September 20, 2015

ढब सब उलटे पड़े हो जहां

इंतज़ार की कोई मियाद नहीं होती.

तपते हुए दिन और रेगिस्तान पर कुछ एक हरे टप्पे से दीखते खेत पीले पड़ते जा रहे थे. कोई राह में मिलता तो कहता इस बार जमाना ख़राब. फसलें कहीं कहीं दिख रही हैं बाकि सब जगह सुनसान. वो सप्ताह भर जो पानी बरसा था जाने किस काम लगा. भीगे दिन भीगी रातें और धूप का इंतज़ार. कुछ एक दिन बाद बरसातें इस तरह गुम हुई कि गोया रेगिस्तान सदियों से सूखा ही था. कल शाम अचानक से हवा चली और ज़रा देर बाद शहर को भिगो गयी. एक बारिश सब कुछ बदल देती है. रात अँधेरी, छपरे पर गिरती पानी की बूंदों की आवाज़. कुछ एक मुरझाई हुई ककड़ी कि फांकें. उनका फीका स्वाद. और एक पुरानी व्हिस्की से भरा प्याला. कितना तो इंतज़ार था और कैसे अचानक खत्म हो गया. उसकी इतनी ही उम्र थी. रात भर बिजली गुल. हवा बंद. आसमान से छींटे. पलंग पर से भारी गद्दों को उठाकर बाहर बालकनी में डालकर लेटे हुए, भूले भटके आते हवा के झोंकों को शुक्रिया कहते हुए रात बीत गयी. 

असल नींद उस वक़्त आई जो शैतानों के सोने का समय होता है. 

स्मार्ट फोन में बेटरी के सिवा हर बात में स्मार्टनेस है. वह तुरंत दुनियावी षड्यंत्रों, जालसाजियों, धोखों, उदासियों को घेरकर लाता है और पेश कर देता है. सूचनाएं अनिर्वचनीय हैं. वे अपने असर को लीप कर जाती हैं. वे अतीत की कुदाल है तो भविष्य की आधुनिक मशीनें हैं. पल भर में आपके सुख को खोदकर रख देती हैं. कितने जतन से दिन को किसी खाली जगह में सरकाया था, कितने श्रम से शाम कमाई थी, सब बेकार. शिकवे, शिकवे और शिकवे. पेड़ अँधेरे में हिलता है. हेजिंग के नीचे कोई सरसराहट जागती है. सीढियों के पास कोई साया लहराता है.

सुबह जब आँख खुलती है तो बिजली फिर गुल. सेलफोन अपनी निद्रा में. ०.

ऑफिस चले जाओ. वहां बिजली मिलेगी. अचानक दुष्यंत कहता है पापा कोई आपसे मिलने आये. जोधपुर विश्व विद्यालय में पढने के दिनों के साथी. त्रिलोक सर. गले मिलते हैं. मैं अपनी पीठ को ज़रा सावचेत करता हूँ. और फिर हम दोपहर भर उन दिनों की, उन दिनों के लोगों की, उन दिनों के चिंतारहित जीवन की बातें करते हैं. सर बास्केटबाल की टीम लेकर आये हैं. राज्यभर से सत्रह और उन्नीस साल समूह की बालिकाएं खेलने आई हैं. मैं बंद पड़े फोन को देखता हूँ. त्रिलोक सर अपने चालू फोन को देखते हैं. साढ़े तीन बजे उनकी टीम का मैच है. चाहना के कितने रंग होते हैं. मैं अपने फोन को चालू देखना चाहता हूँ. त्रिलोक सर फोन को अवॉयड करते जाते हैं. 

दोपहर बाद एक दौड़ से दफ़्तर जाता हूँ. फोन चल पड़े मगर वहां होना क्या होता है. चुप दफ़्तर का काम करने लगता हूँ. अवकाश के दिनों में दफ़्तर का सूनापन रूमानी होता है. कोई दुआ सलाम नहीं. खिडकियों के रास्ते आता परिंदों का शोर. सड़क से गुज़रते वाहनों की आवाजें. मैं उठकर लम्बे गलियारे को पार करके बाहर आ जाता हूँ. खाली खाली मन कहता है चलो शाम छत पर गुज़ारो. एक ज़रा सुकून और एक छोटी बेख़याली में दुशु की आवाज़ आती है. पापा कोई मिलने आये. मैं देखता हूँ महेश कुमार गुप्ता खड़े हैं. कहते हैं, मैं कई दिनों से सोचता रहा कि आपसे मिल आऊँ. किसी हड़बड़ी में कहीं कुछ मिस होता रहा, आज पक्का था कि आपसे ज़रूर मिलना है. 

मैं शाम की तीसरी चाय बनाता हूँ. चाय बनाते हुए सोचता हूँ कि इस दिन का कोई ढब है? 

September 7, 2015

स्थायी दुःख से कैसलिंग


काश बहुत से हैं जैसे गिरहें जब पैर में उलझी तब गिर पड़ने की सीख को पहले उठाया होता और ख़ुद बाद में उठता. आज ढलती हुई शाम में रेल पटरी पर बने पुल से गुज़रते हुए सोच रहा था कि पुल के उपर से देखने पर नीचे का दृश्य ज्यादा समझ आता है. इसी तरह जीवन बिसात को देखा समझा होता. बीते दिनों के किसी अफ़सोस की दस्तक के साथ फिर एक काश आता है. काश उन दिनों कुछ सोचा जा सकता परिस्थिति से थोडा ऊपर उठकर.

एक गिर पड़ने का ख़याल और एक ज़रा उपर से गिरहों को देखने की समझ. थोडा सा फासला कितना कुछ बदल देता है. सुख के भेष में दुखों को आमंत्रण पत्र लिखते समय सोचा होता कि रेगिस्तान के तनहा पेड़ सूखे के स्वागत में कुछ ज्यादा रूखे और ज्यादा कंटीले हो जाते हैं तो हमने ख़ुद के लिए क्या तैयारी की है?

मगर कुछ नहीं होता. 
बेख़याली में समय की ढलान पर फिसलते हुए दिन रात, बरस के बरस लील लेते हैं. इस छीजत में उदास काले धब्बे, अनामंत्रित खरोंचें, अनगढ़ सूरत बची रह जाती है. दुःख आता है कि बीते वक़्त रिश्तों, सम्मोहनों और कामनाओं के प्रवाह में किनारा देखा होता. खो देने के भय में लुढकते खोखले ढोल से बाहर आ गए होते. सोचा होता जिस तरह पुराने दुःख बुझी हुई भट्टी की तरह ठन्डे पड़ गए हैं आगामी दुःख भी अस्त हो जायेंगे. एक ख़ामोशी की दीवार चुनी होती. एक पत्थर का पर्दा बनाया होता. एक बार खुद से कहा होता, नहीं. कहा होता जाने दो. कहा होता कि जाने देना ही सुख है.

शतरंज के खेल में राजा और हाथी के बीच, जगह की अदला-बदली वाली कैसलिंग की सुविधा की तरह काश एक पुराना दुःख नए दुखों के सामने खड़ा कर दिया होता. काश एक स्थायी दुःख के मोल को समझा जा सकता. काश किसी स्थायी दुःख से कैसलिंग कर ली होती.

September 6, 2015

नासमझी के टूटे धागों में


कुछ काम अरसे से बाकी पड़े रहते हैं. उनके होने की सूरत नहीं बनती. कई बार अनमने कदम रुकते हैं और फिर किसी दूजी राह मुड़ जाते हैं. फिर अचानक किसी दिन पल भर में सबकुछ इस तरह सध जाता है कि विश्वास नहीं होता. क्या ये कोई नियति है. घटित-अघटित, इच्छित-फलित भी किसी तरह कहीं बंधे है? क्या जीवन के अंत और उसके प्रवाह के बारे में कुछ तय है? मैं अक्सर पेश चीज़ों और हादसों और खुशियों के बारे में सोचने लगता हूँ. अब क्यों? अचानक किसलिए? और वह क्या था जो अब तक बीतता रहा. मुझे इन सवालों के जवाब नहीं सूझते. एक चींटी या मकड़ी की कहानी कई बार सुनी. बार-बार सुनी. निरंतर असफल होने के बाद नौवीं या कोई इसी तरह की गिनती के पायदान पर सफलता मिली. मैं यहाँ आकर फिर से उलझ जाता हूँ. कि पहले के जो प्रयास असफल रहे वे असफल क्यों थे और एक प्रयास क्यों सफल हुआ.

हम कब तक जी रहे हैं और हम कब न होंगे. आदेश श्रीवास्तव. अलविदा. गीता का संदेश इसी नासमझी का सन्देश है कि कर्म किये जा और फल की इच्छा मत कर. 
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हाथों में आ गया जो कल रुमाल आपका

मेरा पेशा ही इतना मीठा है कि कभी खुद पर रश्क़ होने लगता है. रेडियो स्टेशन के ठन्डे सीले स्टूडियोज में कहीं बैठे हुए फिल्म संगीत सुनते सुनाते जाना से बेहतर क्या हो सकता है. रात ग्यारह बजे के आस पास जब ट्रांसमिशन के पूरे होने में कुछ मिनट भर बचे हों, उस वक़्त पाकीज़ा फिल्म से गीत प्ले हो रहा हो चलते चलते यूँ ही कोई.. और फिर रेल इंजन की विशल से फिल्म संगीत सम्पन्न हो रहा हो. या लग जा गले के फिर ये हंसी रात हों न हो गीत पूरा होने से पहले उसके आखिरी में ऐ ऐ ऐ सुनते हुए समाचारों से पहले की बीप बजने लगे. ऐसे जादुई मौसमों में संगीत और संगीत की दुनिया के लोगों के नाम बोलते हुए, साजों पर उनकी कलाकारी सुनते हुए, गीतों के बोलों को गिरहों में पिरोते हुए सुनना. कितना बेशकीमती है, मैं कभी कह नहीं पाऊंगा.

ऐसे ही पहली बार जब आदेश श्रीवास्तव का नाम बोला था वह गीत था, हाथों में आ गया जो कल रुमाल आपका. आज सचमुच आदेश का ख़याल मुझे बेचैन कर गया है. परसों ही मैंने आदेश के स्वास्थ्य के बारे में समाचार सुना था. उसे सुनते हुए मुझे वह शानदार व्यक्तित्व का धनी याद आया जो एक ड्रमर था. कहीं किसी टीवी शो के बारे में मालूम हुआ कि आज आदेश उसके गेस्ट हैं. मैंने उसे देखने के लिए समय निकला. वे आये और आते ही उन्होंने ड्रम को चुना. शायद कुछ प्रेम कभी बिसराए नहीं जा सकते. संगीत रचनाकार के मन का प्यारा साज़ हमेशा उसे अपने पास खींच लेता है. मैं ड्रम बजने वालों को बड़े सम्मोहन से देखता आया हूँ. शायद इसलिए कि स्कूल कॉलेज के दिनों में ड्रम बजाने वाले लड़कों से सब लड़के लड़कियां खूब प्यार करते थे. लेकिन मैं संगीत का अ आ कभी न सीख पाया. स्वप्नजीवी होने का यही एक दुःख है.

मैंने शाम के ट्रांसमिशन ही किये हैं. मुझे सवेरे जागने और पांच बजे स्टूडियो पहुँचने में रूचि नहीं रही. दोपहर आलस भरी होती थी. इसलिए मैं हमेशा चाहता था कि शाम की ड्यूटी लग जाये. और फिर उदघोषणा करते जाना. फिल्म संगीत के ईपी और एलपी छांटना. शाम की सभा के फिल्म संगीत में चलत के गाने बजाने में बड़ा सुख होता है. मेरा रेडियों में आना उन्हीं दिनों हुआ था जब आदेश श्रीवास्तव संगीतकार बनकर आये थे. और मैंने लगभग तब तक लगातार उदघोषणाएं की जब उनके आखिरी दौर की फिल्म आई होगी. कुछ बरस पहले दीवार फिल्म का गीत चलिए वे चलिए.. मुझे इस तरह अपने सम्मोहन में बांध चुका था कि फिल्म संगीत चुनते हुए हर दूसरे तीसरे दिन में उसे प्ले कर देता था. आदेश की बीट्स के साथ मेरा चेहरा अक्सर ख़ुशी से भरा हुआ हिलता रहता था. स्टूडियो के उस तरफ बैठा कोई इंजिनियर साथी जब मुझे इस तरह मुस्कुराते हुए खुश देखता तो वह भी प्रसन्न हो जाता था. ये आदेश श्रीवास्तव का जादू है जो देश और देश के बाहर और जाने कहा-कहाँ कितने लोगों को स्पंदित करता है और करता रहेगा.

इस बीच राजनीति फिल्म में आदेश का संगीत आया,. कहाँ वे रुमाल और सोणा सोणा जैसे गीत और कहाँ मोरा पिया मोसे बोलत... ये ही जीवन सफ़र है और यही सीखना है. आदेश का संगीत भी एक गहराई में अपना घर कर चुका था. अनुभूतियों से जब थोथी चीज़ें उड़ने लगती हैं, उसी समय जीवन बीज अपने सबसे लघुतम और सर्वाधिक उपयोगी रूप में हमारे सामने आता है. एक ड्रमर संगीत के अपने सफ़र में कैसी अद्भुत मिठास तक पहुँचता है यही कहानी आदेश श्रीवास्तव की याद है.

आदेश श्रीवास्तव, आप मेरे लिए स्पन्दन हैं और हमेशा रहेंगे. यकीनन मोरा पिया मैं कभी प्ले न करना चाहूँगा... आखिर रोने का भीगा गीला सीला मौसम कौन जान बूझकर अपनी झोली में भरे. लव यू.

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.