March 29, 2014

ताबीर है जिसकी हसरत ओ ग़म

एक तिकोना कस्बा था. मोखी नंबर आठ से राय कॉलोनी के आखिरी छोर पर वन विभाग तक और इनके ठीक बीच में जोधपुर की तरफ नेहरू नगर में उगे हुए बबूलों के बीच बसा हुआ.

मैं साल दो हज़ार में सूरतगढ से स्थानांतरित होकर वापस बाड़मेर आया. तब अमित खूब कृशकाय हो गया था. उसके पास कुछ सिगरेट और कुछ निश्चिन्तता भी थी. उसने कहा- "बंधू तुम लौट आये हो तो किसी शाम फिर से साथ में घूमेंगे." मैंने दो साल बाद बाड़मेर आने पर दिनों को घर में नींद लेने में बिताया और शामें रेडियो पर बोलते हुए. हमारे पास क्या नहीं था. पिताजी थे. कुछ गुरुजन थे. कुछ एक चाय की थड़ी थीं. वोलीबाल के मैदान थे. कुछ बेखयाली थी.

जिस शाम रेडियो पर बोलने की ड्यूटी न होती वह शाम अक्सर शेख बंधुओं के सायबर कैफे के आगे बीत जाती थी. मैं और अमित जब मिलते तो वहाँ से चल देते. हम महावीर पार्क या नेहरू नगर में उबले अंडे बेचने वालों में से किसी एक जगह पर होते थे. हमारे जेब में वही हिप फ्लास्क होते. मुझसे वह कभी नहीं पूछता कि तुम क्या पियोगे? इसलिए कि वह बरसों से जानता था कि मेरी कोई पहली दूजी पसंद नहीं थी. ख़राब होना था चाहे जिस चीज़ से हो जाते.

प्रेमचंद की सेवासदन जैसी कालजयी रचना की ही तरह हमारे पास हमारा अपना सेवासदन था. बाड़मेर क़स्बे का सस्ता और साफ सुथरा यात्रियों के रुके का स्थान. उसके सामने शेख सायबर कैफे था. जो कालान्तर में शेख कम्प्यूटर्स हो गया. उसी के पास शेरू की ज्यूस की दूकान है. शेरू पहले हॉस्पिटल के आगे ठेला लगाता था. अस्पताल के मरीजों के लिए जीवनदायी तरल के निर्माता इन दो भाइयों के सामने नगर पालिका वाले रोज़ संकट किये रहते थे. नगर पालिका वाले मरीजों के लिए किये जा रहे इस उपकार को बुरी नज़र से देखते थे. वे अक्सर ठेला उखाड़ देने की भूमिका में आ जाते. इस तरह वसूल होने वाली रंगदारी से अधिक शेरू को अपने अपमान का दुःख होता था. इसलिए एक दिन उसने चार हज़ार रुपये महीने के बड़े भाड़े पर सेवासदन के सामने एक दुकान खरीद ली.

शेरू की दूकान दक्षिण भारतीय प्राकृतिक पेय नारियल पानी के लिए भी फेमस थी. शेरू के यहाँ रखा हुआ लड़का नारियल छील कर स्ट्रा डाल कर देता और अनुभवी लोग सबकी आँख बचा बनारस के घाटों पर लंगोट बांधने जैसी फुर्ती से उस नारियल में अपना पव्वा उलट देते. रेगिस्तान की गरम शाम हल्की सुहानी ठण्ड की तरफ बढ़ रही होती उसी समय मयकश सड़क के किनारे अच्छे बच्चों की तरह केन की कुर्सियों पर बैठे नारियल पानी पी रहे होते. जिस तरह मेरे प्रिय कवि कानदान कल्पित बाईसा के डब डब भरे नयन याद करके होस्पीटल से आई ग्लूकोज चढाने के लिए लगने वाली पतली नली के एक सिरे को पव्वे में डाले रखते और दूसरा सिरा कमीज की कॉलर के पास लटका रहता था. उसी तरह अमित के बम्बैया अपर के अंदर की जेब में जीवन रसायन रखा होता था.

इस आवारगी में शराब पीते जाने के रोमांच से बड़ा रोमांच तकनीक के साथ आया. सवा लाख की कीमत वाले हेंडीकैम की कीमत कम होती हुई तीस हज़ार तक आ गयी. पूरे हिंदुस्तान में सिनेमा निर्माण में एक नई धारा बहने लगी. देश के बिहार जैसे पिछड़े और राजस्थान जैसे सूखे प्रदेशों की गली-गली वीडियो बनने लगे. नाच गाने के वीडियो. इस प्रक्रिया में नायिकाओं का उदय हुआ. वे रंग रूप के भेद से बहुत दूर सिर्फ नायिकाएं थीं. उनका पेशा था वीडियो के गीतों के लिए नृत्य करना. इस पेशे के साथ कई नये निर्माता और निर्देशकों का भी उदय हुआ.

नायिकाएं पहले से पेशेवर थी और इस तकनीक आगमन से उनके पेशे को एक सम्मानजनक नाम मिल सका. अब वे वीडियो एक्ट्रेस कहलाने लगी थीं. नायिकाओं के दबे कुचले शापित और अभिशप्त जीवन को नये रंग मिले. गली महोल्ले में क़ैद रहने वाली ये नायिकाएं अब यात्रायें करती थीं. उन्होंने सब निर्माता निर्देशकों को उलट पलट कर कर जांच लिया था. जिन लोगों के पास पैसे थे और वे सुख चाहते थे, उनको निर्माता बनने से ये सुख उठाने का सामाजिक अधिकार मिला. इसी आंदोलन के चरम पर पहुँचने के समय अमित एक फ़िल्म की पटकथा लिख रहा था. उसने बताया कि बालोतरा के कोई राम गोपाल वर्मा है उनकी फ़िल्म के लिए है. उस निर्माता निर्देशक का असल नाम सिर्फ राम गोपाल ही था किन्तु वीरेंदर सहवाग की विस्फोटक पारियों की तरह फ़िल्में बनाने वाले राम गोपाल वर्मा के नाम से वर्मा टाइटल मिल गया था. ये वर्मा की उपाधि अंग्रेजों द्वारा दी जाने वाली सर की उपाधि के समतुल्य थी.

अमित उन दिनों इसी तरह के कामों से घिरा रहता था. वह सरस सलिल में कहानियां लिखता था. उसकी कहानियां कड़ियों में छपती थीं. सरस सलिल के पाठक अगले भाग का इंतज़ार करते थे. दिल्ली प्रेस का ईश्वर में अविश्वास अमित को अपने करीब खींचता था. वह एक उपन्यास लिख रहा था जो महिला नर्सिंगकर्मियों के जीवन पर आधारित था. उसके पहले भाग को दिल्ली प्रेस ने स्वीकार कर लिया था. उसने दिल्ली प्रेस की कहानी प्रतियोगिता में अपनी कहानी भेजी और दूसरे स्थान पर रहा था. वो जब ये बातें मुझे बता रहा होता तब वह उदासी से घिरा रहता था. वह खुश उस दिन होता जब उसके लिखे प्रहसन और लघु नाटकों का शहर के मंच पर प्रदर्शन हो रहा होता. उसने सामाजिक जागरण के विभिन्न अभियानों के लिए नाटक लिखे. उन नाटकों के गाँव-गाँव में सैंकड़ों प्रदर्शन हुए. इस काम से उसे खुशी मिलती थी. एक बार मदन बारुपाल मेरे पास आए और बोले आपका वोयस ओवर चाहिए. बाड़मेर में जल संरक्षण को हुए काम को लेकर एक डॉक्यूमेंट्री बननी थी. जिला प्रशासन द्वारा बनायीं जा रही इस रपट को देश के प्रधानमंत्री भवन में उन्हीं की उपस्थिति में दिखाया जाना था. मैंने कहा स्क्रिप्ट दीजिए. उन्होंने मुझे पांच मुड़े हुए पन्ने दिए. वह लिखावट अमित की थी. मैं मुस्कुराया कि देखो दोस्ती हमें कहीं से भी खोज लेती है. हम फिर से एक साथ किसी बहाने से.

अमित की लिखावट अनूठी थी. उसकी लेखनी में जो जीवन बसता था वह सबसे अधिक सुन्दर था. मुझे मुकेश व्यास मिले. वे कहने लगे- "अमित जैसा कोई नहीं. मैंने एक बार कहा कि एक दस मिनट की नाटिका की स्क्रिप्ट चाहिए. उसका स्कोप ये है. अमित ने कहा एक सिगरेट पैकेट और आधा लीटर चाय ले आओ और पन्द्रह मिनट बाद आना. वे टाउन हाल के एक कोने में बैठे सिगरेट पीते हुए लिखते रहे. ठीक पन्द्रह मिनट बाद उन्होंने कहा कि ये स्केलेटन बन गया है पढ़ लीजिए पसंद आए तो उसको डेवलप कर लेते हैं. और आप कर सको तो कर लेना."

अमित की ख्वाहिशें बहुत ऊंची थी मगर उसकी सादगी उन ख्वाहिशों से भी बढ़कर.

ढूंढोगे अगर मुल्कों मुल्कों मिलने के नहीं नायाब हैं हम
ताबीर है जिसकी हसरत ओ ग़म ऐ हम नफसों वो ख्वाब हैं हम.
शाद अज़ीमाबादी



March 27, 2014

पपहिया प्यारा रे


क्या आपके पास बची है थोड़ी सी शराब, थोड़ा सा दिल में दुःख या थोड़ी सी ज़िंदगी? हाँ तो आओ सुनो प्रेम की बेमिसाल रचना. मैंने अब तक रेगिस्तान की उन्मुक्त गायकी के उस्ताद जिप्सी मांगणियार गायक गफ़ूर खां और साथियों की आवाज़ में कुछ लोकगीत आपके साथ बांटे हैं. आज दरबारी लंगा गायकी सुनिए. बड़नवा गाँव के गनी खां लंगा और साथियों की आवाज़. नायिका पपीहे का खूब शुक्रिया कह रही है कि उसने पीहू पीहू रटकर उसके प्रिय को कच्ची नींद से जगा दिया है. वह खुद उनको कभी न जगा पाती और रात जाने कैसे बीतती. 

एक दोस्त के लिए, अमित की याद के लिए भी 

सुण सोरठी थनों बीन्जों कहे तूँ म्होरी गली मत आवजो
थोरीं रे पायल हमें बाजनी रे म्होरे ढोले रो अवलो सभाव

म्हे तो बींजा जी आवसों रे ठमके धरसों पाँव
थे तो बींजा जी जोवसो हमें तो धुधले मिलाव

पपहिया प्यारा रे जस रो दिवलो
महाराजा नो काची नींद जगाया

नेड़ी नेड़ी रे करजो महाराजा चाकरी रे
झांझड़ली सा बेगा घर आवो रे
मिरगा नेणी रा ढोला रे
जस रो दिवलो महाराजा ने काची नींद जगोया पपहिया प्यारा रे

ऊंटों री असवारी रे महाराजा रे
अरे घोड़लिया रो टल जोवे रे मिरगा नेणी रा ढोला रे
जस रो दिवलो महाराजा ने काची नींद जगोया पपहिया प्यारा रे

ऊँची ऊंची रे मेड़ी महाराजा रे
झरोखों में आवे ठंडो बाव मिरगा नेणी रा ढोला रे
जस रो दिवलो महाराजा ने काची नींद जगोया पपहिया प्यारा रे

थे म्होरे आईजो महाराजा रे पोमणा
कर रे घोड़लां रो घमासाण रे
जस रो दिवलो महाराजा ने काची नींद जगोया पपहिया प्यारा रे

ओ विलक्षण छंद सी षोडशी तुम हमारी गली मत आना
तुम्हारी पायल बजती है और हमारे प्रिय का स्वभाव बड़ा कोमल है

ओ बींजा जी मैं आऊंगी और धमक के साथ अपना पाँव रखूंगी
ओ बींजा जी आप देखोगे धुंधलके में एक अप्रतिम मिलन

ओ प्यारे पपीहा तुमको तमाम शुक्रिया
कि मेरे महाराज को कच्ची नींद से जगा दिया.
 
ओ प्रिय निकट निकट ही करना नौकरी
धुंधलका होने से पहले घर आ जाना
ओ मृग नयनी के प्रियतम

ओ प्यारे पपीहा तुमको तमाम शुक्रिया
कि मेरे महाराज को कच्ची नींद से जगा दिया.

ऊंटों के सवार चले आ रहे हों
और घोड़ों के दल की राह दिख रही हो
ओ प्यारे पपीहा तुमको तमाम शुक्रिया
कि मेरे महाराज को कच्ची नींद से जगा दिया.

ऊंची ऊंची मेड पर बने हुए
झरोखों से ठंडी हवा आ रही है
ओ प्यारे पपीहा तुमको तमाम शुक्रिया
कि मेरे महाराज को कच्ची नींद से जगा दिया.

ओ महाराज आप तो आना प्रियतम बन
घोड़ों पर घमासान कर के
ओ प्यारे पपीहा तुमको तमाम शुक्रिया
कि मेरे महाराज को कच्ची नींद से जगा दिया.


March 25, 2014

मौत से पहले आदमी ग़म से निजात पाए क्यों.

क़ैद ए हयात ओ बंद ए ग़म असल में दोनों एक है 
मौत से पहले आदमी ग़म से निजात पाए क्यों.

अमित को लगता होगा कि ये शेर मिर्ज़ा असद उल्लाह खां ग़ालिब साहब ने शायद उसी के लिए लिख छोड़ा होगा कि शादी करना या ज़िंदगी भर ग़म उठाते जाने असल में दोनों एक ही चीज़ है, किसी भी आदमी को मौत से पहले ग़म से आज़ादी क्यों मिले.

बोम्बे में अमित के पास महानगर अखबार की नौकरी थी. वह अपनी प्रिय बीट सिनेमा के लिए लिखने से हट कर साहित्यिक विधाओं पर भी लेख लिखने लगा था. उसने सम सामायिक विषयों पर कई गंभीर टिप्पणियां लिखने की ओर रुख किया था. कुछ समकालीन साहित्यिक पत्रिकाओं में अमित की लिखी हुई टिप्पणियां छप रही थी. वह स्क्रिप्ट लेखन के लिए सामग्री का अध्ययन कर रहा था. वह कितना कामयाब होता ये नहीं मालूम मगर वह अपनी पसंद का जीवन जीते हुए आधे सच्चे आधे बाकी ख्वाबों के साथ अंतिम साँस ले सकता था.

साल इकानवे से लेकर छियानवे तक अपने सपनों के लिए भाग रहे नौजवान को अब एक न खत्म होने पतझड़ से गुज़रना था. जिस समझौते से उसने अपने लिए एक रास्ता चुना था वह वास्तव में गहराई की ओर जाती अँधेरी सुरंग निकली.

अब इस कथा की कुछ रीलें आपको गायब मिलेंगी. इसलिए कि मेरी स्मृति खूब अच्छी नहीं है और यहाँ तक आते आते हम दोनों के हालत अलग अलग हो गए थे. जब अमित बम्बई विश्व विद्यालय पढ़ने गया तब मैं जोधपुर विश्व विद्यालय चला गया था. जोधपुर विश्व विद्यालय में एम ए हिंदी में प्रवेश लेकर मैं नवभारत टाइम्स के ब्यूरो चीफ नारायण बारेठ का सहयोगी हो गया. वहाँ मैं खबरें लिखना सीख रहा था किन्तु जो चीज़ सबसे अच्छी पाई वह थी फीचर लिखना. बारेठ जी पत्रिका के कोटा संस्करण में थे तब उन्होंने खूब फीचर लिखे थे. वे फीचर मुझे पढ़ने को मिलते थे. वे खुद कोई फ़ाइल घर से खोज कर लाते और कहते किशोर इनको पढ़ो. मैं शाम को नव भारत टाइम्स में होता था और दिन में विश्व विद्यालय की सड़कों पर घूमता रहता था.

कोई दो साल जोधपुर में बिताने के बाद मैं आकाशवाणी चूरू में उद्घोषक होकर इस संसार से दूर चला गया. जब बाड़मेर ट्रांसफर हुआ तब अमित आया ही था. उसने एक परीक्षा दी और ग्राम सेवक बन गया. इस सरकारी सेवा में आते ही अमित के सामने एक नई दुनिया खुली.

जिस लड़की से वह भागता फिर रहा था वह बेहद अच्छी थी जितना कि अमित खुद न था. मैं बेहद कम मगर चार-छः महीने में एक दो बार अमित के घर चला जाता था. अमित की पत्नी घूंघट खींचे हुए कभी-कभी चाय ले आती थी. एक बार जब घर गया तब वह एक गुप्त जगह पर आराम कर रहा था. सीढ़ियों के नीचे बने हुए लकड़ी के पार्टीशन में उसने दडबा बना रखा था. उसी में कुछ किताबें और म्यूजिक प्लेयर था. वह उसकी गुफा थी. जिसमें उसने अपनी निजी दुनिया बसाई थी. एक छोटी सी चारपाई पर वह सिकुड़ा हुआ पड़ा रहता था. हम दो दोस्त उसके अंदर बैठ जाते तो तीसरे के लिए कोई जगह न बचती. इस तरह अट्टालिकाओं के ख्वाब देखने वाला आदमी एक चार गुणा छः की जगह में सिमट गया था. उसके पास बड़े कमरे थे मगर जाने क्यों उसे वाही एक अँधेरा कोना रास आया.

अचानक मेरा तबादला सूरतगढ हो गया. हमारे बीच फिर दो साल का अंतराल आया.

अमित ने ग्राम सेवक के रूप में जो ग्रामीण जीवन अपनाया था वह उसी ग्राम्य जीवन की चालबाजियों का शिकार हो गया. जिस गाँव में उसकी पोस्टिंग थी वहाँ के सरपंच ने अमित को अफीम की लत लगा दी. अमेरिका की मशहूर गायिका बेल्ली होलीडे ने जिस नशे की ज़द में दो सिपाहियों के पहरे में आखिरी साँसे ली थी, वैसा ही हाल अमित का भी हो गया. उसने कोई साल भर तक इस दुःख को उठाया और आखिर एक दिन ठोकर मार दी. उसने इस नशे को एलोपेथी की ड्रग्स से रिप्लेस कर दिया. अब वह सारे दिन कॉफी में कोई पाउडर घोल कर पीता था. अमित के चहरे पर अजब ढंग की सूजन आ गयी थी. वह हर एक से नज़रें चुरा कर बात करता था.

ऐसे हाल में एक दिन मैं उसके घर गया. पापा और माँ घर पर नहीं थे. दोनों भाई काम पर गए हुए थे. अमित की पत्नी ने दरवाज़ा खोला. उन्होंने कहा कि वे अंदर सो रहे हैं. मैं उसके कमरे तक गया जहाँ कभी हम दस साल पहले किशोर कुमार के गाने सुना करते थे. वक्त बहुत गुज़र गया था लेकिन कमरे से कुछ न बदला था. वह आधी नशे भरी नींद से जागा और इस तरह मिला जैसे कोई दो राजनैतिक दल किसी एक बात पर सहमत होकर गले मिलते हैं.

वह अपना मुंह धोकर आया. उने अपनी पत्नी से कहा किशोर के लिए चाय बनाओ. उन दोनों का वार्तालाप बेहद आत्मीय था. ऐसा कि जैसे जन्म जन्म के संगी हो. उस दिन शादी के दस साल बाद पहली बार अमित की पत्नी ने मुझसे कहा- “इनको समझाओ, हमें कुछ नहीं चाहिए. बस ये रहें और बच्चे बड़े होते जाएँ.” मैं खूब भावुक हो गया कि वे मुझे अपना समझकर कह रही थी. मैंने अमित को कहा कि सुनो तो भाभी क्या कहती है. इनका कहा मानो. ये ज़िन्दगी खूब कीमती है. अमित ने सब बातों को हंस कर टाल दिया. हमने चाय पी और सोचते रहे बचपन के दिनों के बारे में. पहली बार वे मियां बीवी मेरे पास बैठे थे. बीच में मैं था.

कल मैं उसकी लिखावट में पढ़ रहा था जो ठीक उन्हीं दिनों अमित ने लिखा था कि मैं अपने बच्चों और बीवी से खूब प्यार करता हूँ. अगर मुझे कुछ हो गया तो मेरी बीवी को एक चपरासी की तरह काम करना पड़ेगा. वह बेहद हताशा में अपनी डायरी लिख रहा था. उस डायरी में एक पत्र भी रखा था पत्र में लिखा था कि मुझे बचा लो. मेरी मदद करो. वह किसे संबोधित था मैं नहीं समझ पाया. लेकिन उसी डायरी में बच्चों का ज़िक्र था.

ज़िन्दगी में चाहे जैसे अंधे मोड़ आये हों मगर अमित की डायरी पढ़ते हुए मुझे लगता कि मिर्ज़ा ग़ालिब ने वह शेर अपने लिए ही कहा था. 
* * *

बात जारी है 

March 24, 2014

दो नाम है सिर्फ इस दुनिया में

मेरे घर में एक बड़ा दरवाज़ा था. उसके पिछले भाग पर एक श्वेत श्याम तस्वीर चिपकी हुई थी. उसमें मुस्कुराती हुई लड़की ज़ेबा बख्तियार थी. हिना फ़िल्म की नायिका. हमारे घर में फ़िल्में एक वर्जित विषय था. इस तरह किसी नायिका की तस्वीर का लगा होना अचरज की बात थी. घर के कई कोनों और आलों में रखी हुई तस्वीरें या तो पुरखों की होती या फिर क्रांतियों के जननायकों की. इन सबके बीच ज़ेबा एक अकेली लड़की थी, जो सदा मुस्कुराती रहती थी. ऐसा इसलिए था कि अमित ने बोम्बे जाते ही पहला काम यही शुरू किया कि वह फ़िल्म दफ्तरों के चक्कर काटने लगा. उसे तुरंत समझ आ गया था कि बिना किसी टैग के हर बार प्रवेश आसन नहीं होता. इसलिए उसने कई जगह काम खोजे. मराठी में प्रकाशित होने वाले अखबार महानगर के हिंदी संस्करण में उसे काम मिल गया था. उसने अपनी प्रिय बीट फ़िल्म को चुना. वह जब काम माँगने गया तब अपने साथ फ़िल्मी ज्ञान को लिखित में लेकर गया था. उसने कुछ फिल्मों की समीक्षाएं भी लिखी थीं. उसकी समझ को देखकर अखबार का प्रबंधन ने उस पर यकीन कर लिया था. 

अब वह फ़िल्मों के प्रमोशन के कार्यक्रमों का हिस्सा हुआ करता. वहाँ सबको एक लिफाफा मिलता ही है जिसमें फ़िल्म के प्रचार की सामग्री होती. इसी तरह उसे हिना फ़िल्म की नायिका की अलग अलग तस्वीरें मिलीं थी. उनमें से एक को उसने मुझे भेज दिया था. पहली बात ये थी कि वह लड़की की तस्वीर थी, दूसरी कि वह सुन्दर भी थी तीसरी कि उसे अमित ने भेजा था. इस तरह जननायकों की तस्वीरों के बीच एक सुन्दर बाला ने प्रवेश पा लिया था. ये घटना हमारे परिवार के आदर्शों में सेंध की तरह थी मगर अमित के नाम के कारण इस पर कोई प्रतिक्रिया न हुई.

ज़ेबा बख्तियार जैसी किसी लड़की का मुझे इंतज़ार न था. कुल जमा कॉलेज के दिनों में एक लड़की ने दो बेनाम खत लिखे थे. उनके पीछे लिखा था “गेस हू?” मैंने कुछ बढ़ी हुई धड़कनों के बीच एक दो दिन बेचैनी में बिताए मगर ये असर ज्यादा कामयाब न हो सका. मेरे दोस्त उस अंतर्देशीय पत्र को लेकर घूमते रहे. वे हेंड रायटिंग के सहारे उस लड़की को खोज लेना चाहते थे. वह चिट्ठी असल में मैंने ढंग से पढ़ी भी नहीं. मेरी इमेज किसी प्रेमी के जैसी न होकर एक एक्टिविस्ट जैसी थी. मैं उस ख़त को हासिल करता उसी बीच एक वर्कशॉप के सिलसिले में दिल्ली चला गया. 

मैं पांच दिन एक वर्कशॉप में रहा. वहां मैंने ये सीखा कि जन आन्दोलनों में गीतों और नाटक की क्या भूमिका हो सकती है. मुझ बेसुरे को वहाँ कोई सुर पकड़ न आया. मैंने नाटक करने के कार्य को भी अपनी समझ से परे जाना. उस कार्यशाला ने मेरा ऐसे गीतों से परिचित करवाया जो मेरे साथ आज भी उदासी में चलते हैं. तूँ ज़िंदा है ज़िंदगी की जीत पर यकीन कर अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर. दिल्ली में मेरे दिमाग ने फिर से रिफिल होने का मौका पा लिया और मैं फिर से खेतों और जोहड़ों के लिए संघर्षरत किसानों के बीच जाने लगा. इन आयोजनों का हिस्सा होने के लिए मुझे माँ से रुपये मिल जाते थे. मुझे सिर्फ किराया चाहिए होता. पापा कहते इसे सौ रूपये और दे देना. मेरा प्रेम मेरे जन आंदोलन ही थी. अमित का प्रेम था फ़िल्मी संसार.

बोम्बे में अमित के दो साल पूरे होने से पहले ही उसे कई बार याद दिलाया जा चुका था कि तुमको घर आना चाहिए और अपनी नव विवाहिता की खबर लेनी चाहिए. पहले उसने हॉस्टल के फ़ोन अटेंड करने वाले को कहलवाया कि मेरा कोई फ़ोन आए तो बात करवाने की जगह फ़ोन करने वाले का नंबर पूछ लेना और कहना कि मैं ही वापस फ़ोन करूँगा. वह वापस उन्हीं लोगों को फ़ोन करता था जिनसे उसका बात करने का मन होता. या इसे ऐसे ही समझा जाये कि जो उसे बाड़मेर लौट आने और घर बसाने की बात न कहे. उसके पिताजी की आशंकाएं बढती जा रही थी. वे इस मामले में पीछे नहीं हट सकते थे. समाज और इज़्ज़त ही उनके लिए प्राथमिकताएं थीं. वे अमित को इस बंधन में बांध कर वास्तव में खुद बंध चुके थे. उन पर लड़की के परिवार का दबाव बढ़ता जा रहा था. दो साल निकलते ही दबाव प्रत्याशित रूप से बढ़ा. समझौता की अवधि खत्म हुई. आशंकाएं बलवती हुईं कि लड़का बोम्बे भाग गया है. बोम्बे गए हुए के लौटने की उम्मीद नहीं होती. अमित के बोम्बे के प्रेम में फंस जाने से कुछ नये ख़तरे थे. एक था कि छोटे भाइयों का विवाह रुक जाता. कोई स्वजातीय अपनी बेटी देने को तैयार न होता. इस तरह से घर का नाश होने का सोचते हुए खुशालाराम जी और अधिक परेशानी में घिरा हुआ पाते. वे किसी भी तरह अमित को अपने घर में चाहते थे. उन्होंने आखिरी बात कही कि बेटा मैं कमाऊंगा और तुम घर बैठकर खाना मगर लौट आओ.

खुशालाराम जी का सहारा भी आखिर फ़िल्मी चीज़ ही बनी. उन्होंने संदेसा करवाया कि तुम्हारी माँ को एक बार देख लो. अमित जिस माँ की कहानी लिखता था, उसी को खो देने के डर से बाड़मेर आया. आते ही गिरफ्तार कर लिया गया. उसके घर पर साफे बांधे हुए रिश्तेदार और ससुराल वाले बैठे रहते थे. छोटे भाई इस तमाशे के कारण असहज होते और अमित को दोष देते. माँ असहाय अमित के कमरे से पिताजी के कमरे के बीच चक्कर काटती रहती. अमित एक गिनी पिग था. हर कोई उस पर अपनी 'प्रवचन प्रेक्टिस' कर रहा था. जो आता सलाह की एक सुई चुभो कर चला जाता. अंदर हर कोई प्रेम भरा और कमरे से बाहर आते ही कहता- "इसका दिमाग सरक गया है." लोगों के मजे थे. असल फंदा बाप बेटे को कस रहा था.

इसी दबाव में अमित मर गया. उसने नींद की गोलियाँ खाकर आत्महत्या कर ली.




पन्द्रह दिन बाद मुझसे मिला. कहने लगा- "मौत ने धोखा दिया. माँ का रोना देखा नहीं जाता. भाइयों की बेरुखी पर अफ़सोस होता है. पिताजी बात करते नहीं. मैं अब कारखाने में रणदा लगाऊंगा. ट्रकों की बॉडी बनाऊंगा. ओवर दी टॉप फ़िल्म का सिल्वेस्टर स्टोन मेरी बनायी हुई ट्रक को चलाता हुआ इस दुनिया के बेरहम लोगों को रोंद देगा." इतना कहते हुए उसने सिगरेट जला ली. इस दौर में इतनी मुश्किलों के बीच खुली आँख में बचे हुए सपने फ़िल्मी ही थे. सिल्वेस्टर स्टोन की याद थी. उसके दिल में उगे हुए बेरुखी के पेड़ के तने की छाल सख्त होने लगी थी.

कई दिनों बाद अचानक मुझे उसका ख़त मिला. बोम्बे से आया हुआ खत. मैं खूब अचरज में पड़ गया कि ये फिर बोम्बे भाग गया. ख़त का मजमून कुछ इस तरह का था जैसा कि जासूसी नोवेल का होता है. उसमें लिखा था. समझौते से जो खेल शुरू किया उस को एक नये समझौते से आगे बढ़ा रहा हूँ लेकिन इस बार दो महीने बाद फिर से मेरी खोजबीन होने लगी है. एक दोस्त के कमीने भाई यहीं बोम्बे में रहते हैं. मेरे बारे में पिताजी को अफवाहें सुनाते हैं. मैं इन सबके हाथ नहीं आने वाला हूँ. इस तरह वह सुकून की तलाश में लगातार भागते जा रहा था. 

बोम्बे में बाड़मेर के सुथार खूब रहते हैं. उन्होंने वहाँ फ्लेट खरीद रखे थे. उन्हीं फ्लेट्स को कारखानों में बदल लिया था. एक ही फ्लेट में आठ दस कामगार, युद्ध बंदियों की तरह काल कोठारी सा जीवन बिता रहे थे. उनके जीवन का ध्येय लकड़ियाँ छीलते जाना ही बचा रह गया था. ऐसे बोरियत भरे जीवन में उनके हाथ एक असल रोमांचकारी चीज़ लगी. अमित के घरवालों और ससुराल वालों की ओर से संदेशे भिजवाए गए थे. "एक समाज विरोधी आदमी भीखाराम जांगिड़, एक लड़की का जीवन तबाह करके मुम्बई की आवारा गलियों में कहीं खो गया है. उसका पता लगाना बहुत ज़रुरी है." अब सारे स्वजातीय बंधू इस सामाजिक दायित्व को निभाने के लिए काम से अवकाश होते ही बोम्बे की गलियों में जासूस बन कर भ्रमण करने लगे. अमित को जहाँ कहीं कोई मारवाड़ी चेहरा दीखता वह अपना मुंह किसी अख़बार के पीछे छिपा लेता. अमित के पास किताबें और अख़बार हुआ करते थे वह उनकी आड़ ले लेता मगर खातियों के पास कोई रणदा या करोती नहीं होती थी जिसके पीछे वे छुप सकें. 

इस तरह रेगिस्तान के जासूस अपने ही एक आदमी को खोज रहे थे. जो समाज का गद्दार था. जबकि गद्दार सिगरटें पीता हुआ जींस की जेबों में हाथ डाले, बेकार डायरियों को काला करते हुए सिनेमा के दफ्तरों में घूमता रहता था. एक बार कुछ खाती महानगर अख़बार के दफ्तर तक पहुँच गए. अमित का कहना था कि उनका आना ऐसा था जैसे शिव सैनिक आए हों. अखबार का प्रबंधन और स्थानीय पुलिस सावधान थी क्यों कि कुछ ही दिन पहले अख़बार के मालिक पर तांत्रिक जैसे दिखने वाले मराठी पत्रकार और शिव सेना के बाप ने मानहानि का दावा किया था. अमित को पकड़ने गए सिपाही खाली हाथ लौट आए. उनको अफ़सोस था कि काश कभी पांचवीं से आगे पढ़ाई की होती तो दफ्तर वाले उनको पहचान न पाते और इस समाज के दोषी को दस्तयाब किया जा सकता. 

आप जानते ही हैं कि मनुष्य समाज का इतिहास पांच हज़ार साल पुराना है और हिंदी का महज एक हज़ार साल. इसलिए हिंदी की हार हुई और समाज के आगे उसे घुटने टेकने पड़े. अट्टालिकाओं के शहर से बिछड़ कर अमित एक बार फिर रेगिस्तान की गलियों में था.

दो नाम है सिर्फ इस दुनिया में एक साक़ी का एक यज़दां का 
एक नाम परेशा करता है एक नाम सहारा देता है. 

इस दुनिया में दो ही नाम है एक जो शराब भर-भर कर पिलाये दूसरा वह जो दयालू है, एक नाम बिखेर देता है दूसरा संभाल लेता है. हम एक दूजे के कंधे से कंधा सटाए अपनी-अपनी जेब में रखे हिप फ्लास्क से दारू पीते हुए घूमते रहते थे. हम ही साक़ी थे, हम ही एक दूजे के लिए दयालू थे. अक्सर शाम को अमित आ जाता. स्टेडियम रोड के पास लुहारों के वास में मेरे घर से हम दोनों अपना सामान बाँध कर निकलते. स्टेडियम से सिन्धी कॉलोनी होते हुए बस स्टेंड और फिर महावीर पार्क. वहां से कलेक्ट्रेट के अंदर से होते हुए राय कॉलोनी की सड़क तक आते. हमारे फ्लास्क खाली हो जाते. अमित मुस्कुराता था. वह अपनी चमक भरी आँखों देखता. हर बार किसी प्रसिद्द साहित्यकार की कही कीमती बात कहता. फिर वह मुझसे पूछता- "तुम्हारे पास कोई नयी बात है कहने को?" मैं कहता नहीं वही बात है- "ज़िन्दगी एक भ्रम है और इसके टूट जाने तक इसे धोखा मत देना." 
* * *

बात जारी है.

March 23, 2014

खिले फूल शाखों पे नए

पनघट रोड बड़ा रूमानी सा लगता है. लेकिन हमारी पनघट रोड पर मोचियों, सुनारों, मणिहारों और अंत में एक भड़भूंजे की दूकान थी. इस पनघट रोड से होते हुए हम या तो गुरु जी आईदान सिंह जी के यहाँ जाते या संजय के घर.

अमित से जान पहचान और दोस्ती के सिलसिले के आगे बढ़ने के दौरान मैं एक छात्र संगठन में काम कर रहा था. वहाँ पोस्टर और बेनर बनाना, कवितायेँ सुनना और खूब सारा लिटरेचर पढ़ना भर मेरे काम थे. स्कूल से आते ही मैं बस्ते को ऐसे जमा करता कि जैसे अब इसका काम अगले जन्म ही पड़ने वाला हो. मैं जो घर में तनहा बैठा हुआ उजले दिनों के सपने देखता था, ग्यारहवीं में आते आते बाहर की दुनिया का लड़का हो गया था. मेरे आस पास खूब सारे लड़के हुआ करते. हम सब अक्सर कोई मोर्चा निकालने की योजना बना रहे होते.

अमित की दुनिया के लोग कोई और थे. उनमें मुझे संजय के सिवा कोई याद नहीं आता. संजय से मेरी असल मित्रता आकाशवाणी में एक साथ नौकरी करने के दौरान हुई लेकिन स्कूल के दिनों में अमित और संजय बड़े कहानीकार बन जाना चाहते थे. अमित की सायकिल राय कॉलोनी से निकलती तो फकीरों के कुएं के पास आते ही अपने आप बाएं मुड़ जाती थी. अक्सर सायकिल के साथ पैदल चलते हुए अमित कि छवि बनती थी. जोशियों के निचले वास में बालार्क मन्दिर से ठीक पहले संजय का घर आ जता था. घर की चार सीढी चढने पर बाहर के कमरे में संजय और अमित की कहानी और लेखन चर्चा चलती थी. मैं जब संजय के यहाँ गया तब सोचा कि अमित यहाँ बैठता होगा. लेकिन संजय का चाय प्रेम उनको उन दोनों को खींचकर पनघट रोड से नीचे की ओर धकेल देता था.

उन दोनों की कुछ कहानियां बाल भारती और चम्पक जैसी किताबों में आई. इसके बाद अमित दिल्ली प्रेस का दीवाना हो गया. ये दीवानगी कोई पल भर का प्यार न थी वरन उम्र भर चलने वाली थी. अमित और संजय कस्बे के लेखकों के घरों और दुकानों पर चक्कर लगाया करते थे. उनके लिए लिखना तूफानी रूमान की तरह था. वे रचनाएँ प्रकाशन के लिए भेजते और हल्के लिफ़ाफ़े का इंतज़ार करते थे. भारी लिफाफा लौट आना मतलब रचना का अस्वीकार हो जाना था. उनकी कई रचनाओं पर महीनों स्वीकृति के बाद भी छपी हुई किताब न आती. वे दोनों पोस्ट ऑफिस सुबह ही पहुँच जाते. डाकिये उन दोनों को मोहल्ले में इतना जानते थे जितना कि किसी वकील और डॉक्टर को नहीं. सबसे अधिक चिट्ठियां उन दिनों इन्हीं के नाम आती थी.

मैंने जब हाई स्कूल छोड़ी और कॉलेज में आया तब मैं छात्र आंदोलन से ऊब गया था. वहाँ सीमायें थीं. इसलिए मैं किसानों और मजदूरों के लिए काम करने लगा. साल भर राजस्थान की अनेक जगहों पर हो रहे किसानों के आंदोलनों में शिरकत करता. अपने जिले के कुछ गांवों में किसानों के साथ रात बिताता हुआ समझना चाहता कि असल माजरा क्या है. रोटी उगाने वाला खुद भूखा क्यों है? मेरे इन प्रवासों के कारण और राजनितिक रैलियों में घूमते रहने के कारण भी अमित और संजय से मिलना खत्म सा हो गया था.

अमित की लिखावट को खोजते हुए कल मुझे मेरी कई तस्वीरें मिली जिनमें मैं मजदूरों और किसानों को संबोधित कर रहा हूँ. वे झंडे लिए हुए बैठे हैं और मैं एक नीला कमीज पहने हुए हाथ में लिए कागज लहरा रहा हूँ. मुझे याद आया कि मेरे पास प्रेम करने के लिए साहित्य से ज़रुरी चीज़ थी.

अमित के बोम्बे जाने के पहले दो साल खुशी से भरे होने और उसके ग्राफ के लगातार नीचे गिरते जाने के थे. वह धीरेन्द्र अस्थाना से मिलता था. उसके होस्टल के सामने उदित नारायण रहते थे और उनकी अक्सर मुलाकातें होती थीं. बम्बई विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के हेड बांदिवडेकर साहब का प्रिय शिष्य था. सांताक्रूज स्थिति कलीना केम्पस के न्यू बॉयज हॉस्टल में रहने वाले सभी लड़के मैदानी इलाकों से आए हुए थे. वे सब फ़िल्मी दुनिया में सितारा होने की आशा से भरे थे. ऐसे माहौल में अमित का होना, सपन संसार में आ जाना ही था. वह वहाँ मंटो की कहानियों पर नाटक करता था. कहानी टोबाटेक सिंह पर उसका निर्देशित नाटक उन दिनों बहुत सराहा गया था.

वह मुझे खत लिखता था. वह मुझसे शिकायतें करता था कि तुम मुझे भूल गए हो. तुम अपने बारे में कुछ नहीं लिखते.

अमित के बोम्बे जाने के फैसले को सोचते हुए मुझे ख़याल आता कि ये हद दर्ज़े का दुस्साहस है. उसने कैसे एक सपने के लिए समझौता किया है. क्या वह इस चक्रव्यूह में मारा नहीं जायेगा. मैं अक्सर सोचता कि बड़े बनने का सपना देखना सबके लिए समाजवाद की तरह था मगर बड़े बनने को असल जामा पहनाना जंगल राज की तरह था. लाखों सपने देश के कोनों से चलकर आते हैं और बोम्बे में आखिरी सांस लेते हैं. क्या अमित के लिए भी यही था कि वह किसी चाल में शराब पीते हुए किसी नई औरत के साथ जीते हुए जीवन को इति की ओर ले जाये. या फिर वह हो सकता था एक मध्यम वर्गीय पत्रकार या स्क्रिप्ट लेखक? लेकिन मुझे इस बात पर यकीन नहीं था कि वह कभी सेंटर टेबल पर चमकीले काले जूते पहने पाँव रखे हुए रणजीत की तरह वेट 69 पी रहा होता और कह पाता कि ज़िन्दगी तुम मुझसे दांव खेलना चाहती थी न? आ आज कर मुकाबला. देख वे रेगिस्तान की गलियां कहाँ छूट गयी है पीछे, देख आज इस पचासवीं मंज़िल के शीशे के पास कैसा दिखता है समंदर.

मैं बोम्बे गया तब तक खूब वक्त पिघल कर बह चुका था. लेकिन उसकी चाल और सिगरेट पीने के सलीके में कोई बदलाव न था. शाम होने के बाद हम दोनों सांताक्रूज के एक बार में बैठे थे. उसके साथ उसके दो दोस्त थे. अमित ने कहा क्या पियोगे? मैंने कहा शराब होनी चाहिए. उसने कहा वोदका चलेगी? मैंने कहा कुछ भी चलेगा. अमित के दोस्त ने जेब से अपना रुमाल निकाला. पहले हमारे प्याले में पानी भरा और फिर रुमाल के सहारे शराब को इस तरह प्याले में उतारने लगा कि शराब और पानी आपस में मिल न जाएँ. पेग बन गए. नीचे पानी ऊपर नीट शराब. बारी बारी से सबने एक ही सांस में उन प्यालों को अप किया. वे पूरे फ़िल्मी लोग थे. रात के बारह बजे तक हम शराब पीते रहे. इसके बाद हमको खाने के लिए कुछ नहीं मिला.

आपने, कहो ना प्यार है फ़िल्म का एक ट्रेक सुना ही होगा. एक पल का जीना फिर तो है जाना... ये विजय अकेला का लिखा हुआ गीत है. विजय हॉस्टल में अमित का पड़ोसी था. अमित का कहना था कि होस्टल के लड़कों को सिगरेट खत्म होने पर सिर्फ मेरे पास ही उम्मीद बचती है. अमित कुछ इस अंदाज में कहता कि जैसे हिन्दुस्तान की टोबेको कम्पनी वही है. आईटीसी का वेयर हाउस उसके होस्टल का ही कमरा है. उसके इस फेंकू अंदाज से मुझमें थोड़ी आस जागती थी कि लालची लोगों की दुनिया में वह कुछ कर पायेगा. हॉस्टल में सब ज्ञानी और रचनाधर्मी लड़के रहते थे. एक कमरे के दरवाज़े पर सूचना लगी थी. “सिरहाने मीर के आहिस्ता बोलो/अभी पकड़े पकड़े सो गया है.” वे सब लड़के सिनेमा संसार में कहाँ खो गए. उनके सपनों का क्या हुआ? विजय अकेला अब क्या करता होगा?

अमित से मिलने बहुत सारे लोग बोम्बे गए. उनमें प्रकाश सिंह राठौड़, संजय और मेरा छोटा भाई मनोज भी थे. वे सब अपने ही किसी काम से बोम्बे गए मगर अमित से मिलकर ज़रूर आए. मनोज और राकेश शर्मा एमएससी करने के दौरान गोवा जाते समय अमित से मिले थे. जो भी उससे मिलकर आता उसकी लंबी फेंकी हुई चीज़ों पर मुस्कुराता रहता था. अमित ने मगर फ़िल्मी संसार को समझते हुए अपने लिए रोज़गार के रूप में पत्रकारिता की ओर ध्यान देना शुरू कर दिया था. वह मुझे खत लिखता तो ऐसे सपने ज़रूर बांटता था. उसके खतों में एक खास किस्म का रुमान और खुशी छलकती थी. उसने दो साल में जो जो काम किया उनका क्या हुआ नहीं मालूम मगर हिंदी विभाग से पहले दर्ज़े में उसने एम ए की डिग्री ज़रूर ले ली.

उसका समझौता इस पढाई भर का समझौता था. समझौता टूटने का दिन आने से पहले भी कई बार लगभग तोड़ा जा चुका था. वह किसी तरह इस बात पर अड़ा रहा कि पिताजी आपने मुझे बोम्बे जाने की अनुमति दी थी. उसके पापा का कहना था कि नहीं ये सिर्फ तुम्हारी पढाई के लिए था. वह छुट्टी में बाड़मेर आता तो मुझसे मिलता और यही बात कहता कि घरवाले कुछ समझते ही नहीं. मैं उसके इसी एक प्रलाप का पोषण नहीं कर सकता था. इसलिए एक दिन मैंने कह दिया- "वह लड़की जो तुमसे ब्याही है, उसे क्या करना चाहिए?" अमित खूब नाराज हुआ. बोला कि ये उसके बाप को और मेरे बाप को तय करना होगा. मैंने थोड़े कहा था कि मैं शादी करना चाहता हूँ. इतना कहते हुए उसका चेहरा ज़र्द हो जाता. वह और अधिक परेशान होता जाता. सिगरेट पीता. फिर मेरी ओर देखते हुए पूछता- "तुम्हारे पास कितनी ज़िन्दगी है?" मैं उसे सुनता रहता वह कहता ही जाता.

हम तिलक बस स्टेंड पर रेखे की चाय पीते. चाय पीने के बाद फिर बात करते. बात हर बार इसी बात पर अटक जाती कि तुम शादी का क्या करना चाहते हो. अमित कहता और चाय पीनी है? सिगरेट सुलगाता और सायकिल को स्टेंड से उतार देता. हम रेलवे फाटक के पास आते और वह बाएं मैं दायें मुड़ जाता. फाटक के नीचे कुत्ते मेरा इंतज़ार कर रहे होते. वे मेरे साथ चलते हुए मुझे गली तक छोड़ कर वापस मुड़ जाते.

अमित स्वेच्छा से चक्रव्यूह में अपने पाँव रख चुका था और उसके लौटने का खेल शुरू होने से पहले ही उसके अपनों ने घेरा कसना शुरू कर दिया था.

मैं जो उसे सलाह दे रहा था. वह नातज़ुर्बेकारी थी. मैं कहता कि तुम लिखो खूब सारा लिखो मगर एक सुन्दर घर बनाओ. मैंने सोच रखा है कि किसके साथ घर बसाऊंगा. मैंने अमित से कहा कि देखो मेरा फ़ैसला मुझे ख़ुशी देगा या नहीं ये मैं नहीं जानता हूँ मगर इतना मालूम है कि मैं इसकी शिकायत किसी से न करूँगा. इसलिए तुमने जो किया उसे निभाओ. मेरे ऐसा कहते ही वह अचानक से बोम्बे की अनिगिनत मज़िलों वाली दुनिया की बात शुरू करता. लोगों के ज्ञान को कमतर बताता. वह रेगिस्तान में सूख कर मर जाने को कायरता कहता.

वह आखिर मैं पूछता- "तुम क्या कहते हो?" मैं चुप रहता और वह मेरे पास से उठते हुए कहता- "तुम मुझसे प्यार नहीं करते हो. तुम्हारे अंदर अहंकार है. तुम सबको छोड़ देने के लिए बहाने खोजते हो." अनेक आशंकाओं से घिरा हुआ, अपने रास्ते में खड़ी दीवार के पार जाने में असमर्थ और हताश अमित मेरे से विदा हो जाता. उसका जाना कुछ इस तरह होता कि जैसे वह कभी लौट कर न आएगा.

मैं जब भी किसी लड़के या आदमी को सायकिल खींचते हुए देखता हूँ तो अचानक चौकन्ना होकर सायकिल के चैन कवर को देखता हूँ. पढ़ना चाहता हूँ कि इस पर क्या लिखा है? क्या मेरे दोस्त का नाम है?
* * *

March 22, 2014

कि मैं और तूँ रह गए हम नहीं

श्री चिड़ीमार कथा के बाद मैं आपको अपने कस्बे के स्कूल का ज़रा सा मौसम दिखा देता हूँ.

बाड़मेर का हाई स्कूल एक भव्य विद्यालय था. दो हज़ार से अधिक बच्चे पढ़ते थे. कक्षाओं के सेक्शन ए से पी तक पहुँच जाते थे. विद्यालय में किसी बच्चे को बिना सेक्शन की जानकारी के खोजना असंभव सा था. निजी शिक्षा ने हमारी आनंदमयी स्कूलों खत्म कर दिया है. निजी स्कूलों के नाम पर बाड़े बचे हैं. अब न हंसोड़ अध्यापक दीखते हैं न बिना डर वाले बच्चे. सबकुछ एक होड़ ने निगल लिया है.

स्कूल दो पारियों में लगता था. स्कूल में आगे हॉकी का मैदान था. स्कूल के पीछे फ़ुटबाल का मैदान था. लेकिन पिछले मैदान में रेत अधिक होने के कारण लड़के हॉकी वाले मैदान में फुटबाल की प्रेक्टिस किया करते थे. मंच के बाएं प्रिंसिपल साहब का ऑफिस और उसके पास एडमिन के कमरे थे. दूजी तरफ गर्ल्स रूम था. उसके ठीक पास लाइब्रेरी का हॉल था. जहाँ कभी-कभी वाद-विवाद और भाषण प्रतियोगिताएं आयोजित होती थी. स्कूल में कुछ अच्छे डिबेटर लडके थे. एक था राजेश जोशी दूजा अनिल कुमार सिंह. मैं भी लगभग हर डिबेट में होता था. हम तीनों स्कूल आते या न आते मगर वाद विवाद प्रतियोगिता में ज़रूर एक साथ बैठे होते. अमित को इस तरह के आयोजनों में कोई दिलचस्पी नहीं थी. वह ऐसे आयोजनों के समय दल्लू जी की कचोरी खाने निकल पड़ता था.

एक माड़सा थे मग सिंह जी. हंसोड़ नहीं थे मगर चुटकियाँ लेने के माहिर थे और छात्रों में खूब लोकप्रिय थे. हमारे यहाँ लहंगे को घाघरा भी कहते हैं. घाघरे की निचली कोर से थोड़ा ऊपर एक अलग रंग की बेहद पतली तार जैसी कपड़े की लकीर लगायी जाती है. ये गोल घेर को सुन्दर बनाती है. इसे मगजी कहते हैं. माड़सा से किसी लडके ने पूछा कि माड़सा थोरों नोम की है? माने आपका नाम क्या है. वे कहते- "थारी बाई घाघरे हेटे लगावे जीको." ये बेहद श्लील प्रहसन खूब प्रसिद्द था. मुझे नहीं मालूम कि किसी लड़के ने ऐसा पूछा था या नहीं या माड़सा ऐसा कहते थे या नहीं. मगजी माड़सा को प्रिंसिपल साहब ने किसी बात पर कहा कि मिठाई खिलाओ. वे बाहर आए और महिला चपरासी को कहा कि बाई जी आपको प्रिंसिपल साहब बुला रहे हैं. बाई जी अंदर गयी. प्रिंसिपल साहब ने कहा कि मैंने तो नहीं बुलाया है. उन बाई जी का नाम था इमरती देवी.

हमारे ऐसे माड़सा स्कूल के बाद भी जहाँ कहीं लड़कों को घूमते देखते तो पूरा ध्यान रखते. अगले दिन कक्षा में आते ही सबके सामने पूछते कल कहाँ घूम रहा था? इसके बाद अगला असंगत सवाल होता कि पिछले टेस्ट में अंग्रेजी में कितने नम्बर आये थे.

सभी लोकप्रिय मास्टर अपनी कक्षाएं बड़ के पेड़ के नीचे लगाया करते थे. स्कूल में विद्यार्थी बहुत ज्यादा थे. उनके संख्या बल के आगे सभी कमरों का नाप छोटा पड़ चुका था. इसलिए सौ-सौ विद्यार्थी बाड़े की भेड़ों की तरह बैठे रहते थे. ज़मीन में छुपे हुए बारीक परजीवी लड़कों लड़कियों की टांगों से खून चूसते जाते थे. आखिर दो हज़ार से अधिक बच्चों और ए से पी सेक्शन तक पहुँच चुकी क्लासों को इसी तरह ही मेनेज किया जा सकता था. ऐसी ही कक्षा बड़ के पेड़ के नीचे लगी होती और स्टाफरूम के पास से अमित आता और लड़कों की भीड़ में मुझे खोजने लगता. हमारी नज़रें मिलती तो इशारों में ये तय हो जाता कि व रुके या चला जाये. अक्सर मैं मना कर देता कि समय से घर आना घर कि पहली शर्त थी.

स्कूल के वे दिन सरल थे. जटिलताएं छू भी नहीं पाती थी.

स्कूल के दिनों से बाहर तीन लंबे सालों का लीप लेते हुए सीधा उस दिन पर आ जाता हूँ जब अमित खूब चिंतित था. मैं ये लीप इसलिए ले रहा हूँ कि इन तीन साल में मैं और अमित नहीं मिल सके. मैं अलग काम में लग गया था. मैं छात्र आन्दोलन में काम कर रहा था और अमित अक्सर किशोर कुमार के गाने सुनता और अपने लेखन में खोया रहता था. अमित की चाहना थी कि वह मुम्बई विश्व विद्यालय से हिंदी में एम ए करे. उसके घरवाले तैयार न थे. अमित का प्लान था कि वह वहाँ एम ए करने के दौरान फिल्मों में स्क्रिप्ट लेखन में अपने हाथ आजमाएगा. दो साल वहाँ रहने के दौरान पढाई भी हो सकेगी और काम के लिए तलाश भी. अमित को मुम्बई जाने की स्वीकृति नहीं मिली. घरवाले चाहते थे कि वह शादी कर ले और घर संसार को आगे बढ़ाये.

इस खींचतान में अमित ने एक ऐसा समझौता किया जिसने उसके जीवन को बदल दिया. उस दिन अमित मेरे पास बैठा था. वह शायद संजय के पास भी जाकर आया होगा. उसने मुझे कहा कि मैंने एक समझौता सोचा है. मैं पिताजी का कहना मान कर शादी कर लेता हूँ. इस पर वे मुझे बोम्बे जाने देंगे. मैंने कहा- "तुम पागल हो क्या? इसका मतलब जानते हो?" उसने किसी फिल्म के संवाद की तरह कुछ ऐसी बात कही जिसका अर्थ था कि अगर ज़िंदगी हमारे साथ दांव खेलना चाहती है तो हमें उसका स्वागत करना चाहिए.



कुछ दिन बाद अमित दूल्हा बना हुआ था. मैं और संजय बारात की किसी जीप में बैठे हुए इन्द्रोई गाँव की तरफ जा रहे थे. मैं एक लेखक के पास बैठा था. संजय व्यास जिसकी कहानियां पत्रिकों में छपती थी. जीप रेत के धोरों के बीच बॉर्डर की ओर बढ़ी जा रही थी. इसी जीप यात्रा और अमित की शादी में मुझे संजय के साथ बहुत सारा समय बिताने को मिला. संजय और अमित पक्के मित्र थे. इसी तरह मैं और अमित भी थे लेकिन संजय से पहचान इसी समय मित्रता में बदलने लगी. शाम को मैं और संजय इन्द्रोई गाँव के रेत के धोरों पर घूमे. अँधेरा घिरते ही अमित विवाह के फेरे खाने चला गया. वहाँ मेहमानों के लिए कच्ची शराब थी. मैंने भी एक कप पी. उस एक कप शराब के पीते ही मुझे उल्टी हो गयी और फिर जाने कब सो गया. सुबह तक अमित विवाहित जीवन जीने के फेरे ले चुका था. घरवाले खुश थे. उसके पिताजी के चेहरे पर संतोष और गर्व का भाव था. ये सामाजिक होने का दर्प था.

इसके कुछ ही दिन बाद अमित ने कहा- "बंधू कल की शाम बाड़मेर की आखिरी शाम होगी." मैं मालगोदाम रोड पर खड़ी एक बस के पास खड़ा था. वह बस बोम्बे जाती थी. अमित के लिए ये सपने के सच होने की शुरुआत थी. हम गले मिले. उसने बस के रवाना होने से पहले मेरे हाथ में एक पर्ची रखी. जब बस चली गयी और मैं घर आया तब मैंने उसे पढ़ा. उसमें लिखा था- क़यामत से कम यार ये ग़म नहीं / कि मैं और तूँ रह गए हम नहीं.

अम्बर टाकीज में जब फिल्म के क्रेडिट दिखाई देते थे तब लोग उन क्रेडिट्स को नज़र अंदाज किये हुए फ़िल्म के शुरू होने का इंतज़ार करते थे या एक्जिट से बाहर जा रहे होते थे लेकिन अमित की नज़रें उन क्रेडिट्स को पढ़ रही होती थी. मोहन जी के सिनेमा के जिस दरवाज़े को मैं नरक का द्वार समझता था वह अमित के सपनों का सुनहला आईना था. वही आईना उसे रेगिस्तान से उस समंदर के किनारे ले गया जहाँ मायावी संसार बसा हुआ था. बोम्बे.
* * *

बात अभी जारी है. 

March 20, 2014

राय कॉलोनी का चिड़ीमार


मीर क्या सादे हैं बीमार हुए जिसके सबब,
उसी अत्तार के लड़के से दवा लेते हैं।

इस शेर से जाना कि लौंडेबाज़ी भी कोई शै होती है. ऐसी ही जानकारियां होने के ख़याल से माँ-बाप डरते थे. मैं चूँकि सायकिल पर सवार हो चुका था. मेरे पांवों में पहिये थे. मेरे साथ मेरा दोस्त था. अमित.

मैं राय कॉलोनी नहीं जाना चाहता था मगर मेरा नया महबूब वहीं था. उसके पास खास किस्म का सम्मोहन था. मेरा मन उसकी ओर खिंचता रहता था. मैं सायकिल चलाते हुए दोपहरें बिताना चाहता था. अमित से मिलने की एक खास वजह थी कि उसमें बातें दूर तक फेंकने का हुनर था. वह बात को इस तरह कहता जैसे बात को अंतिम सत्य से उसी ने लपेटा है. वह मेरा दुष्यंत कुमार था और वही दिनकर भी. लेकिन इस सब से बढ़कर वह सिनेमा का अद्भुत स्क्रिप्ट रायटर स्टीव मार्टिन और एडम मैके था.

आखिर मैं राय कॉलोनी गया. उसी लंबी काली पतली सड़क पर चलते हुए विश्वकर्मा न्याती नोरे के लिए घेर कर रखी हुई जगह के थोड़ा आगे अमित ने मुझे इशारा करके बताया कि इस घर में कोई महान शख्स रहता है. उस घर से थोड़ी दूर आगे अमित किसी सूने पड़े हुए बाड़े के रास्ते मुझे अपने घर ले गया. ये वास्तव में अमित के घर में बैक डोर एंट्री थी. मगर सीधी थी. इस एंट्री के ठीक सामने ओम प्रकाश नाम के एक लड़के का घर था. ओम् के पापा अध्यापक थे. बेहद सरल और संजीदा इंसान. ओम खुद खूब सीधा सादा और भला लड़का था. ओम् से मिलने के दिनों से पहले अमित ने मुझे राय कॉलोनी की उस महान आत्मा से मिलवाया.

बच्चों के बिगड़ने की असीमित संभावनाएं होती हैं. शराबी-जुआरियों की संगत में पड़ जाना. चोरी और सीनाजोरी करने वालों का संग कर लेना. हमउम्र लड़कियों के घरों के आस-पास डोलते हुए पिट जाने का या आवारा भटकते रहने का और पढाई से मन उचट जाने का. लेकिन श्री चिड़ीमार की कथा का को जानना भयानक बिगड़ जाना था.

श्री चिड़ीमार कथा

मैं पीछे और अमित आगे. हम महान आत्मा के घर में दाखिल हुए. मेजबान ने उधारी वसूलने आए लोगों को ट्रीट करने के भाव में दरवाज़ा खोला मगर हमारे प्रति रुख एक अनुभवी, सताई हुई और जीवन से बेज़ार ज़िन्दगी सा ही रखा. उसने कहा बैठो. हम बैठ गए. अमित ने कहा- "चिड़ी विड़ी पकड़ते हो या छोड़ दिया?" उसने प्रतिकार भरा मुंह बनाया. दोनों की भंगिमाएं लड़ाई जैसी होने लगी. माहौल गंभीर हो गया और हम विदा हो लिए.

वहाँ से लौटते हुए अमित ने बताया कि एक दोपहर मैं इसके घर गया. मैंने दरवाज़ा खटखटाया तो अंदर से आवाज़ आई- "कौन है?" मैंने कहा- "भीखो." अंदर से आवाज़ आई- "रुक." मैंने पूछा- "क्या कर रहे हो?" अंदर से आवाज़- "आई चिड़ी पकड़ रहे हैं." अमित ने ज़रा देर बाद दरवाज़े के कुंदे पर पैर रखकर रोशनदान से अंदर झाँका तो पाया कि चिड़ी नहीं पकड़ी जा रही थी.

साले गंदे कहीं के.

मैंने पूछा- "अमित इसका मतलब क्या हुआ?" अमित ने मुझे दया भरी नज़रों से देखा. उसे खूब अफ़सोस हुआ कि मैं किसी खास ज्ञान के मामले में दरिद्र हूँ. उसने कहा- "वो नहीं समझते हो." मैंने पूछा- "क्या?" अमित ने खूब परेशानी से बाहर आने की कोशिश करते हुए कहा घर चलो बताता हूँ.

आह ! मैं सचमुच गलत संगत में था. मुझे इस कहने का अर्थ समझते हुए मजा खूब आया मगर कोई डर इस मजे का पीछा कर रहा था. इस बयान की सच्चाई के बारे में अनेक दावे थे. राय कॉलोनी में अमित मुझे जिस किसी से भी मिलवाता उससे ये ज़रूर पूछता कि चिड़ीमार से मिले या नहीं. मौका है फायदा उठाओ. अगले की हंसी और आँख मारने की अदा मुझे यकीन दिलाती कि वह वाकई ऐसा गया गुज़रा लड़का है.

चिड़ीमार वास्तव में प्राण की टोपी, राजकपूर के लंबे रूसी कोट और शेक्सपीयर के बर्फ के जूतों का दीवाना था. वह इस साज़ ओ सामान के साथ अग्रवालों की गली का चक्कर लगाया करता था. उसी हवा के झोंके के लिए जिसकी प्रतीक्षा अमित हाई स्कूल के मूत्रालय के पास खड़े होकर किया करता था. चिड़ीमार के इस प्रतिदिन के उपक्रम पर अग्रवालों की गली के लड़कों को आपत्ति थी. वे नहीं चाहते थे कि उनकी गली की किसी लड़की के लिए कोई इस तरह फेरे लगाये. ये एक तरह से उस गली के लड़कों को चुनौती थी. वे इसे स्वीकार करना चाहते थे किन्तु महाराज सा ने कह रखा था जीवों के प्रति दया रखो इसलिए इस चिड़ीमार के विरुद्ध कोई कदम न उठाते थे.

एक ओर हमारी ही उम्र का लड़का जैन मुनि तरुण सागर जी बनकर कटु प्रवचन के लिए प्रसिद्द होता जा रहा था. उसके प्रवचन की कैसेट लोग घरों में सुनते थे. दूजी और अग्रवालों की गली के लड़के कटुप्रवचन करने में असमर्थ थे. चिड़ीमार की नियमित आवाजाही से परेशां लड़कों ने राय कॉलोनी से ही कुछ गुंडे हायर किये गए. जिस ज़माने में एक-दो रूपये में मिर्ची बड़ा आ जाता था उस ज़माने में पचास रूपये जितनी अविश्वसनीय फीस चिड़ीमार का काम पक्का करने के लिए दी गयी.

लड़कों ने चीड़ीमार को उसी वेशभूषा में शीतल हवा वाले घर के बाहर विचरण करते हुए रोका और कहा "आप बड़े स्मार्ट आदमी हो." चिड़ीमार इसी अवसर की प्रतीक्षा में था कि इस गली में कोई तो पहचान निकले. वहाँ खूब पहचान निकली. तीसरे दिन तय हुआ कि इतवार को सूजेश्वर के नीचे घाटी में गोठ होगी. इसका खर्च उठाने के लिए चिड़ीमार ने खुद को प्रस्तुत कर दिया.

राय कॉलोनी जिस काम के लिए बदनाम थी, वही हुआ. चिड़ीमार को मूर्ख बना कर गोठ के नाम पर पहाड़ों की तलहटी में ले गए. वहाँ खूब पीटा. उसको नंगा किया और फिर उसके कपड़े लेकर चलते बने. अमित का कहना था कि इस घनघोर अपमान से शर्मिंदा होकर प्रेम ने सोन तलाई में छलांग लगाकर आत्महत्या कर ली. चीड़ीमार ने आस पास कोई चीज़ खोजी. उसे याद आया कि एक फिल्म में जब धर्मेन्द्र के कपडे इसी तरह चुरा या लूट लिए जाते हैं तब वह बांस की छबड़ी में खुद के अप्रदर्शनीय अंग छुपा कर मंजिल तक जाता है. चिड़ीमार को छाबड़ी न मिली लेकिन सौभाग्य से गूणकी मिल गयी. वह बारदाने में खुद को ढके हुए लेकिन नंग धड़ंग सूजेश्वर से राय कॉलोनी के आखिर छोर तक आ पाया.


इस घटना की सत्यता के लिए अमित ने कई लोगों से हाँ भरवाई मगर मुझे अब तक यही लगता है कि ये अमित का चिड़ीमार के प्रति रश्क था और अमित ने अपने कथा कौशल से रकीब से बदला लिया था. मेरा दोस्त अमित एक अच्छा कहानीकार बनेगा मैं ये सोचता लेकिन वह हमारे एकांत में कविताएँ सुनाया करता. मैंने तीन चार महीने पहले ही कविता सुनाने से रोक दिए जाने से अपमानित होकर उस कविता को फाड़कर फेंक दिया था.

एक रोज़ अमित ने पूछा- "कविता नहीं लिखी कोई?" मैंने कहा- "मुझसे कविता नहीं लिखी जाती."उसने कहा- "कोई बात नहीं. ऐसा सबके साथ होता है. एक दिन अपने आप कविता बनेगी." वह थोड़ा सा चुप रहा और फिर उसने अपनी डायरी निकाल ली. डायरी पर फेविकोल के जोड़ को तोड़ने के लिए ज़ोर लगाते हुए हाथी थे मगर जोड़ इतना मजबूत था कि हाथी वहीँ खड़े हुए थे. अमित ने कुछ पन्ने पलटे और कविता सुनाने लगा. एक कविता सुनाते हुए अमित को जाने क्या याद आया कि उसने कहा चलो.

हम दोनों अपनी-अपनी सायकिल लिए चल पड़े. राय कॉलोनी में पुराने आयकर ऑफिस के पास वाले छोटे से चौराहे पर हम अलग मुड़ गए. अमित बाएं मुड़ गया और मैं दायें. मेरी सायकिल पीएचईडी के गोदाम की ओर ढलान में भागी जा रही थी.
* * *

March 19, 2014

नरक का प्रवेश द्वार

साल चौरासी के आस पास डाक बंगले से लेकर फकीरों के कुएं तक एक आठ फीट की पतली काली लकीर थी, जिसे राय कॉलोनी रोड कहा जाता था. इस रोड पर धूल उड़ती रहती थी. भारत के बंटवारे के बाद पाकिस्तान से आए शरणार्थियों ने बड़े शहरों में पनाह ली. इसलिए कि वहाँ रोज़गार के अवसर ज्यादा थे. घर बसाने में एक ज़िंदगी बीत जाती है फिर नये सिरे से घर बसाने की तकलीफ वे लोग नहीं जान सकते जो पुरखों की ज़मीन पर रह रहे हों. इस विस्थापन में बहुत से परिवार बाड़मेर में ही रुक गए. उनके लिए या तो भागते जाने की थकावट राह का रोड़ा थी या उनके रिश्तेदार यहाँ थे. इन्हीं विस्थापितों के लिए उन्नीस सौ तिरेपन से पचपन के बीच कलक्टर रहे ऐ के राय ने आवासीय भूमि आवंटन के प्रयास किये थे. इस बसावट को राय कॉलोनी के नाम से जाना जाने लगा. आज ये बाड़मेर की व्यापारिक गतिविधियों की केन्द्रीय जगह है. कभी ढाणी बाज़ार और पीपली चौक बाड़मेर के अर्थ जगत के आधार थे. उसी धूल भरी पतली रोड पर मेरे नये दोस्त भीखू का घर था.

साल अट्टहतर के आस पास किसान छात्रावास में पापा के वार्डन रहने के दौरान राय कॉलोनी तक धूल भरे धोरों को पार करके पहुंचा जा सकता था. वे रेत के धोरे बालमंदिर स्कूल को पार करने के बाद अस्पताल के पीछे वाले टीलों तक आते ही मुझे थका देते थे. एक दोपहर बाद मेरे द्वारा किसान बोर्डिंग हाउस से अस्पताल के आखिरी छोर तक की हुई यात्रा उन दिनों की सबसे बड़ी यायावरी थी. मैंने उस शाम घर पहुँचते इस तरह सांस ली जैसे आदिम यात्रियों का आशीष उतर रहा है. हमारे लिए खेलने की सीमा बालमंदिर स्कूल के आगे का भाग और हाई स्कूल के पीछे का मैदान तय था. जिस मैदान में अब गर्ल्स कॉलेज बनी हुई है. इन दो जगहों के बीच मुर्दा कोटड़ी नामक भयावह जगह थी. जो ठीक राय कॉलोनी की दिशा में पड़ती थी. उस कोटड़ी के चारों तरफ कोई दीवार न थी. कुछ बबूल की झाड़ियाँ थी और भूतों के लटकने के लिए एक बड़ा बरगद का पेड़ था. इसलिए भी मुझे राय कॉलोनी की दिशा में देखना पसंद न था. पुलिसिया भाषा में वह मोहल्ला आवारागर्दों का स्वर्ग था. वहाँ रोज़ लड़ाई झगडे होते थे. शराबियों और बदचलन लोगों की शरणस्थली थी. शहर के जूना केराडू मार्ग से लेकर रेलवे स्टेशन तक लोकतंत्र स्थापित हो रहा था लेकिन राय कॉलोनी में जिसकी लाठी उसकी भैंस का कायदा चलता था.

अमित से दोस्ती मुझे उस वर्जित भूभाग की ओर खींचने लगी.

हम कभी कभी ही मिलते थे यानी कोई दो महीने में एक बार. मुझे उसके बारे में सिर्फ इतना मालूम था कि उसे साइंस नहीं पढनी पड़ती और वह भाग्यशाली है. मोहन जी के सिनेमा यानी अम्बर टाकीज वाली गली में उसके पापा का ट्रक की बॉडी बनाने का कारखाना था. वे छः फीट लंबे और कद्दावर इंसान थे. उनकी आवाज़ भरी और आँखें गहरी थी. वे बोलने में मितव्ययी थे. शब्दों के प्रति उनका ये किफायती रुख और चेहरे के हाव भाव हमको डरा देते थे. लेकिन अमित अक्सर टिफिन लेकर वर्कशॉप तक जाता था. इसके बदले उसे कुछ रुपये मिला करते थे. लेकिन अक्सर सिर्फ ये होता कि अमित के पापा खुशालाराम जी उसे मोहन जी के सिनेमा में एंटर करवा देते थे. वे अमित से खूब प्यार करते थे. अमित का दावा था कि पिताजी और सिनेमा वाले मोहन जी गहरे दोस्त थे. मेरे लिए ये पहचान फिर कोई खुशी लेकर नहीं आई.

अम्बर टाकीज में कुछ एक फ़िल्में ऐसी लगती थी, जिनका कोई सींग पूँछ नहीं होता था. उन फिल्मों के बीच में कोई खास रील जोड़ी जाती थी. टिकट खिड़की पर लड़के सर छुपाये हुए टिकट लेते और पास की दुकानों में छुप जाते. इस कार्य के लिए दोस्तों में बारी बंधी हुई होती थी. असल खतरा था टिकट लेते हुए देख लिया जाना. एक बड़ा कुख्यात किस्सा सबको डराता था. इन दिनों बिदेस बसे हुए एक एयरवेज के कमर्शियल पायलट के छोटे भाई ने कुछ दोस्तों की उनके घर पर शिकायत कर दी. दोस्तों ने योजना बना कर उसे कहा कि मोहन जी के सिनेमा में धांसू फिल्म लगी है. सेंग उतारी नोखा जेवी. उनसे कहा टिकट कौन कराएगा. उन दिनों खेल देखने में सबसे महत्वपूर्ण कारक था, टिकट करवाया जाना. उसका टिकट हो गया. अम्बर टाकीज से चलती फिल्म में बाहर जाने की छूट थी. कुछ अनुभवी लोग तो टिकट खिड़की पर पूछ भी लेते वो रील कब लगेगी? और वे ठीक उसी समय आते थे. 

वह दोस्तों के जाल में फंस गया था. जिस लड़के ने टिकट कराई वही उसके पापा के पास गया और बोला. आपका बेटा अम्बर टाकीज में भूंडी फिल्म देख रहा है. रेलवे में गार्ड बाबूजी को खूब गुस्सा आया और वे बोले कहाँ मिलेगा. तो उसने आधी टिकट दी और ये भी बताया कि वह किस सीट पर बैठा है. जैसे ही बाबूजी अंदर पहुंचे तभी दुर्भाग्य से वही रील शुरू हुई. उन्होंने हाथ में लिए हुए डंडे से अमके को वहीँ हाल में ही मारना शुरू किया. उसके सर के बाल पकडे हुए पीटते पीटते जुलूस निकाल कर अम्बर टाकीज से रेलवे कॉलोनी तक ले गए. ये सख्त बापों का ज़माना था. सारे बाप इस होड़ में थे कि वे सख्ती में एक दूसरे से आगे निकल सकें. सारी औलादें इस धरती पर उपलब्ध अतुलनीय ज्ञान से जानबूझकर वंचित रखी जा रही थी. जो बाप पीटते नहीं थे वे इस तरह देखते थे जैसे पीट रहे हों. मुझे पापा ने एक थप्पड़ भी न मारा मगर ऐसे किस्से सुनकर मुझे ख़याल आता कि मैं अमके की तरह सीन देखता हुआ पकड़ा गया हूँ और पापा मुझे रेलवे कॉलोनी से भी आगे नेहरू नगर तक ले जा रहे हैं. इससे डरकर मैं तुरंत तय करता कि मोहन का सिनेमा नरक का प्रवेश द्वार है.

अमित लगातार फ़िल्में देखता था. उसके पास अम्बर टाकीज की ऊँची दीवारों में बने पतली लोहे की चद्दर वाले एक्जिट से सुनाई देती हर तक पहुँचने का लाइसेंस था.

मैं आपको राय कॉलोनी की बात कहना चाहता था मगर मेरे बचपन के कस्बे की लाजवाब चीज़ों ने मुझे रोक लिया. कुछ लोग सत्तर के दशक को याद करके रुमान से भर जाते हैं. मुझे अस्सी का दशक खूब प्रिय है. वो अस्सी का दशक जिसमें अमित मिला.
* * *
आगे की बात अगली कड़ी में

March 18, 2014

ट्यूशन की नदी के इस और उस पार

बाड़मेर रेलवे स्टेशन से बाहर निकले ही गाँधी जी स्टेशन रोड की ओर जाते हुए दीखते हैं. लेकिन वे कहीं नहीं जाते चुप खड़े रहते हैं. उनके चरणों के आस पास बने हुए सर्कल में धरनार्थी बैठे रहते हैं. बाईं तरफ की सड़क चौहटन की ओर जाती है लेकिन दायीं तरफ जाने वाली सड़क पर रेलवे की ज़मीन पर नेहरू युवा केंद्र खड़ा रहता और उसके ठीक पास एक सराय. यहीं भेलीराम की चाय की थड़ी. आगे गली में मुड़ जाओ तो हाई स्कूल.

उन दिनों स्कूल के अध्यापकों को भी भेलीराम की चाय खूब प्रिय थी. जब कभी स्कूल के टी क्लब में चाय बनाने वाला अनुपस्थित होता या फिर शिक्षकों को कुछ ऐसी बातें करनी होती, जो विद्यालय प्रबंधन से किसी तरह जुड़ी हुई हों तब अध्यापक चाय पीने भेलीराम के यहाँ पहुँच जाते थे. ये बहुत ख़तरे की बात थी. मैं वहाँ ढाबे पर रोज़ हो नहीं सकता था. वहां पर दो रास्ते थे. एक स्कूल की तरफ से दूजा रेलवे स्टेशन की ओर से. दो रास्ते होने से दुश्मनों को जान बख्शने का अवसर मिलता था. मास्टर लोग जिस तरफ से आते लडके दूजी तरफ से निकल जाते. स्कूल में मास्टरों का जितना दबदबा था स्कूल के बाहर उनको इतनी ही आशंकाएं भी रहती थी. इसलिए दोनों पक्ष एक दूजे की इज़्ज़त रखते थे. दो रास्ते होने के बावजूद मैंने अमित से कह दिया था कि कभी अचानक से पा आये तो भेलीराम की थड़ी संकट का कारण बन जाएगी. इसलिए जब भी वक्त मिलता मैं और अमित अपनी सायकिल लिए हुए नये ठिकानों की तलाश में घूम फिर कर घर लौट आते.

हर माँ बाप जिस ख़तरे से सदियों से डरते आए हैं, मैं उस ख़तरे की ज़द में था. ये ख़तरा था रुलियार फिरने का यानी आवारगी का. सायकिल पर पैडल मारते हुए किसी दोस्त के घर तक जाना और वहाँ से शहर की सड़क पर फेरा देना. ये उस ज़माने का सबसे बड़ा एब था. इससे भी बड़ा एब था गलियों के चक्कर काटना. हर माँ-बाप अपने ही नहीं दूसरे परिचितों के बच्चों पर कड़ी नज़र रखते थे. उनका सूचना तंत्र इतना मजबूत था कि शाम को घर आते ही हर बच्चे से उसके पापा पूछ रहे होते कि आज फलां गली में किस लड़के के साथ घूम रहे थे. क्या वहाँ अपने बाप का नाम रोशन कर रहे थे? इस लताड़ के बाद उस पर नमक और मिर्च भी छिड़कते कि वो लड़का कितना अच्छा पढता है. मालूम है उसके टेस्ट में कितने नंबर आते हैं. इस तरह अपमान का घूँट पीते हुए कस्बे के सारे निम्न और मध्यम दर्ज़े के नौसिखिए, आवारा होने को आतुर लड़के सर झुकाए रहते. वे अपने पिताजी की घुड़की सुनते जाते. इस दौरान वे उन कमीने जासूसों के बारे में भी कयास लगाते कि किसने ये बात पापा को बताई होगी.

अमित से दोस्ती पक्की होने के पहले चरण में हम दोनों ने अलग अलग गलियों के सात चक्कर सायकिल पर लगा लिए थे. दूजे चरण में अमित को मैंने कहा घर आना. वह एक सुबह सायकिल लेकर घर चला आया. अमित ने घर आते ही दीवार में लम्बे आलों की शक्ल में बनी अलमारी को देखना शुरू किया. वहां सौ एक किताबें रखीं थी. अमित उन किताबों को किसी पेंटिंग को देखने की तरह देखता रहा. उसने मुझे पूछा "तुमने इनमें से कौनसी किताब पढ़ी है?" मैंने एक छोटी सी किताब की ओर इशारा किया. वह राहुल सांस्कृत्यायन की किताब थी." उसने मुझे कहा- "इतिहास की इतनी सारी किताबें हैं, इनको क्यों नहीं पढ़ते?" उन बरसों में माएं बाबू देवकीनंदन खत्री के ऐयारों की तरह घर में आये दोस्तों के आस पास गुप्त रूप से बनी रहती थी. वे मालूम करना चाहती थी कि लड़का कैसा है? लेकिन मेरी माँ को इससे कोई वास्ता न था. मेरी माँ आई और हमको पूछा- "छोरों चा पी हो?"
भेली राम की थड़ी पर पी गयी चाय मुझे किसी अहसान जैसी लगती थी. मुझे लगता था कि मैंने अमित के पैसे खर्च करवा दिए हैं. इसलिए माँ के हाथ की बनी चाय अमित को पिलाकर मुझे बहुत बहुत अच्छा लगा. अमित जब जाने लगा तो पक्की दोस्ती का प्रदर्शन करने के लिए मैं उसे कुछ दूर तक विदा करने के लिए गया. बाड़मेर रेलवे स्टेशन से जोधपुर की ओर जाने वाले मार्ग पर दो रेलवे फाटक हैं. पहला फाटक उदास खड़ा रहता है जबकि दूजे फाटक से आवागमन होता रहता है. दूजा फाटक खड़ी चढ़ाई वाला था. उस फाटक के पास आते ही अमित सायकिल से उतर गया. पैदल चलकर सायकिल खींचता हुआ फाटक की चढाई चढ़ने लगा. मुझे लगा कि वह बहुत आलसी किस्म का है हालाँकि फाटक की चढाई खूब खड़ी चढाई थी.

शहर के बीच की बापू कॉलोनी के नौजवान अपनी सायकिल लेकर नेहरू नगर आया करते थे. फाटक से उतरना शुरू होते ही अच्छी सायकिलें एफसीआई तक बिना पैडल मारे चलती जाती थी. लेकिन बापू कॉलोनी के बाशिंदों की सायकिलें स्टेडियम रोड आते ही अपने आप रुक जाती थीं. करणजी की कोने वाली दूकान से आगे पांचवीं दुकान सायकिल की दूकान थी. दुकान के आगे बबूल के नीचे एक घड़ा मिट्टी में दबा रहता था. ये लोकल फ्रीज़ का काम करता था. गाँधी जी जिस पेय से घृणा करते थे, वही आसव इस फ्रीज़ में ठंडा हो रहा होता. जो भी आता दो रुपये देकर एक लोटा कच्ची शराब पी सकता था. बच्चन की मधुशाला जो भेद मिटाती, वही पावन कार्य उगमजी के यहाँ हुआ करता था. बापू कॉलोनी के बाशिंदे लोटा पीकर वापस लौटते तो उनका पॉवर फाटक की चढाई खत्म होने से पहले हर हाल में टूट जाता और उनकी सायकिल लुढकती हुई फिर उसी दुकान तक आ जाती. शाम को दो चार लोग सफाई का कचरा ढोने वाला हाथ ठेला लेकर आते और कुछ ज़िंदा ख़ूबसूरत लोगों को बेरहमी से उसमें पटक कर बापू कॉलोनी तक ले जाते. अमित के इस तरह सायकिल से उतरने ने मुझे उसके शराबी हो जाने की आशंका से भर दिया.

हमारे जीवन की सीमा रेखा में हर वक्त कोई न कोई नई चीज़ संक्रमण कर रही होती है. इस क्रिया के अनेक लक्षण प्रत्यक्ष होते हैं. हम समझ रहे होते हैं किन्तु हमारा मन एक स्वीकृति के साथ उनको प्रवेश करने देता है. मैं अमित को अपनी दुनिया में आने दे रहा था. उसकी उपस्थिति से एक खास किस्म का सौहार्द्र अनुभूत होता था. इसलिए उसके होने से ख़ुशी होती थी. लेकिन उसका होना, होने की कामना का अल्पांश भर हो सकता था. मैं सुबह स्कूल जाता और लौट कर घर पर ही रहता. घर मुझे खूब अच्छा लगता था क्योंकि वह अक्सर खाली होता. पापा स्कूल होते और माँ अपना काम करके पड़ोसी औरतों के साथ गली में किसी घर के बाहर बैठ कर दोपहर को जी रही होती.

दोपहर बाद मैं नानक दास धारीवाल सर के पास ट्यूशन पढ़ने जाया करता था. उनको सब नानग जी माड़सा कहते थे. वे मेरे पापा के परम मित्र थे. उन दो दोस्तों के पास एक दजे के अनगिनत क़िस्से भी थे. मुझे नेहरू नगर से प्रताप जी प्रोल तक रोज़ जाना होता. वहाँ बटर पेपर जैसे पन्नों के बीच पांच-सात कार्बन डाल कर सर गणित पढ़ाते थे. वे जो लिखते उनकी एक एक कॉपी सब बच्चों को मिल जाती. मुझे वहाँ पढ़ी गयी भौतिक, गणित और अंग्रेजी की कोई याद नहीं. मुझे याद है कि लोक कथाओं में नानग जी धारीवाल सर दो सिगरेटों को नीम के एक बारीक तिनके से जोड़ कर सिगरेट पिया करते थे. इस कथा में कुछ लड़के खूब अचरज से दावा करते थे कि धारीवाल सर के लिए दो सिगरेट से दो कश ही हो पाते हैं.

वे एक सन्यासी किस्म के आदमी लगते थे. सुबह स्कूल, दोपहर घर में पपलू और शाम को ट्यूशन पढाया करते. वो हमारे समय के अनूठे क्रांतिकारी इंसान थे. उन्होंने वणिकपुत्र माने जैनी होते हुए भी बॉर्डर के मुस्लिम बहुल इलाके के राजनेता अब्दुल हादी साहब के बेटे गफ़ूर को अपने घर में रखा था. हादी साहब चाहते थे कि किसी तरह उनके साहबजादे दसवीं पास कर सकें. गफ़ूर एक निहायत शरीफ और सीधा-सादा लड़का हुआ करता था. वह मुझे तहमद पहने ट्यूशन में बैठा पढता हुआ या पानी का लोटा लता ले जाता दिख जाता था. उसका खाना पीना रहना सब एक जैनी के यहाँ होता था. जबकि तीस साल बाद आज भी रुढियों और बेड़ियों में जकड़े हुए समाज में, ये किसी जैनी के बस की बात न होगी कि वह किसी मुस्लिम को अपने घर में बच्चे की तरह रख सके. धारीवाल सर हमारे लिए ज़िंदा भगत सिंह थे.

मैं धारीवाल सर के यहाँ से ट्यूशन पढकर जेठू सिंह माड़सा के घर चला जाया करता. वहाँ भरत और अशोक के पास खूब सारे खरगोश थे. उन खरगोशों से जी भरकर खेलता. उनकी लाल आँखों से आँखें मिलाता. उनको जी भरकर प्यार करता. इसके बाद मैं और भरत घर से बाहर निकलते.  नरगासर के देवीय कृपा वाले पानी में पड़ी हुई भैंसे, किनारे पर चद्दरें धोते खत्री और पास ही अमर बकरों की अद्वितीय गंध बसी रहती. इलोजी और सब्जी मंडी के आस पास की गलियों में शाम डूब जाती थी.

मैं नेहरू नगर से ट्यूशन पढ़ने अपने दोस्तों के पास आता था और सब्जीमंडी से लेकर प्रताप जी की प्रोल तक की सब जगहें मेरी प्रिय जगहें थीं. जबकि अमित राय कॉलोनी के आगे सूजेश्वर जाने वाली सड़क के मार्ग पर ही अपने दोस्तों के साथ घूमता रहता था. इसलिए हमारे मिलन के बारे में शीन काफ निज़ाम साहब के शेर की ये टूटी फूटी पंक्तियाँ माकूल हैं. "मैं बहता हुआ दरिया तूँ वादी का सीना, जाने कैसे मिलन होगा हमारा तुम्हारा”
हम नहीं मिलते थे. नहीं मिल पाते थे. या ये कुछ ऐसा था कि अमित ने मेरे भीतर थोड़ा सा इन्वेस्ट कर दिया था और उसे रिजल्ट का इंतज़ार था.

और रिजल्ट खूब उदास करने वाला आया.

अमित को फ़िल्में देखने का ख़ूब शौक था और मेरे लिए सिनेमा हाल के आस-पास देखा जाना असमय मृत्यु का कारक हो सकता था. मेरे ताउजी पुलिस में थानेदार साहब थे और वे अच्छे पिता की तरह एक कांस्टेबल को फिल्म देखने भेजते. वह आठवीं पास कांस्टेबल फिल्म समीक्षक बन कर लौटता और पूरी फिल्म की कहानी बताता. सम्भव है कि वे इस बारे मेंक ह्र्चा करते होंगे कि फ़िल्म में हिरोइन और हीरो के बीच के दृश्यों पर सेंसर बोर्ड ने कहीं लचीला रुख तो नहीं अपनाया है? या बच्चे इस फिल्म से क्या सीख लेंगे? शायद इसी तरह की बैटन पर विचार विमर्श होता होगा. आखिर सब फ़िल्में ख़ारिज होती जाती. एक फिल्म एप्रूव हुई थी “बिन माँ के बच्चे”. पुलिस की जीप में बैठकर हम मोहन जी के सिनेमा पहुंचे. वहाँ खूब मान सम्मान से हमें अंदर बिठाया गया. उस फिल्म में एक पिता अरसे बाद घर लौट कर दरवाज़े पर लगी ऊपर वाली कुण्डी को हथोड़े से तोड़ता है. वह जब अंदर देखता है तो सूना घर. बच्चे नहीं है. सिर्फ खालीपन. मैं उसे देखते हुए मन ही मन रोने लगा. मैंने चाहा कि बाहर भाग जाऊं. मैंने सोचा कि मेरे भाई बहनों ने मुझे इस तरह रोते हुए देखा तो मेरी खूब बे इज्ज़ती हो जायेगी. मैं सिनेमा का भगोड़ा था.

इस तरह सेंसर पर सेंसर होकर देखी जाने वाली फ़िल्मों से ये सबक आया कि कभी सिनेमा हाल के पास देख लिए गए. किसी ने पापा को बता दिया तो तय था कि मेरे जीवन का हाल परमारों की शापित राजधानी किराडू जैसा होता. मैं अपने आप को किराडू के भग्नावेशों की तरह देखने लगता. कोई आक्रांता मुझे रोंदता हुआ गुज़र रहा है. मेरे सौंदर्य के हर एक अक्स को तोडा जा रहा है. मैं टूटी हुए टांगें लिए बिस्तर पर पड़ा हूँ या फिर अपने छोटे भाइयों की नज़रों के सामने घर के ही आँगन में मुर्गा बना हुआ हूँ. इसलिए मैंने अमित से साफ़ कहा कि मैं फिल्में नहीं देखता हूँ. अमित के लिए फ़िल्में न देखने वाला इंसान दुनिया का दोयम दर्ज़े का अधूरा इंसान होता था.

हमारे एक साथ होने की एक वजह इस तरह कट गयी जैसे गाँधी खानदान के एक पुराने युवराज ने आपातकाल में देश की आबादी पर अंकुश पाया था.
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March 17, 2014

पहली मुलाकात का यादगार स्थल

कक्षा नौवीं जी कई बार केमस्ट्री लैब के पास वाले कमरे में लगती थी. कई बार उस कमरे की ठीक विपरीत दिशा में बने हुए थियेटर जैसे बड़े कमरे में लगती थी. लैब के पास वाला कमरा रेल के डिब्बे जैसा था. जिसमें पीछे वाली बेंच पर बैठने वाले बच्चे बिना टिकट यात्रियों की तरह छुप जाते थे. अक्सर विज्ञान पढाने वाले मास्टर पहले दो महीनों में अपने ट्यूशन के लिए छात्र छात्राओं का शिकार कर चुकने के बाद इस बात से उदासीन हो जाते थे कि पीछे की बेंच पर कौन बच्चे हैं और वे क्या गुल खिलाते हैं.

मैं पीछे की बेंच पर होता और वहाँ से हर रोज़ मुझे बरामद कर लिया जाता. जो भी माड़साब, जिनका पीरियड होता वह याद से पूछते- "अरे शेरजी वाला किशोर कहाँ गया." पिताजी उसी स्कूल के इतिहास में अध्यापक थे और उनसे प्रेम के कारण उनके सहकर्मी मेरे भविष्य को लेकर चिंतित रहते थे. मैं इस प्रेम के कारण अँधेरे से रौशनी में आ जाता और भारत की इस जेल शिक्षा को मन ही मन खूब गालियाँ देता था. मेरी लास्ट वाली बेंच का छिन जाना कुछ ऐसा होता जैसे कि अभी स्वर्ग के द्वार पर थे और यमदूतों ने हांक कर नरक में ला पटका हो.

आगे वाली बेंच पर आने के बाद मन बाहर की ओर भागने लगता.

बाहर रेत ही रेत थी. हाई स्कूल के लंबे चौड़े मैदान में बतूलिये उठते रहते थे. बाल मंदिर स्कूल की तरफ एक बड़े भूभाग की ओर नज़र डालो तो इकलौता मूत्रालय नज़र आता था. रोमन सभ्यता से अलग दस वर्गफीट से ज्यादा बड़े भाग में बने इस मूत्रालय के एक तरफ के दो दरवाज़ों पर हमेशा ताले लगे रहते थे. ये छात्राओं की सुविधा वाला हिस्सा था. लेकिन लड़कियों के लिए इस तरह खुले मैदान की ओर जाना ठीक न था इसलिए उनके लिए कहीं गुप्त जगह पर कोई व्यवस्था थी. लड़के गर्ल्स रूम में जा नहीं सकते थे और मैं पापा के कारण ये सोच भी नहीं सकता था. उनके डर के आगे इस दुनिया की सब चीज़ें स्वतः मेरे लिए वर्जित थीं.

बालमंदिर की दिशा में बने हुए उस भव्य मूत्रालय के पास अनगिनत किस्से थे. उनमें से एक कुछ अधिक ख्यात था. वह एक लोककथा या किंवदंती जैसा था. उस समय के एचएमवी कम्पनी के गायक और विद्यालय के लैब सहायक का किसी बदमाश छात्र ने उसी मूत्रालय की छत पर चढ़कर स्टिंग ऑपरेशन कर लिया था. उसका दावा एक दवा की तरह था. केमस्ट्री लैब में सहपाठी छात्राओं के साथ कथित रूप से छेड़खानी करने वाले लैब सहायक इस दुनिया की वंशवृद्धि में योगदान देने में असमर्थ थे. इस ख़बर की पुष्टि हर छात्र करता था. जैसे उसने ख़ुद अपनी आँखों से देखा हो. छात्रहित में इस अमूल्य योगदान देने वाले महान छात्र का नाम एक रहस्य था. जिसे मैंने अपने जीवन में कभी नहीं जाना. मेरे लिए इस तरह की बात करना निषेध था. ना मालूम किस जगह से पापा आ जाये और वे मेरे मुख से उच्चरित ऐसा कोई वाक्य सुन लें.

मैं समंदर का ज्ञान लेने के लिए पिंजरे में बंद करके छोड़ा हुआ कोई दरियाई घोड़े का बच्चा था जिसे कोई शार्क निगल न जाये, जिसे कोई अपवित्र समुद्री आत्मा छू न ले.

उस मूत्रालय के पास मुझे अमित मिला. खाकी पेंट और सफ़ेद कमीज पहने हुए. उसकी गणवेश में एक खास किस्म की निडरता थी. उसने अपने कमीज की बाहें मोड़ रखी थी. जैसे हाई स्कूल के सामने वाली गली के मोड़ वाली कोने की जूस की दुकान के अंदर राजेश खन्ना फ़िल्मी पोस्टर में दीखते थे. उस दुकान से जूस पीने जितने पैसे हमारे पास कभी नहीं हुए मगर वह दुकान एक खास आकर्षण का केंद्र थी. उसी दुकान पर एक गाना बजता था जिसे बेशर्म लोग रुक कर सुनते थे और इज्ज़तदार लोग सुन लिए जाने का भाव मन में भरते हुए बिना आवाज़ वाली आह भरकर आगे बढ़ जाते थे. गीत था आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी में आए... तो बात बन जाये. बात बन जाये का असल भाव हर कोई यही समझता था कि इस अवसर के आने पर बाप बन जाने की पूरी संभावना है. मेरे सहपाठी इस अवसर के लिए इस कदर बेचैन थे कि बाप बन जाने जैसी जिम्मेदारी उठाने के दावे किया करते थे. इस तरह के दावे करने वाले सहपाठी मेरे लिए बड़े खतरे थे. उनके साथ रहना विषैले जीव पालने जैसा काम था. अस्पृश्य अभिलाषाओं से भरे हुए वे लड़के मुझे कभी भी पापा से पिटवा सकते थे इसलिए मैं किसी अच्छे लड़के की तलाश में था.

मूत्रालय से निवृति के बाद अमित की नज़र बाल मंदिर स्कूल की तरफ थी. मैंने कहा- तुम कवितायेँ लिखते हो?

अमित की आँखों में ज़बरदस्त चमक आई. उससे शायद पहली बार स्कूल के किसी लड़के ने इस हुनर के बारे में पूछा था. उसने कहा तुम शेरजी के लड़के हो न. मैंने कहा हाँ. उसने कहा जल्दी भागो. हम दोनों वहां से भागकर भेलीराम की होटल कहलाने वाली चाय की थड़ी पर आ गए. उसने मेरे सामने शेक्सपीयर और कीट्स होने के, रामधारी सिंह दिनकर, बच्चन और दुष्यंत के होने से भी बड़े होने जैसे भावों का प्रदर्शन किया. उसने अपनी जेब से तीन कवितायेँ निकाली और चाय का ऑर्डर दिया. मैंने कहा मेरे पास पैसे नहीं है. मैं डर गया कि बिना पैसे चाय पीने के बाद चायवाला जाने क्या सलूक करेगा. उसने कहा कि तुम डरो नहीं. मेरे पास पैसे हैं.

उस मीटिंग में मुझे मालूम हुआ कि वह खूब पैसे वाला लड़का है. इसलिए कि उसने चाय की थड़ी पर दो बार चाय का ऑर्डर किया. ये कार्य मेरे लिए दुनिया का एक असम्भव कार्य था. उसने अपनी तीन कवितायेँ सुनाने के बाद मेरी पहली ही कविता को आधे रास्ते ही रोक दिया. उसका व्यव्हार ऐसा था जैसे कोई नामसझ कविता की तलवार से खुद को ही घायल किये जा रहा हो. उसने अपना मुंह बिचकाया और कहा- "अच्छी है मगर अभी और कोशिश करनी चाहिए." ये मेरी कविता का घोर अपमान था. मैं उन सब लोगों को निर्दयी मानता आया हूँ जिन्होंने भी किसी कवि कवयित्री को सुन कर कहा कि प्रयास अच्छा है. इस वाक्य में मुझे अहंकार की बू आती थी, अब भी आती है.

बारह बजकर बीस मिनट होते ही अमित के पैर बेकाबू होने लगे. वह बम विस्फोट के डर से भाग रहे किसी आदमी की तरह स्कूल की ओर गायब हो हो गया.

कई मुलाक़ातों के बाद मुझे मालूम हुआ कि मूत्रालय के पार दिखने वाली बालमंदिर स्कूल की ओर से एक ठंडी हवा का झोंका आता था. स्कूल से निकलकर वह झोंका अग्रवालों की गली के किसी घर में गुम हो जाता था. उसकी पहली तीन कविताओं में से तीन कवितायेँ उसी झोंके के नाम थी. मेरा कवि होना ख़ारिज कर दिया गया था बावजूद इसके साल उन्नीस सौ पचासी की उस सुबह ने एक ऐसे दोस्त से मिलवाया जो बरसों बरस धूप की तपिश और बादलों की ठंडी छाँव की तरह मेरे मन के सूखे रेगिस्तान में बना बना रहा.

वो मूत्रालय हमारे प्रथम मिलन का स्थल है. रबातक शिलालेख पर अंकित जानकारी जिस तरह कुषाणों की पहचान में भ्रम पैदा करती है उसके विपरीत हमारे पहले मिलन की अधिक गहरी पहचान स्थापित करने वाला न लिखा गया शिलालेख, हाई स्कूल का ऐतिहासिक मूत्रालय था. 
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आगे की बात अगली कड़ी में

March 16, 2014

जो अपने आप से रूठा रहे

समय की गति सापेक्ष है. हम अगर आकाशगंगा में एक निश्चित गति से कर सकें घूर्णन तो हमारी उम्र हज़ारों साल हो सकती है. ऐसा करने के बाद लौट कर आयें और न पहचान सकें किसी एक अपने की आँखें तो ये बचाई हुई उम्र किस काम की? हम अगर इसी पल स्वेच्छा से मर जाएँ और हज़ारों बरसों तक कोई हमें कोसता रहे तो ये चुवान किस काम का? तो क्या हम न अपने लिए जीयें और न अपने लिए मरे?

अमित सुनो. आज से बारह साल पहले तुम कैसी कहानियां लिखते थे. ये तस्वीर एक ऐसी निशानी है जिसमें तुम्हारे हाथ से लिखा हुआ दुनिया का एक सबसे प्रिय संबोधन है. मेरी बेटी अपनी नर्सरी की किताब लिए हुए बैठी है. तुमने ही कहा था कि ये कहानी जहाँ छपेगी उसके साथ मुझे मानू की तस्वीर चाहिए. तुम्हारा प्रेम जो बेलिबास था उसे सब पागलपन समझते थे. मैं जितना जनता हूँ तुम्हे वह सब लिखने से एक किताब बन जायेगी. मैं इन दिनों दफ्तर के काम में व्यस्त हूँ फिर चुनाव है और उसके बाद वक्त होगा एक उपन्यास का. लेकिन फिर भी मैं ज़रूर लिखूंगा हमारे बचपन और अधेड़ होने की ओर बढते दिनों को.

मैंने चाहा कि तुम्हारी आवाज़ इंटरनेट पर तब तक बची रहे जब तक मैं हूँ मुफ्त का ब्लोगर है और मुफ्त का वर्ल्ड वाइड वेब है. बावजूद इसके कि दुनिया में कुछ भी स्थायी नहीं है.

जो ऊग्या सो आथमें, फूल्या सो कुम्हलाय
जो चिणिया सो ढही पड़े जो आया सो जाय.

जो उदित होता है वह अस्त हो जाता है, जो खिलता है वह कुम्हला जाता है, जो चिना जाता है वह ढह जाता है और जो आता है उसे जाना पड़ता है.

अमित तुम्हारी कहानी माँ. इसे मैंने साल दो हज़ार दो में रिकार्ड किया था.

 

March 15, 2014

जहाँ हम कभी पहुँच न सके



















अमित मैं रो नहीं रहा. इसलिए कि ये दिन तुमने ही चुना था. मैं हूँ बाड़मेर के हाई स्कूल से लेकर मुम्बई विश्व विद्यालय के हिंदी विभाग तक, मैं हूँ रेगिस्तान की आवारा पगडंडियों पर, तुम और रहते तो मैं मिलवाता तुमको उन लोगों से जो मेरे लिखे के प्यार में पड़ गए. इस वक्त सिर्फ तुम्हारी कवितायेँ उनमें से सिर्फ आठ मिनट यहाँ... कुछ दोस्तों को रुलाने के लिए.

March 9, 2014

घोड़े की आँखों में आंसू

रिचर्ड वाग्मेज का एक उपन्यास है इन्डियन होर्स. एक शराबी के पुनर्वास केंद्र के होस्टल में बीते बचपन की सरल दिखने वाली जटिल स्मृतियों के पहरे में आगे बढ़ता हुआ. लगभग मृत्यु से जीवन की तलाश की ओर बढ़ता हुआ कथानक. ऐसे ही नो मेंस लेंड में एक घोड़ा. जो घोड़ा महाद्वीपों के पार चला आया था. बेच दिए जाने के बाद एक युद्ध का हिस्सा बनाता है और आख़िरकार सूंघता है अपनी ज़मीन को. मिशेल मोर्पुर्गो के नोवेल वार होर्स का घोड़ा. आह ! कितना कठिन है ये जीवन. हज़ार त्रासदियों से भरा हुआ. हज़ार लोगिंग्नेस से गुज़रता हुआ. ऐसे ही जाने क्यों एलेक्स एडम्स एक इस तरह की फंतासी बुनते हैं जिसमें मनुष्य, मनुष्य से अलग किसी जीव या वस्तु के कायांतरण की ओर बढ़ता जाता है. यह नोवेल एक समानांतर डर बुनता है. तीस साल की नायिका इसी भय से गुज़रती है. इस उपन्यास का शीर्षक है, व्हाईट होर्स. ये बिम्ब इसलिए कि सफ़ेद घोड़े हमारी जीवन इच्छा के प्रतीक हैं और जंगली घोड़े हमारी सहवास कामना के. और घोड़े पालने वाले किसी काऊ बॉय की सबसे सुन्दर कहानी हम पढते हैं कोर्मेक मैककार्थी के आल प्रेटी होर्सेस में. घोड़े हमारे आदिम सपनों के वाहक हैं. हम खुद घोड़े हैं. हमारी शक्ति का पैमाना अश्व शक्ति है. हमारी दौलत जंगलीपन को पालतू बनाने के सामर्थ्य की गणना है. मेरी प्रिय किताबों की सूची में निकोलस इवांस की होर्स विस्परर हमेशा रहेगी. ये एक कौमार्य से भरा प्रेम है. इसलिए कि लेखक की पहली ही किताब है और क्या किताब है. ऐसे कि जैसे किसी ने अजाने ही जी लिया हो ज़िंदगी को उसकी तमाम खूबसूरती के साथ.

मैं पिछले कई दिनों से एक किताब को टुकड़ों में पढ़ पाया हूँ. ये पढ़ना कुछ ऐसा है जैसे कि हम जीना मुल्तवी करें और फिर से उसे जीने लगें. मैं अपने वुजूद की लड़ाई के लिए गिने चुने विषय रखता हूँ. जैसे कि मैं प्रेम नहीं करता हूँ इसलिए मेरी कोई लड़ाई प्रेम के लिए नहीं है. मैं सामंत नहीं होना चाहता हूँ इसलिए मेरी लड़ाई किसी प्रकार की शक्तियों के लिए भी नहीं है. मैंने इस दुनिया में अपने आपको एक मुसाफिर की तरह समझा है और इसी अक्लमंदी की वहज से मैं कुछ भी स्थायी बनाये जाने के लिए संघर्षरत नहीं होना चाहता हूँ.

मैं किताब की कविताओं में एम आई रोड से आती किसी टूटन की आवाज़ को सहेजता हूँ अपनी स्मृति की बुगची में, इसी सहेज को पढते हुए पाता हूँ कि हाँ दुनिया में कितना कुछ दरकता टूटता जाता है हर क्षण. मुझे नहीं मालूम कि सन्यस्त होना किसे कहते हैं मगर कवितायेँ मुझे याद दिलाती हैं कि कुदरत के किसी हिस्से का कुदरत के साथ निरपेक्ष जीवन जीना. कुदरत के सब सजीव और निर्जीव तत्वों को उनके पूरे विस्तार और अस्तित्व के साथ बिना छेड़ के रख देना ही सन्यस्त होना है. सन्यस्त होना इस तरह भी है कि कविता कहती है- हम किसी मुहावरे की तरह लौटते हैं घर. दरअसल खुद को मुहावरे की तरह देखना उस बात की ओर इशारा है कि ज़िन्दगी किस उलटी उड़ान और उसकी लौट का नाम है. छीज के विपरीत की वह आशा जो जानती है कि ज़िन्दगी गुज़र रही है मगर फिर भी है. अजंता देव की कवितायेँ कहती हैं कि परलोक में हमारी प्रतीक्षा में होने चाहिए बहुत से मित्र और परिजन कि विगत चालीस सालों में बिछड गए हैं, बेहिसाब. इसे कविता में कहा जाता है ऐसे ही परलोक में महफ़िल. 

उन दिनों मेरी उम्र पच्चीस साल थी. उन दिनों अजंता देव की कविताओं की उम्र नामालूम थी. उनको कहीं सुनते हुए लगता था कि कोई बात है जो सुनी जाये दोबारा. उन दिनों किसी कविता को दोबारा सुनने का विचार एक खास आशा से भर देता था. मैं अजंता जी से इस बार पुस्तक मेले में क्षण भर को मिला. मैंने उनको पाया वैसा ही जैसा वे रेगिस्तान के उस कस्बे में कभी दिखीं थी, जहाँ मैं रहता हूँ. उसी कस्बे में बनी कुछ सरकारी दो मंजिला मकानों की छत पर एक यायावर कवि के सानिध्य में उनका रचनाकर्म सबसे सघन और दुरूह समय को रेखांकित करता होगा. ये मेरा एक अनुमान भर है. इसलिए कि घोड़े और उनके आंसू तब तक अनचीन्हे हैं जब तक की उनको जी न लिया जाये. ये वे दो लोग ही समझ सकते हैं. चेखव की तरह मुझे समझ नहीं है मगर मैं ये जानता हूँ कि समर्पण ही सबसे बड़ा साहस है. इसे कायरता समझने वालों के लिए कविता की पैदाईश नहीं हुई है.

घोड़े की आँखों में आंसू कविता संग्रह में एक कविता है बहुत दूर बाड़मेर. कवयित्री ने दुनिया के अनेक रास्तों पर चलते हुए भी बचाकर रखी बाड़मेर की याद. इस कविता में रेगिस्तान कंकालों के पार गुज़रता है सन्यस्त विद्वान की तरह. रेत का आदमी धोरों की उपत्यकाओं में चलता है, वैतरणी पार उतरता हुआ सा. जैसा मैं अक्सर कहता हूँ कि ज़िंदगी तुम्हारा खूब शुक्रिया इस रेत के लिए इस रेत से प्रेम करने वालों के लिए. घोड़े जो अक्सर रेगिस्तान में रोते भी हैं तो कौन देख पाता है उनके आंसू. मैं दुनियाभर के घोड़ों की स्मृति से गुज़रता हूँ और पाता हूँ कि रेगिस्तान के घोड़े जो मालाणी के घोड़े कहे जाते हैं, अच्छे घुडसवारों को खूब पसंद हैं. जैसे हर किसी को पसंद होती है अच्छी ज़िन्दगी मगर हर कोई नहीं समझता अच्छी ज़िन्दगी के दुखों को.

March 8, 2014

कुछ सबक पड़ोसी से भी लेने चाहिए

इधर चुनाव की घोषणा हुई और असंख्य लोगों को अपने मंसूबे साकार होने का वक्त करीब आता हुआ दिखने लगा. मैंने अखबार में देखा कि हमारे यहाँ चुनाव कब होने को है? हम सब लोकतंत्र में खूब आस्था रखते हैं इसलिए बड़े सब्र के साथ अच्छी बुरी सरकारों को काम करने देते हैं. इसका सबसे बड़ा उदहारण ये है कि विगत पांच सालों में देश के सबसे बड़े कथित घोटाले उजागर होते गए और जनता चुप देखती रही. सबसे बड़ा विपक्षी दल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में पहली बार अपूर्व मौन साध कर प्रतीक्षारत बना रहा. सरकारें खुद के कर्मों से जनता का विश्वास खोती रहे तब भी विपक्ष से आशा की जाती है कि वह देश को गर्त में जाने से बचने के लिए जनता की आवाज़ बने. मगर कई बार टूट रहा छींका हमें भला लगता है और हम इस बात की परवाह नहीं करते कि कि छींके में रखा हुआ सामान भी टूट बिखर जायेगा. क्या हम उसी को चाटने के लिए बने हैं. हमारी मर्यादाएं इतनी भर है कि देखिये सत्ता का फिसला हुआ पहिया खुद हमारे पाले में चला आ रहा है. हम मौन को निराधार समझें तो ये हमारा बचपना होगा. ये वास्तव में मरणासन्न देह के करीब बैठे हुए कोवे की प्रतीक्षा है. जो चाहता है आँख के बुझ जाने से पहले आँख को निकाल खाने का इंतज़ार. इसके बाद सत्ता के दांतों से मरणासन्न धन का खूब दोहन किया जा सके. इसबार कई एक्जिट पोल की पोल सामने आ चुकी है. इस बार अधिनायकवाद का परचम पूँजी के बल से फहराया जाने को है. इस बार लोगों को उम्मीद है सब बेहतरीन हो जायेगा. लेकिन इस बार क्या हमने इतिहास की खिड़की में झाँका है. अधिनायकवाद और सेना जैसे शासन में लोकतंत्र और लोक का क्या हाल होगा.

मिस्र का राजनैतिक घटनाक्रम हमारे लिए एक ज़रुरी उदाहरण है. ये बहुत पुरानी बात नहीं है सन उन्नीस सौ बावन में फौजी विद्रोह ने राजशाही को खत्म किया था. अब्दुल गमाल नासिर के नेतृत्व में एक लोकतान्त्रिक देश कि स्थापना की गयी थी. उस दौर के अनेक राष्ट्रों ने इसे मान्यता प्रदान की. मिस्र में इस राजनितिक बदलाव का असर सबसे अधिक अमेरिका और पश्चिमी देशों पर हुआ. उनके हितों को सीधी चोट पहुंची. लेकिन ये सब अधिक न चल सका और गमाल के बाद उन्नीस सौ सत्तर में अनवर सादत के सत्ता संभालते ही अरब देशों के दरवाज़े पश्चिमी देशों के लिए खुल गए. यहीं से मध्यपूर्व पर अमिरिका के अधिकार का मार्ग खुला. उन्नीस सौ इक्कासी में सादात की हत्या के बाद होस्नी मुबारक ने मिस्र की सत्ता अपने हाथ में ली. इस तानाशाह के कारनामें से दुनिया वाकिफ रही है. उनके बारे में कुछ लिखना इस पन्ने को और लफ़्ज़ों को जाया करना होगा. लेकिन क्या हम इस बात से अनभिज्ञ हैं कि होस्नी मुबारक के पश्चिम के हतों के लिए देश को किस हाल में पहुँचाया था. साल दो हज़ार दस के आने से पहले ही संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस देश की दश को अत्यधिक दारुण बताया. यूएनओ का कहना था कि जो हाल इस देश के युवाओं का है वैसा दुनिया के किसी कोने में इन बरसों में नहीं देखा गया. देश के ऐसे हाल में सांप्रदायिक ताकतों ने मौके का फायदा उठाया और मुस्लिम ब्रदरहुड देश के गरीब वंचित और शोषित युवाओं में अपनी पैठ बना ली. एक लोकतान्त्रिक देश में सांप्रदायिक ताकत का उदय होगया. ऐसा हो सकने के कारण वहीँ उपस्थित थे. देश की पैंतालीस फीसद आबादी प्रतिदिन दो रियाल कम पा रही थी.

आप ज़रा सोचिये कि हमारे देश में गरीबों की कमाई और भोजन को लेकर जो रुपयों के दावे किये जाते हैं वे कितने हास्यास्पद रहे हैं. गरीब की कमाई को लेकर पेश किये जाने वाले आंकड़े उसकी खिल्ली उड़ाने वाले हैं. कुछ नेता भरपेट भोजन के लिए पांच रुपये का दावा करते हैं. क्या सचमुच हम नहीं जानते कि इस देश में सेहतमंद भोजन तो दूर ज़रुरी भोजन के लिए कितने रुपयों की ज़रूरत होती है. तो क्या हम इसे भी भूल रहे हैं कि दो रियाल में मिस्र की जनता की गुज़र कैसे होती होगी. उनके इस हाल में मुस्लिम ब्रदरहुड के पास जाने के सिवा जनता के पास क्या विकल्प बचा होगा. धर्म की अफीम और नये बेहतर शासन की आस में एक नया ज़हर बोया जाना कितना आसान रहा होगा. एक और घटना पर नज़र डालिए कि दो हज़ार आठ में पुलिस बर्बरता में मारे गए एक शख्स खालिद सईद के नाम से बुद्धिजीवियों, कामगारों और कर्मचारियों ने एक आंदोलन खड़ा किया. इसका नाम था “हम सब खालिद सईद” क्या याद आया आपको? अपना देश याद नहीं आया. उसके आगे का दृश्य भी सोचिये. अगर हम किसी फौजी शासन के तले होते होते तो देश का क्या अंजाम होता. हम मिस्र की बर्बादी से किस तरह अलग होते. किस तरह हम पश्चिमी शक्तियों के जंजाल से बाहर रह पाते. मिस्र के आंदोलन में हज़ारों बेगुनाहों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी. वह आंदोलन किसलिए था? दो वक्त की चैन की रोटी के लिए. उनको क्या चाहिए थी? एक ऐसी सरकार जो जनकल्याणकारी हो. लेकिन आज उनके हिस्से में इतनी कुर्बानियों के बाद क्या है? उनके पास अस्थिरता है. उनके आस पास तोपें और गोलियाँ हैं. उनको खाने को रोटी मिलेगी या नहीं लेकिन इतना तय है कि उनको गोली ज़रूर मिल सकती है. ये सब उसी तानशाही का परिणाम है. जो एक व्यक्ति के शासन द्वारा आई थी. ये सब उसी का परिणाम है जो मुस्लिम ब्रदरहुड के नाम पर फिर से पश्चिमी देशों की साज़िश का शिकार हो जाने देने के कारण है. हमारे सामने हमारा अपना देश है और हमें ये तय करना करना है कि जिस लोकतंत्र में हम सांस ले रहे हैं क्या उसे किसी एक व्यक्ति के हाथ में सौपन दें? या फिर हम बेहतर सामाजिक बराबरी वाले गठबंधनों के सामूहिक नेतृत्व को चुने. इसलिए नहीं कि अगले पांच साल हमें क्या मिलेगा. इसलिए कि हमारी आने वाली पीढ़ी को हम कैसा भारत देना चाहते हैं. हम सबको तानाशाही भरे मंसूबे खूब अच्छे लगते हैं. हम सब अपने से अलग को देश और दुनिया से बाहर कर देना चाहते हैं. यही इस दुनिया की सबसे बड़ी फिरकापरस्ती है.

March 4, 2014

रेगिस्तान से किताबों के मेले तक

रेगिस्तान का ये हिस्सा जहाँ मैं रहता हूँ दिल्ली से बहुत दूर है. हालाँकि कई और जगहें इससे भी दोगुनी दूरी पर हैं. हम सब फिर भी किसी न किसी बहाने दिल्ली शहर पहुँच ही जाते हैं. यात्राओं को लेकर मेरे भीतर का यात्री हमेशा उनके स्थगित और निरस्त होने की दुआएं करता रहता है. मन होता ही नहीं कहीं जाया जाये. इसी रेत में उगता और डूबता हुआ सूरज, चाँद की ठंडी रौशनी, मौसमों कि गरम ठण्डी हवाएं इस तरह पसंद है कि इससे आगे कहीं जाना सुहाता नहीं. बावजूद इसके जाना ही होता है. कभी सरकारी काम से, नहीं तो फिर अपनी ज़रूरत के काम निकल आते हैं. इस बार मैं विश्व पुस्तक मेला में भाग लेने के लिए जा रहा था. रेल के डिब्बे में साइड बर्थ पर बैठे हुए मैंने देखा कि मेरे सामने वाली दो शायिकाओं पर बैठे हुए सज्जन किताबें पढ़ तरहे हैं. एक के पास प्रेमचंद का कथा संग्रह था और दूसरे वाले चैन मार्केटिंग या जल्दी पैसा कैसे बनाये जैसी कोई किताब लिए हुए थे. खिड़की के पास बैठी महिला एक मासिक पत्रिका पढ़ रही थी. वह दृश्य इतना सुन्दर था कि मैं अभिभूत हो गया. मैंने अपनी खुशी के हक़ में दुआ की इस बार पुस्तक मेले की यात्रा अच्छी रहेगी. रेलगाड़ी की छुक छुक को मैं सुबह त्याग देता हूँ. मैं जयपुर उतर कर आगे कार से दिल्ली निकल पड़ता हूँ.

प्रगति मैदान पर बने हुए विशाल प्रदर्शनी भवनों के गुम्बद दीखते ही मुझे खूब खुशी होती है. मैं नये दोस्तों और पुराने मित्रों से मिल लेने की खुशी से भर उठता हूँ. दिल्ली के पहाडगंज में चलती हुई बेतरतीब दुनिया और नई दिल्ली के इन राजपथों पर आए हुए लोग कितने अलग दीखते हैं. पढ़ा लिखा तबका जिसे किताबों से प्रेम है, जो ज्ञान का मोल समझता है वह सभ्य दीखता है. जो किताब मेले में नहीं आते वे असभ्य हैं ऐसी कोई बात नहीं है. लेकिन हिंदुस्तान के अलग अलग हिस्सों और जगहों पर जीवन जीने में कितन फर्क है. एक ही देश में लोगों की सोच और व्यवहार एक दूजे के विपरीत हैं. हम कभी जान नहीं पाते हैं कि इसकी वजह क्या है. देश में एक शिक्षा तंत्र है. विद्यालय है. शिक्षा आधारित रोज़गार है. फिर भी इतनी दूरी कि जिसे कभी सोचा न जा सके. क्या हम कभी ऐसे बन सकते हैं कि हर जगह किताबें हमारे आस पास हों और वैसी ही सस्ती और सुलभ हों जैसी रुसी प्रकाशन रादुगा से आया करती थीं. अब दो तीन सैंकड़ा में एक आधी किताब आती है. प्रकाशक फिर भी परेशान. लेखक को फिर भी रोयल्टी नहीं. यानी सब कुछ गडबड है.

मेला पन्द्रह फरवरी से आरम्भ हुआ और तेईस फरवरी तक चला. इस बीच असंख्य लोगों ने किताबों को छुआ, खरीदा और अपने साथ ले गए. स्टाल्स पर खूब भीड़ थी. लोग इतने बड़े मैदान में दूर दूर बने हुए हाल्स का चक्कर काटते. कुछ लोग बसों में बैठकर एक हाल से दूसरे हाल तक आते जाते. वे बसें इस मैदान की दूरी को कम करने के लिए लगायी जाती हैं. यहीं लगभग हर जगह पर खाने और चाय कॉफी के स्टाल थे. वहाँ चर्चा प्रेमी भी खड़े रहते. वहीँ पर लेखकों और उनके मित्रों में संवाद होता. वहीँ प्रियजनों के साथ मिलन का सुख बांटा जाता.
मेले में रहने के दौरान मैंने कई स्टाल पर अपनी पसन्द की किताबें चुनी. अक्सर ऐसी जगहों पर किताब चुनना तभी आसान हो सकता है जब आप पहले से तय करके आयें कि आपको क्या चाहिए. मेरे पास किताबों की सूची थी. अपने प्रिय लेखकों के नाम थे. किस विधा की किताब लेनी है ये भी तय था. इसलिए मुझे किताबें खरीदते समय कुछ परेशानी न हुई. मैंने लगभग सभी किताबें हिंदी भाषा कि ही ली. इनमें से कुछ रूसी से और कुछ आंग्ल भाषा के अनुवाद भी शामिल हैं. प्रकाशक के स्टाल पर एक दिन मुझे अपने पाठकों से मिलना था. उस दिन एक ही जगह पर सुबह से शाम हो गयी. रेगिस्तान में रहने वाले एक लेखक के खूब सारे पाठक जमा हुए. एक कॉलेज का विद्यार्थी आया हुआ था जिसके पास मेरी दोनों किताबें पहले से ही थी लेकिन उसने फिर से खरीदी ताकि वह मेरे हस्ताक्षर ले सके. इस तरह के प्रेम को देखकर मैं भीग गया था. मेरे पाठकों और चाहने वालों की उम्र का पैमाना खूब चौड़ा था. वरिष्ठ नागरिकों से लेकर सत्रह साल के बच्चे. सब सामान रूप से प्रेम करने वाले. ये सब इंटरनेट तकनीक के कारण ही संभव हुआ कि सीमा पर रहते हुए हम देश के दिल में जगह बना सकें.

जिस दिन मुझे लौट आना था उसी दिन मैंने हाल नंबर बारह के पास पीली टोपी लगाये हुए नौजवानों के एक समूह को नुक्कड़ नाटक करते हुए देखा. नुक्कड़ नाटक मुझे खूब प्रिय हैं. इसलिए मैं उनके पास पहुँच गया. ये नुक्कड़ नाटक एक सन्देश दे रहा था कि आसाराम बापू ईश्वर के अवतार हैं. उनको जानबूझकर फंसाया गया है. अभिनय करने वालों के आस पास कोई बीस तीस लोग जमा थे और यकीनन या तो वे मेरी तरह रहगुज़र थे या फिर कथित संत या ईश्वर आसाराम के चेले. नुक्कड़ नाटक बुद्धिजीवियों का प्रिय कार्य है. इसलिए आसाराम के समर्थन में नुक्कड़ नाटक होता देखते ही मैं चौंककर चारों तरफ देखने लगा. मेरी नज़रे एक और ऐसे ही आयोजन के बारे में सोचने लगी जो तरुण तेजपाल के बारे में हो रहा हो. आखिर तरुण तेजपाल भी सिर्फ आरोपी ही है और कहा जाता है कि उनको भी फंसाया गया है. ये कैसा दुर्भग्य है कि अंधभक्ति हमें कुछ विचारने नहीं देती. तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर न्याय न्यायप्रणाली में चल रहे मुकदमों को हम इस तरह प्रभावित करना चाहते हैं. हालाँकि ऐसा सिर्फ मेले के मैदान में ही नहीं वरन मेले के भीतर भी कुछ एक स्टाल पर चल रहा था. मुफ्त में धार्मिक किताबें बांटी जा रही थी और संप्रदाय विशेष के स्टाल अपना राग आलाप रहे थे. हम रेगिस्तान से चलकर कहीं भी जाएँ भारत एक अद्भुत देश है. इसका रंग भले ही लग हो इसकी आत्मा में वही सब बसा हुआ है जो हर गाँव गली में देखने को मिलता है.

छीजने की आहट

मन एक तमाशा है  जो अपने प्रिय जादूगर का इंतज़ार करता है। शाम से बालकनी में बैठे हुए सुनाई पड़ता है। तुम कितने कोमल हो सकते हो? खुद से पूछने पर...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.