May 28, 2015

उम्मीद की केंचुलियाँ

रातों को कभी नीरवता और कभी आंधियों का शोर. एक के बाद एक हवा के झौंके. भूल से या जानबूझकर खुली खिड़कियों के पल्ले टकराते हुए. अचानक कोई शीशा चटककर खन्न की आवाज़ से बिखर जाता है. इस चटक से जन्मे एक उदास लम्हे को हवा की अगली लहर उड़ा ले जाती है. रात आहिस्ता सरकती है. हवा मिट्टी से भरे थपेड़े लिए हर शै से पूछती है- भाग चलोगे मेरे साथ? कि इस शहर में अब कुछ नहीं बचा.

करवटें टूट कर नहीं गिरती. काँटों या पत्थरों की तीखी धार से रगड़ कर सांप जैसे अपनी केंचुली उतारता है ठीक वैसे ही बिस्तर से बार-बार रगड़ कर करवटों को विदा कहना होता है.

तुम मर गए क्या?

नींद जब दोपहर बाद चटकती है तो लगता है, जिस बदन के शीशे में ज़िन्दगी का आसव भरा था वह खाली हो चुका है. खाली शीशा लुढ़क रहा है. लुढकता भी कहाँ है? बस एक करवट पड़े हुए लुढकने का ख्वाब देखता है.

असल में हम एक दूजे से नहीं बिछड़े, हम उम्मीद से बिछड़ गए हैं.

आओ उदासी से भरा कोई डूबा-डूबा गहरा लोकगीत गायें. ऐसा गीत जिसमें इंतजार की शाखों पर आस के फूल न हों.

कि पतझड़ आने पर पत्ते टूटते थे शाखों से
कि शाखों से पत्तों के टूटने पर पतझड़ आता था।

कुछ कहो जाना।
* * *

कि कुछ लिख भेजूं।
लेकिन कोई हरारत पसर जाती है।
टूटे बदन से बंधी अंगुलियां नाकाम पड़ी रहती है।
छोटी झपकियों में बेमुराद ख़्वाब बनकर बिखरते रहते हैं।

हर एक दिन असल में सरल रेखा नहीं है।
* * *

कितनी ही करवटें
घर में फाहों सी उड़ती हुई।
बालकनी से दीखता है एक रास्ता
तुम्हारी आमद के इंतज़ार में जगा-जगा।
* * *

वक़्त 

सिर्फ बहती-उड़ती शै नहीं है।
वह एक ठहरी हुई बारिश भी है।
जहाँ शब्द और विन्यास गुम है।
सिर्फ एक भारीपन
कि आप देखते हैं गुज़र कर भी कुछ नहीं गुज़र रहा।

तुम कहाँ जा रहे हो?
ये पूछकर ठहर गयी आँख भी वक़्त ही है।

* * *

पोस्ट के साथ लगी ये तस्वीर प्यारे ब्लॉग कबाड़खाना से ली है.

वेलेरी हादीदा के शिल्प
समकालीन फ्रेंच पेंटर और वास्तुशिल्पी वेलेरी हादीदा अधिकतर कांसे और मिट्टी के माध्यमों पर काम करती हैं. आज उनकी कुछ अनूठी वास्तुशिल्पीय कृतियाँ देखिये जिन्हें ‘लिटल वूमेन’ सीरीज का नाम दिया गया गई. आलोचक इस सीरीज के बारे में कहते हैं: “यह एक काव्यात्मक भिड़ंत है जो हमें स्त्रियों द्वारा पार किये गए उन तमाम रास्तों की बाबत बताती है जो उन्होंने युवावस्था से प्रौढ़ होने तक पार किये होते हैं और उन तमाम संवेदनाओं और मूड्स की बाबत भी जो स्त्रियों की इन पीढ़ियों के जीवन का संबल हैं.”

May 11, 2015

कॉलर पर टँगा सफ़ेद ईयरफोन

फोन में लगे होने की जगह ईयरफोन का 3.5एमएम का जैक उसके मुंह में था। और नज़रें कहीं दूर क्षितिज में अटकी हुई थी।

हालाँकि उसे मालूम था कि जीवन का अप्रत्याशित होना अच्छा है।
***

उसे उन दोनों के सस्ते और अमौलिक ड्रामों के बारे में कुछ मालूम न था। उसे ये जानना न था कि वे दो और उनकी मण्डली मिलकर कैसा रूठने-मनाने, जीने और मर जाने का सजीव प्रसंग खेलते हैं। उन दो के बीच निष्पादित रसों का स्थायी भाव प्रेम, मित्रता या मसखरी या कुछ और था ये जानना भी उसकी रूचि न था।

मगर अचानक कभी-कभी उसका जी चाहता कि अपने फोन की प्ले लिस्ट को सर्फ करे। अपने गले के पास कॉलर से लटके ईयरफोन को छुए।
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हाँ ठीक है। अच्छा। ओके। कब। ओह। ऐसा क्यों। हूँ। हाँ-हाँ। इसी तरह की बातें करते हुए उसकी अंगुलियां ईयरफोन के सफ़ेद लंबे तार से खेल रही थी। आखिर में उसने कहा- हाँ लव यू टू।

फोन कटने के ज़रा देर बाद उसने देखा कि ईयरफोन के तार में अनगिनत गांठे पड़ चुकी थी। मौसम में गरमी बहुत ज्यादा थी और तन्हाई पहले जितनी लौट आई।
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एक रोज़ बच्चे ने पूछा- क्या थोड़ी देर के लिए आपका ईयरफोन मिल सकता है। उसने थोड़ी देर सोचा और ईयरफोन बच्चे को दे दिया।

बाद में उसने बहुत देर सोचा कि ईयरफोन देने से पहले थोड़ी देर क्यों लगायी थी। थोड़ी देर उसने क्या सोचा था?
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जब उससे बात होती तब ईयरफोन का लेफ्ट पीस कान में लगा होता। ताकि बात करते समय दुनिया की आवाज़ें भी ख़याल में रखी रहें और कोई अनहोनी न हो। असल में उसकी चाहना थी कि दोनों कानों में ईयरपीस लगाकर मोहोब्बत को संगीत की तरह सुन सके।
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उसके गले में एक लम्बे सफ़ेद तार वाला ईयरफोन लटका रहता था। संगीत उसके लिए सम्मोहन और उद्दीपन का सहारा न रहा था और फोन किसी का आता न था। एक बेख़याल इंतज़ार की तरह, वह ईयरफोन उसके साथ था।

बिना किसी ठोस वजह के ईयरफोन था, ज़िन्दगी भी थी।
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पहले मेहदी फिर जगजीत और उसके बाद नुसरत की आवाज़ बजती थी। कुछ साल बाद न म्यूजिक प्लेयर ऑन होता न कानों में ईयर फोन। मगर वे आर्टिस्ट उसके भीतर गाते रहते थे। हर सुर, आलाप, गिरह और तान सबकुछ नियम से सुनाई देता। ज़रूरी ख़ामोशियाँ भी सही जगह लगती थी।

प्यार होने पर बहुत सी चीज़ें न होकर भी होती रहती हैं।

May 5, 2015

ओ मुसाफिर ! ये बस पीले और टूटे पत्ते भर हैं

हसरतों के पत्ते पीले होकर गिरते रहते हैं। मुसाफ़िर रफ़ू की हुई झोली में सकेरता जाता है। सफ़ेद फूलों वाला कम उम्र दरख़्त कहता है- मेरे कोरे पीले और टूटे पत्ते ही तुम्हारे हिस्से में आते हैं। तुम ऊब नहीं जाते। क्या तुमको थकान नहीं होती।

मुसाफ़िर मुस्कुराता है।

जाना तुम्हारी छाँव के साथ प्रेम बरसता है। ज़िन्दगी की तल्खी में नरमाई उतरती है। इसमें डूबे हुए कभी लगता नहीं कि पीले पत्ते सकेर रहा हूँ। लगता है, तुम थोड़ा-थोड़ा मेरे हिस्से में आ रहे हो।

शाम गुज़र गयी। कोई तन्हाई आई। कोई खालीपन उतरा। कोई आवाज़ दूर हुई। इसे भरने के लिए यादों का कारवां चला आया। उड़ता-गरजता और सब तरफ से घेरता हुआ। कोई याद का चश्मा नुमाया हुआ। हल्के छींटे बरस-बरस कर बिखरते गए। भीगा लिबास ज़िन्दगी का। याद होने की, जीने की, रूमान की।

जाना, कहो तो। हम जैसे हैं क्या हम पहले से बने हुए थे या हम ख़ुद बने। बोलो, कुछ उसी तरह जैसे भरी-भरी आँखें जवां दोपहर को कह रही थी- ये सुख है। आत्मा खुश है। दुनिया से कह दो- आगे जाता हुआ पहिया ज़रा देर रोक लो।

दूसरी ओर आमीन, आमीन। 

May 2, 2015

न ऊब न प्रतीक्षा


शब्द अपने अर्थ के साथ सम्मुख रखे हुए किस काम के, जब तक वे स्वयं उद् घाटित होकर भीतर प्रवेश करने को आमंत्रित न करते हों।


April 29

जाना, आग के फूल न बरसते, बारिशों के फाहे गिरते तो रेगिस्तान क्या रेगिस्तान होता।

उदास ही सही, ज़िन्दगी सुन्दर चीज़ है।


क्या तुम्हारे पास कोई ऐसी कहानी है।

ज़िंदा शहतूत के तने में नुकीले दांतों वाले मकोड़ों ने घर बना लिया हो। लाल चींटियों ने चाक कर दिए हों पत्ते। बकरियां दो पंजों पर खड़ी होकर जितना चर सकती थीं चर गयी हों। बच्चों ने टहनियों की लचक की सीमा से आगे जाकर तोड़ दिया हो। पेड़ के मालिक ने काले-लाल और कच्चे हरे शहतूत, कुछ तोड़ लिए कुछ मसल दिए। और वो जो शहतूत का कीड़ा होता है उसकी भी कोई बात शामिल हो।


April 28

तुम एक पिरोये हुए फूल हो। दिल बेवकूफ़, अपने ठिकाने पड़े रहो।

अतीत की जाली छनकर गिरने नहीं देती, फटकती रहती है भविष्य की ओर उछाल-उछाल कर।

अचानक किसी दोपहर हम खुद को पाएं खाली पड़े हुए पुराने प्याले की तरह। नमी, नाज़ुकी, ज़िन्दगी जैसा कुछ न बचा हो। बस हम पड़े हों बिना हरकत, बिना जान के।

तो....


अभी-अभी एक सूखा पत्ता गली से दौड़ता हुआ गुज़रा। आखिरी छोर पर दीवार के पास कोने में बैठे खालीपन ने उसे अपने करीब खींचकर छुपा लिया।

आओ मोहोब्बत करें। शायद यही कहा होगा।


काश मैं लिख पाता कि रेगिस्तान में कहीं किसी घर की छत पर बैठा हुआ एक आदमी कैसा दिखता है। ताज़ा बोसों के दो हल्के निशान और उसकी आत्मा पर पड़ी हुई अतीत के अनगिनत बोसों की मोहरें कैसी दिखती है। क्या उसके पास बची है किसी रूमान की दिलफ़रेब याद।

काश लिख सकूँ कि खर्च होते-होते कितना बचा है वह आदमी। जो रेगिस्तान में कहीं किसी छत पर बैठा है।


April 26

हर रंग की शाम एक दिन बिखर पड़ेगी तुम्हारे आस-पास। ख़ुशी या तकलीफ से भरी। प्रेम या इंतज़ार से भीगी। गहरे अफ़सोस या बेहिसाब सुकून से भरी।

जो नहीं हुआ, वह होगा।

आज शाम को डूबते हुए सूरज को देखा। ये भी एक अरसे से बाक़ी था।

धूप के शबाब में स्टेशन रोड पर उल्फ़त की दुकाँ के आगे एक ट्रॉली भरी पड़ी है शर्तिया दवा से। दवा बेचते उदास सांवले लड़के के चेहरे पर लिखा है नाउम्मीद इंतज़ार। एक रॉयल एनफील्ड मेरे आगे चलती हुई। नौजवान लड़का धूप का चश्मा चढ़ाये अपने मेरुदण्ड पर तना हुआ। मारवाड़ी पोशाक में गहरे रंग के घाघरे पर लहरिया ओढ़े मोटर सायकिल पर पीछे बैठी औरत की गोद में तोलिये में लिपटा हुआ रेगिस्तान का एक नन्हा बाशिंदा। एनफील्ड की कर्णप्रिय राजसी आवाज़ और सायलेंसर से आते हवा के स्ट्रोक्स मेरे हेलमेट को छूकर बिखरते हुए। मन फिर से स्टेशन रोड का फेरा देता हुआ अचानक जेल के पास से आकाशवाणी की तरफ मुड़ जाता है। नीम के नीचे रुकते ही सोचता हूँ कहाँ आये हो केसी और फिर कहाँ जाओगे।

ज़िन्दगी सा सूदखोर कोई नहीं।

बंद बात की ख़ुशबू सबसे अधिक मादक होती है।

आओ चुपचाप।


उदासी कि शाम, जाने कौन किसके कांधे पर सर टिकाये था।


दूर होने से क्या हो जाता है दूर, पास होकर भी सब कहाँ कुछ पास होता है?

आज तुम जहाँ हो उम्र भर वहीँ रहोगे।

April 25

गमले में पसरी उदासी के बीच कोई हरापन झांकने लगता है। उसे देखकर गमले के धूसर रंग में हरे रंग की झाईं खिलने लगती है। कुछ रोज़ में धूसर और हरा रंग आपस में मिलकर एक नया रंग हो जाते हैं। और आदतन पौधे के याद आता है कि वह आकाश की ओर बढ़ने के लिए दुनिया में आया है। गमला कहता है तुम इतने ही ठीक हो। तुम और बढे तो मैं टूट जाऊँगा। एक आज़ादी का सवाल एक ज़िन्दगी के सवाल पर भारी हो जाता है। कुछ रोज़ की लड़ाई के बाद गमला उस खूबसूरत पौधे को आज़ाद ज़मीन में रख देता है। ऐसे ही सालों बाद जब हवा पानी ठीक होते गमले में कोई नया रंग खिल जाता। हरियल पौधे आज़ाद आकाश की ओर बढ़ते जाते।

सबकी अपनी चाहनाएं, सबकी अपनी नियति।

जिन घुंघरुओं के अंदर बीज नहीं होता। उनको खनकने के लिए दीवारों से सर फोड़ना पड़ता है।


जो कभी टूटा न हो, वो प्यार नहीं है। वो दो तरफा ऋण है जिसकी किश्तें बराबर चुकाई जा रही हैं।


वह न ऊब में है न किसी प्रतीक्षा में। न ही वह ध्यान के आनंद में है। वह बस जिस तरह बनी उसी तरह ठहरी हुई है। इस ठहराव पर गिरी किसी नज़र की छुअन। मद्धम, विलम्बित अथवा द्रुत। लरज़िश। कोई अनगढ़-सुघड़ आवृति। टंकार का सुरीला गान। और फिर ख़ामोशी। ताकि सेंसेज़ को जगा कर जो अभी गुज़रा उसे पढ़ा जा सके। वह एक सुर था, जो ठहराव के भीतर जगा। जिसने ठहराव के छद्म को तोड़ा। जिसने विस्मय से भर दिया किसी धातु को किसी जीवन को।

वही प्रेम है।

जैसे हवा ने किसी को छुआ। जैसे मैंने फेरी तुम्हारी तस्वीर के रंगों पर अपनी अंगुलियां।


सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.