November 29, 2014

इंतज़ार में खड़ा हो कोई कब से ही

टूटे-टूटे गिरते जाते इन लम्हों में, धुंध भरी सुबह की आँखें सोचे, सारे मंज़र खो जाने हैं. दूर किसी धुंधले धब्बे की मानिंद. धुआँ धुआँ सा बेशक्ल तुम्हारा होना दिखता है और मिट जाता है. जैसे कोई पानी की चादर मुड़ी हुई सूखी पत्तियों सी उड़ी जाती है. सूखे सूखे इस रेतीले जीवन में ठंडी नमी भरी हवा का मौसम फुसलाता है. दुःख आने हैं, हाँ दुःख ही आने हैं सच लगता है फिर भी मन मुस्काता है.

उफ़क और मेरी आँखों की बीच तुम्हारी याद किसी व्यू कटर की तरह खड़ी है.

कहीं से भी
अपनी ही आवाज़ की तरह
सुनाई दो।

दिखाई पड़ो अचानक
खाली मैदान के किसी टुकड़े पर
जैसे इंतज़ार में खड़ा हो कोई कब से ही।

जैसे कोई साया छू जाये
ऐसी छुअन की तरह आओ।

मैं कब तक
एक सर का बोझा उठाये रखूं
दर्द भरी गरदन पर
कब तक पीठ पर मुमकिन रहे
इस गरदन के साथ अतीत का बोझ।

तुम आओ कहीं से।


उसके सामने कई बार हम पिघल कर बह जाते हैं कि आखिर कब तक जिरह करते जाएँ। कई बार हम साँस भी नहीं लेते कि उसके सामने मुंह तक न खोलें।

होता मगर कुछ भी नहीं।
वह अपनी फितरत में और हम अपनी बेबसी में जीते जाते हैं।

शब्द रंग रेखाएं
सबकुछ उधार के
सब प्रसंशाओं के भरोसे टिका विश्वास

प्रेम का एक एक टुकड़ा
पड़ा है गिरवी
किसी खोखले सम्मान की चाह में।

कभी सोचा है इस बारे में?


उसने कहा
मैं किस तरह चूम सकती हूँ कीचड़ को
कमल के फूल की इससे बड़ी मजाक कभी सुनी आपने।

खरपतवार की तरह उगने और सूखे तिनके की तरह दहक जाने वाले रिश्तों के इस दौर में सबकुछ अप्रिय और नाशवान लगता है। जबकि हम कथित गलत ढंग से गुपचुप मिल और चूम लेने का जो सपना देखते हैं वह कितना मोहक लगता है। सारी दुआएं उसी पर जा गिरती हैं।

ओ अबूझ और अनकहे, तुम अमर रहना।

[Painting courtesy : Arif Ansari]

November 26, 2014

ख़ानाबदोश कारवां में

मेरा जीवन एक आवृति की तरह स्पंदित है. तुम एक अविराम, अन्नत प्रवाह की तरह हो. मेरी नींद और जाग के बीच की घाटी के खालीपन में स्याह आवाजें हैं. उनका ठीक से पढ़ा जाना शेष है. स्मृति की वेगवती धाराएँ स्थिर होने से रोकती हैं. प्रवाह की एक ही दिशा में होते हुए भी तुम्हारे प्रश्न अलग हैं मेरे उत्तर अलग हैं. मैं सुबह को सोया सोया जागता हूँ. रात को जागा जागा सोता हूँ. शामें जैसे मेरी ही टोह में रहती है. जैसे कोई सोलह साला लड़का अपनी प्रेमिका को किसी लम्बे गलियारे में खींच लेता है किसी खम्भे के पीछे.  मैं भी खुद सौंप देता हूँ अपने आपको जैसे रूई का फाहा पानी को छूकर हो जाता है स्थिर, गीला और जयादा नरम. मुझे नहीं मालूम कि इस ज़िन्दगी का क्या होगा. मुझे इससे गरज भी नहीं कि जिनको खूब चिंता थी ज़िन्दगी की वे भी नहीं बचे शेष.

हमारे बीच एक ही अपूर्व सम्बन्ध है
मुझे किसी ने नहीं किया प्यार तुम्हारे सिवा.

मैं इसी बात पर पहली बार समझ सका प्यार.
* * *

प्रेमिका की छेनी की धार उतरती नहीं
शैतान भी विचलित नहीं होता इस टंकार से.

प्रेम जैसा जाने क्या करते हैं ये दो लोग.
* * *

 

प्रेमिका बाल्टी को पानी पर पटकती जाती है
जैसे शैतान की रूह पर गिरता हो कोड़ा.

प्रेम वलय बन-बन बिखरता जाता है.
* * *

एक खराब अध्यापक की तरह
प्रेमिका याद कराती है अतीत के पाठ.
 

प्रेमिका असल में सुनार की धोंकनी है,
शैतान है गलकर नया बन जाने के लिए.
* * *

जब गालों से उड़ गया
मांसल होने का रंग
जब आँखों के कोटरों में
उतर आया खालीपन
जब टूटी हुई प्रार्थनाओं 

और आशाओं से भर गया बेडरूम
जब अजनबियों को लगाया गले
.

शैतान पहाड़ की किसी खोह में गिरा हुआ नीम अँधा.
* * *

 

लीर लीर कपड़ों में
बजूका खड़ा था हरे धान के बीच

 

तुम समझ सकते हो इस बात को?
* * *

उसके पास एक दिल है
बिछोह की आग से भरा हुआ 


जैसे लुहार बैठा हो सुबह से किसी इंतजार में.
* * *

उसने शैतान को मारकर बना ली मशक
ताकि उसमें भर सके प्रेम की याद .

ओ प्रेमी, देखो क्या बदा है तुम्हारे भाग में.
* * *

शैतान तुम्हारे बिन मर जायेगा
तुम जी न सकोगी शैतान के बिन.

मगर ज़िन्दगी हेंस प्रूव्ड कहाँ होती है?
* * *

रात के शिकारी कुत्ते
बैठे रहते हैं
उजले दिनों की भेड़ों के झुण्ड के इंतज़ार में

ज़िन्दगी सिवा इसके क्या है याद नहीं आती.
* * *

कोई कब तक रखे याद,
घटिया मुसाफिरों के नाम

ख़ानाबदोश कारवां में
ये तनहा ज़िन्दगी
एक छोटा एकल गाना है,
जिसे तुम्हारे नाम पर किया जा सकता है पूरा.

* * *

[Painting courtesy : Inam Raja ]

November 25, 2014

जीवन वितान के कोने खड़े एक आदमी का एकांत

सुबह का आग़ाज़ रात के हेंगऑवर में होता है. कल मालूम हुआ कि मेरा पहला कहानी संग्रह तीसरी बार मुद्रित होने जा रहा है. इसका आवरण बदला गया है. नए रंग रूप में इस किताब का होना मुझे ख़ुशी से भर रहा है. मैंने कहानियां मन के रंजन और दुखो के निस्तारण के लिए लिखीं थी. हिंदी साहित्य इसलिए पढ़ा था कि कभी लेखक बन सकें. लेकिन औपचारिक पढाई पूरी करते ही मेरा लेखक होने के स्वप्न से मन टूट गया. हालाँकि अनेक लेखक मेरे लिए सम्मोहक थे. उनके शब्दों में एक जादू भरी दुनिया दिखती थी. मैंने किताबों के साथ हालाँकि बहुत कम समय बिताया किन्तु मेरे लिए किताबें और तन्हाई दुनिया के दो बड़े सुख रहे हैं.

कहानी संग्रह चौराहे पर सीढियां का बनना सिर्फ और सिर्फ इंटरनेट, ब्लॉग और दोस्तों के कारण संभव हुआ. साल दो हज़ार आठ में कहानियों के मामूली ड्राफ्ट लिखना शुरू किया. अपने बचपन के मित्र संजय व्यास को वे ड्राफ्ट पढवाए. संजय ने तमाम खामियों के बावजूद मेरा उत्साहवर्धन किया. एक दोस्त के ऐसे शब्दों से मुमकिन था कि मैं लिखता गया. वहां से शुरू हुई ये यात्रा आज कुछ सालों के भीतर ऐसे मुकाम तक आ गयी है जहाँ सब मुझे प्रेम और सम्मान से देखते हैं. कभी एक किताब छपना ख़ुशी की बात थी आज वही किताब तीसरी बार छपकर आ रही है. इस बीच दो और किताबें एक कविता संग्रह “बातें बेवजह” और कहानी संग्रह “धूप के आईने में” पब्लिश हुए. इस तरह तीन किताबें पाठकों और दोस्तों के प्यार सम्मान से आसानी से आ सकीं हैं.

मैं एक और कहानी संग्रह पर काम कर रहा हूँ. इसके इस साल के आखिर या नए बरस के पहले में महीने में छपकर आने की आशा है.

आज सुबह मैंने दो कहानियां पढ़ीं. पहली कहानी है- स्मार्ट सिटी विद 32 जीबी. ये कहानी प्रख्यात पत्रकार और रूपक शैली की भाषा वाले कार्यक्रम प्रस्तोता रविश कुमार की है. साल भर पहले कहीं सुना था या पढ़ा था कि किसी बड़े पब्लिशिंग हाउस ने कुछ नए लिखारों से अनुबंध किया है. उनमें रविश कुमार का नाम भी था. ये लोग उपन्यास लिखने के लिए अनुबंधित किये गए थे. मेरी याददाश्त ज़रा कमजोर है इसलिए आप ये भी समझ सकते हैं कि मैंने कोई अफवाह सुनी होगी. बस इतना तय है कि इसे मैंने बुना या चलाया नहीं है. उन दिनों रविश कुमार की एक बेहतर कहानी पढ़ी थी. वह मुकम्मल कहानी शायद न थी. वे कुछ हिस्से थे जो दिल्ली के पराने दिल की इमारतों और नयी पीढ़ी के उससे संबंधों को सुन्दरता से बुन रहे थे. उनकी कटाई छंटाई सलीके से की हुई थी. वे कहानियों के हिस्से सम्मोहक थे. उनमें इस तरह के तत्व थे कि पाठक को अपने पहलू से न उठने दें. उसके बाद मैंने रविश कुमार का लिखा हुआ कुछ पढ़ा नहीं.

आज जो कहानी पढ़ी, ये प्रो प्रभात रंजन की ई पत्रिका जानकीपुल पर छपी है. कहानी का शीर्षक किसी रूपक कथा सरीखा ही है. हम नैनो तकनीक की खूब बात करते हैं. हमें सबकुछ ऐसा चाहिए जो बहुत सारा हो किन्तु कम से कम जगह में समा सके. भौतिकी के लोग जानते होंगे कि जिस तरह आवाज़ एक वस्तु है और उसे कई-कई बार अलग-अलग रूपों में बदल कर अपने वास्तविक आकर में लाया जा सकता है. इसी तरह ये भी संभव होना चाहिये कि व्यक्ति को किसी अन्य स्वरूप में ढाल कर इम्पोर्ट एक्सपोर्ट किया जा सके. यानी आप पेरिस के किसी बूथ में घुसे बिल चुकाया और अपलोड हो गए. दिल्ली के किसी बूथ से आपको डाउनलोड कर लिया गया. क्षणांश में यात्रा पूर्ण हो गयी. रविश कुमार की कहानी या इसे एक कच्चा ड्राफ्ट भर कहा जाये, इसी संभावना की थीम की कहानी है. हिंदी में ऐसी कहानियां नहीं लिखी जाती. हिंदी में लिखा जाता है गाँव और उपेक्षा का दुःख. रविश कुमार इसी कॉकटेल को बनाते हैं. सपने में नैनो तकनीक है हकीकत में एक नाउम्मीद क़स्बा. रविश कुमार गेजेट्स के साथ और उनके मार्फत जीवन जीते हैं. ये उनकी मजबूरी है. सूचनाओं का प्रवाह उनके भीतर इस गति से है कि कोई पगला जाये. ऐसे मैं किसी प्लाट का आरंभिक ड्राफ्ट लिख लेना, बधाई की बात है. नैनो जीवन को लिखते समय एक हड़बड़ी और उपहास है. इन दोनों से बचकर तकनीक का स्वप्न लिखा जाना चाहिए था. हम समझते हैं कि ज्यादातर लेखक लेखिकाओं के पास लिखना एक चुराए हुए समय में किया गया मन का काम है.

रविश कुमार की कहानी के ड्राफ्ट में एक हताश किन्तु लम्पट समय को देखती हुई नौजवान आँखें हैं. किसी दुसरे जुग में अपनी आमद दर्ज़ कराने की उहापोह है. अच्छा हुआ कि इस कहानी को पढ़ा. ये और भी अच्छा होगा कि हिंदी में किताबें न बिकने का रोना रोने वाले युवा लेखक इस थीम को पहचानें और भारत की नयी पीढ़ी के लिए ऐसे फिक्शन लिखें.

दूसरी कहानी है- कार्तिक का पहला फूल. उपासना की ये कहानी जागरण के साहित्य परिशिष्ट में प्रकाशित है. संयोग ऐसा था कि मैंने कहानियां ठीक क्रम में पढ़ी. एक बदहवास और न समझी जा सकने वाली दुनिया की है तो दूसरी कहानी एक शांत ठहरे हुए समय के प्रवाह में स्थिरता से बहते हुए जीवन की. उपासना की कहानी उम्र के सबसे ऊंचे पड़ाव पर सबसे कम ऑक्सीजन वाले जीवन की जिजीविषा की कहानी है. वहां एक पुष्प जीवन का ध्येय और आशा है. इस कहानी में भाषा किसी सुन्दर कालीन की बुनावट जैसी न होकर सुंदर प्रकृति जैसी है. एक सम्मोहक प्राकृतिक सौन्दर्य. उपासना ने कहानी में जीवन वितान के कोने खड़े एक आदमी के एकांत को इतनी सघनता से बुना है कि वह समूचा भीतर उतर आता है.

मैंने पश्चिम के लेखकों को इसी वहज से पढ़ा कि उनके लिखने में कथ्य के साथ कुदरत का अनूठा वर्णन होता था. कहानियों का जीवन अपने आस पास के काँटों-फूलों, वादियों-नदियों, कहवाघरों और शराबखानों को सजीव बुनता है. उपासना की कहानी में इसी तरह की इतनी प्रोपर्टी है कि मैं देख पाता हूँ दृश्य कैसा है. लोक व्यवहार की अनेक सीखें कुदरत के माध्यम से व्यक्त हैं. कहानी खुरदरे वर्तमान को समतल करने के प्रयास का आरोहण है. आस-निरास के झूले पर बंधा अतीत और वर्तमान. इसे पढ़ते हुए बाद दिनों के सुबह में अपनी प्रिय भाषा का आगमन होता है.


[Painting Image Courtesy : Valerio Libralato]

November 19, 2014

शाख के उस सिरे तक


एक काफिला था, ठहरी हुई दस्तकें थीं. बंद दरवाज़े और दीवार से बिना कान लगाये सुनी जा सकती थी. ज़िंदगी मुझे बुला रही थी. मैं अपने सब रिश्ते झाड़ रहा था. चलो अच्छा हुआ जी लिए. जो उनमें था वह गले से उतरा. जिस किसी जानिब कोई टूटी बिखरी आवाज़ के टुकड़े थे सबको बुहारा. अपने आप से कहा चलो उठो. ज़िंदगी जा रही है. रास्तों को छूना है तो चलो उनपर. देखना है बदलते मौसम को तो बाहर आओ. प्रेम करना चाहते हो तो प्रेम करो. न करोगे कुछ तो भी सबकुछ जा ही रहा है. ज़िंदगी एक छलनी लगा प्याला है. कुछ रिस जायेगी कुछ भाप हो जायेगी. 

कुछ बेतरतीब बातें. बीते दिनों से उठाई हुई. 
* * *

खुला पैसा अक्सर हम जिसे समझते हैं वह वो चवन्नियां अठन्नियां रुपये सौ रूपये नहीं होते। खुले पैसे वो होते हैं जिन्हें बेहिसाब खर्च किया जा सके। ऐसे ही खुली ज़िन्दगी वो है जो बहुत सारी है। जिसे आप अपने हिसाब से बेहिसाब खर्च कर सकते हैं।
* * *

शाख के उस सिरे तक जाकर बैठेंगे, जहाँ वह हमारी सांस-सांस पर लचकी जाये।
* * *

उस जगह मुद्दतों सूनापन और किसी आमद की हलकी आस रहती थी। अचानक दो जोड़ी गिलहरियाँ फुदकने लगी। वे कच्ची मूंगफली के दूधिया दाने मुंह में फंसाए इठलाती और फिर अचानक सिहरन की तरह दौड़ पड़ती। दक्खिन के पहाड़ों पर कुम्भ के मेले की तरह बारह साल बाद खिलने वाले फूल न थे मगर उल्लास भरी हवा किसी सम्मोहन की ठहर में घिर पड़ती।

दोपहर जब कासे के ज़रा भीतर की ओर लुढकी तो वही सूनापन लौटने लगा। शाम जैसे कोई रुई से भरा बोरा थी जिसका मुंह उल्टा खुल गया था। वह फाहों की तरह दसों दिशाओं से अन्दर आने लगी। जैसे आहिस्ता आहिस्ता किसी के चले जाने के दुःख का बोझ उतरता हो। नींद ख़्वाब थी। ख़्वाब नींद हो गए। प्रेम एक अबूझ रंग, गंध और छुअन बन कर आया स्मृति बनकर बस गया। एक लम्हा गोया एक भरा पूरा जीवन।

लौट लौट आने की दुआ हर सांस।
* * *
यूं तो दूर तक पसरी हुई रेत सा कोरा जीवन था, सब्ज़ा एक कही सुनी बात भर थी। दिन, रात के किनारों के भीतर लुढ़क जाते थे। सुबहें अलसाई हुई चल पड़ती थीं वापस दिन की ओर। धूल ढके उदास बाजे पर प्रकाश-छाया के बिम्ब बनते-मिटते रहते थे। सुर क्या थे, सलीका कहाँ था? जाने किस बेख़याली में लम्हे टूटते गिरते जाते।

दफ़अतन!
एक छुअन से नीम बुझी आँखे जाग उठीं। रेत की हर लहर में समायी हुई अनेक गिरहों से भरी लहरें नुमाया हुई। एक उदास अधुन में जी रहा बाजा भर गया अपने ही भीतर किसी राग से।

ओ प्रेम, सबकी आँखों में कुछ सितारे रखना।
* * *
जैसे किसी लता पर फूटते पहले दम कच्चे रोएं का सबसे हल्का हरा रंग। जैसे किसी उम्मीद के कोकून से ताज़ा बाहर आये केटरपिलर की नाज़ुकी। जैसे अचानक पहली बार सुनी जा रही अविश्वसनीय किन्तु प्रतीक्षित प्रेम की बात दोशीज़ा कानों को छूती हुई।

वह कुछ इस तरह और गुज़रती रात रुक-रुक कर देखती हुई।
* * *
हाइवे पर गुजर रही है चौंध भरी रोशनियाँ
जैसे तुम्हारे ख़यालों की ज़मी पर
मुसलसल बरस रही हों याद की पीली पत्तियां।

वो शहर क्या था, ये रास्ता क्या है
मेरे बिना तुम कैसे हो, तुम बिन मैं जाने क्या हूँ।
* * *
तुम उचक भी नहीं सकते
मैं हद को तोड़ भी नहीं सकता
एक आवाज़ सुनने को एक सूरत देख लेने को
आज जाने क्या मनाही है
दिन ये उदासा था, शाम ये तनहा थी, रात ये खाली है।

एक बार व्हिस्की और उससे ज्यादा तुम आओ।
* * *
एक बलखाई तनहा पत्ती शाख से बिछड़ कर कुछ इस तरह उतरती है ज़मी की ओर जैसे कोई सिद्ध खिलाड़ी तरणताल में उतरने से पहले गोल कलाबाज़ियों के ध्यान में गुम होता है। वह अगर एक बार भी देख सकती पीछे या ज़रा सी नीचे से ऊपर की ओर भर सकती उड़ान तो भ्रम हो सकता था कि एक सूखी पत्ती बदल गयी है पीली तितली में।

वैसे होने को क्या नहीं हो सकता कि मुझसा बेवफ़ा और दिलफेंक आदमी भी आखिर पड़ गया प्यार में।
* * *
उन दीवारों के बारे में मालूम न था कि वे किसलिए बनी थी मगर खिड़कियाँ थीं आसमान को चौकोर टुकड़े की शक्ल में देखने के लिए। जो सबसे ठीक बात मालूम है वह है कि तुम्हारे लब बने थे मेरी रूह के पैरहन से खेलने के लिए।
* * *

पेड़ के नीचे हर रोज फूलों एक चादर बिछी होती थी. जैसे किसी प्रिय के मन से निशब्द आशीष झरता हो. वे दोनों मगर अनचाहे थे. जो फूल अपने आप झड़ते हों, जो आशीष अपने आप मिलता उसका कोई मोल नहीं था.

किसी से नहीं कहा कि था क्या
किसी के पास इस वजह को सुनने का मन भी न था
सबकुछ यथावत चाहिए था हर किसी को
मिलने से पहले की सूरत में
या ये अपरिहार्य था कि हिसाब बिना ढील के कर लिए जाएँ.
वे दयालु और प्रेमी कहलाना पसंद करते थे
उन्हें झूठ और फरेब से नफरत थी.
ऐसा उनका कहना था कि
वे नहीं जानते
उन्हें असल में डर किस स्थिति से था
अप्रिय हाल में उनकी देह भाषा किस तरह व्यक्त थी
वे जिस तरफ रौशनी में थे उसकी दूसरी तरफ क्या था
वे इकहरे कहलाना चाहते थे मगर बुने हुए थे त्रिआयामी.

पहाड़ के लोग सनोबर का चिलगोंजा थे
रेगिस्तान के लोग थार के डंठल थे
समंदर के लोग किसी समुद्री जीव के खोल थे
बावजूद इसके
जो सबसे पूछा गया वह सवाल एक था
वे सब जो जवाब देते थे वह जवाब एक था.

प्यार था तो फिर इतनी नफरत कहाँ से आई
नफरत थी तो वो प्यार जताने के सिलसिले क्या थे?

मेरे पास तुम्हारे लिए एक श्राप है, जाओ भुगतो इस जीवन को
जिस तरह उसने मुझे खोजा है, उस तरह कोई तुमको न खोज सके.

November 3, 2014

सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना



इन्हें पढकर विदूषक उदास हुए, ज्ञानी हंस पड़े, दार्शनिकों ने कहा पुद्गल है सब चीज़ें.

कभी हम स्नेह की डोर से बंध जाते हैं, वह अवस्था राग है. राग दुखों का कारण है. दुःख आयातित हैं. उनका निवारण राग के नष्ट होने में है. कहानी कहना भी एक राग है. इसी राग को एक दिन टूटना ही होगा. इस राग में दरारें पड़ती हैं. अभी हाल ही में पड़ी दरार से आते प्रकाश में मैंने जैन दर्शन को याद किया. मैंने जैन दर्शन को उतना ही पढ़ा है जितना अजमेर विश्व विद्यालय बीए के पाठ्यक्रम में पढाता था. उसी दर्शन की स्मृति मेरे साथ रही. मेरे कई सहपाठी, सखा और अध्यापक जैनी थे. जैन मुनियों के दल जब प्रवास पर होते थे तब मेरे पिताजी उनको घर पर भोजन के लिए आमंत्रित करते थे.मेरी माँ उनके लिए खाना बनाती थी. एक बार कुछ साध्वियां आई. उन्होंने घर की रसोई में देखा कि माँ ने जो चपातियाँ बनाईं थीं वे चमक यानि मसाले रखने वाली लकड़ी की पेटी पर रखी थीं. उन्होंने पूछा क्या चमक में नमक है? माँ ने कहा हाँ है. साध्वियों ने उन चपातियों को अभोज्य कहा. उनके लिए हालाँकि माँ ने फिर से चपातियाँ बना दी. मगर मैं हमेशा सोचता रहा कि ऐसा क्यों है. पिताजी स्कूल में सामाजिक विज्ञान पढ़ाते थे उसमें जैन सहित अनेक धर्मों के बारे में पाठ थे. मैंने उनसे पूछा तो उन्होंने कहा कि नमक जीव हत्या का हेतु है शायद इसलिए उन्होंने उन चपातियों को स्वीकार न किया होगा जिनके नीचे नमक था. मेरे लिए श्वेत वस्त्र धारण किये नोच नोच कर घुटे हुए सर वाली साध्वियां और मुनि कोतुहल न थे. वे मेरे जीवन का हिस्सा थे.

मैं जब आकाशवाणी चूरू में पोस्टेड था तब मालूम हुआ कि आचार्य तुलसी सुजानगढ में प्रवास पर है. हम अपना अल्ट्रा पोर्टेबल टेप रिकार्डर उठाकर चल दिए. इतने बड़े आचार्य से कोई क्या साक्षात्कार करता और खासकर मेरे जैसा बच्चा तो मैंने माइक्रोफोन उनके सामने कर दिया. मैंने कहा भौतिकवाद पर अपने विचारों से हमारे श्रोताओं को अवगत कराएँ महाराज. उन्होंने दस मिनट के दो उद्बोधन दिए. उनको सुनते हुए ऐसा लगता था कि उनके समक्ष कोई अदृश्य पुस्तक है जिसका वे पाठ कर रहे हैं. वे सम्मोहक थे. उनमें गहरी शांति थी.

मुझे जैनियों से कोई प्रेम था. मैं चूरू से डेगाना आभा के पास जाता था. रेल के रास्ते में लाडनू आता. मेरी इस यात्रा के दो हिस्से होते थे लाडनू आने वाला है और लाडनू चला गया. लाडनू में जैन विश्व विद्यालय है. मैं रेल गाड़ी में अक्सर सोचता था कि काश मैं तत्व मीमांसा पर किसी जैन प्राध्यापक के निर्देशन में शोध कर सकूं. उन दिनों पढ़े लिखे की पहचान के लिए पीएचडी की डिग्री ही मंगल सूत्र थी. मुझे वह चाहिए था. बचपना ही था. आगे चलकर पीएचडी उपाधि का इस तरह क्षय हुआ कि मुझे संतोष आया चलो कोई बात नहीं कि डॉक्टर किशोर न कहलाये. मैं कोई चिन्तक या बुद्धिजीवी नहीं था, मेरे पास अपनी भोग्य कामनाएं थीं. मैंने उन्हीं का पोषण किया. मैं अब भी वही कर रहा हूँ. ये अगर कवितायेँ कही जाएँ तो समझिए कि असल में मेरे राग द्वेष हैं. मैंने एक दर्शन की स्मृति का सहारा लेकर बात कहीं है. जैन दर्शन मेरी इन बातों से कोटि कोटि ऊँचा है.

राग द्वेष से मुक्त
वीतरागी स्त्री स्थिर आसन में
प्रेम की पतवार से ठेलती है पृथ्वी को।

बुद्ध से वृद्ध ऋषभदेव के
पदचिन्हों को व्याख्यित करती है
क्या वे पति हैं तुम्हारे जिसे न त्याग सको।

त्याग तो कुटिलता, असभ्य भाषा
और अपने अहंकार का ज़रूरी है।

फिर पति या पत्नी को
त्याग कर जाते हुए अनेक उदहारण हैं।
जिनके दुनिया पैर पूजती है।

सर्वज्ञ सिद्ध अहर्त
तुम्हारी कोहनियों से टपक रहा है ममत्व
धरती तुम्हारी गोद में आने आतुर है।

।। सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/1।।


ज़रा नीचे झांको देवी

निगंठ नातपुत्त में सुना था
आखिरी तीर्थंकर का नाम पहली बार।

सुन्दर परदों के पार
अट्टालिका के भव्यतम शिखर से झांकती स्त्री
तुम्हारा अवतरण कब हुआ था?

बीहड़ों से बहकर आये
जल का आचमन तुमने अज्ञान से किया था
या फिर तुममें बचा रह गया
क्षत्रीय ज्ञातृ कुल का कोई अंश।

तेजस्वी भाषा के आलोक में
दिगंबर निर्ग्रन्थ का लोप हो चुका है।

कुछ सीढियां उतरने का समय है, हे देवी!
।।सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/2।।


वस्त्र धारण किये रहो देवी


झूठ से बने वस्त्रों को
नोचते हुए
कठोर चेहरे से
कल्याण की कामना करती, है रूपवती स्त्री।

असत्य हुआ जाता है दिगंबर।

मगर गृहस्थों और श्रावकों को
सार्वजनिक निर्वस्त्र होने का आदेश नहीं है

तुम कुछ न तजो, देवी।
।।सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/3।।


पर-पुरुष क्या होता है झूठ किसे कहते हैं?


उन खो चुके आगम ग्रंथों में
तीर्थंकरों ने क्या कुछ लिखा होगा प्रिये।

क्या ब्योपार पर गए
वणिकों की
स्त्रियों के पर पुरुष संवाद के बारे में भी
कुछ रहा होगा।

क्या नेह के दो टुकड़े
किसी अपराध में रखे गए होंगे।

क्या किसी की अपत्नी होते हुए भी
सौतिया डाह का उल्लेख रहा होगा।

कहो देवी
क्यों खोयी चीज़ें लुभाती हैं
क्यों आगम ग्रन्थ स्मृत होते हैं।
।।सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/4।।


राह अँधेरी

रागद्वेषादिविजय को
प्रभु कितने कष्ट सहे आपने
कैसे पाया महावीर होना।

ये केंचुए कौन हैं?

सत्य का अंकुश लिए
आती सुंदरियाँ कौन हैं?

और प्रभु
इनमें बचे हुए रागों के लिए
क्यों न छीन लिया जाए इनसे जैनी होना

मार्ग दिखाओ।
।।सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/5।।


बंधन

ज्ञान प्राप्त होने पर
भोजन अनावश्यक हो जाता है
किन्तु स्त्री-शरीर को
कैसे भी नहीं होती मुक्ति.

और तीर्थंकर
क्या ये कठोर वार्ता
समस्त स्त्रियों के लिए है या
वायु में विचरते
गुलाबी फाहे निबद्ध नहीं हैं इनमें

प्रभु अगर स्त्रियों की मुक्ति नहीं है
तो मुझे भी एक स्त्री होने का वर दो।

मैं प्रेम आसव में रहूँ क्रीड़ारत
प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष ज्ञान की तरह।
।।सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/6।।


ऊँचा पदार्थ

ओ प्रिये
वह सुदीर्घ ऊँचाई क्या विशेष है
वहां अधरों को चूमे बिना होता है परोक्ष ज्ञान।

वहां मिट जाती है
इन्द्रिय अथवा मन की ज़रूरत
और आत्मा
अपने ज्ञान से छांट लेती है
काले-गोरे, छूत-अछूत, जैनी-अजैनी मन।

मैं मूढ़
काश जान पाता
अदृष्ट दूर स्थित पदार्थों का अवधिज्ञान।

प्रभु
इतने ऊंचे पदार्थों में कभी होता है
थोड़ा सा भी प्रेम किसी के भी लिए।
।।सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/7।।




धनी चरवाहा

देवी
जिस विध चरवाहा हांकता है जानवर
उस विध तुम कितने मन हांकती हो।

कहाँ जायेगा रेवड़
हरे चारागाह में या अंधे कुएं में?

वैसे
ये लोगों के मन को पढने की
मनःपर्यायज्ञान विधि कहाँ से सीखी है?
।।सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/8।।


श्रुत ज्ञान


प्रिये
श्रुतज्ञान का
जो वृक्ष उगाया है
उसके बीज किसने दिए थे।

या किस संयोग से जन्मे वे बीज?

वातायन में खड़ी
सुंदरी पर आसक्त हो गया था
कोई शैतानी साया
या सुंदरी ने ही पसार दिया था खुद को?

देव अपने तेज़ से  
इसे भी उघाड़ो कभी।
।।सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/9।।




सबकुछ नाशवान है प्रिये

दिक् काल सिमित है प्रभु
तो सबका क्षय होता ही होगा?

ढल जायेगा जोबन
उन्नत ललाट पर
उतर आएगी चिंता की रेखाएं
इसके पश्चात् एक दिन
विस्मृति में बचे,
सताए, मरे हुए लोगों के लिए भी
कर पाओगे क्षमा याचना?

मूर्ख
इन अधरों और जिह्वा से
चूमा होता किसी को।


अज्ञानी सींचे जीवन बेल।
।।सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/10।।



कैवल्य  

बिछोह में
आत्मा ने उतार फेंका सबकुछ
तीर्थंकरों ने
इसे केवलज्ञान कहा।

प्रेम के बिना
असंभव था
आत्यंतिक नाश।
।।सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/11।।

सापेक्षतावादी बहुत्ववाद
बहु आयामी और अनेक धर्मी सबको बनाता है
देवी(?)

या ये सब ऐसे हैं ही?

चाहना, प्रेम और सहवास को भी क्या जींस समझा जाएँ ?

इनके भी अलग अलग
और अनेक धर्म हों तो तुम्हें बुरा तो न लगेगा.

अपनी ताड़ना के शंकु को
आकाश की ओर कर लो.

अनंतधर्मकं वस्तु. अन्नतधर्मात्मकमेव तत्त्वम.

॥सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/12॥


रूपसी
तुम्हारे बदन के
हर बल से गिर रही हैं गिरहें
और दर्शक के मन से झरता है अकूत लोभ
मगर सब पुद्गल है.

आह जिस रूप लावण्य
चाहना को लेकर आत्म वशीभूत हैं जगत
वे सब तो
सड़ने गलने वाली नाशवान चीज़ें ठहरीं. 

एक प्याला और दो कि मेरा नाश हो. 

तुम भी पुद्गल, मैं भी पुद्गल.
॥सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/13॥



वह धतूरा है देवी
सुन्दर पुष्पों की आभा तले
मस्तिष्क नाशक बीजों का सजीव संग्रह.

सिहरकर दूर न हटो
धतूरा एक औषधि भी तो है.

जो सत्य से पूरित है वह ही फलित है
जो विनाशी होकर नित्यत्व है,
वह वस्तु है. 

तुम भी एक वस्तु हो
एक समय साथ तरल थी, एक समय ठोस हो.
किसी और समय जाने कैसे कैसे हो जाओ.

अनेकांतवाद अनन्त अनेक होने का वाद है
अभी सब कलाएं जानना शेष है. 

॥सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/14॥


मैं आकाश के आसन से उतर कर
तुमसे बात करूँ?

आह
मुनि स्थिर हो गए
अविचल प्रेक्षक की भांति
आकाश से उतरी सत्य की बाती. 

लोक लाज
मान सम्मान सब विस्मृत
सहसा
तिमिर में खड़े तपस्वी पर
उतरा एक द्रव्य
ज्यों कोलाहल में उतरे मौन.  

द्रव्य का लक्षण है
गुणपर्याय वाला होना.

श्रमणी
तुम्हारे पास ये कौनसा निश्चेतक है?
॥सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/15॥

उसने कहा
यह ही सत्य है

मेरे तीर्थंकरों ने कहा है
इससे अधिक
दुर्नीति, दुर्गुण या दोषयुक्त नय (सत्य) कुछ नहीं.

क्या तुमने सिर्फ वे पत्थर के चरण देखे
उनके अभिवादन में पड़े तोड़े कुम्हलाये पुष्प देखे
क्या तुमने कभी मन से सुनी नहीं ये बात.

तुम्हारा सत्य असल में तुम्हारा अहंकार है.
॥सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/16॥



सत्य के अतिरेक भरे 
तुम्हारे संभाषण को    
आप्तमीमांसा के किसी पन्ने पर
रचयिता ने सत्यलाँछन कहा है.

सत्य के नाम पर
कौनसा अंग पकड़ रखा है तुमने हाथी का.

॥सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/17॥

मैं सही हूँ
हो सकता है तुम भी सही

आओ बैठें किसी कॉफी हाउस में.

हो सकता है कॉफी हाउस अच्छी जगह है
हो सकता है कॉफी हाउस बुरी जगह हो.  

हो सकता है क्रिया विधि, उपवास और जीवन का
तुम्हारे नाम के आगे लिखे
कुलनाम से कोई वास्ता न हो.

भाषण में अभाष्य
भोजन में अभोज्य से अधिक कष्टप्रद है प्रिये.

स्यात, स्यात, स्यात ये मेरा भ्रम ही हो.
॥सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/18॥


सबकुछ खंडित है प्रिये

सत्य भी विभाजित है
सात भागों में
अस्ति, नास्ति और अव्यक्तम् के
संभावित मेल में बंटा हुआ.
 
भव्य शयनकक्ष के वातायन से
प्रेयसी कर रही थी
प्रिय संग अव्यक्तम् दृष्टि विहार
पत्नी प्रतीक्षा
कामायनी कल्पनाएँ
ढोंगी, ढोंग.

घड़ा मिट्टी था या मिट्टी घड़ा थी
सत्य अबूझ है अभी तक. 

॥सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/19॥



शायद ये सच है
शायद वो भी सच है

मुझको उससे प्रेम है
शायद तुमको उससे प्रेम है
सत्य में उसे किसी से प्रेम नहीं
मैं सत्य हूँ और वह असत्य है.

शाड़करभाष्य में इसे
पागलों का प्रलाप कहा है प्रिये.  

मजमे के बाद और उससे पहले
तुमने जो कुछ कहा
वह बहुत कोमल है इसके आगे.

तुम्हारा यज्ञ विरोधों का समूह
मैं हविष्य उसका.
॥सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/20॥


वीतराग से बड़ा देव और
अनेकांतवाद से बड़ा कोई सिद्धांत नहीं
उम्र के पचास बरस किसकी आराधना में गवाएं प्रिय
वो भूख किस कारण सही
वो तपस्या के हेतु क्या थे फिर?

आंशिक अपूर्ण सत्य के निवारण को
मेरे अधरों से फूटती हैं
कच्ची कोंपलें
वक्ष ढक गया भुजाओं की ओट में
बाक़ी कुछ भी ऐसा नहीं  
जो अजाना हो जिसे लाया गया हो चुराकर.  

मैं पदार्थ
मिलता हूँ पदार्थों में
कुपित न रहो.
॥सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/21॥


पत्र आया है दूर से
लिखा होकर उदास

भोगायतन शरीर है
भोग्य समस्त जगत
अनादि अविद्या
और वासना के
कर्म बंधन में जीए जा रहे हैं.

लिखना तुम कैसे हो?

हे तीर्थंकर
पत्र का क्या लिखूं जवाब?
सब जीव स्वभाव से मुक्त.

॥सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/22॥



चींटी का जीव चींटी के बराबर
ऊंट का जीव ऊंट के बराबर .

मेरा जीव जाकर समा गया उसके जीव में.

प्रभु
ये पदार्थ दोष है?

क्या हम दोनों केंचुए हैं क्या हम दोनों डोल्फिन मछली हैं.

जीव चेतन द्रव्य
किस विध समझूं, किस विध जानूं?

॥सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/23॥





सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.