससे पहले, इस तरह की स्थिति उन्नीस सौ पिचानवें छियानवें में पैदा हुई थी। अमेरिका में कामकाज बंद रहने का मतलब है कि सरकारी कार्यालयों में कागजी कार्रवाई धीमी पड़ जाएगी और संघीय सरकार के लाखों कर्मचारियों को घर बैठा दिया जाएगा। उन्हें इस दौरान वेतन नहीं मिलेगा। केवल आपात सेवाएं हीं जारी रखी जाएंगी। इस तरह अमेरिका पर जो संकट है वह उनके अंदरखाने का मामला है। ऐसा मामला कि कभी भी संसद बजट पास कर सकती है और कभी भी अमेरिका फिर से दुनिया के देशों में शांति बहाल करने के अपने प्रिय काम पर निकाल सकता है। लेकिन हम रेगिस्तान के लोगों के पास इस लगातार होती बारिश से बचने का कोई उपाय हैं। ये बेहिसाब बरसात एक रूठे हुये सेठ द्वारा बार बार मांग रहे भिखारी के मुंह में जबरन रोटियाँ ठूँसते जाने जैसा है। साँवरिया गिरधारी कोई होता नहीं है कुदरत अपना काम करती है। वरना रेगिस्तान से जब कोई प्यासी पुकार उठी होती तभी उतना ही पानी बरसा होता।

इधर एक नयी बात पर चर्चा चल पड़ी है कि अब हमको वोट देते हुये ये बताने का अधिकार भी मिल सकता है कि हमें हमारे नेता पसंद नहीं है। अगले माह होने वाले विधानसभा चुनाव के दौरान जो मतदाता चुनाव मैदान में उतरे किसी भी उम्मीदवार को वोट नहीं देना चाहेंगे, उनके लिए इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन में एक अलग बटन होगा। इस बटन को दबाकर मतदाता किसी को भी वोट नहीं देने के विकल्प का उपयोग पूरी गोपनीयता कायम रखते हुए कर सकेंगे। इस बटन का नाम ‘‘नोटा’’ रखा गया है। ये नेताओं को किसी सोटे की तरह भी लग सकता है। उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में अपने एक निर्णय में भारत निर्वाचन आयोग को ईवीएम के मतदान-पत्र ‘नोटा बटन’ उपलब्ध कराने की व्यवस्था करने के निर्देश दिए थे। इस तरह की खबरों को पढ़ते हुये मुझे उन खास तरह के लोगों की याद आती है कि दुनिया में हर चीज़ की कीमत होती है। इसलिए किसी भी चीज़ को खराब नहीं करना चाहिए। हमारे यहाँ मतदान के के समय बहुत सारे मतदाता आखिरी समय में अपना मन बदल लेते हैं। इसलिए कि उनको लगता है वे जिसको वोट देने जा रहे हैं वह जीतेगा नहीं और वोट खराब हो जाएगा। अब को नोटा आएगा वह तो पक्के हिसाब से वोट की खराबी जैसा लग सकता है। लेकिन इस तरह के प्रावधान उन मतदाताओं के लिए हरहस का विषय हो सकते हैं जिनको नेताओं से प्रेम न होने का कारण वोट करने में रुचि न थी। 
 
एक दिन हो सकता है भ्रष्टाचार में डूबे हुये उम्मीदवारों के मुक़ाबले नोटा को ज्यादा वोट पड़ जाएँ। वह भारतीय मतदाता के विवेक और बुद्धिमत्ता का उदाहरण होगा। हम खराब चीजों से बचकर चलने के आदि हैं उनको बदलने की जहमत नहीं उठाते हैं। ये एक नयी शुरुआत है। हमें अपने मत का मोल पहचान कर स्वच्छ, निर्भीक और समाजसेवी उम्मीदवार को चुनना चाहिए अगर कोई ऐसा उम्मीदवार नहीं है तो हमारे पास एक नोटा है। ज्ञान और धर्म वाले को उर्दू ज़ुबान में ज़ाहिद कहते हैं। ऐसे ही लोगों के बारे में शकील बदायूँनी साहब ने कहा है। ज़ाहिदों को किसी का खौफ़ नहीं/सिर्फ काली घटा से डरते हैं।

दो सूखे पत्ते नम मिट्टी में

एक रोज़ कोई कोंपल खिली जैसे नज़र फेरते ही किसी ने बटुआ पार कर लिया हो। एक रोज़ उससे मिला। फिर उससे ऐसे बिछड़ा जैसे खाली बटुए को किसी ने उदासी ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.