September 12, 2014

गुज़रे हमें छूकर मगर रहे अनुछुआ

दिन
स्याही के परिंदे थे सफ़ेद
और स्याही में खो गए.
* * *

सदियों सा उम्रदराज़
एक बुजुर्ग रखा हुआ है इस काम पर
हर शाम दिन को ले जाये अंगुली थाम कर
हर सुबह लौटाए सलामती के साथ.
* * *

दिन डूबता है ऐसे
जैसे डूबी जाती हो नब्ज़
लौटता है ऐसे जैसे आने लगी हो साँस.
* * *

एक बीता हुआ दिन आता है
किसी नए दिन की तलाश में.
* * *

ज़िंदगी का हर दिन
एक ख़याल है, मिथ है
किस्सा है, नज़्म भी है
गुज़रे हमें छूकर मगर रहे अनुछुआ.
* * *

जो बात आज लिखने लायक नहीं है, यकीनन उसे कल भी नहीं लिखा जाना चाहिए.








  [Painting courtesy : Laurie Justus Pace]

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.