January 28, 2014

काश मैं गठित कर सकता कोई न्यायिक आयोग

आकाशवाणी के जिस स्टूडियो में काम करता हूँ वहाँ अलग अलग जगह पर स्लेव क्लोक लगीं हैं. वे बंधी हैं एक मास्टर क्लोक के आचरण से. आज अचानक तुम्हारी याद आई और याद आया कि तुमने किस तरह सुनाये थे बहुत सारे लोगों के किस्से, जो तुम्हारी ज़िन्दगी में थे.

कविता की पनाह, सबसे बड़ा मरहम है ज़िंदगी का.

कई बार अचानक दीखते हैं
फैंके हुए जूते, सामने पड़े हुए.

कई बार
हम चुरा लेते हैं नज़र
ऐसी चीज़ों से.

इस बार
बेरी पर आये नहीं उतने बेर
जितने दीखते रहे पिछले बरस.

पिछले बरस की याद आते ही
आया याद कि
फैंके हुए जूते, सामने पड़े हुए.

जाने क्यों
इन फैंके हुए जूतों को देखते
अचानक याद आता है एक लफ्ज़.

मुहब्बत.
* * *

उड़ते हुए पीछे की तरफ
गुलाची खाते
बर्मिंघम रोलर कबूतर की तरह

या फिर पिंजरे में क़ैद
एक पतली लकड़ी से उलटे लटके
बजरीगर की तरह

या याद की कलाबाजियों के बीच
सिर्फ गुरुत्वाकर्षण से बंधी
साँस थामे उड़ते बाज़ की तरह

एक रात थी
बीत गयी उलटे लटके शब्दों को पढ़ते।

लिखा था कि स्याह रात में
उदास कमरे नहीं रखते उम्मीद
अपनी खिड़कियों से किसी झाँक की।
* * *

सुनता हूँ तुम्हारे लफ़्ज़ों को बार बार,
इस तरह एक आवाज़ का रास्ता बुनता हूँ।

तुम जिस लहजे में कहो बात
उसी तरह की तासीर है अब मेरी ज़िन्दगी की।
तुमको गर न मालूम हो अपना नाम तो मुझे पूछना।
* * *

कर्क संक्रांति की तरह
जब हम पड़े होते हैं पांवों में
तब कोई नहीं देखता हमारी ओर.

मैले पैर ढोते जाते हैं उजले मुख को
मगर सर पर सवार चीज़ें
खींचती है सबका ध्यान अपनी तरफ.

रात के बिना दिन एक सूनी लंबी चौंध ही होता
फिर भी हम खुश होते हैं उगता हुआ सूरज देख देखकर.

इसी तरह सब चीज़ें बेढब है

सबसे अधिक बेढब है प्रेम
जो वार इतवार भी नहीं बूझता, बेअक्ल कहीं का.
* * *

धरती अँधेरे से डर कर लेगी करवट
ज़िंदगी फिर जीयेगी अपना भाग
जब भी देखो, ज़रा गौर से देखना
कि कौन पड़ा है रात की उम्रदराज़ जुल्फों में उलझा.

देखना कि कितना अँधेरा तारी है दो चीज़ों के बीच.

जालसाजी का भरम है
सिर्फ नौजवान दिनों के लिए
मगर उम्र की सलवटों के कारीगर जान लेते हैं जल्द ही
कि वक्त की चुप्पी के डर को मिटाने के लिए
आदमी ने रखी है घडी में टिक टिक की आवाज़.

सवाल बेहूदा है, मगर है तो कि
और कितने नकली हो सकोगे, जीयोगे कब तक इसी तरह.
* * *

रेत के कटोरे में रखा हुआ अंगारा बुझ गया
शाम आई और ले गयी उजास की सारी पंखुडियां

मैंने किसी पक्के शराबी की तरह
एक ही घूँट में पी डाला दिन भर का जाम

अब स्याह चादर के नीचे नीम नशे में तनहा, बेक़रार, बेहिस और बेमजा.

मैं निष्काषित करता हूँ तुमको आज की रात
कि इतनी सारी चीज़ों के होने पर क्या ज़रूरत है तुम्हारी.
* * *

खाली और भरी हुई
सब जेबों में उतरी

पुल पर संग चलते लोगों पर कुछ कम
पुल के नीचे बैठे लोगों पर कुछ ज्यादा.

धूसर, काली, अबखी या सुवाली

जैसी जिसके भाग लिखी
वैसी ही सब जेबों में उतरी, रेगिस्तान की शाम.
* * *

मार्क्स के मजदूर की तरह
नीत्शे की नफ़रत की तरह

ना ना
प्रेम सिर्फ अपनी ही तरह की चीज़ है.
* * *

केसी कहो तो भर दूं तुम्हारे कमरे को आला शराब से
केसी कहो तो लिख दूं तकदीर किसी स्याही खराब से.

बस एक उसको न मांगो कि
बाहर सर्दी बहुत और पालकी उठाने को कहें किस गुलाम से.
* * *

पिछले साल जनवरी में कोहरा था
इस साल की खबरें भी यही कहती हैं.

काश मैं गठित कर सकता
कोई न्यायिक आयोग तुम्हारे हाल की खबर लेने को.
* * *

एक दिन मैं हांक रहा था उसको घोड़े की तरह
एक दिन मैं निश्चेष्ट पड़ा था केंचुए की तरह.

कहो मायावी कौन?
* * *

इस वक्त क्या बजा है तुम्हारे देश में
मेरे यहाँ तीसरे पैग का वक्त हुआ है.
* * *

किसी कल्पना लोक में
एक गुलाम ने अपने आका को दे दिया देश निकाला

प्रेम बड़ी ही अद्भुत चीज़ है.
* * *

मैंने जो सबसे लंबी दारुण कथा सुनी वो
हत्यारों और शैतानों के बारे में नहीं थी.

वह एक प्रेम कहानी थी.
* * *

प्रेम
रेगिस्तान की चन्दन गोह नहीं था
कि बच सकते, उसकी पकड़ से.

प्रेम घात लगाये बैठा मकड़ा था, एक चुम्बन के इंतज़ार में.
* * *

हमारे प्रेम की सीमायें न थीं
इसलिए हम राष्ट्र न हो सके.
इसलिए हमारे प्रेम का कोई राष्ट्रीय ध्वज भी न था.

इसलिए दिल पर टांगा जा सकता था सिर्फ पागलपन का झंडा.
* * *

जहाँ कहीं कम पड़ जाता है प्रेम
वहीँ से शुरू होती हैं गुलामी और आज़ादी की सीमायें .
* * *

छीजने की आहट

मन एक तमाशा है  जो अपने प्रिय जादूगर का इंतज़ार करता है। शाम से बालकनी में बैठे हुए सुनाई पड़ता है। तुम कितने कोमल हो सकते हो? खुद से पूछने पर...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.