September 10, 2014

गुज़र रही है ये शाम

भिक्षु की तरह सर घुटाये हुए
पद्मासन की मुद्रा में ध्यान की तरह
किसी दरगाह के आस्ताने में
दुआ में पड़ी ठुकराई चीज़ की तरह 
लटका हुआ हो लोहे की ज़ंजीर से
सुरीली प्रार्थनाओं के बीच ताल की तरह.

मणिहारे की टोकरी में
छुपे कंगन के हरे बैंगनी रंग की तरह
गाँव की हाट के खोखे पर 
तगारी में पड़े पीतल के मोरचंग की तरह
गोबर से लिपि दीवार पर टंगे
अलगोजा की मौन जोड़ी की तरह
गोरबंध में गुंथी हुई
खारे समंदर की किसी कोड़ी की तरह.

किले के परकोटे से
निगेहबानी को बने सुराख की तरह
रनिवास की खिड़की से उतरती
उदास विकल झांक की तरह
लिप्सा से भरे आदमकद आईनों में
धुंधली अनछुई विस्मृत याद की तरह.

मय-प्याले को थामें
खानाबदोश ठिकाने की ठंडी रात की तरह
सोये अलसाये बदन पर
वक्त की पांख से गिरी सुरमई बात की तरह
धरती के दो छोर से आगे
अनजाने लोकों में देवताओं की जात की तरह.

या फिर किसी दिल में
पल भर की धड़क
किसी पाबन्दी से परे, चाकरी से दूर
जो मन जिस विध हरियाए
रेगिस्तान में उसी बेतरतीब सेवण घास की तरह.

ऐसे प्रेम कैसे प्रेम?

गुज़र रही है ये शाम मगर जाने किस तरह
कि कहीं किसी तरह नहीं, न ऐसे प्रेम न वैसे प्रेम.
* * *

उन्होंने फिर से दोहराया. इसके सिवा कुछ नहीं सूझता? मैंने दर्शन पढ़ा. साहित्य की टोह ली. मैंने दीन-ईमान की बातें सुनी. मैं नीति और जातक कथाओं से गुज़रा. मैंने ठोकरों, पनाहों, निगेहबानी और याद से भरे लोगों के दिलों में एक ही बात को पाया. वो बात जहाँ पहुँचती दिखी, वहीँ दिखा कि ज़िंदगी और कुछ हो न हो प्यार भरा सुकून का एक पल तो होनी ही चाहिए. 


[पेंटिंग सिंध के मशहूर वाटरकलर आर्टिस्ट अली अब्बास साहब की है. ]

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एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.