November 25, 2014

जीवन वितान के कोने खड़े एक आदमी का एकांत

सुबह का आग़ाज़ रात के हेंगऑवर में होता है. कल मालूम हुआ कि मेरा पहला कहानी संग्रह तीसरी बार मुद्रित होने जा रहा है. इसका आवरण बदला गया है. नए रंग रूप में इस किताब का होना मुझे ख़ुशी से भर रहा है. मैंने कहानियां मन के रंजन और दुखो के निस्तारण के लिए लिखीं थी. हिंदी साहित्य इसलिए पढ़ा था कि कभी लेखक बन सकें. लेकिन औपचारिक पढाई पूरी करते ही मेरा लेखक होने के स्वप्न से मन टूट गया. हालाँकि अनेक लेखक मेरे लिए सम्मोहक थे. उनके शब्दों में एक जादू भरी दुनिया दिखती थी. मैंने किताबों के साथ हालाँकि बहुत कम समय बिताया किन्तु मेरे लिए किताबें और तन्हाई दुनिया के दो बड़े सुख रहे हैं.

कहानी संग्रह चौराहे पर सीढियां का बनना सिर्फ और सिर्फ इंटरनेट, ब्लॉग और दोस्तों के कारण संभव हुआ. साल दो हज़ार आठ में कहानियों के मामूली ड्राफ्ट लिखना शुरू किया. अपने बचपन के मित्र संजय व्यास को वे ड्राफ्ट पढवाए. संजय ने तमाम खामियों के बावजूद मेरा उत्साहवर्धन किया. एक दोस्त के ऐसे शब्दों से मुमकिन था कि मैं लिखता गया. वहां से शुरू हुई ये यात्रा आज कुछ सालों के भीतर ऐसे मुकाम तक आ गयी है जहाँ सब मुझे प्रेम और सम्मान से देखते हैं. कभी एक किताब छपना ख़ुशी की बात थी आज वही किताब तीसरी बार छपकर आ रही है. इस बीच दो और किताबें एक कविता संग्रह “बातें बेवजह” और कहानी संग्रह “धूप के आईने में” पब्लिश हुए. इस तरह तीन किताबें पाठकों और दोस्तों के प्यार सम्मान से आसानी से आ सकीं हैं.

मैं एक और कहानी संग्रह पर काम कर रहा हूँ. इसके इस साल के आखिर या नए बरस के पहले में महीने में छपकर आने की आशा है.

आज सुबह मैंने दो कहानियां पढ़ीं. पहली कहानी है- स्मार्ट सिटी विद 32 जीबी. ये कहानी प्रख्यात पत्रकार और रूपक शैली की भाषा वाले कार्यक्रम प्रस्तोता रविश कुमार की है. साल भर पहले कहीं सुना था या पढ़ा था कि किसी बड़े पब्लिशिंग हाउस ने कुछ नए लिखारों से अनुबंध किया है. उनमें रविश कुमार का नाम भी था. ये लोग उपन्यास लिखने के लिए अनुबंधित किये गए थे. मेरी याददाश्त ज़रा कमजोर है इसलिए आप ये भी समझ सकते हैं कि मैंने कोई अफवाह सुनी होगी. बस इतना तय है कि इसे मैंने बुना या चलाया नहीं है. उन दिनों रविश कुमार की एक बेहतर कहानी पढ़ी थी. वह मुकम्मल कहानी शायद न थी. वे कुछ हिस्से थे जो दिल्ली के पराने दिल की इमारतों और नयी पीढ़ी के उससे संबंधों को सुन्दरता से बुन रहे थे. उनकी कटाई छंटाई सलीके से की हुई थी. वे कहानियों के हिस्से सम्मोहक थे. उनमें इस तरह के तत्व थे कि पाठक को अपने पहलू से न उठने दें. उसके बाद मैंने रविश कुमार का लिखा हुआ कुछ पढ़ा नहीं.

आज जो कहानी पढ़ी, ये प्रो प्रभात रंजन की ई पत्रिका जानकीपुल पर छपी है. कहानी का शीर्षक किसी रूपक कथा सरीखा ही है. हम नैनो तकनीक की खूब बात करते हैं. हमें सबकुछ ऐसा चाहिए जो बहुत सारा हो किन्तु कम से कम जगह में समा सके. भौतिकी के लोग जानते होंगे कि जिस तरह आवाज़ एक वस्तु है और उसे कई-कई बार अलग-अलग रूपों में बदल कर अपने वास्तविक आकर में लाया जा सकता है. इसी तरह ये भी संभव होना चाहिये कि व्यक्ति को किसी अन्य स्वरूप में ढाल कर इम्पोर्ट एक्सपोर्ट किया जा सके. यानी आप पेरिस के किसी बूथ में घुसे बिल चुकाया और अपलोड हो गए. दिल्ली के किसी बूथ से आपको डाउनलोड कर लिया गया. क्षणांश में यात्रा पूर्ण हो गयी. रविश कुमार की कहानी या इसे एक कच्चा ड्राफ्ट भर कहा जाये, इसी संभावना की थीम की कहानी है. हिंदी में ऐसी कहानियां नहीं लिखी जाती. हिंदी में लिखा जाता है गाँव और उपेक्षा का दुःख. रविश कुमार इसी कॉकटेल को बनाते हैं. सपने में नैनो तकनीक है हकीकत में एक नाउम्मीद क़स्बा. रविश कुमार गेजेट्स के साथ और उनके मार्फत जीवन जीते हैं. ये उनकी मजबूरी है. सूचनाओं का प्रवाह उनके भीतर इस गति से है कि कोई पगला जाये. ऐसे मैं किसी प्लाट का आरंभिक ड्राफ्ट लिख लेना, बधाई की बात है. नैनो जीवन को लिखते समय एक हड़बड़ी और उपहास है. इन दोनों से बचकर तकनीक का स्वप्न लिखा जाना चाहिए था. हम समझते हैं कि ज्यादातर लेखक लेखिकाओं के पास लिखना एक चुराए हुए समय में किया गया मन का काम है.

रविश कुमार की कहानी के ड्राफ्ट में एक हताश किन्तु लम्पट समय को देखती हुई नौजवान आँखें हैं. किसी दुसरे जुग में अपनी आमद दर्ज़ कराने की उहापोह है. अच्छा हुआ कि इस कहानी को पढ़ा. ये और भी अच्छा होगा कि हिंदी में किताबें न बिकने का रोना रोने वाले युवा लेखक इस थीम को पहचानें और भारत की नयी पीढ़ी के लिए ऐसे फिक्शन लिखें.

दूसरी कहानी है- कार्तिक का पहला फूल. उपासना की ये कहानी जागरण के साहित्य परिशिष्ट में प्रकाशित है. संयोग ऐसा था कि मैंने कहानियां ठीक क्रम में पढ़ी. एक बदहवास और न समझी जा सकने वाली दुनिया की है तो दूसरी कहानी एक शांत ठहरे हुए समय के प्रवाह में स्थिरता से बहते हुए जीवन की. उपासना की कहानी उम्र के सबसे ऊंचे पड़ाव पर सबसे कम ऑक्सीजन वाले जीवन की जिजीविषा की कहानी है. वहां एक पुष्प जीवन का ध्येय और आशा है. इस कहानी में भाषा किसी सुन्दर कालीन की बुनावट जैसी न होकर सुंदर प्रकृति जैसी है. एक सम्मोहक प्राकृतिक सौन्दर्य. उपासना ने कहानी में जीवन वितान के कोने खड़े एक आदमी के एकांत को इतनी सघनता से बुना है कि वह समूचा भीतर उतर आता है.

मैंने पश्चिम के लेखकों को इसी वहज से पढ़ा कि उनके लिखने में कथ्य के साथ कुदरत का अनूठा वर्णन होता था. कहानियों का जीवन अपने आस पास के काँटों-फूलों, वादियों-नदियों, कहवाघरों और शराबखानों को सजीव बुनता है. उपासना की कहानी में इसी तरह की इतनी प्रोपर्टी है कि मैं देख पाता हूँ दृश्य कैसा है. लोक व्यवहार की अनेक सीखें कुदरत के माध्यम से व्यक्त हैं. कहानी खुरदरे वर्तमान को समतल करने के प्रयास का आरोहण है. आस-निरास के झूले पर बंधा अतीत और वर्तमान. इसे पढ़ते हुए बाद दिनों के सुबह में अपनी प्रिय भाषा का आगमन होता है.


[Painting Image Courtesy : Valerio Libralato]

छीजने की आहट

मन एक तमाशा है  जो अपने प्रिय जादूगर का इंतज़ार करता है। शाम से बालकनी में बैठे हुए सुनाई पड़ता है। तुम कितने कोमल हो सकते हो? खुद से पूछने पर...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.