October 29, 2014

तनहा पड़ी, बरबाद हुई चीज़ें

उजड़े घर के पास से गुज़रते हुए एक सिहरन सी होती थी. कोई जादू का घेरा था, कोई सम्मोहक छाया थी, दिल धड़क के रह जाता था. दूर निकल आने पर अक्सर देखा करता था उसे मुड़कर.

कौन फूंकता है मंतर उनके अंदर से
किसकी परछाइयाँ बुलाती रहती हैं.

आह! ये तनहा पड़ी, बरबाद हुई चीज़ें.

* * *

शीशे के पार पानी हो तो चेहरा साफ़ देखा जा सकता है वरना सब फ़ैल जाता है दूर दूर तक

कभी अगर बाद बरसों के
तुम पढो अपने इस लम्हे के बारे में
तो पढ़कर चौंक उठोगे।

इतिहास में दर्ज़ तुम को पढ़कर
संभव है तुम्हारा विश्वास उठ जाये
दुनिया भी लग सकती है ना काबिल ए यक़ीन।

इसलिए कि जो हम कर रहे हैं
उसे ठीक वैसा ही दर्ज़ नहीं कर रहा इतिहास।

जो लोग खेल रहे थे दिलों से
वे बाद सदियों के तवारीख़ के पन्नों में
वे पाए गए मामूली जगलर।

उनके हाथों में जो नाज़ुक चीज़ें थीं
उन्हें देखकर असल में कुछ कमजोर लोगों को
हुआ था धोखा कि वे दिल से खेलते होंगे।

सब जानते हैं
दिल से असल में कोई खेल ही नहीं सकता है
दिल पर किसी का काबू ही नहीं
इसलिए हमारा अपना दिल ही खेलता है हमारे साथ।

दिल से किसी तानाशाह और शैतान ने
कभी नहीं चली कोई चाल
कि उनके कठोर दिल पर
कोमल नाज़ुक दिली रेशों की
रफ़ुगिरी के वाकये बेहिसाब मौजूद हैं।

इतिहास पर शक मत करना
कि इस वक़्त तुम सोच रहे हो मुझे
जबकि इतिहास में लिखा जाएगा
एक बेढब बात कहते हुए मैं सिर्फ तुम्ही को सोच रहा था।

सिर्फ तुम्ही को सोच रहा था
दिल की बात जाने कहाँ से कैसे चली आई बीच में।
* * *

वो हम जिससे मिले थे वो उससे मिलना न था , मुलाकातों के ब्योरे अलग अलग हैं 

कभी हम मिलें अचानक
तब हमारे बीच से गुज़र चुकी हों
इंतज़ार और ख़यालों में बीती अनेक शामें।

हम क्या वैसे ही भर लेंगे एक दूजे को बाँहों में
जैसी कभी कभी चाहना हुआ करती थी
कई बार हमने लिखी अर्ज़ियाँ कि ऐसा हो पाए।

क्या हम खड़े रहेंगे एक निश्चित दूरी पर
जैसे जानते तो हों मगर मरासिम कुछ न हो
एक ज़रा सी दूरी भी न कर पायें तय।

जिन दिनों अपने प्रिय पत्थरों
फूलों, रास्तों, चिड़ियों, टूटते हुए पत्तों से पूछा था
कि अगर ऐसा हुआ तो क्या वैसा होगा।

और कभी अचानक हम मिलें
पाएं कि स्मृति में बड़ा किया था जिन अहसासों को
असल में वे गुज़र चुके वक़्त की स्मृति भर ही रहे।

सोचो ये हादसा कितना बड़ा ठहरे
किसी के जाने के जिस दुःख को हम असहनीय समझते हैं
उसकी जगह हमारे सामने खड़ा हो हमारा ही कोई अजनबी की तरह।

मोहब्बत कुर्बान है सबकुछ तुम्हारे आगे
इसके सिवा कुछ पक्का नहीं तुम्हारे बारे में
कि तुम्हारे बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता।

* * *

दोपहर की धूप भरने लगी है एक ठन्डे उजास से। बेरियाँ लद रही हैं कच्चे हरे बेर से। रेगिस्तान पर उतरने को हैं विलायती परिंदे। विषधर और शोर मचाने वाले छोटे जीवों ने कर ली है तैयारी बिलों में दुबक जाने की। निर्बाध प्रेम के लिए यही बेहतर मौसम है।
* * *

ये  वाटरकलर पेंटिंग सिंध सूबे के मशहूर कलाकार अली अब्बास साहब की है.


October 11, 2014

बेशकीमती चिट्ठी - मलयालम में अनुवाद

ये ठीक बात है कि मैं हिंदी पढ़ना चाहता था. मैंने साहित्य में स्नातक किया. मेरे मन में लेखक होने के प्रति गहरा चाव था. इस सबके बावजूद मैंने कभी लेखन को गंभीरता से नहीं लिया था. मैं अपनी आरामपसंद ज़िंदगी का ही दीवाना रहा. मैंने कम सुविधाओं में अपने मन का पोषण किया. जो मिला वह पढ़ लिया. मजदूरों के साथ रेलियां कीं. छात्रों के साथ हड़तालें की. तेईस बरस की उम्र से रेडियो में नौकरी करने लगा.

नौकरी करते, शराब पीते, खूबसूरत ख्वाब देखते और घर बनाते हुए बीतता गया. 

फिर अचानक लिखना शुरू हुआ. आंधी का कोई बीज था और फूट पड़ा. बूँद में समाया हुआ दरिया था बह निकला. हाथ से फिसल कर वक्त की अँधेरी सतह के नीचे गिरे हुए अक्षर थे, अपने आप उगने लगे.

सब कुछ अचानक, दफ़अतन, सडनली.

नौजवान होने के जो दिन थे, वे शहरों में घूमते, दोस्तों से कवितायेँ सुनते, सिगरेट के धुंए भरे कमरे और छतों पर शामें बिताते, गाँव के स्कूलों के बच्चों से बातें करते और किसानों से उनके अनुभव सुनते हुए बीते थे मगर जो कहानियां लिखीं वे सब नाकाम मोहब्बत की कहानियां निकली.

अक्सर भाग जाता था. चुप्पी की गहरी छायाओं में खो जाता था. शहरों से दूर बिना कुछ बताये. इसलिए कि किसी को कुछ कहने की आदत न थी. लगता था जो बात कहना चाहता हूँ उसका मोल नहीं है. वह बात इसी लम्हे बिखर जायेगी. बाद चुप्पी ही श्रेष्ठ थी. अपनी उदासी, तन्हाई और बेकसी को अपना करते जाना.

कहानियां क्यों इस कदर टूटन से भरी है? उनमें इतनी तन्हाई और कितना सारा वीरान रेगिस्तान बसा है. कैसे कोई अपनी बेदिली को शब्द देता है, ये सब नहीं मालूम.

तीन किताबें बन पड़ीं. दोस्तों ने पढ़ी, वाह वाही की. आलोचकों ने मिठास भरी नज़र रखी. पत्रिकाओं ने प्रेम से प्रकाशित की. सब तरफ बिना किसी कोशिश के कहानियां फैलती गयी. मेरे अपने शहर के लोग, मेरे रेगिस्तान के लोग, मेरे हमजोली, मेरे जानकार सब खुशी भरे अचरज में डूबे. एक छोटे से भी छोटे नाम केसी की पहचान दूर दूर तक.

लोग खूब एफर्ट लेते हैं. मैं कुछ नहीं करता. मुझे मालूम है कुछ भी स्थायी नहीं है, ख़ामोशी के सिवा जो कुछ है एक दिन बचा नहीं रह पाता. नाम के लिए जीने वाले लोग भुला दिए गए. यश का कोई भरोसा नहीं है. कथा कविता की उम्र क्या है कोई नहीं जानता. आज की खुशी आज भर चले ये भी ज़रुरी नहीं. दुःख ज़रूर कुछ दिन टिके रहते हैं मगर आख़िरकार उनका भी नाश हो जाता है.

मैंने किताबों का कुछ नहीं किया. बस शैलेश भाई से पूछा था छापोगे? उन्होंने कहा- पढाओ. मैंने दो कहानियां पढवाई और फिर वे दो किताबें बन गयी. जिस हिंदी को लोग उपेक्षा से देखते हैं उसी हिंदी को शैलेश ने ऐसी पहली किताब दी जिसकी प्री बुकिंग हुई. ये शैलेश भारतवासी का ही आइडिया था. मैं कहता पचास एक किताब बिक जाये तो समझेंगे जिन दोस्तों ने किताब मांगी थी उन्होंने खरीद ली है. मगर दृश्य कुछ और बन गया. पचास दिन में किताब का दूसरा संस्करण आया.

अहा ज़िंदगी, आउटलुक, भास्कर, जागरण, प्रथम प्रवक्ता और जाने कहाँ कहाँ किताबों की चर्चा हुई. सबने कहा- बढ़िया, खूब बढ़िया.

मैं मगर आदतन जैसा था वैसा ही रहा. अपने मन के जीवन को जीता रहा. दफ्तर, घर, महबूब और शराब. जब मौका मिला और दिल हुआ तब लिखता गया. कुछ पुराने ड्राफ्ट थे जिन पर काम करता था. लेकिन पिछले महीने नयी किताब का मन हुआ तो नयी कहानियां लिखनी शुरू की. पहली कहानी का ड्राफ्ट बनाया- परदे के पार चिड़िया. दोस्तों को पसंद आया. अब कुछ और लिख रहा हूँ.

आज एक चिट्ठी मिली. कायदे से उसके मिलने की कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए थी. पिछले बरस जब आउटलुक में कहानी आई तो उसके साथ मेरे पते में स्टेडियम रोड की जगह स्टेशन रोड हो गया और पिन कोड बिल्कुल गलत. छः एक महीने पहले एक चिट्ठी आई थी वह भी घूमती फिरती. आज जो चिट्ठी आई वह ब्यावर पहुँच गयी थी. वहाँ से किसी सज्जन ने इसे बाड़मेर का रास्ता दिखाया.

चिट्ठी बेशकीमती.

मलयालम भाषा के विद्वान और पालघाट में स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य श्री वी डी कृष्णन नंपियार जी ने आउटलुक के सितम्बर 2013 के अंक में छपी मेरी कहानी “प्रेम से बढ़कर” का अनुवाद मलयालम भाषा में किया. ये अनुवाद वीक्षणम पत्रिका के ओणम विशेषांक सितम्बर 2014 में छपा. इस पत्रिका की प्रति मुझे भेज दी गई थी किन्तु चिट्ठी की तरह वह मुझ तक नहीं पहुँच पाई.

किसी अन्य भाषा में अनुवादित होना गर्व की बात है. ये कोई मूल्य चुकाकर करवाया हुआ अनुवाद नहीं है. ये एक विद्वान किन्तु मेरे लिए अपरिचित आदरणीय का कथा को दिया हुआ सम्मान है. जिस व्यक्ति के पास मेरा सही पता और फोन नंबर भी नहीं है. कितने प्रेम से इस कहानी को उन्होंने बरता होगा.

मैं दफ्तर से घर आया तब ये खुशी मेरे गले लगने को थी. दोस्त मुझे कहते हैं- आपको मालूम नहीं है, आने वाले समय में हर भाषा में आपकी रचनाओं का अनुवाद होगा. हर भाषा में आपको प्रेम और गहरे दिल से पढ़ा जायेगा.

इस बात पर मैं हमेशा हंस कर चुप हो जाता रहा. लेकिन आज मेरा जी चाहता है उन दोस्तों की दुआओं का शुक्रिया कहूँ.

October 9, 2014

घने साये दार पेड़ों का पता

जब पागलपन, मोड़ लेती किसी जवाँ नदी की तरह उफान लेता हो तो इसे हर जुबां में कुछ तो कहा जाता ही होगा. असल में मगर देखो तो धूल उड़ती ही जाये और कच्चे रास्ते से गुज़रते रेवड़ की तरह बेचैनी की पूँछ न दिखाई दे. बिना किसी दुःख के ज़िंदगी बोझ सी हो जाये. न ठहरे न गुज़रे. ज़रा हलके उठे-उठे क़दमों के लिए कोई हलकी शराब, ज़रा खुशी के लिए किसी की नरम नाज़ुक अंगुलियां और गहरे सुख के लिए बिना किसी रिश्ते वाले माशूक के साथ कोई गुनाह, कोई दिलकशी, कोई सुकून...

पागलपन में मुझे कल दोपहर से रंगीन पत्थर सूझ रहे हैं. मैं बेहिसाब रंगीन पत्थरों से भर गया हूँ. मेरी कलाइयों में बंधे, मेरे गले में झूलते पत्थर... पत्थर मौसम का पता देते हैं. सर्द दिनों में ठन्डे गर्म दिनों में तपिश भरे. जैसे किसी नाज़ुक बदन की पसीने से भीगी पीठ, नीम बुझे शोलों जैसे होठ. पागलपन असल में तेज़ रफ़्तार तलाश है. खुद में खुद को खोजो कि किसी और में खुद को खोजो.

पागलपन की नदी में दीवानों की नाव, सुख से तैरती...
* * *

ख़ानाबदोशों के घर उनके लोकगीतों में बसे होते हैं। उनके सफ़र की सुराही अनुभव के तरल से भरी होती है। ठहरा हुआ पानी पीने से पहले वे चखकर इंतज़ार करते हैं। प्रेम में पड़ो तो ख़ानाबदोश भी होना।

* * *

अप्रतिम होती है हर मृत्यु सब बुहार ले जाती है। कोई मकसद उसे बना सकता है अविस्मरणीय। जैसे मेरा जाना दुनिया को दे बहाना, तुम्हारी याद का।
* * *

तुमसे बात करते करते छपरे के आँगन में गिर रही चाँद की रौशनी की लकीर चलकर कहीं और पहुँच गयी। बात मगर कुछ हुई नहीं।
* * *

जबकि लौट कर नहीं आते कैसे भी दिन फिर भी कभी कभी बीते दिनों सा सुख आता है. पूरे दिन बरसता रहता है. मैं अपनी जेबों में टटोलता हूँ कि क्या वे दिन ऐसे ही थे. यकीन के लिए पूछता हूँ बार-बार. कहो क्या सचमुच ऐसे ही? कहीं कहीं बची हुई शिनाख्त से उड़कर गुज़रा मौसम लौटता है. एक चिड़िया हवा में गोता लगाती है. उसे किसी कीड़े को पकड़ लेना है. उसका गोता उसकी फितरत और ज़रूरत है. इसलिए हर कोई वही करता है जो उसमें बसा हुआ है. जिसमें होता है प्यार वह प्यार करता जाता है. और लोग भी वही करते हैं जो उनमें होता है. सिलसिला कैसा भी बन ही नहीं पाता. कहीं कोई राह रुक जाती है. कहानी के बेहद छोटे टुकड़े लिखते हुए दो दिन बाद बदन की हरारत और दर्द सब रोक लेता है. मैं आराम के इंतज़ार में बेआराम फिरता रहता हूँ. कोई प्रयास नहीं करता. इसलिए नहीं कि कई बार लगता है सबकुछ तय है. करने से कुछ न होगा.

एक उम्मीद लिखता हूँ कि
सूखे पत्ते घने साये दार पेड़ों का पता होते हैं.
* * *

October 3, 2014

काँटा कोई न कोई




जाने कहाँ खिले थे, ईमान के फूल।

हमारा प्रेम तो बेगैरत था
एक कंधा, एक सहारा और एक प्याला
जहाँ मिला, वहीँ बस गया।

अब इस दिल को क्या कहिये?
* * *

कुछ घर जाए, कुछ पराये रिश्ते पिरोये
कई टुकड़े किये दिन के
तब जाकर कहीं बचे रहे ज़िन्दा हर शाम।

कई सारी चीज़ें खड़ी की शाम के दरम्यान।

वरना

पगला जाते देखकर अवसान
जैसे बिना आरती वाले
सूने मंदिर में उतरता है भय।

बदहवास हो जाते सोचकर
ज़िन्दगी की थैली में सुराख़ है
रोज़ टपक जाता है एक दिन।

इसलिए कई जंजाल बना कर
खुद को बचाया आदमी ने, एक जंजाल से।

मेरे पास कोई ठोस वजह नहीं
ये सब लिखने की
मेरे पास सबकुछ तरल है
ह्रदय, अश्रु, जिज्ञासा, स्मृति
और ड्राई डे के दिन बची हुई दो प्याला व्हिस्की।

और शाम बीत रही है राज़ी ख़ुशी।
* * *

चुभ ही जाता है काँटा कोई न कोई
ज़िन्दगी बे काम कभी नहीं रहती।
* * *
[Painting Courtesy;  Frank Boyle]

दो सूखे पत्ते नम मिट्टी में

एक रोज़ कोई कोंपल खिली जैसे नज़र फेरते ही किसी ने बटुआ पार कर लिया हो। एक रोज़ उससे मिला। फिर उससे ऐसे बिछड़ा जैसे खाली बटुए को किसी ने उदासी ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.