December 21, 2015

उस रोज़ आप ये भी जान लेते हैं

सर्द दिन की दोपहर में किसी की सलाइयाँ छूट गयी, जीने पर. रिश्तों जैसे जो धागे थे, वे उलझे होते तो सुलझाने के जतन में बिता देते नर्म सुबहें और ठंडी शामें मगर बदनसीबी ये कि वे धागे लगभग टूट चुके हैं. सलाइयों को देखता हूँ तो ख़याल आता है कि आँखें ऊन के गोले हुई होती तो उनमें सलाइयाँ पिरो कर रख देता किसी आले में. 


रात के बाजूबन्द से
झरती है, ठण्डी हवा।
* * *

सर्द आह थी किसी की
या मौसम का झौंका छूकर गुज़रा था।
* * *

वे सब जो
विपरीत होने का बोध थे,
असल में एक ही चीज़ थे.
* * *

भ्रम
प्रेम का सबसे बड़ा सहारा है.
* * *

अक्सर कोई कहता है
तुम उसे छोड़ क्यों नहीं देते
अक्सर दिल मुस्कुराकर बढ़ जाता है आगे.

जाने क्या बदा है?
* * *

उम्मीद से अच्छा
और उम्मीद से अधिक मारक कुछ नहीं है.
* * *

फूलों के चेहरे से स्याही बुहारती,
भीगी हरी घास पर रोशनी छिड़कती, ओ सुबह!
आ तुझे बाहों में भर लूँ।
* * *

इस बियाबां के दरवाज़े हैं
और सब बंद है. यहाँ कौन आता है?
* * *

उदास किवाड़ों पर
बेचैन मौसमों की दस्तकों में
दिल के एक कोने में
जलता हुआ किसी धुन का अलाव.

और सोचें उसे, जबकि वो, अब वो नहीं है.
* * *

आँखों में कुछ फूल उकेरे हुए दीखते थे
जो असल में थे नहीं
लफ़्ज़ों में कहानियां कही हुई मालूम होती थी
जो असल में थी नहीं.
जैसे पंद्रह दिन में किसी रोज़ चाँद दिखता है
आधे से ज़रा सा ज्यादा मगर वो होता तो उतना ही है
जितना कभी था.

इसी तरह झूठ अपने ऊपर लगा लेता है
हंसी, उदासी और शिकवों का वर्क
आधे से थोड़ा सा ज्यादा थोड़ा कम मगर
असल में होता वह झूठ ही है.

दोपहरों के इंतज़ार में अक्सर सच साफ़ दिखाई देता है और रातों की स्याही में उम्मीदें ज्यादा अच्छी लगती हैं. बशर्ते आप ख़ुद को रोने से रोक लें और सोच सकें कल के बारे में.
* * *

जिस रोज़ आप जान लेते हैं कि कोई साध रहा है एक साथ दो तीन रिश्ते. उस रोज़ आप ये बात भी जान लेते हैं कि आप एक कटते हुए पेड़ के नीचे खड़े हैं. मगर आप वहां से हटने की जगह ये सोचते रहते हैं कि किस तरफ गिरेगा.
* * *

December 2, 2015

कितनी तहें हैं, और रंग कितने हैं

दिसम्बर का महीना आरम्भ हो गया है. हल्की ठंड है मगर सर्द दिन ही हैं. सुबह धूप में बैठे हुए मुझे पुलिस दरोगा ओचुमेलोव की याद आई. और उसके साथ एक ग्रे हाउंड किस्म का मरियल कुत्ता और सुनार खुकिन याद आया. चेखव की कहानी 'गिरगिट' हमें बचपन में पढ़ाई गयी थी. शिक्षा विभाग ने सोचा होगा कि ऐसी कहानियां पढ़कर बच्चे सीख लेंगे. लेकिन बच्चों ने इस कहानी को पढ़ते और समझते हुए क्या सीखा मुझे नहीं मालूम मगर मैंने जो सीखा वह साफ़ सुथरा था. 

एक- मनुष्य के स्वभाव एवं व्यवहार की जानकारी लेना
दो- कथा की विषयवस्तु को अपने अनुभवों से जोड़ना
तीन- नवीन शब्दों के अर्थ जानना और अपने शब्द भंडार में वृद्धि करना
चार- नैतिक मूल्यों में वृद्धि करना

इनके सिवा जो कुछ और बातें कहानी के बारे में बनायीं जा सकती थीं, वे छात्र को आधा अतिरिक्त अंक दिलवा सकती थी. इसमें आगे हमारे अध्यापक कहते थे कि इस तरह की कहानियां पढने से कथा कौशल में वृद्धि होती है. 

कहानी आपने पढ़ी होंगी. इस कहानी में एक कुत्ता व्यक्ति की अंगुली काट लेता है. कुत्ते की पकड़ के हंगामे के दौरान सख्त और क़ानून की हिफाज़त के लिए प्रतिबद्ध दरोगा ओचुमेलोव अपने सिपाही साथी के साथ वहां पहुँचता है. सुनार अपनी अंगुली काटे जाने का हर्जाना मांगता है. दरोगा कहता है कि वह ऐसे आवारा कुत्तों से मनुष्यों को होने वाली हानि बर्दाश्त नहीं करेगा. भीड़ से अचानक आवाज़ आती है कि ये कुत्ता तो जनरल जिगालोव का है. इसके बाद दरोगा को बारी-बारी से ठण्ड और गर्मी लगती है. वह अपना कोट उतारता और पहनता है. अंततः ये मालूम होता है कि कुत्ता जनरल के भाई का है और वे इन दिनों यहाँ आये हुए हैं. दरोगा कहता है- अरे मुझे बताया ही नहीं गया कि वे यहाँ आये हुए हैं. कब तक रुकेंगे?” 

इसके बाद सुनार को एक उपद्रवी बताकर धमका कर दफ़ा कर दिया जाता है. कुत्ते को अपनी गोदी में उठाकर दरोगा साहब चल देते हैं. 

वे इस कहानी को कक्षा में इस तरह पढ़ाते थे कि ये व्यवस्था और चाटुकारों की कहानी है. इसमें व्यवस्था का चरित्र खुलकर सामने आता है. जहाँ कहीं व्यवस्था है वहां नैतिकता होने पर ही समाज का भला हो सकता है. आह !! काश उन्होंने इस कहानी को मनोविज्ञान की तरह पढ़ाया होता. मुझे समझाते कि बेटा इस दुनिया के आदमी का कोई भरोसा नहीं है. वह अपने लाभ और हित के लिए कितने ही स्वांग कर सकता है. तुम उसके कहे शब्दों को अंतिम न मान लेना. वह बाहर से जो दीखता है असल में अंदर से वैसा नहीं है. 

पुलिस दरोगा ओचुमेलोव काश तुम आखिरी गिरगिट होते. 

इस कहानी के नाट्य रूपांतरण को दुनिया भर में बेहिसाब खेला गया है. बहुत से कलाकार इन पात्रों को अपनी आत्मा से जोड़कर निभा सके है. इसलिए कि गिरगिट होने का गुण मनुष्य के भीतर बखूबी उपस्थित है.

छीजने की आहट

मन एक तमाशा है  जो अपने प्रिय जादूगर का इंतज़ार करता है। शाम से बालकनी में बैठे हुए सुनाई पड़ता है। तुम कितने कोमल हो सकते हो? खुद से पूछने पर...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.