September 30, 2014

फेसबुक ; क्व गच्छति

कल रात मैंने एक स्टेट्स लिखा था कि वे दिन कितने अच्छे थे जब हम फेसबुक पर दोस्ती के लिए अनगिनत फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजा करते थे. अब हम ऐसा नहीं करते हैं. मैंने देखा है कि लोग जल्दी जल्दी अपने एकाउंट को डीएक्टिवेट करते हैं. जल्दी जल्दी लौट कर आते हैं. चैट में लोग्ड-इन नहीं रहते. अजनबी प्रोफाइल को इस तरह देखते हैं जैसे किसी लिफाफे में एंथ्रेक्स के जीवाणु न आये हों. वे लगभग हर बात का उद्धेश्य सोचने लगते हैं.

मई दो हज़ार नौ में जब मैंने फेसबुक पर अपना एकाउंट बनाया था उन दिनों ये बड़ा खुला-खुला नया हरा मैदान था. जैसे दुनिया को नया अछूत चारागाह मिल गया हो. यहाँ लोग अटखेलियाँ करते हुए प्रसन्न रहते थे. यहाँ आकर बहुत सारे दोस्त जीवन की वास्तविक थकान को भूल कर ताज़ा हो जाते थे. अपनी पसंद के गीत, शेर-शायरी, विद्वानों की उक्तियाँ, फ़िल्मी गानों के लिंक और कविता-कहानियां की बातें अपने पूरे शबाब पर होती थीं. ऐसा लगता था मानो फेसबुक पर न आकर किसी भव्य रोमन थियेटर जैसी शानदार जगह पर आ गए हैं.

उन शुरूआती सालों में अभियक्ति ही असल खुशी थी. बाद के इन सालों तक आते आते निजता बचे रहना असल खुशी हो गया है.

उस समय को, बसे-बसाए घर वाले स्त्री पुरुषों के मजे मजे में किये गए प्रेम निवेदनों का स्वर्णकाल कहना कोई अतिश्योक्ति न होगी. स्माइलीज से मारी गयी आँखें, स्माइलीज से ही किये गए बोसे इतने सच्चे जान पड़ते थे कि हर कोई इस तंत्र और यन्त्र से बंधा रहने लगा. एक आस का दरिया सबके घर की खिड़की के पास बहने लगा. ज़रा इंटरनेट ऑन करो और दरिया अपनी रवानी में. जीवन के दुखों के उपचार का झरना. असाध्य रोगों के इलाज की आशा से भरा हुआ.

हम बहकावे में बहते गए. ये प्लेटफोर्म वास्तविक जीवन में दाखिल होने लगा. जितना आभासी कहने में मजा था उतना ही ये वास्तविक होकर असरदार हो गया था. कोई प्रेम करता तो प्रेम पहुँचता, कोई गाली देता तो गाली पहुँचती. ऐसा कुछ न था जिसे यहाँ किया हो और उसका कोई असर न आया हो. इसी तरह परिणाम मिलने का सिलसिला शुरू हो गया. उलझनें बढ़ने लगी. उन उलझनों से घबरा कर नई प्रोफाइल बना ली. उसमें उलझे तो और नयी बना ली. ऐसा करने वालों को कुछ श्रूड दोस्त गरियाते रहे. उनके गरियाने में संयम और शुचिता के पाठ होते थे. वे किसी सन्यस्त की तरह उपदेश देते थे. लेकिन बावरा मन कहीं सुनता है. वह अपनी चाल चलता रहा. इस चाल ने फेसबुक को जवानी की ओर धकेला.

आख़िरकार घर-परिवार, रिश्ते-नाते, सुख-दुःख और सब-कुछ अपने फेसबुकिया प्रिय के साथ बाँट लेने के बाद लगभग हर किसी ने अफ़सोस जताया कि चुनाव गलत था. अगले ने कहा चुनाव सही था तुम ही नीच निकले. प्यार से शुरू होने वाले प्रसंग हताशा, उदासी, टूटन और आत्मग्लानि जैसी अप्रिय स्थितियों तक पहुँच गए.

तो क्या फेसबुक पर किसी को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजना, उसके साथ आत्मीय हो जाना, उसको मन का हाल कहना और अपने जीवन के कुछ पलों को बाँट लेना बुरा काम है? मैं जब आया था तब मुझे लगता था कि बड़ा अच्छा है. कितना अच्छा होता है न हमें बेशुमार लोग जानते हैं. वे हमारी सहजता, सरलता, सुंदरता, ज्ञान, कला, विवेक, ह्यूमर जैसे किसी एक कारण या बिना किसी कारण पसंद करते हैं.

तो  सबको खूब चाहा गया, खूब बातें भी बनी.

बातें बनने के बारे में आप जानते ही हैं कि फीडबैक किसी भी संचार का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है. अगर फीड बैक न हो तो कम्युनिकेशन यानि संचार को अधूरा ही माना जाता है. नॉइज यानी शोर भी इसका ज़रुरी अंग है. फेसबुक पर कम्युनिकेशन की अवधारणा ने काफी सुगमता से काम किया. याहू चैट अविश्वसनीय था तो ऑरकुट ने उसे थोडा विश्वास के करीब खींचा. लेकिन फेसबुक का सभी तरह से अधिक सुचालक होना सामने आया. संचार में तेजी हुई. रिश्ते, दोस्तियां, दुश्मनियाँ, जलन, घृणा जैसे तत्वों ने अपनी महान यात्रायें की. प्रेम और उसकी परछाइयों का शोर देश-विदेश तक गूंजा.

इस गूँज का हाल ये हुआ कि मैंने दो-एक साल पहले एक अखबार में उमर अब्दुल्ला के वैवाहिक जीवन की टूटन पर लेख लिख डाला. जिन उमर को कभी न देखा न जाना, न उसके साये के पास से गुज़रे. वह साप्ताहिक परिशिष्ट में कवर स्टोरी थी. आपको अजीब लगेगा मगर ये सच है कि उस कहानी के सारे सूत्र इसी इंटरनेट के यूजर्स से मिले थे. बाकी जो कहानी के किरदारों का बेस बनाने को चाहिए था उसे मैंने विकीपीडिया से लिया था, जो संसार का एक असत्य ग्रन्थ है. विकिपीडिया की विश्वसनीयता संदेह के घेरे में हैं. इसलिए कि उसको अपडेट करने वाले हम ही हैं. जैसे मेरे बारे में अक्सर वे लोग भी अधिकारपूर्वक बात करते हैं जिन्होंने मुझे कभी देखा ही नहीं. ऐसे लोग इसे अपडेट भी कर सकते हैं.

मैं अपने इस बचकाने पर शर्मिंदा हूँ मगर ज्यादा शर्मिंदा इसलिए नहीं होता हूँ कि मेरी गलतियाँ अपार है. उन पर शर्मिंदगी की तो उम्र पूरी इसी काम में गुज़र जायेगी.

कल रात जब मैंने स्टेट्स डाला कि एक फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजने को साहस चाहिए तो इसका आशय था कि हम स्वेच्छा से ऐसे कटघरे में प्रवेश कर चुके हैं जहाँ कई आरियाँ लगातार चलती रहती है. हमें उन आरियों के बीच से किसी वीडियो गेम के नायक नायिका की तरह आगे बढ़ना होता है. जो कट जाता है उसकी अन्य खिलाड़ी खिल्ली उड़ाते हैं. जो नहीं कटता और आगे बढता जाता है, उसे खिलाड़ी नहीं मानकर महान शातिर धूर्त माना जाता है.

ये हम कैसे निज उद्घाटन पर तुले हुए हैं. हमारे समक्ष कितने सारे खतरे मंडरा रहे हैं. हम किस मादक असर में भूल जाते हैं कि ये कोई खेल नहीं है और अगर खेल है तो भी इसमें कोई जीवनदान या नयी शुरुआत नहीं है. फिर हम क्या करें? बंद कर दें इसे. जैसा कि डीएक्टिवेट करने के रूप में अस्थायी तौर पर करते आये हैं. कोई तो हल होना ही चाहिए. आदर्शों के उपदेशक मेरे लिए मायने नहीं रखते. उनके विराग के भाषण मुझे प्रिय नहीं है. उनकी पक्की लंगोट उन्हीं को मुबारक हो. उनकी सत्यवती छवियाँ खोखली हैं. उनके आचरण अबूझ है. जो व्यक्तिगत जीवन में सामाजिक नहीं है वही इस कम्युनिकेशन की दुनिया में घोर-सामाजिक होने के स्वांग में डूबा है. मुझे तो अपनी खामियां प्रिय हैं. मेरे भीतर चाहनाएँ, कामनाएं और लालसाएं हैं. इस जगत से जी अभी भरा नहीं है. इस संसार से अभी मोह नष्ट नहीं हुआ. इसलिए मैं फेसबुक के पहलू में हूँ और वह मेरे साथ साथ है.

एक उपाय मेरा हमेशा साथ देता है.

मैंने एक पौराणिक कथा पढ़ी थी. जाबाला सत्यकाम की. मन में बसी रह गयी. जाबाला का पुत्र सत्यकाम पूछता है- माँ मैं किसी गुरु के पास विद्या अर्जन को जाऊँगा तो वे मुझसे मेरा गोत्र पूछेंगे. मुझे उनको क्या बताना होगा. सत्यकाम की माँ ने कहा- बेटा युवावस्था में मैंने असंख्य पुरुषों की सेवा की है इसलिए मैं नहीं बता सकती की तुम्हारे पिता की गोत्र क्या है. इसलिए तुम सिर्फ ये कहना कि मैं जाबाला सत्यकाम हूँ. सत्यकाम जब ऋषि आश्रम पहुंचा तो यही प्रश्न पूछा गया. सत्यकाम ने कहा मेरी माँ ने बहुत से पुरुषों की सेवा की है इसलिए मुझे नहीं मालूम कि मेरा गोत्र क्या है. मैं सिर्फ इतना जानता हूँ कि मेरी माँ जाबाला है और मैं सत्यकाम. ऋषि ने कहा तुम सबसे आगे आओ. तुम एक सच्चे ब्राहमण हो. एक ब्राहमण ही स्पष्ट वक्ता हो सकता है.

इस पौराणिक कथा में ब्राहमण का आशय किसी गोत्र से न होकर, स्पष्ट बात कहने से है. मैं खुद को याद दिलाता हूँ कि जाबाला का साहस ही उसका आत्मसम्मान है. हम कोई देव पुरुष या देवी नहीं हैं कि हमसे कोई भूल न हुई हो, हम साधारण मनुष्य हैं. हमने असंख्य व्यसनों और दुर्गुणों से भरे समाज के बीच रहते हुए भूल से या जानकार किसी दुर्गुण का संग कर लिया होगा. फेसबुक तो एक धंधा है, कोई धंधा आदर्श स्थापना के लिए नहीं किया जाता. इसकी खामियों पर खुद को माफ रखो.

जीवन का वह आरोहण भी क्या आरोहण, जिसमें कोई दोष न हो. जिसे कभी ठगा न गया हो वह वास्तव में महाधूर्त है.

बाबा ! प्रवचन कुछ लम्बा हो गया है. शांति शांति.
* * *

[Image courtesy : Pawel Kuczynski]

September 29, 2014

चुप्पी की एक गिरह

जब मैंने अपनी नयी कहानी के पहले ड्राफ्ट को पूरा किया तो खूब अच्छा लगा. मैंने खिड़की के पास कबूतर की आवाज़ सुनी. मैं आँख बंद किये उसे फिर से सुनने की प्रतीक्षा करने लगा. कबूतर के दोबारा गुटर गूं करने से पहले मैंने एक चिड़िया की आवाज़ सुनी. उसके साथ कई चिडियों की आवाज़ सुनी. थोड़ी देर में मुझे गली में बोलते हुए बच्चे सुनाई दिए. फिर लोहे की छड़ों की आवाज़ सुनाई दी. इसे बाद लुहार की हथोड़ी सुनाई दी. फिर किसी बस ने होर्न दिया. और कोई स्कूटर गुज़रा. मैंने अपनी आँखें खोली और सोचा कि ये आवाजें अब तक कहाँ थी? पिछले कई महीनों से इनको किसने चुरा रखा था. मैं इनको क्यों नहीं सुन पाता था. ऐसा सोचते हुए मैंने अपनी आँखें फिर से बंद की और पाया कि चिड़ियों का स्वर सराउंड सिस्टम से भी बेहतर सुनाई दे रहा है. चारों तरफ हलकी चहचहाहट.

अहा जीवन.

क्या हम जीना भूल जाते हैं? इसी प्रश्न की अंगुली थाम कर मैं ज्यादा नहीं थोड़ा सा पीछे गया. कोई दस एक दिन पीछे. अपने लिखने में झांकने गया. खुद को लिखना सुखकारी होता है इसलिए मैं इस डायरी में अपने कच्चे पक्के अनुभव लिखता रहता हूँ. कई बार इस लिखने में विराम आता है तो जांचता हूँ कि वजहें क्या है? मैं रुक गया हूँ या किसी और काम ने मुझे बाँध रखा है. पिछले कुछ महीने इस ज़रुरी प्रतीक्षा में बीते कि बेटी का बारहवीं का परिणाम आये. जब वह अच्छे नंबर ले आई तो नयी प्रतीक्षा शुरू हुई कि वह कहाँ पढ़े. इसी वजह से मैंने जयपुर और दिल्ली में दो तीन महीने बिता दिए. वे इस जीवन के सबसे सुन्दर दिन थे. मैं एक हेल्पर की तरह था. माँ और पापा अगर अच्छे हेल्पर बन सकें तो इससे अधिक कुछ बनने की ज़रूरत नहीं होती. तो हम दोनों अपने बच्चों को मदद करते आये हैं. जो हमारे पास था वह दिया, जो समझते थे वह बात बताई और उनके लिए प्रार्थना की. इसी ज़रुरी काम में मैंने तीन महीने डायरी में कम कम लिखा. मैंने कई बार चाहा कि अपनी बेटी के साथ बिताए खूबसूरत दिनों के बारे में लिखूं मगर फिर मैंने इसे स्थगित रखा. इसलिए कि कई बार मैं लालच से भर जाता हूँ. परिवार के साथ जी हुई खुशियाँ किसी के साथ शेयर करने का मन नहीं होता.

इस महीने मैंने सोचा था कि रोज कुछ डायरी में लिखा जाये. इसी बहाने से मैं लैपटॉप और लिखने के काम से फिर से जुड़ सकूंगा. मैंने पहले दो सप्ताह लिखा और फिर सिलसिला थम गया.

क्यों?

अचानक से कोई रास्ता कहीं जाकर बंद हो जाता है. हम ठहर जाते हैं. हम दुखी और उदास होते हैं. हम सोचते हैं कि ऐसा क्यों हुआ. उस वक्त हम ये भूल जाते हैं कि रास्ते बंद होने और मिटने के लिए ही होते हैं. हर रास्ते का एक आखिरी पड़ाव होता है. जैसे ज़िंदगी भी एक रास्ता है. अक्सर ज़रूरत के वक्त सब ज्ञान हमारा साथ छोड़ जाता है. लेकिन अनुभव कभी हमसे जुदा नहीं होता. तो इस बार जब लिखना बंद हुआ तब मेरे अनुभव ने कहा कि अगर कोई रास्ता बंद न होता तो क्या बहुत सारे रास्तों की ज़रूरत होती. सारी दुनिया एक ही सुन्दर रास्ता बनाती और उस पर चलती रहती. मैं ये सोचकर चुप हो गया. इसलिए चुप हो गया कि मुझे नचिकेता की याद आई.

नचिकेता के पिता जब गौ दान कर रहे थे तब उसने अपने पिता से पूछा- आप मुझे किसको दान दोगे. क्रोध से भरे ऋषि पिता ने कहा- मैं तुम्हें मृत्यु को दान दूंगा.

क्रोध किसी ऋषि को भी अपने पुत्र के लिए ऐसे कठोर, अप्रिय और अनिष्टकारी वचन के लिए प्रेरित कर सकता है. हम साधारण मनुष्य हैं. हमें क्रोध उत्पन्न करने वाली स्थिति में नहीं पड़ना चाहिए. हमें आते हुए क्रोध को शीघ्रता से पहचान लेना चाहिए. क्रोध को बरतने का साहस न हो तो हमें एक चुप लगानी चाहिए. शांत रहिये, प्रतिक्रिया न कीजिये.

नचिकेता स्वयं चलकर मृत्यु का अतिथि हो गया. मृत्यु किसी कार्य से घर पर न थी. जब वह लौट कर आई तो उसने देखा कि तीन दिन भूखा रहने के कारण नचिकेता का हाल बहुत बुरा हो गया है. मृत्यु ने कहा नचिकेता तुम्हें भोजन करना चाहिए था. उसने उत्तर दिया- जिस घर में स्वयं मेजबान न हो उस घर में भोजन के लिए उसकी प्रतीक्षा करना ही धर्म है. मृत्यु ये सुनकर प्रसन्न हुई. उसने नचिकेता को तीन वरदान दिए.

उन तीन वरदानों में एक में नचिकेता ने माँगा कि उसके पिता क्रोध मुक्त हो जाये. तीसरे में उसने स्वयं के लिए माँगा कि उसे आत्म ज्ञान प्राप्त हो. मृत्यु ने तीसरे वर को पूर्ण करने से पूर्व अनेक प्रलोभन दिए कि इसकी जगह तुम कुछ और मांग लो. लेकिन नचिकेता ने उन प्रलोभनों को नहीं स्वीकारा. उसने आत्म ज्ञान ही चाहा और वह इसे पाकर वह मल-मुक्त हो गया.

मैंने भी सोचा कि इस जगत में जब तक हम मल-मुक्त नहीं हैं तब तक इस दुनिया कि किसी भी अनुभूति और व्याधि से बचना असम्भव सा है. हम कठिन परिश्रम करके खुद को थोड़ा संयमित कर सकते हैं किन्तु लोभ, मोह, काम, असत्य, घृणा और ईर्ष्या जैसे अनेक स्वाभाविक गुण-दुर्गुण से मुक्त नहीं हो सकते हैं. इसलिए सब प्राणी लगभग एक से हैं. वे अगर श्रेष्ठ जान पड़ते हैं तो उनका अनावृत होना भर शेष है. इसलिए कि उनका मल-मुक्त होना अभी बाकी है. 

मैं अपनी खामियों के साथ जीते हुए खूब खुश रहता हूँ.

बड़ा अनगढ़ जीवन है. इसे संवारने के उपकरण हमारे पास कम हैं. जब तक हम उनको उपयोग में लेना सीखते हैं तब तक जीवन के घड़े से उम्र का आसव रीत चुका होता है. इसलिए ज्यादा अफ़सोस भी किसी को नहीं करना चाहिए. अगर बहुत सुन्दर बना सकते तो भी इस जीवन का रास्ता कहीं न कहीं बंद होना ही है.

केसी तुम ऐसे क्यों हो? तुम क्यों मुझे अपमानित करते हो.

मैंने कहा कि सर्वोच्च दंड है मृत्यु को दान देना. अभी हिंदी दिवस पर दीपक अरोड़ा के दूसरे कविता संग्रह के विमोचन के अवसर पर उनके पिताजी दो मिनट बोलने के लिए आये थे. उन्होंने कहा- मुझे मालूम होता कि दीपक को कविता ही प्रिय है तो मैं उसे सब कामों से मुक्त करके कहता जाओ कुछ न करो कविता करो. इसके बाद उनकी आँखें और गला भर आया. मेरे तो पिताजी भी नहीं है. संसार का यही सबसे बड़ा दुःख है पिता के दिल में पुत्र का शोक. इससे बड़ा भार कुछ नहीं कहा गया. तो मेरे लिए कितनी खुशी की बात है कि ये दुःख उनको कभी न उठाना पड़ेगा. 

इस तरह हम जब थोड़ा आगे का सोच लेते हैं तब आगामी दुखों का कुछ हिस्सा अभी उठा लेते हैं. ये सोचना अच्छा है. सोचने के लिए चुप होना अच्छा है. इसलिए मैंने जो सोचा था कि इस महीने खूब लिखा करूँगा उसमें व्यवधान आया. मैंने चुप्पी को अपना साथी चुना. इन दिनों कुछ हलकी कवितायेँ अपने आप आने लगी. इसका अर्थ ये भी हुआ कि मैं अपने पास लौटने लगा. अपने पास आते ही ज्ञानेन्द्रियाँ जीवन के संकेत देने लगी. चिड़ियों की चहचाहट सुनाई पड़ने लगीं. आइसक्रीम वाले का भोंपू सुनाई देने लगा. छत पर सोते समय चाँद की फांक देखी, तारे देखे, आती हुई सर्दी की पदचाप सुनी. जैसे किसी जादू के अभिशाप से रुका हुआ शहर अचानक चलने लगा हो. जैसे दीवारें सुनने लगीं हों हमारी हथेलियों की दस्तक. जैसे तुम मेरे इस बेढब जीवन को पढकर मुस्कुरा रहे हो.

कि कोई काम की बात न थी मगर पढते ही गए....
* * *

[Painting : Silence (1799-1801) by Johann Henry Fuseli]

September 28, 2014

सब गारत हों

कविता एक उपकरण है, दिशासूचक यन्त्र है, एक चिकित्सा है, मगर सबसे बढ़कर कविता जिजीविषा है. कुछ बेवजह की बातें ताकि जीए जाएँ.

न सोया न जागा
न बैठा न ठहरा
मिट्टी की मूरत सा मन
सदा तन्हा सदा इकहरा
कभी सिरहाने
तो कभी सुदूर तारों पर
कभी पैताने
कूदता फिरता बावरा सा मन।

कई बार जागता
अनगिनत शीशों के घर में
और औचक खो जाता है इस डर में
कि अब तक
निकल गयी होगी दुनिया, जाने कितनी दूर
दूर बहुत दूर।

मगर सांझ पड़े उसी काम पर मन
वही तारे, वही समंदर, वही रेत का बिछावन।

अनमना बावरा ये अजाना मन।
* * *

सुख मुसाफ़िर की दीवड़ी का पानी था
उड़ता ही गया
दुःख मोजड़ी में लगे कांटे थे चुभते ही रहे.
* * *

आखिर हम ठुकरा दें
अपनी ही समझाइश
लौट आयें खुद के पास।

चाँद की पतली फांक को देखते हुए
खोज लें एक तारा सर के ठीक ऊपर।

कोई आवाज़
गुज़रे छूकर
नसीहतें, तकरीरें, सलाहें
सब गारत हों।

मेरी जाँ हर तरफ आये
आये किसी बेड़ी के टूटने की आवाज़ आये।
* * *
[Painting Moon Kiss courtesy ; Nick Fedaeff]

September 18, 2014

उनींदे रहस्य

शहर के बीच वाले कस्टम के पुराने दफ़्तर के आगे सड़क पर ट्रेफिक की उलटी दिशा में चलते हुए मैंने और संजय ने अचानक हाथ छोड़ दिए. एक ट्रक ने सीधे चलते हुए नब्बे डिग्री पर मोड़ लिया. मैं बायीं तरफ रह गया और संजय दायीं तरफ. मुझे लगा कि संजय सुरक्षित उस तरफ हो गया होगा. ट्रक सीधा कस्टम ऑफिस की दीवार से टकराया और रुक गया. उसके ड्राइवर का कोई पता न था. एक तहमद बाँधा हुआ आदमी, ट्रक के केबिन के ऊपर से तिरपाल उतारने लगा. वह उदास कम और उदासीन ज्यादा लग रहा था. उसने किसी प्रकार का दुःख या क्षोभ धारण नहीं किया था. संजय बिलकुल ठीक मुझसे आ मिला और हमने बिना किसी संवाद के उस ट्रक की ओर देखा.

दुर्घटना कुछ इस तरह घटित हुई जैसे ये होना पूर्व निर्धारित था.

उसी सड़क पर चलते हुए मैं अपने साथ किसी बारदाने को सड़क पर खींचता रहा. उसमें क्या सामान था, जो मुझे खींचने के लिए प्रेरित कर रहा था, ये मुझे समझ नहीं आया. कमल रेडियो के आगे से उसे खींचना शुरू किया था. किसान बोर्डिंग की बिल्डिंग जहाँ से शुरू होती है, वहां सड़क के बीच एक प्याऊ थी. वहीँ तक उसे खींचा. वह प्याऊ अपने गौरवशाली अतीत के साथ पुण्य के घमंड में सीधे तनी हुई खड़ी थी. उस तक पहुँचते ही मैंने वह बोरी जैसा टुकड़ा छोड़ दिया.

कुत्ते की लंबी हूक ने मेरा स्वप्न तोड़ दिया. उस कुत्ते का रोना किसी अनिष्ट के निकट आते जाने की चेतावनी जैसा था. इसी चेतावनी से घबरा कर या उससे सहमती जताते हुए कई कुत्तों के छोटे स्वरों की जुगलबंदी रात के माहौल में घुली हुई थी. मैं नीम नींद में डरा हुआ सा छत पर किये बिस्तर से उठ बैठा. मैंने देखा कि नगर परिषद ने जो हाई मास्ट लाईट लगाई है वह मेरे घर की छत की निजता को भेद रही है. मैं भारी आँखों से फिर लेट गया.

जब आँख खुली तो पाया कि कुत्ते शांत हो गए थे. अब कोई एक दो आवाज़ें रह-रहकर आ रही थीं. वे आवाज़ें सिर्फ अपने होने का संकेत भर थी. उनसे वह चेतावनी जा चुकी थी जो किसी अनिष्ट की ओर संकेत था. मेरी चेतना का अल्पांश लौटा तो सहसा ख़याल आया कि अक्सर जब रात की रेल जाने से पहले विशल देती है तब कुत्ते भी उसके साथ अपनी राग मिलाते हैं. एक सुख का कतरा उतरा कि ये किसी अनहोनी की नहीं वरन रेल के साथ तुकबंदी की कोशिश भर थी.

स्वप्न मुझे फिर से कहीं और ले गए. मैं उनको ठीक से याद नहीं रख पाया.

हम ऐसे लोगों को सपनों में देखते हैं जिनको नहीं जानते. अक्सर ऐसा होता है कि उस पूरे आदमी की कोई हल्की छवि ही देख पाते हैं. या उसकी शक्ल का एक हिस्सा भर याद रह पाता है. ऐसा कम होता है जब हम किसी पूरे जाने-पहचाने को देखें. मैं सोचता हूँ कि स्वप्न ही वह जगह है जो हमें हमारी इस भूल की ओर संकेत करती है कि भौतिक जान-पहचान का हमारा हिसाब बहुत एकतरफा है. जैसे कि स्वप्नों में अनजाने लोग ही सबसे ज्यादा उपस्थित होते हैं. जैसे कि जिस व्यक्ति से हमारा लगभग न्यूनतम या न के बराबर संवाद होता है, उसे हम अपने स्वप्न में उपस्थित पाते हैं. हम ये सोचते हैं कि इस व्यक्ति से कोई वास्ता नहीं मगर वह इस अजाने संसार में निकटतम रूप में उपस्थित होता है. हमें ये मान लेना चाहिए कि वह व्यक्ति हमारे साथ हैं मगर हमारी समझ सिर्फ भौतिक उपस्थिति को चीन्हती है. हम उस उपस्थिति को कभी चीन्ह नहीं पाते हैं जो चेतन मन के दूसरी ओर दर्ज़ हुई है.

मोनाली और मेरा परिचय इतना कम है कि मुझे साल भर उसकी कोई खबर नहीं होती न उसे कुछ मेरे बारे में मालूम होता है. सिवा पढ़ने लिखने के कोई ऐसा कारण नहीं है जो हमें आपस में जोड़ता हो. अभी कुछ महीने पहले मोनाली ने एक सपना देखा. मैं और आभा एक छोटे बच्चे के साथ हैं. वह बच्चा खूब बीमार है. उस बच्चे के साथ होने के वक्त हम दोनों की मनोदशा क्या थी, ये मोनाली ने लिखा नहीं. लेकिन मोनाली ने जैसे ही उस बच्चे को अपनी गोदी में लिया, वह बच्चा खिल उठा. बच्चा स्वस्थ हो गया और मुस्कुराने लगा. मोनाली ने पहले भी ये पढ़ा होगा कि मैं अक्सर सपनों को अपने ब्लॉग पर लिखता हूँ. मैं कोशिश करता रहता हूँ कि सपने याद रखे जाये और उनको ठीक ठीक लिखा जाये. मोनाली के इस स्वप्न के बाद मैंने कुछ खास नोटिस नहीं किया कि घटनाक्रम में कोई ध्यान देने योग्य बदलाव आया हो. लेकिन वह स्वप्न मेरे साथ है.

रेत कोमल है और आपके तलवे नहीं छीलती मगर उसपर आगे बढ़ने में अधिक परिश्रम करना पड़ता है. पहाड़ सख्त है और हम आसानी से कदम जमाकर आगे बढ़ जाते हैं किन्तु बहुत जल्दी हमारे पैरों के तलवे कच्चे पड़कर हमें आगे बढ़ने से रोक लेते हैं. वस्तुतः जो कुछ भी है, वह दुधारू है. उसकी दो परतें हैं. उसके दो परिणाम हैं. इकहरा कुछ नहीं है. लेकिन भौतिक चीज़ों से इतर स्वप्न सबसे अद्भुत है. मेरे पापा को मालूम नहीं मनोविज्ञान में क्या रूचि रही होगी कि हमने जब से समझना शुरू किया तब से अपने घर में सिगमंड फ्रायड की किताब को पाया. उसी किताब में स्वप्नों का मनोविज्ञान वाला हिस्सा मैंने बहुत बार पढ़ा है. वह किताब घटनाओं और परिणामों के साथ उस अदृश्य को भी सिखाती है जो घट रहा मगर देखा नहीं जा रहा. परिणाम आ रहे हैं किन्तु अनुभूत नहीं किये जा रहे हैं.

स्वप्न एक मीठा शब्द है. इसी मीठे में मधुमेह जैसा डर भी शामिल है.

कुछ साल पहले मोनाली एक कहानी लिख रही थी. उस कहानी को लिखा जाना उस समय की जरूरत थी. कहानी के पहले तीन चार चेप्टर पढकर ही ये समझा जा सकता था कि अनुभूतियों के आवेग कितने तीव्र हैं. वे सतही घटनाएँ जो सबके साथ घटती हैं, वे ही सबसे अलग असर छोड़ रही हैं. वे इस तरह सामने आती हैं कि आप जानते हैं ऐसा कुछ होने को है और उसकी प्रतीक्षा बनी रहती है. जिन कारणों से उसने इस सुन्दर धारावाहिक कहानी का आगाज़ किया था उन्हीं कारणों के ज़रा बदलते ही वह कहानी रुक गयी. उसे समेट लिया गया. तब मैंने उसके स्वप्न के बारे में ये सोचा था कि हो सकता है मोनाली जिस हाल से प्रेरित होकर कहानी लिख रही थी वह हाल अब कभी लौट कर न आएगा. जबकि वह कहानी स्वप्न से दो साल पहले ही बंद कर दी गयी थी.

मैंने कुछ रोज पहले लिखा था कि जो बात आज लिखने लायक नहीं है उसे कल भी नहीं लिखा जाना चाहिए. इस वाक्य को मैंने जांचा परखा था कि परिस्थितियों और काल के अनुसार हर चीज़ और संबंध बदल जाता है. जिस प्रकार किसी अबोध बालक के लिए सन्यास अनुचित है, समझ आने पर वह उसके लिए उचित भी हो सकता है. इसी तरह कुछ भी समसामयिक नहीं होना चाहिए. जब जैसा समय और ज़रूरत हो उसे वैसा होना चाहिए. हमारे जीवन की भोर होती है तो सांझ भी होनी चाहिए. हम एक आशा की तरह इस संसार में आने वाले हैं तो हमें एक स्मृति में ढलकर इस संसार से चले जाना भी होगा. लेकिन मैंने जो बात कही उसका आशय ये था कि आज आप अगर अपने दुखों, उदासियों और खुशियों के बारे में नहीं लिखना चाहते हैं तो भविष्य में इस आज को नहीं लिखना चाहिए. इसलिए कि उस वक्त लिखा जाने वाला आज एक अनुभव और कल्पना भर हो सकता है किन्तु यथार्थ से परे का. जो हम अब भोग रहे हैं वह अभी लिखा जाये या न लिखा जाये. बाद में लिखी गयी चीज़ें कोरे उपदेश मात्र होती हैं.

स्वप्न जीवन में बदलाव के संकेत होते हैं. मैं एक आम आदमी की तरह जादुई विशेषताएं प्राप्त करना चाहता हूँ लेकिन ये इतनी मामूली है जैसे कि अपने सपनों को कभी समझ सकूँ. 
* * *

[Watercolor Painting Courtesy : Sunga Park - Korea]

September 16, 2014

मैं रुकती रही हर बार...

रास्ते की धूल
या धूल के रास्ते पर
तुम्हारी अंगुलियों के बीच
अटकी एक उम्मीद
कितनी उम्र पाएगी ?

तुम्हारी शर्ट के
इक कोने मे
दाग की उम्र ना हो उस लम्हे की......
ज़बान पर जीती रहे स्वाद उन होठों का

धूल की बारिशों में
समेट ली है कमीज की बाहें

मैंने छत पर सूखे बाल खोले......
अभी अभी कोई होंठ भिगो गया

उसने कहा कि रुको कहीं बैठ जाते हैं
मैंने कहा ज़रा दूर और
कि काश वो थक जाए और
उसे उठा सकूँ अपनी बाहों में
धूल से भरे रास्ते में ये सबसे अच्छा होता।

मैं रुकती रही हर बार....
हर बार उसका हाथ छू गया .....
मैं दूर हट कर संभलती रही.....
वो पास आता मचलता रहा.

एक साया है ज़िंदगी. थामा नहीं जाता मगर साथ चले. संजोया न जा सके किन्तु खोए भी नहीं. जैसे दीवार से आती कोई खुशबू, सड़क के भीतर सुनाई पड़ती है कोई धड़क, आसमान में अचानक कोई मचल दिखाई देती हो. ऐसे ही सब कुछ सत्य से परे इसलिए है कि हमारा जाना हुआ सत्य बहुत अल्प है. ऐसे ही बचे हुए शब्द उतने ही हैं जितने हमें बरते थे.


[Painting Image Courtesy : Jim Oberst]


September 15, 2014

उपत्यका में प्रेमी युगल

कहवा के प्याले की तलछट 
के रंग की शाम 
पहाड़ पर उतरती हुई.

उपत्यका में प्रेमी युगल, 
पहाड़ को सर पर उठाये हुए. 
* * *
डूबती हुई रोशनी में,
बुझते हुये सायों के बीच 
थोर  के कांटे
रेगिस्तानी सहोदर
केक्टस की आभा लिए हुए.

ज़िंदगी  कितनी सुस्त.
* * *

कई बार इंतज़ार की तरह
खेजड़ी के पेड़ पर गिरती है
बिजली याद की
और फिर अगले तीन मौसम देखना होता है सूना रेगिस्तान. 
* * *

रात बीत गयी 
ऐसी अनेक रातें बीत गयी। 

बिस्तर पर नंगी पड़ी, तस्वीर का रंग उड़ता गया.
* * *

September 12, 2014

गुज़रे हमें छूकर मगर रहे अनुछुआ

दिन
स्याही के परिंदे थे सफ़ेद
और स्याही में खो गए.
* * *

सदियों सा उम्रदराज़
एक बुजुर्ग रखा हुआ है इस काम पर
हर शाम दिन को ले जाये अंगुली थाम कर
हर सुबह लौटाए सलामती के साथ.
* * *

दिन डूबता है ऐसे
जैसे डूबी जाती हो नब्ज़
लौटता है ऐसे जैसे आने लगी हो साँस.
* * *

एक बीता हुआ दिन आता है
किसी नए दिन की तलाश में.
* * *

ज़िंदगी का हर दिन
एक ख़याल है, मिथ है
किस्सा है, नज़्म भी है
गुज़रे हमें छूकर मगर रहे अनुछुआ.
* * *

जो बात आज लिखने लायक नहीं है, यकीनन उसे कल भी नहीं लिखा जाना चाहिए.








  [Painting courtesy : Laurie Justus Pace]

September 10, 2014

गुज़र रही है ये शाम

भिक्षु की तरह सर घुटाये हुए
पद्मासन की मुद्रा में ध्यान की तरह
किसी दरगाह के आस्ताने में
दुआ में पड़ी ठुकराई चीज़ की तरह 
लटका हुआ हो लोहे की ज़ंजीर से
सुरीली प्रार्थनाओं के बीच ताल की तरह.

मणिहारे की टोकरी में
छुपे कंगन के हरे बैंगनी रंग की तरह
गाँव की हाट के खोखे पर 
तगारी में पड़े पीतल के मोरचंग की तरह
गोबर से लिपि दीवार पर टंगे
अलगोजा की मौन जोड़ी की तरह
गोरबंध में गुंथी हुई
खारे समंदर की किसी कोड़ी की तरह.

किले के परकोटे से
निगेहबानी को बने सुराख की तरह
रनिवास की खिड़की से उतरती
उदास विकल झांक की तरह
लिप्सा से भरे आदमकद आईनों में
धुंधली अनछुई विस्मृत याद की तरह.

मय-प्याले को थामें
खानाबदोश ठिकाने की ठंडी रात की तरह
सोये अलसाये बदन पर
वक्त की पांख से गिरी सुरमई बात की तरह
धरती के दो छोर से आगे
अनजाने लोकों में देवताओं की जात की तरह.

या फिर किसी दिल में
पल भर की धड़क
किसी पाबन्दी से परे, चाकरी से दूर
जो मन जिस विध हरियाए
रेगिस्तान में उसी बेतरतीब सेवण घास की तरह.

ऐसे प्रेम कैसे प्रेम?

गुज़र रही है ये शाम मगर जाने किस तरह
कि कहीं किसी तरह नहीं, न ऐसे प्रेम न वैसे प्रेम.
* * *

उन्होंने फिर से दोहराया. इसके सिवा कुछ नहीं सूझता? मैंने दर्शन पढ़ा. साहित्य की टोह ली. मैंने दीन-ईमान की बातें सुनी. मैं नीति और जातक कथाओं से गुज़रा. मैंने ठोकरों, पनाहों, निगेहबानी और याद से भरे लोगों के दिलों में एक ही बात को पाया. वो बात जहाँ पहुँचती दिखी, वहीँ दिखा कि ज़िंदगी और कुछ हो न हो प्यार भरा सुकून का एक पल तो होनी ही चाहिए. 


[पेंटिंग सिंध के मशहूर वाटरकलर आर्टिस्ट अली अब्बास साहब की है. ]

September 9, 2014

न मिला जाँ के सिवा यार ए वफ़ादार

एक तीखे नाक और लम्बे चेहरे वाला हाथ में कलम लिए बैठा हुआ लंबी काठी का आदमी सोच में गुम है. उसके ख़यालों में जाने क्या बहता है, कौन जाने. मैं बस उसकी सूरत को देखता हूँ. इसी किताब को पिछले कई सालों से अपने आस पास पाया है. हम सोचते हैं और थके हुए से लेट जाते हैं. क्या करना है पढकर. क्या पढ़ा हुआ साथ चलेगा. ये उपन्यास है बाबर. बाबर जो एक शायर दिल इंसान था और उसने इल्म और अदब के लिए खूब काम किया था. लेकिन जो सिला मिलेगा उसके बारे में क्या वह खुद ये जानता रहा होगा कि यही होना है.

मेहरबान तुझपे न अपना है न बेगाना
खुश नहीं कोई भी वह गैर हो या जानाना

नेकियाँ लाख की लोगों से कि कायल हो जाएँ
फिर भी बदनाम हुआ बन गया मैं अफ़साना.

अफ़साना होना बुरा है क्या? हकीक़त होना अच्छा है क्या? जो बचेगा उसे कौन देखेगा? नेकी या बदी की गूँज से कहाँ कि रोशनियाँ जल उठेंगी या बुझ जायेगी. इसी दुनिया की मिटटी में कहीं गुम हुआ आदमी किस तरह इस असर से दो चार होगा कि उसकी बदी सताने लगी हैं या उसकी नेकी के कारण आलीशान झंडे फहराते हुए उसे ठंडी दिलकश हवा दे रहे हैं?

ख़यालों के सिलसिले से एक तवील सन्नाटा जागता है. फ़ानी यानी क्षणभंगुर जीवन को लेकर इतनी चिंताएं क्योंकर? इस सन्नाटे के भीतर की गूँज में बदहवास खयाली दौड़ का हासिल क्या है. ज़रा सी हरकत से सिलसिला टूट जाता है तो याद आता है सितम्बर का मुबारक महीना जा रहा है. धूप की चौंध पसरी है. झुग्गियों की जगह पत्थरों से बने दड़बों पर कहीं कहीं बादल की छाँव का कोई टुकड़ा गुजरता है. जैसे दिन में देखा जा रहा स्वप्न.

उजबेक लेखक पिरिमुकुल कादिरोव का उपन्यास बाबर चौदहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध बाद से पंद्रहवीं शताब्दी के पूर्वाह्न से पहले के काल के मावराऊन्नर और हिन्दोस्तान के शासक रहे ज़हीरुद्दीन मुहम्मद बाबर के प्रभावशाली व्यक्तित्व की कथा है. ये उपन्यास उस काल की तमाम सामाजिक और भौगोलिक विशेषताओं को उकेरता है. समरकंद और फरगाना के इतिहास की टोह लेता है. अतीत का दरवाज़ा खोलकर पाठक जब उस काल में प्रवेश करता तो एक जाने पहचाने किन्तु बहुत सदियों पहले बीते हुए समय को जीने लगता है. मैंने कई शामें समरकंद में बितायी. मैंने साजिशों, हिम्मतों और हासिल को देखा. किस तरह मनुष्य का इतिहास एक ही कहानी को अलग ढंग से कहता है इसे सिर्फ ऐसे ऐतिहासिक उपन्यास पढकर सहजता से समझा जा सकता है.

बाबर की कथा में एक शायर दिल आदमी है. उसका शायर दिल होना शायरी के प्रेम में होना है. वह किसी तड़प और बेचैनी को अपने आस पास से चुनता हुआ, कहता है. उसकी शायरी के पेच और गिरहें भले ही ला मुकाबिल न हों मगर वे अपने आप में मुकम्मल हैं.

ज़िंदगी अक्सर एक नयी शुरुआत है, उस वक्त जब हम कुछ नया सीखते हैं.

मुझे महसूस हो रहा है कि जल्द ही मेरी आँखें मुंदने वाली हैं. तब मेरी मय्यत को काबुल ले जाकर वहां दफ़ना दीजियेगा. लेकिन अपनी ज़िंदगी के बचे-खुचे दिन मैं आगरा में गुज़ारूंगा... ज्यादा अरसे नहीं जीऊंगा. दिल बहुत कुछ लिखने को करता है. हुकूमत के कामों में मसरूफ आदमी को यकीनन इसके लिए फुरसत नहीं मिलती.लेकिन अब लिखूंगा... मुझे न ताज ओ तख़्त ज़रूरत है और न ही महलों की. मेरे लिए खिलवतगाह ही काफी है. यहीं इसी बाग में. मैं बिना नौकर चाकर और दरबारियों के काम चला लूँगा, अकेला ताहिर आफ़ताबी काफी है. मेहरबानी करके हुमायूँ को मेरे फैसले के बारे में साफ़गोई से लिख दीजिए.

माहिम बेगम कहती है ये सब मुझसे उस बेटे को न लिखा जायेगा जो अपने बाप की खूब इज्ज़त करता हो. बाबर ये कहते हुए वहां से बाहर की ओर चल देते हैं कि अगर तुम न लिखोगी तो ये मैं खुद लिखूंगा. बाबर की बेटी उनको देखकर जान लेती है कि अब्बा किसी परेशान हाल में हैं. बाबर उसकी तरफ देखते हुए मुस्कुरा कर हाथ हिलाते हुए आगे निकल जाते हैं.

क्या मुझे भी इसी तरह आगे बढ़ जाना चाहिए. क्या लिखना ही वह ठिकाना है जहाँ एक सुलतान ने आखिरी सहारा पाया. क्या लिखने से दर्द मिट जाता है. जो भी है जैसा भी है, एक गरीब और बे सल्तनत के सुलतान के लिए कम नहीं है.

न मिला जाँ के सिवा यार ए वफ़ादार मुझे
न मिला दिल के सिवा महरम ए असरार* मुझे.

असरार* माने राज़दार

September 8, 2014

मानवता का इकलौता धागा

हमारे भीतर दो अनिवार्य तत्व होते हैं. एक है हमें सौंपे गए सजीव शरीर को बचाए रखना और दूजा है निरंतर इसका उपयोग करते जाना. इसके उपयोग के लिए हमारे भीतर एक तलाश होती है. वह तलाश हमें नयी चीज़ों के प्रति जिज्ञासु, उत्सुक और लालची बनाती है. ये एक नैसर्गिक गुण है. इस तलाश की उपस्थिति मात्र से हम सबका अलग अलग होना भी नैसर्गिक है. कई बच्चे बड़े जिज्ञासु होते हैं, उनकी इस प्रवृति के कारण अक्सर वे हमें तोड़ फोड़ करने वाले, बिखेरा करने वाले और असभ्यता फ़ैलाने वाले लगने लगते हैं. लेकिन ये सहज है. जीव किसी कारखाने का उत्पाद नहीं है. वह अपनी विशिष्ट खूबियों और जीने के अलहदा अंदाज को साथ लेकर आया है. इसलिए वह लाख सांचों में ढाले जाने के बावजूद अपनी रंगत नहीं छोड़ता है. बच्चे सामने अगर चुप बैठे हैं तो ज़रा ध्यान हटते ही अपना प्रिय काम करेंगे. उनको उसी पल सुकून आएगा. उनकी पसंद का काम होने से वे राहत में होंगे. बस इसी तरह हम जीते रहते हैं.

ऐसे ही किसी बच्चे की तरह किताबों से मेरा याराना नहीं है. वे मुझे खूब बोर करती हैं. मैं उनके आस पास होता हूँ जैसे आप किसी नाव में सवार हों मगर बेमन. जैसे हवा में उड़ रहे हों मगर ख़याल में कुछ और. मैं एक तरह से खयाली पुलाव बनाने वाला बावर्ची हूँ. मेरे दिमाग में बातें और कल्पनाएँ एक के बाद एक बाद तेज़ी से दौडती हुई गुज़रती रहती है. मैं कभी शांत बैठा होता हूँ तब ये ख़याल राजपथो को छोड़ कर संकरी गलियों में विचरते हैं. इसलिए कोई ऐसी चीज़ जो इस में व्यवधान डाले मैं उससे मुंह फेर कर बैठता हूँ. मेरे इस आचरण के कारण मुझे ऐसा समझा जाता है कि मैं जहाँ हूँ वास्तव में वहाँ नहीं हूँ. मैं उपन्यास नहीं पढता. इसकी इकलौती वजह यही है. मुझे कुछ अनुभवी लोगों ने कहा कि उपन्यास लिखना गंभीर होने की निशानी है. शोर्ट स्टोरी का मान कम है. मैं मुस्कुराता हूँ. सोचता हूँ कि जब तक किसी कार्य के किये जाने का प्रयोजन हमें न मालूम हो तब तक हम कैसे किसी को सीधी सपाट सलाह दे सकते हैं. मेरा कहानियां लिखने का प्रयोजन है कि मुझे इसमें सुख है. जिसे सुख की चाह हो उसे मान से क्या वास्ता? कहानी कहना या पढ़ना ऐसा ही है जैसे पानी में ताज़ा गुलाब की टहनी को भिगोना और अपने ही चहरे पर लगाते जाना.

कैथरीन मेंसफील्ड की कहानियां पढते हुए मैंने रियोनुसुके अकूतागावा की खिड़की में भी झाँका. सोचा पूछूं दादा अफीम उगी या नहीं. उगने से मेरा आशय है कि सेवन करने के बाद ताज़गी आई या नहीं. वे वहीँ उसी राशोमोन को देख रहे थे. एक सड़ांध भरी हलकी हवा थी मगर भय बहुत भारी था. ये सामंती समाज में फैली अव्यवस्था का नाकाबिल ए बरदाश्त मंज़र था. ऐसे ही सामंती युग लौट लौट कर आता है. कोई भी चीज़ कहीं जाती नहीं है. वह कमतर या बेहतर हो जाती है. हम भी अपने आचरण में सामंत होते जाते हैं. जैसे ही हमें मालूम होता है कोई चाहने लगा है तो तुरंत कलापूर्ण, मानवीय और प्रेमी होने का रुख बदल लेते हैं. सवालों और परीक्षणों पर उतर आते हैं. हम मन के किसी कोने में अपने अभिमान का पोषण करने लगते हैं.

कैथरीन साहिबा की जो कहानी मैंने परसों सुबह पढ़ी थी. वह मेरी पढ़ी हुई बेहतरीन कहानियों में से एक है. कथा का शीर्षक है गार्डन पार्टी. हाँ ऐसे ही दीवानावार नहीं मगर जैसा हाल हो वैसे जी लेता हूँ. इन दिनों कहानियां पढ़ रहा था. आज कहानी लिखना शुरू किया. दम ताज़ा कहानी. वैसे कहानी के बारे में कहा जाता है कि जिस कहानी के कथ्य को आप एक वाक्य में नहीं कह सकते वह कहानी नहीं कोरी बकवास है. सेन्ट्रल स्पाइन क्या है? मैं कहानियां पढते हुए ये भी समझाने की कोशिश करता हूँ कि कहानी जिस समाज और भूगोल को उकेरती है उसकी जड़ें किधर हैं. अर्थात वह कौनसी एक बात थी जिसने कहा कि ये कथा कहनी चाहिए. मैंने आज जो कहानी शुरू की वह महानगरीय जीवन का बिम्ब है. इस कहानी से मैं ये समझना चाहता हूँ कि क्या वाकई जीवन गति के सापेक्ष है. क्या कभी जब हम किसी बहुत भारी चीज़ के साये में जी रहे होते हैं तो हमारी गति कम हो जाती है. क्या हम किसी फ्रीज़ जीवन का हिस्सा होने लगते हैं? क्या ठहराव भरा जीवन हमें अधिक अनुभूतियाँ देता है. बस इसी तरह की कुछ मामूली बातें और एक सहज कथानक मेरे मन है. लगता है कि मेरा मन अच्छा रहा तो कहानियां लिख लूँगा. इसलिए कि मेरा कोई अंतिम लक्ष्य नहीं है और मैं चीज़ों और स्थितियों से खूब प्रभावित होता हूँ.

शाम उतर आई है और मैं याद कर रहा हूँ कि वर्गभेद के विलासी कालीन में गुंथे मानवता के इकलौते धागे की कथा है, कैथरीन मैन्सफील्ड की कहानी गार्डन पार्टी. 
* * *

[Painting Image : The self portrait of Vigee Le Burn]

September 7, 2014

याद भी एक जादू है

किसी जादूगर के शो में
स्टेज पर कभी नहीं होता गधा.
सब सामने कुर्सियों पर बैठते हैं.
* * *

गधा एक बुद्धिमान प्राणी है
ज़रा सा बोझ उठाकर
दुनिया भर की चिंताओं से हो जाता है मुक्त.
* * *

प्रेम की ही तरह
जादू सम्मोहन नहीं
यकीन की बात है.
* * *

मसखरे की नाकामी हो सकती है हंसी का सबब
मगर जादूगर के लिए सफाई को बुनना होता है नफासत से
कि जो मसखरे को भूलें माकूल है, जादूगर के लिए परेशानी का सबब.

टोपी से उड़कर कबूतर बैठ सकता है किसी ऊँची मुंडेर पर
खरगोश पड़ा रह सकता है शराब के नशे में किसी भी कोने में.

मगर ये इल्म तब काम आता जब हमारी ज़िन्दगी कोई जादू का तमाशा होती.
* * *

हो सकता है कि एक दिन
हम संभल जायेंगे
ढाल लेंगे खुद को हालत के हिसाब से
खुशी और सुख को तलाश लेंगे.

हो सकता है कि एक दिन
के लिए सीखा हो हमने सबकुछ
बोलें छायाओं की तरह
चलें आहटों की तरह
गुम हो जाएँ दिनों की तरह.

हो सकता है कि एक दिन
हम हों ही नहीं...

जो कुछ भी हो सकता है, उसे होना ही चाहिए.
* * *

याद भी एक जादू है. कोई जादू कभी धोखा नहीं होता. इसलिए कि धोखा तब तक मुकम्मल नहीं है जब तक वह आपने न दिया हो. हर चीज़ जो बाहर जैसी हमें दिखाई देती है, उसका सब आकार-प्रकार, रंग-लक्षण और प्रकृति हमारे भीतर से आती है. हम बिना छुए कैसे जान लेते हैं कि वह चीज़ तिकोनी है. इसलिए कि हमने सीख रखा है कि दिखाई पड़ने वाली त्रिआयामी वस्तु तिकोनी है. ऐसे ही हम अपने आप को अनेक सीख देते रहते हैं. ये सुख है. ये दुख है. और ऐसी अनेक सीखों के बोझ तले अव्यापार जमा करते हैं. इसी तरह जब हम दोष देते हैं वे दोष हमारे अपने होते हैं. उन सब दोषों का निर्यात नहीं किया जा सकता वे सब दोष उत्पादित या आयातित होते हैं. जैसे पानी गंदला नहीं होता अगर उसके भीतर मिट्टी नहीं होती. मिट्टी पानी के भीतर है. कोई आकाश धूसर न होता अगर हवा कुछ बारीक धूल उड़ा न लाती. कोई मिट्टी दलदल न होती अगर वह पानी को अपने पास न रखती. इसी तरह सब कुछ. मन के दर्पण पर जितनी खरोंचे हैं वे अपने ही नाखूनों की हैं. याद में जितने ज़हरीले कांटे हैं वे खुद के बोये हुए हैं. इससे भी बड़ी बात कि वे खरोंचे हैं या नहीं ये हमें नहीं मालूम, वे ज़हर भरे कांटे हैं ये भी एक अनुमान भर है.
* * *

पेंटिंग अलेक्जेंडर की है शीर्षक है द मेजिसीयन.

September 6, 2014

लू-गंध

स्कूल के पास बैठे हुए जुआरी जब ताश के पत्तों की शक्ल और रंगों से ऊब जाते हैं तब द्वारका राम को छेड़ते हैं. वह इसी लायक है. बनिए के घर पैदा हुआ मगर व्यापार छोड़कर किसानी करने लगा था. इस पर बहुत सारी गालियाँ भी हैं. ऐसी गालियाँ जिन्हें भद्र लोग देते हों. जैसे कि इसके बाप का पड़ोसी कौन था.

खद-खद हंसी से भरी गालियाँ.

सीरी ताश के पत्ते छोड़कर उठे तब तक द्वारका वहीँ जुआरियों के पास बैठा रहता है. क्या करेगा खेत में जाकर. वही गरम उमस भरी हवा और दूर तक बियाबान. काम सबके हिस्से एक ही काम साल के आठ महीने दिनों को काटो.

कभी कभी जलसे होते हैं तब द्वारका को सुनकर हर कोई मंत्र मुग्ध रहता है. तालियाँ बजती हैं. बाकी गाँव की पंचायत या किसी बात पर उसके साथ कोई नहीं चलता. पिछली बार दयाराम पंडित जी ने फैसला सुनाया कि जो कोई धर्म को मानता है उसको द्वारका से बात नहीं करनी चाहिए. जो बनिया होकर बनिया नहीं हुआ वह किसान होकर किसान क्या होगा.

द्वारका मगर जब भी खड़ा होता है लोग उसे कान लगाये सुनते रहते हैं. उसकी सब बातें लगभग यही होती हैं और यहीं से शुरू होती हैं.

"उन्होने कहा कि देखो मर गया वह विचार और उससे आने वाली सारी उम्मीदें।
मनुष्य की बराबरी के स्वप्न देखने वाले ढह चुके हैं। इस विचार को हम ख़त्म करार देते हैं। हम धर्म प्रिय लोगों से रखते हैं उम्मीद कि मनुष्यता को बचाने के लिए वे हर आधुनिक हथियार का प्रयोग करने में नहीं हिचकेंगे। मूर्खता की पराकाष्ठा की इस बात पर ही भले आदमियों को समझ जाना चाहिए था कि ये कितना बेवकूफाना होगा कि राजा और मजदूर एक जैसे जीएंगे। मंदिरों में घुस आएगा हर कोई, चर्च के फैसले लेने में सबसे ली जाएगी सलाह। हर कोई रखेगा एक ही बीवी और हरम के बिना भी राजा का चलेगा सुखी जीवन।

मगर लोग बहकावे में आ ही जाते हैं इसलिए ऐसे भोले और सीधे लोगों की रक्षा के लिए एक नौजवान हौसले वाला राजा होना चाहिए जिसने आँखें बंद करके कभी मार गिराया हो शैतान लोगों को भीड़ को।

धर्म अर्थात जिसे हम धारण करते हैं। आओ तुम मुझे धारण करो वरना तुम एक अधार्मिक और राष्ट्रद्रोही हो।"

गाँव के भले के लिए बुलाई गयी सब जनों की बैठक को सांप की तरह रेगिस्तान की लू सूंघने लगती है. लोग पत्थरों के बुतों की तरह हो जाते हैं. शाम तक जाने किस मन से लुढक कर कोई पत्थर अपने ठिकाने लगता है. द्वारका क्या करता है? हमें जोड़ता है कि अलग करता है. वह धर्म का नाश देखना चाहता है क्या? बुजुर्ग लोग कहते हैं द्वारका एक बीमारी है, उनके बच्चे पूछते हैं कौनसी बात के कारण है बीमारी बाबा?

हवा की सरगोशी बोरड़ी  की बाड़ से बातें करती रहती हैं. 

पीथे की माँ कहती है- हमारे छोरे भोले हैं. वे उनको मारेंगे. 
पीथे का बाप जानता है कि यही होगा मगर वह दूसरी बात कहता है- कुछ न होगा कोई न मारेगा. अपने खेत में अपनी मजूरी अपनी बाजरी, बाकी सांवरियो गिरधारी. 

चिंता तो थी ही. कुछ लड़के ज़िद्दी होते जा रहे थे, वे द्वारका का अपमान होने पर बोलने लगते और उसके आस पास मंडराते रहते थे.
* * *

September 5, 2014

ठन्डे गलियारों में कमसिन लड़कियां

बेशक हम बहुत सारे वे काम नहीं कर पाते हैं जो हमारी फेहरिस्त में साफ़ दिखाई देते रहते हैं. क्यों? मैं इसी बात को सोचता हूँ. क्या बात है जो रोकती है और क्या बात है जो इसे किये जाने को ज़रुरी समझती है. अगर हमने वे काम नहीं किये तो क्या उनको दीवारों की तरह मौसमों के सितम सहते हुए बदरंग होकर हमारी फेहरिस्त में धुंधला पड़ जाना चाहिए. या पत्तों की तरह पीले पड़कर हमारी फेहरिस्त से झड़ ही न जाना चाहिए. वे काम मगर बने रहते हैं. जैसे कार्बन अपनी उम्र के इतने साल जी चुका होता है कि स्याह होने के कुदरती गुण की जगह हीरा बन कर चमकने लगता है. हम किस निषेध और किस लालच अथवा लाभ अथवा सुख के बीच की रस्साकशी में उलझे रहते हैं.

इसी उलझन में कल की शाम आहिस्ता उतर रही थी.

कहानियां हमारे अंदर अपना भूगोल उतारती है. मैं जो कुछ लगातार पढ़ रहा हूँ वहीँ की सब प्रोपर्टी मेरे आस पास आभासी रूप में उपस्थित थी. यानी थार के इस असीम रेगिस्तान के एक कोने में बैठे हुए मुझे बसंत के बाद के ठन्डे देश याद आ रहे थे. लग रहा था कि अब कोट समेट कर हाथ में लेकर चलने की शामें जा चुकी हैं.

दो दिन से रेगिस्तान के अलग अलग हिस्सों में दो से आठ इंच बरसात हुई है. मौसम में ठंडक है. भीगी हुई हवा चलती है. हवा में नमी की गंध, ज़रा से सीले कपड़े और हलकी हलकी बेखयाली. कोकटेल सी अनुभूतियों से भरी इस शाम में सत्रह साल की लड़की पास से गुज़रती है. “एक जवान लड़की” कहानी की इस सत्रह साला नायिका की आँखें सरगोशी की तरह बोलती है. वे कहती हैं मैं इस तरह मिस फिट क्यों हूँ? ये क्लब, शराबघर, जुआखाने मुझे जिस उपेक्षा से देखते हैं मैं उससे अधिक इनसे घृणा से भर जाती हूँ. ये जो बूढ़े लोगों की गन्दी निगाहें जब तरह मुझे घूरती है तब इनके भद्र और दुनिया के सबसे ज़हीन समाज की सूरत कितनी बद दिखाई देती है.

किशोर लड़कों के खाने पीने की जाहिली, बूढी जर्जर काया पर साटन के सब्ज़ लिबास पहने हुए जुए की आदतों से भरी हुई औरतें, सिगारों के धुएं को उलीचते जुआरी, शराब की मादक गंध के बीच लालची निगाहें... आह किस कदर इस शाम का रंग भद्दा सा जान पड़ता है. इस सत्रह साला लड़की की फेहरिस्त में लिखा हुआ है, तन्हाई चाहिए. तन्हाई जो इस सूची में शामिल है वह उसे नहीं मिलती. हम सबको भी वे सब चीज़ें कहाँ मिलती हैं जो हमारी सूची में शामिल होती हैं. न धुंधली होती हैं न मिट कर झड़ पाती हैं.

मैं मुस्कुराता हूँ. एक गहरी किन्तु इतनी संजीदा कि उजाले में भी न देखी जा सके वैसी मुस्कान. उस लड़की की आँखें ही नहीं उसकी पूरी ज़िंदगी नीले रंग से भरी हुई थी. 

मुझे दोस्त कहते हैं इतनी उदास कहानियां क्यों लिखते हो? इन कहानियों को पढकर दुःख होता है. क्या हम इसलिए पढ़ें कि पढकर दुखी हो जाएँ. क्या आपका मंतव्य यही होता है कि पाठक को दुखी किया जाये. मैं निरुत्तर उनको पढता सुनता या देखता हूँ. कल जब कैथरीन मैन्सफील्ड की कहानियां पढ़ रहा था तभी एक कहानी ने इन सब बातों की याद दिलाई. संगीत का सबक, ये कहानी का शीर्षक है. शीर्षक से कुछ तो होता ही है. होता हर एक सर्द आह और दुआ से भी है. इसी तरह इस बेहतरीन कहानी में मुझे खूब आनंद होता है. ठन्डे गलियारों से गुज़रती हुई मिस मीडोज संगीत कक्षा की ओर जा रही होती है. कक्षा में वह कमसिन लड़कियों को एक बेहद उदास गीत सिखाती है. इसके समानांतर मिस मीडोज के गले को अपने प्रेमी के लिखे पत्र के शब्द फांसी की तरह कसते जाते हैं. हाँ मैं प्रेम में था. अब भी करता हूँ. करता ही रहूँगा... मगर हम साथ नहीं रह सकते. ऐसे अनगिनत वाक्य जिनमें एक तवील फ़साना है. एक डेड एंड है. उन शब्दों की स्मृति में आरोह के बाद मिस मीडोज लड़कियों को डांटती है कि उनका स्वर इतना ऊंचा क्यों है? वे क्यों नहीं इसे और गहराई की तरफ ले जाती. गहरे लंबे आलाप भरे दो शब्दों के बाद के चार शब्द किसी फुसफुसाहट की तरह. इस तरह मिस मीडोज के दुःख को कैथरीन मैन्सफील्ड बेहतरीन जुबां देती है.

अचानक !!

स्कूल प्रिंसिपल के पास एक तार आता है. प्रिंसिपल के कमरे में बैठी हुई मिस मीडोज की अंगुलियां काँप रही होती हैं, उनका चेहरा शर्म से लाल हो जाता है. वे कक्षा की ओर भागती है, बच्चियों को गहरे उदास स्वरों के लिए डपटती है. कहती हैं ज़रा हाई, या शायद कुछ ऐसा ही... उस तार में क्या लिखा होता है ये बताने की ज़रूरत नहीं है. मगर क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि ज़िंदगी जिस किसी के पास है वह उसे नादानी से हेंडल कर रहा है. हम नौसिखिए हैं, हमारे सीखने तक ये बीत जायेगी.

कैथरीन मैन्सफील्ड की कहानियां पढ़ना, प्यार करने जैसा है. 

September 4, 2014

अतीत की उबड़-खाबड़ सतह पर

भी हम एक खाली लम्हे के हाथ लग जाएँ तो गिर पड़ते हैं समय के भंवर में. उसी भंवर में भीगते डूबते चले जाते हैं. लेकिन जब कभी भर उठते हैं गहरी याद से तब हम असहाय, अतीत की उबड़-खाबड़ सतह पर अनवरत फिसलते हैं.

मैं जब कभी खाली लम्हों के हाथ लगता हूँ तो दौड़ कर किताबों में छुप जाता हूँ.

किताबों के आले में बहुत सारी किताबें जिनके आवरण सफ़ेद रंग के हैं, वे बड़ी सौम्य दिखती हैं. मैं उनको सिर्फ निगाहों से छूता हूँ. मुझे किताबों का गन्दा होना अप्रिय है. एक दोस्त अंजलि मित्रा ने किताब सुझाई थी “द पेलेस ऑफ इल्यूजन्स”. चित्रा बनर्जी का एक स्त्री की निगाह से लिखा हुआ महाभारत. ये किताब आई और आते ही बेटी के हाथ लग गयी. उसने अविराम पढते हुए पूरा किया. फिर ये किताब उसकी सखियों तक घूम कर कई महीनों बाद मेरे पास पहुंची. किताब का श्वेत-श्याम आवरण अपने साथ नन्ही बच्चियों की अँगुलियों की छाप लेकर आया और अधिक आत्मीय व प्रिय हो गया. प्रेम में अक्सर हम उदार हो जाते है और अपने प्रिय सफ़ेद रंग के धूसर हो जाने पर भी खुश रहते हैं. ये एक ज़रुरी किताब है. जिनको अमिष की किताबें प्रिय हैं उन्हें इसे ज़रूर पढ़ना चाहिए ताकि समझ सकें कि सार्थक कैसे लिखा जाता है.

समय इन दिनों मेरी पीठ को आहिस्ता से छूकर पूछता है, कहो तुम क्या करोगे? मैं इस खालीपन में सफ़ेद आवरण वाली किताबों के प्रेम में एक और किताब उठाता हूँ. स्पानी लेखक खुआन अल्फ्रेंदो पिन्तो सावेद्रा का कहानी संग्रह मोक्ष और अन्य कहानियां.

मैं निरंतर पढता हूँ. मंथर गति से, किसी काई की तरह शब्दों से चिपका हुआ. आगे न बढ़ने के हठ से भरा हुआ. मेरे पढ़ने का तरीका ऐसा ही है. स्पानी कहानियों की इस किताब के श्वेत विलास के भीतर हालाँकि मेरी पसंद की भाषा शैली नहीं है. कहानियां बोझिल ब्योरों से भरी हैं. कहानीकार उपन्यास जितनी लंबी कथा को कुछ पन्नों में समेटता है. इसी कारण कहानियां दूर दूर की यात्रा करते हुए पाठक को थका देती है. एक कहानी का शीर्षक है, खोसे ग्रेगोरियो. ये कहानी कुछ ऐसी है जैसे कभी कभी ही हमको कोई शाम अलग लगती है, जबकि हम जानते हैं हर शाम को अलग ही होना होता है. इसी तरह कहानी अलग है मगर लगती नहीं. खोसे ग्रेगोरियो बचपन से मेधावी गायक है, रेस्तरां, होटलों, वैश्यालयों और इसी प्रकृति के सभी सहोदर उपक्रमों में जीने को बाध्य किन्तु नाम और धन उसका लगातार पीछा करते हैं. बचपन में वह इस बात से नफ़रत करता है कि वेश्याएं मुझ नन्हे गायक को जबरन क्यों चूमती रहती है. बड़ा होते हुए भी वह इसी तरह की उलझन में रहता है. कुछ एक तफसीलों के बाद आखिर थाई मसाज से अपने कौमार्य पर पहली समलैंगिक सिहरन को उगने देता है. हम कितनी ही बार निषेध का जीवन जीते हुए आखिर किसी कमजोर लम्हे में उसे त्याग देते हैं. यही इस कहानी का कथ्य है.

जैसे मेरे पास किताबें होती हैं लेकिन मैं उनको पढ़ने के निषेध में जीता रहता हूँ और कभी कभी ये टूट जाता है. ये किताबें अक्सर मेरे सिरहाने पड़ी रहती हैं. मुझे किताबें देखना खूब प्रिय है. मैं उनको उलटता पुलटता हूँ और थोड़ी देर बाद खुश होकर उन्हें करीने से रख देता हूँ. महीने गुज़रने के बाद ही कभी मन किसी किताब को आवाज़ देता है. इस बार मैं सफ़ेद किताबें छांट कर अलग रखे हुए सबको देख रहा था. उन्हीं में अंजू शर्मा के कविता संग्रह को शामिल पाया. कल्पनाओं से परे का समय.

इस कविता संग्रह से एक खूब भली कविता पढ़ी, साल उन्नीस सौ चौरासी. 

इसे  पढ़ने के बाद सोचता रहा कि किस तरह गुज़रना हुआ इस साल से? इसके जवाब के लिए छत पर बैठे हुए चुप देखता रहा पुल के पार जाते हुए लोगों को. बस यही लम्हा है कि मैं देख रहा हूँ उनको जाते हुए. बस इसी पल वे गुज़र जायेंगे. यह फिर कभी न होगा. गुज़रना एक बार ही होता है. इसे पुनरावृति की अनुमति नहीं होती.

कल्पनाओं से परे का समय, यानि यथार्थ का ऐसा हो जाना कि वह कल्पनाओं से परे का लगे. अंजू यथार्थ को लिखती हैं, उनकी कविताओं में प्रेम रूमानी होने से अधिक आत्मीयता और सम्मान का पक्षधर है. उनकी अंगुलियां जिन शब्दों को चुनती हैं वे समानता की इबारतें गढती हैं. वे सब कवितायेँ एक ऐसे जीवन की कामना है जहाँ सभी तरह के भेद खत्म हों. इस संग्रह में शामिल शीर्षक कविता से इतर साल उन्नीस सौ चौरासी खुद-गिरफ़्त कविता होकर एक बड़े कैनवास को को चित्रित करती है. चौदह साल की एक किशोरी की स्मृति में घनीभूत और जड़ जमाए बैठे हुए साल चौरासी का भव्य और मार्मिक वर्णन. मैं इस कविता के जरिये उस साल के हेक्टिक होने को फिर से समझता हूँ. अचानक मुझे ख़याल आता है कि आठवें दशक के चौरासीवें साल में मैंने भी चौदह बरस की उम्र जी थी मगर इतना गहरा तो वह मेरे भीतर न उतरा. शायद रेगिस्तान के सुस्त जीवन में घटनाएँ इतनी शिथिल होती हैं कि उनका असर इस मद्धम गति के आगे दम तोड़ देता है. लेकिन क़स्बों, शहरों और महानगरों में संचरण तेज होता है. एक भय अपने साथ अनेक भयों की संभावनाएं लेकर आता है. एक चौकसी अनेक शंकाओं को जन्म देती है. एक असुरक्षा के परदे के पार अनेक अनिष्ट छिपे जान पड़ते हैं.

इसी संग्रह से एक कविता जिसे कई कई बार पढ़ा वह है, मुक्ति. उसी की चार पंक्तियाँ.

मैं सौंपती हूँ तुम्हें 
उस छत को जिसकी मुंडेर भीगी है
तुम्हारे आंसुओं से, जो कभी तुमने
मेरी याद में बहाए थे.


वैसे सफ़ेद रंग खूब अच्छा होता है. उतना ही अच्छा जितना कि काला. कई बार हमारे अपने भीतर की मचल और तड़प हमें किसी खास रंग की ओर धकेलती है. हमें कम ही समझ आता है कि प्राइमरी रंगों से अनेक रंग बनाते जाना खुशी है, किसी एक ही रंग पर ठहर जाना असल उदासी है.

कैथरीन मैन्सफील्ड की कहानियां पढ़ी हैं? ऐसा लगता है कि उसी कहानी में रूपायित हुए हुए जा रहे हैं जिसे पढ़ रहे हों. ऐसी कहानियां जैसे किसी और का जीवन चुरा कर जीए जा रहे हों. हाय वो आगे से सीधे कटे हुए बाल जो ढके रहते थे आधी पेशानी को, एक तीखी नाक और लंबा चेहरा जैसे कोई ग्रीक देवी, वे सवालों से भरी आँखें. हाय वो कैथरीन साहिबा.

September 3, 2014

अंतर्मुखी उड़ान की विध

अचानक बरसात होने लगी. सराय रोहिल्ला की तंग गलियों में भरे पूरे इंतज़ार का अभ्यस्त टेक्सी वाला अपने गमछे से अंदर की तरफ का शीशा पोंछता हुआ पड़ोस में खड़े ऑटो वाले को कहता है, निकल जायेगी. देवता उसके इस ज्ञान से खुश होकर और तेज पानी बरसाने लगते हैं. टेक्सी नहीं निकलेगी, इसलिए वह चुप खड़ा रहता है.


मकोड़ा देखता है आसमान की ओर
ऊपर मगर छत की सफेदी पसरी है.

वह खुजाता है अपना सर
आदमकद भार से भरे
भारी कदम उसके पास से गुज़रते हैं.

लाल  रंग की मोल्डेड कुर्सी पर बैठा
आदमी सोचता है
मकोड़ा इस पल है और शायद अगले पल नहीं.

या शायद आदमी सोचता है
मकोड़े के बहाने अपने ही बारे में.

मकोड़ा फिर से खुजाता है सर
बढ़ जाता है भारी कदमों के बीच से बेपरवाह.
* * *

लोहे की सलाखों के सहारे से खड़ी है सायकिल
लोहा खड़ा है, लोहे का सहारा लिए हुए.

यूं तो उर्ध्वाकार खड़ी रह सकती है सायकिल
बिना किसी सहारे अपनी ही किसी सीधी बैठक के बल
या अपनी किसी टेढ़ी टांग के सहारे किसी तोप की तरह झुकी हुई
या अपने सबसे बुरे दिनों में हो पड़ी हों चित्त मिटटी से सनी.

लोहे का दरवाज़ा भी खड़ा कब तक रहेगा?
* * *

पेड़ की छाया में धोबी धोता है
अतीत के स्याह धब्बे.

एक कुत्ता चाहता है चाटना
गले का गोल ज़ख्म.

एक पीला पत्ता उड़ा जाता है
अपनी अंतर्मुखी उड़ान की विध.

हर किसी को मुक्ति है
दुःख सिर्फ प्रतीक्षा.
* * *


September 2, 2014

कितने शीरीं हैं तेरे लब कि...

ज़िंदगी कितनी नफ़ीस और कितनी ऐबदार है.

वह लड़की रो रही थी. मैंने उसे उसी समय क्यों देखा, जब उसकी आँख का आंसू उसकी तर्जनी के शिखिर को छू रहा था. अचानक याद आया कि किसी महबूब ने बददुआ दी थी कि तुम भी एक बेटी के बाप हो. इसलिए कि मैं देखूं ये षोडशी का आंसू तुम्हारी अपनी बेटी की आँख में भी हो सकता है. शायद उसका आशय कभी ऐसा न रहा हो कि उसकी आँख में हो. बस एक उलाहना भर हो.

वह लड़की कनाट प्लेस के ए और बी ब्लाक के बीच पत्थरों से बनी हुई बैठकों पर बैठी हुई थी. उसके साथ जो लड़का था वह ज्यादा चिंतित न था. चिंतित होने से मेरा आशय है कि उसे लगता होगा कि लड़की के आंसू का कारण वह न था. मगर मैंने अचानक याद किया कि उसने पूछकर हाल, रुला दिया उसको. यानि हम कहीं भी हों, कई बार सामने वाले के दुःख पूछ कर उसे रुला देते हैं. इसी तरह क्या मेरे सब हिसाब मेरी बेटी से चुकता किये जायेंगे?

अचानक मुंह कड़वा हो जाता है.

कनाट प्लेस पर बादल कुछ देर पहले बरस कर गए थे. सब तरफ एक खुशी थी कि दिल्ली की उमस भरी गर्मी से पीछा छूटा, सब तरफ एक शिकायत थी कि यहाँ पानी क्यों फैला है? ये जो है वह क्यों है और जो नहीं है वह क्यों नहीं है? इसी ख़याल और तफसील में जीती हुई दुनिया कमाल है.

रात को कहानी पढ़ रहा था. राजेंद्र राव की कहानी है, कितने शीरीं हैं तेरे लब कि... जब मैं जन्मा था उस दौर के कथाकार हैं लेकिन पढते हुए लगता है कि इस दौर के कथाकार हैं. हर दौर के कथाकार हैं. इसी कहानी के शीर्षक से कथा संग्रह है. सामयिक बुक्स दिल्ली से आया हुआ. एक बेहद घटिया कवर वाला कहानी संग्रह. मगर कवर से क्या होता है. जैसे मैं दिखता बढ़िया हूँ मगर असल में वैसा नहीं हूँ. उसी तरह एक खराब कवर में अच्छी कहानियां हो सकती हैं.

मनोवैज्ञानिक कहानियां मैंने कम पढ़ीं हैं. वैसे हर तरह की कहानियां कम ही पढ़ीं हैं. इस कहानी को पढते हुए रेगिस्तान के रेल स्टेशन गुज़रते रहते हैं. उसी तरह जैसे अचानक आपको याद आये कि पंजाबी नाम चार या पांच अक्षर के होते हैं. उनके निक नेम ढाई अक्षर के. कहानी में क्लास फेलो लड़की का नाम चार अक्षर का है. नाम में क्या रखा है मगर मैं कहीं पहुँच जाता हूँ. जैसे मैंने एक कहानी लिखी थी परमिंदर की कहानी. असल में उस कहानी से ज्यादा मुझे याद आई भोपाल की एक लड़की की. सुरजीत की तरह उसका भी चार अक्षर का नाम है. उसके बारे में लिखने को लाख बातें मैंने बचा रखी है. शीरीं लबों की इस कहानी के मुकाबिल याद आता है कि उसने मुझे कहा “कितनी गर्मी है तुम्हारे तो भुट्टे की तरह सिक गए होंगे.” यही संवाद उसने रवीश कुमार को कहा और फिर खिलखिलाते हुए मुझे यह बात बताई. 

हाय! क्या बेहयाई है. कोई बीस पच्चीस साल की लड़की कभी इस तरह की बातें कहती हैं? मगर सचमुच ये कोई फंतासी नहीं है. राव साहब की कथा की पात्र सुरजीत और उसके दारजी इससे ज्यादा भदेस गालियाँ देते हैं. वे जड़ों से मुक्त हैं. वे धरती और हवा के बीच किसी जीवन के प्रतिनिधि है. उनके लिए ये इस पल ज़िंदा होना बड़ी बात है मगर मैं अपने अतीत के खौफ़, भविष्य की चिंताएं लिए इससे असहमत रहता हूँ. मैं अपनी भाषा के प्रति अचानक सजग होने लगता हूँ. आगे क्या सीखूंगा ये सोचने लगता हूँ.

कहानी से सुरजीत अचानक गायब हो जाती है. जैसे कि मैं अपनी दोस्त से कहता हूँ तुम मोदी प्रेम में अपनी दृष्टि खो चुकी हो. ये बदलाव नहीं वरन जड़ता की ओर बढ़ने का संकेत है. वोट हालाँकि सबने मोदी को दिया जैसी परिभाषाएं गढ़ी जा रही हैं. वह रूठ जाती है. कहती है “तुम पांच रुपये के हो, मेरे दोस्तों को बार बार न गरियाओ. तुम्हारी औकात तुम अपने पास रखो.” इस तरह हमारी बातचीत बंद हो जाती है. मुझे उसने अपने एक-एक लम्हे के बारे में बताया होता है. अपने बचपन से लेकर अब तक का. अपने प्रेम से लेकर खालीपन तक का. क्या मैं इसे लिखूंगा? क्या मैं कभी उसके इस बिहेव का प्रतिकार करूँगा? नहीं. मैं तय पाता हूँ कि उसने जो गालियाँ राहुल और अरविन्द को दी है उसकी तुलना में मेरा बड़ा मान रखा है.

लेकिन मेरा एक बेटी का बाप होना मुझे उस ओर खींच ले जाता है जिधर एक किशोरी अपनी आँख से आंसू पौंछ रही होती है और उसकी दूसरी तरफ मेरी बेटी पूरे परिवार के साथ खुशी भरे क्षण बिता रही होती है.

राजेन्द्र राव सर की कहानी में मनोविज्ञान का इस तरह उपयोग हुआ है कि हम कहानी को पढते हुए जाने कितनी बातें बिना पढ़े अपने आप समझते जाते हैं. क्या मीठी ज़ुबान का होना भला है? या फिर तमाम घटनाक्रम के बाद अचानक से मीठी ज़ुबान का नैसर्गिक हो जाना, आवरण रहित और ओरिजनल हो जाना. हम अपने सारे पहनावे की तारीफ करते हुए अचानक से उस पल, उस स्थिति, उस दृश्य, उस कामना के भीतर पहुँचते हैं कि उलझ जाते हैं. हम हैरत ,में पड़ जाते हैं. क्या हमने जो सीखा और ओढ़ा था वह सही था या जो हमने उतार दिया और भुला दिया वह अच्छा है? या ऐसा चमत्कार कैसे हुआ कि जिसे सीखने के नाम भर से उल्टी आने लगती थी, उसी के अच्छे प्रदर्शन के लिए शाबासी के पात्र बन गए. 

कहानी कई परतों में हैं. ऐसा लगता है कि राव साहब इसे खूब लंबी लिखना चाह रहे होंगे और किसी कारण से समेट दिया. यूं इस कहानी के चार भाग है. उन सबको साफ़ देखा जा सकता है. यूं ये कहानी कहती है कि समझदार को इशारा काफी है. हम अक्सर कहते हैं कि कैसी बाज़ारू भाषा में बात कर रहे हो. ये भाषा की अशिष्टता के लिए सबसे अधिक प्रयोग किया जाने वाला वाक्य है. इस कहानी में बाज़ार है, प्रतिस्पर्धा है, चालाकियां हैं, स्वार्थ है, और किसी का गला काट कर आगे बढ़ जाने जितनी निर्दयता भी है. कथा के प्रथम पुरुष के बॉस का चरित्र गालियों से मुकम्मल होता है. ऐसा कहीं नहीं जान पड़ता कि ये कोई अवास्तविक पात्र और कल्पनीय भाषा है. एक पाठक की तरह इससे गुज़रते हुए मैं हर कहीं बाजारवाद के ऐसे नुमाइंदों को खूब अच्छे से बुन लेता हूँ. उनकी काइयां शक्ल और अशिष्ट शब्दों से भरी भाषा मंज़र और पसमंज़र दोनों को बुनती है. यही भाषा कम ओ बेश निचले स्तर के दलाल से लेकर एक्जीक्यूटिव स्तर तक समान रूप से संचरित है. राजेंद्र राव, समाज के हर तबके की भाषा में उपस्थित इस दोष या खूबी को किसी मनोवैज्ञानिक की तरह चिन्हित करते हैं. बसों और रेल गाड़ियों में सफर करने वाले माँ और बहन की गालियाँ देने वाले लोग हिकारत से देखे जाते हैं मगर उनको समझा कभी नहीं जाता. उनको ये भाषा जिस बाज़ार ने दी है उसका नियामक कौन है? ये कहानी इस तरह की भाषा की गिरहें खोलती है.

मैं सोचता हूँ कि वह कौनसा एलिमेंट था? जिससे इस तरह की मनोवैज्ञानिक कहानी का अवतरण हुआ. क्या सचमुच हमारा ओढना - पहनना हमें अपने आप से दूर करता है. क्या शीरीं लबों की नाज़ुकी और अल्हड़पन के बीच की दूरी बड़ी मामूली है. क्या हम असल में वे हैं हीं नहीं जो हम जीए जा रहे हैं.

मैं फिर से देखता हूँ कि दिल्ली पर मेहरबान बादलों का कोई झोंका गुज़रता है.

बेटी कहती है- पापा, क्या आज आप मुझे जोगर दिलाओगे? मैं मुस्कुराता हुआ उठ जाता हूँ. इसलिए कि जो कुछ उसे चाहिए दिला दूं. वह बच सके बददुआओं से. उसके पास रहे हर एक चीज़. हम दोनों उठकर जाने को होते हैं तभी वह नन्हीं लड़की फिर से पोंछती है अपनी आँखें. वह लड़का जिसे हालात के नज़र झूठा और मक्कार कहा जा सकता है, वह चुपचाप देखता है उसकी भीगी आँखों को और कुछ नहीं कहता. 

इस तस्वीर से उस लड़की का कोई वास्ता नहीं है. वह लड़की और उसका साथी उठकर जा चुके थे. उनकी जगह ये नवयुवती और नवयुवक आकर बैठ गए. ये जिंदगी के एक लम्हे का सिर्फ  इल्युजल भर है कि एक अधेड़ आदमी चिंतित है और नयी नस्ल खुश है.इस तस्वीर के यहाँ होने से किसी को कोई एतराज़ हो तो कृपया इस पते पर ईमेल करें, इसे तुरंत हटा दिया जायेगा. kishorejakhar@gamil.com

दो सूखे पत्ते नम मिट्टी में

एक रोज़ कोई कोंपल खिली जैसे नज़र फेरते ही किसी ने बटुआ पार कर लिया हो। एक रोज़ उससे मिला। फिर उससे ऐसे बिछड़ा जैसे खाली बटुए को किसी ने उदासी ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.