October 3, 2014

काँटा कोई न कोई




जाने कहाँ खिले थे, ईमान के फूल।

हमारा प्रेम तो बेगैरत था
एक कंधा, एक सहारा और एक प्याला
जहाँ मिला, वहीँ बस गया।

अब इस दिल को क्या कहिये?
* * *

कुछ घर जाए, कुछ पराये रिश्ते पिरोये
कई टुकड़े किये दिन के
तब जाकर कहीं बचे रहे ज़िन्दा हर शाम।

कई सारी चीज़ें खड़ी की शाम के दरम्यान।

वरना

पगला जाते देखकर अवसान
जैसे बिना आरती वाले
सूने मंदिर में उतरता है भय।

बदहवास हो जाते सोचकर
ज़िन्दगी की थैली में सुराख़ है
रोज़ टपक जाता है एक दिन।

इसलिए कई जंजाल बना कर
खुद को बचाया आदमी ने, एक जंजाल से।

मेरे पास कोई ठोस वजह नहीं
ये सब लिखने की
मेरे पास सबकुछ तरल है
ह्रदय, अश्रु, जिज्ञासा, स्मृति
और ड्राई डे के दिन बची हुई दो प्याला व्हिस्की।

और शाम बीत रही है राज़ी ख़ुशी।
* * *

चुभ ही जाता है काँटा कोई न कोई
ज़िन्दगी बे काम कभी नहीं रहती।
* * *
[Painting Courtesy;  Frank Boyle]

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.