December 5, 2016

जाको लागे वो रंग

अचानक माणिक ने किताब उठा ली. “पुखराज की किताब? क्या बात है” नीलम का दिल सदमे में चला ही जाता कि माणिक की मुस्कराहट ने इस सदमे को रोक लिया. वह उनको देख रही थी. जाने क्या सोचें, क्या कह बैठें. कुछ देर तक किताब के पीछे का पन्ना देखने के बाद माणिक ने किताब को अधबीच के किसी पन्ने या शायद आगे पीछे कहीं से पढना शुरू किया. हरा रंग माणिक के हाथों में था लेकिन नीलम के सब रंग ज़र्द हुए जा रहे थे. माणिक ने कहा- “खुली नज़्में”

मई महीने को आधा बीतने में दो दिन बचे थे. रात के आठ बजे थे.

दिल्ली जाने की तैयारी थी. नीलम ने इससे पहले क्या बातें की थी ये पुखराज को याद नहीं था लेकिन पौन घंटे बाद एयरपोर्ट निकलने से पहले नीलम कहा- “कल जो हुआ वह मुझे अभी तक सता रहा है. क्या आपको कुछ कहा है उन्होंने?” नीलम असल में पन्ना के बारे में सवाल कर रही थी. लेकिन इस बात से ज़रूरी बात उनके बीच थी कि अब जाने क्या होगा.

नीलम ने कहा- वे टेक्सी करवा रहे हैं

पुखराज चुप रहना चाहता था मगर उसने जवाब दिया- मेरा हाल अजूबा है. मगर मेरे हाव भाव सामान्य है.

वह पूछती है- अरे क्यों? क्या मैंने कुछ किया?

पुखराज ने सोचा कि कल के वक़्त का वो सफहा, जब बहुत देर तक उसकी कोई ख़बर न थी तब जाने क्या बात गुज़री होगी. असल में कहीं जाने से पहले किताबें लेने जाने जैसे किसी बहाने का कोई अर्थ नहीं होता. इसी सोच में पुखराज ने कहा- “नहीं नहीं. तुमने कुछ न किया. तुम्हारा नाम आते ही मैं जाने क्यों ऐसा बिहेव कर रहा हूँ. मुझे क्यों लग रहा है कि मैं कहीं पकड़ा जा रहा हूँ. तुम जाने कैसे ये सब छिपा लेती हो?”

नीलम ने कहा- “और मुझे हर कदम बढाते हुए लग रहा ही कि मैं आपसे दूर जा रही हूँ.”

“पगली. दूर कभी नहीं. मन के गहरे में हो हमेशा.”

“पता नहीं मैं ये सब छिपा पा रही हूँ कि नहीं. आई एम फीलिंग टू लो. एक ही बात लगती है कि पता नहीं कब देखूंगी आपको.”

“सुनो. अभी जब तुम्हारा फोन आया तब मैं उनके आस पास था, उनको ऐसा न लगे कि दूर भाग रहा हूँ. तुम जल्दी ही मुझे देखोगी.”

“शायद.” 

नीलम टेक्सी में थी. माणिक आगे बैठे थे. टेक्सी को अपने गंतव्य तक जाने में बीस मिनट लगने थे.

नीलम- “जान. आपको जानने के बाद जब पहली बार दिल्ली आई थी तब कितनी खुश थी मैं. फिर आपसे लम्बी लम्बी बातें शुरू हुई. मैं वक़्त चुरा कर आपसे बातें किया करती थी. अब लगता है जैसे ज़िन्दगी एक चक्कर पूरा कर चुकी है. अब हम करीब हैं मगर दूर होंगे.”

“नहीं दूर न होंगे. ये दूरी बस भूगोल की होगी. एक अस्थायी दूरी. जिसे एक दिन मिट जाना होगा.”

“मुझे नहीं रहना आपके बिना. मेरा सब्र ख़त्म हुआ.”

“कभी न रहना मेरे बिना. मगर सब्र ख़त्म होते ही मुश्किलें बेहिसाब हो जाएगी.” ऐसा कहते हुए पुखराज सोच रहा था कि उस देश जाते ही जाने क्या-क्या बदल जायेगा. ये महीनों बाद मिलना भी क्या मिलना था लेकिन अब उसकी भी आस जाती रहेगी. लेकिन जाने क्यों पुखराज को एक यकीन आता था कि नीलम वहां न रह सकेगी. उसको कोई वजह यहाँ खींच लाएगी. वह वजह केवल पुखराज न होगा.

रात के नौ बज चुके थे. नीलम ने कहा- “ये केवल आप समझ सकते हैं कि मैं इसी देश में रहना चाहती हूँ. ये दोनों बातें एक साथ होना बहुत मुश्किल है. मगर फिर भी मैं यहाँ रहने के ख्वाब देखती हूँ. उन लोगों का मेरे साथ रहना मुझे गहरे डिप्रेशन में डालता है मगर फिर भी मैं आप तक लौट आना चाहती हूँ.”

पुखराज ने कहा- “हम इस बारे में बात करेंगे. अभी तुम अपनी यात्रा को कष्टप्रद न बनाओ. समझो अभी वेकेशन पर जा रही हो. जब मुश्किल आएगी तब देखंगे.

“यू आर एन अवसम पार्टनर. मैरी मी.”

पुखराज ने सोचा कि डिप्रेशन में जाने की वजह क्या-क्या हो सकती है? उसने अचानक ऐसा क्यों कहा कि मैं घरवालों की वजह् से डिप्रेशन में चली जाती हूँ. क्या पहले जब डॉक्टर के चक्कर लगाए थे तब उसे भी कारण यही बताया होगा? जबकि उसने मुझसे अक्सर कहा कि मैंने डिप्रेशन की वजह बता दी है कि मैं पुखराज से प्रेम करती हूँ. वह मुझसे प्रेम नहीं करता. वह इग्नोर करता है. जवाब नहीं देता. मैं क्या उससे बाहर आ सकती हूँ. असल में मैं बाहर आना ही नहीं चाहती. मुझे उसी की ज़रूरत है.

रात के साढ़े दस बज गए थे. एक बेचैनी थी. एक शंका थी. कितना कुछ गुज़रा था उन दोनों के बीच पिछली पहाड़ की यात्रा ने बहुत कुछ स्पोइल किया था. उसी की स्मृति एक दूरी बुनती है. इस दूरी में एक दोराहा आता है. क्या वह सचमुच उसके जाने को याद करके उदास हो जाये या फिर समझे कि पुखराज की प्रेमिका के भीतर के खानों में जो कुछ रचा हुआ है, उसका भागी न बने और उसे उसके हाल पर छोड़ दे.

मई महीने के आधे दिन बीतने में कुछ ही घंटे शेष थे. ये रात खत्म होने से पहले बहुत लम्बी हो गयी थी. जाने कौनसा साल था. पुखराज की ऑंखें बेहद भीगी हुई थीं. वह एक ठहरी हुई रात की तरह था. उसके पास कोई रौशनी न थी.

अँधेरा बढ़ता जा रहा था. नब्ज़ डूब रही थी. उससे प्यार कितना करता था ये नहीं मालूम मगर पुखराज को साफ़ लगता था कि वह कभी उससे अलग नहीं हो पायेगा.

[नील-स्वप्न - एक ]

Painting : Hidden lake of memories by John L Mendoza

November 27, 2016

तब तक के लिए

पत्ता टूटा डाल से ले गयी पवन उड़ाय
अबके बिछड़े नाहीं मिलें दूर पड़ेंगे जाय.
~ कबीर

मन शिथिल, उदासीन, बदहवास, गुंजलक. महीनों उलझनों से घिरा. नासमझी से भरा. बीतते दिनों से बेपरवाह. ठहरी चीज़ों से अनजान. दीवार हुआ मन. आंधी का भंवर. सूखी नदी से उड़ती धूल सा मन.
कितनी ही जड़ें उग आई होगी. कितनी ही शाखाएं उलझ पड़ीं थीं.

क्या मन के भीतर आने के चोर रास्ते होते हैं? क्या कोई बेशक्ल चीज़ मन पर एक उदास छाया रच देती है. अक्सर समझ नहीं आता. क्या हम कभी इस सब को समझ सकते हैं? मगर समझें क्या? वो कहीं चुभता दिखे. वह गिरह कसती हुई सामने आये. वो साँस तड़प कर किसी का नाम ले. मगर कुछ नहीं मालूम होता.

आज सुबह अचानक सबकुछ हल्का हो गया. सोचा कल की रात क्या गुज़रा था? क्या सुना-कहा था? क्या जीया था? इस खोज में कुछ भी बरामद नहीं होता. कोई शक्ल, कोई आवाज़, कोई छुअन याद नहीं आती. फिर ये क्या है कि बोझा गायब जान पड़ता है. मन खुली हवा में ठहरा हुआ. मन बेड़ियों से आज़ाद. मन अपने प्रवाह की लय में लौटता हुआ.

बोगनवेलिया से अनगिनत पत्ते रोज़ झड़ते हैं. रोज़ कोई बुहार देता है. लेकिन किसी रोज़ मन उनको खोज लेता है. उस अंतिम बिछोह को पढने के लिए ज़मीन की ओर झुक जाता है. बिना छुए बात करता है. इसी तरह एक रोज़ हम अपने रास्ते चले जायेंगे.

तब तक के लिए प्रसन्न रहो केसी. अपनों से प्रेम करो, परायों के प्रति दया रखो.

November 25, 2016

इस आग ही आग में


तिवारी जी ने कार रोक दी है।

हापुड़ से मयूर विहार तक शैलेश भारतवासी एक कहानी सुना रहे थे। मानव कौल की लिखी कहानी। मैंने ऐसे अनेक सफर किये हैं। मगर उन सब में कहानी मैं ही सुना रहा होता था। मैंने आज तक जितनी कहानियां सुनाई हैं , वे सब झूठ हैं। कहानी को सच क्यों होना चाहिए जबकि हम झूठ भर से ही किसी का जी दुखा सकते हैं। झूठ भर से काटा जा सकता है एक लंबा सफर।

आज जो मैंने कहानी सुनी वह तीन लड़कों की प्रेम कहानी है. प्रेम एक युद्ध है. इस कहानी में शांति के मोर्चे पर बैठे एक दूजे को अपने भीतर सहेजे दोस्त अचानक युद्ध के आरम्भ हो जाने के हाल में घिर जाते हैं. इसके बाद मोर्चे पर हो रही हलचल कथानक में बढती जाती है. घटनाएं तेज़ गति से घटती है और योजनाएं नाकाम होती जाती है। प्रेम वस्तुतः नाकामी को अपने पहलू में रखता है और बार-बार इस बात का परिक्षण करता है कि क्या सबकुछ ऐसे ही होना था? वह सोचने लगता है कि गुणी और योग्य व्यक्ति की जगह प्रेम को अक्सर चापलूस और मौकापरस्त चुरा लेते हैं. प्रेम हवा का तेज़ झोंका है जो जीवन को आलोड़ित करके कहीं छुप जाता है.
शुक्रिया मानव इतनी सुंदर कहानी कहने के लिए।


मैंने इस कहानी के कोई पंद्रह सत्रह पन्ने सुने. इसी कथावाचन और श्रवण में हम हापुड़ से दिल्ली के मयूर विहार तक आ गए.

जब हम हापुड़ जा रहे थे तो कथित राष्ट्रीय राजमार्ग पर सैंकड़ों बाइकर्स कलाबाजियां दिखाते हुए सड़क पर आड़े तिरछे भागे चले जा रहे थे. मुझे उनको देखकर कोई प्रसन्नता न हुई. मेरे जैसा व्यक्ति जिसके मन और अनुभवों में बहुत सारा रेगिस्तान बसा हुआ है, वह कभी भी महानगरों को नहीं समझ पायेगा. मेरे लिए राष्ट्रीय राजमार्ग का अर्थ है अस्सी फीट चौड़ी सड़क और सौ किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक की गति. मेरे लिए दूर तक पसरा हुआ सूनापन ज़िन्दगी है.

शैलेश भारतवासी कहते हैं सब लोग नौकरी करके गाज़ियाबाद को लौट रहे हैं. मैं उनको देख रहा था. वे अपनी बाइक से कारों और बड़े ट्रकों के बीच फिसल रहे थे. असल में उनका भागना ऐसा था जैसे किसी नरक की दीवार में सुराख करके आये हैं. नरक के पहरेदार उनके पीछे लगे हैं. वे हर सूरत में हाथ नहीं आना चाहते हों. लेकिन वे कल सुबह फिर से लौटेंगे. दिल्ली शहर.

एक रोज़
आदमी की पीठ
लोहे की पटरी में ढल जाएगी.

धूप की तपिश में
चमकती
कोहरे के दिनों में
खोई-खोई .
बारिशों में फिसलन भरी.

मन मगर मर चुका होगा.

एक रोज़
लोहे के फूल चूमेंगे
धूप में भीगे होठ.
और इस आग ही आग में
दुनिया लौट जाएगी वहीँ
जहाँ से शुरू हुई थी.

मैंने कितने लोगों से मोहोब्बत की है ये हिसाब बेमानी है. जैसे हर किसी के पास है कहानियां. जैसे हर कोई कविता की तरह चलता है. ज़िन्दगी मगर ज़िन्दगी है, जिस ढब देखिये.

September 29, 2016

फ़ैसले के बाद का इक सवाल

मुमकिना फ़ैसलों में इक हिज्र का फ़ैसला भी था
हमने तो एक बात की उसने कमाल कर दिया। ~परवीन शाकिर

घर की मरम्मत के काम से उड़ती हुई गर्द ने सब धुले कपड़ों को ढक लिया। कई रोज़ से एक ही जीन्स और दो टी में फिरता रहा। कल रात ये सोचा था कि कपड़े पानी से निकाल कर सुखा दूंगा कि बाद दिनों के बदल कर कुछ पहनूँ। दिनों से कड़ी धूप थी मगर आज कहीं से बादलों का टोला चला आया है। आठ बजे हैं और धूप गुम है।

अचानक कोई मिले और आप पीछे झांकने लगें। आपको वे लोग याद आये जो पास बैठे होने को नज़दीकी समझने लगे थे। अचानक वे भी याद आएं जिनसे नज़दीकी थी मगर कभी पास न बैठे थे। हवा में गिरहें पड़ने लगें, जब कोई अपने हादसे सुनाये और कहता जाये कि इन बातों का आपसे कोई वास्ता नहीं है। और सुनते हुए दिल सोचता जाये कि जब वास्ता नहीं है तो इस मुलाक़ात में उन्हीं की याद क्यों हैं?

कई बार एक ही रास्ते तनहा चलते हुए कोई अजनबी भला सा लगने लगता है। सफ़र के रास्ते के सूनेपन पर कोई साया। जहाँ से गुम हो सब छाँव, सब धूप ला पता हो। जहाँ सांस किसी याद की तरह आये। जहाँ एक सिरा दिख रहा हो। ठीक वहीँ जवाब से सवाल, चुप्पी से सवाल और सवाल से सवाल उगते जाएँ।

ख़यालों के इस वृन्द से ठिठक कर मन देखता है पुल की ढलान से उतरते हुए नौजवान। पीठ पर अपना थैला बांधे। ऊँची आवाज़ में बतियाते। उनपर एक धूप की लकीर आई और फिर से खो गयी। जैसे हम कहीं बहुत पीछे छूट गए थे और इस छूट जाने की याद एक लकीर की तरह बनी और मिट गयी।

सुबह छः बजे परवीन शाकिर साहबा की आवाज़ यूट्यूब पर थी। उनके शेर छूकर गुज़रते रहे मगर ज़िन्दगी की याद में ये शेर मन में अटक गया। कई बार फ़ैसला किया था कि ऐ ज़िन्दगी हम बिछड़ जाएं तो अच्छा मगर वो हर बार कोई न कोई सवाल करके चुप हो जाती रही।

September 27, 2016

उन दिनों के बुलावे

परिवार का संकुचित जीवन, घर की चारदीवारी में बंद स्त्रियां और धन संग्रह की भावना राज्य की एकता और उसके समस्त घटकों के स्वतंत्र विकास की क्षत्रु है ~ अफलातून।

कुछ दोस्त मेरी डायरी के सबसे पुराने पन्ने ही पढ़ना चाहते हैं। वे असल में बार-बार उन्हीं पन्नों को पढ़ते हैं जिनमें जीवन के दुख और चाहनाएँ अनावृत हैं। जहाँ एक व्यक्ति सरलता से अपनी खामियों का चित्रण करते हुए, समाज के मानदंडों को अस्वीकार करता।

मैंने सचमुच वैसे डायरी लिखना छोड़ दिया है। ये भयग्रस्त होने का प्रमाण है। मैं वर्जनाओं के शंकु से घबरा कर दैहिक और मानसिक अपेक्षाओं को छिपाने लग गया हूँ। मैं अब नहीं लिखता कि किस आदर्श जीवन की अवधारणा गिरहें बनकर मेरी साँस को रोक लेती है। मैं ये भी नहीं लिखता कि हताशा, उदासी और अवसाद की पीड़ा से भरा जीवन कैसा दिखता है। एक दोस्त ने कहा कि जब तक आपको कोई जानता नहीं है तब तक आप लिखते है। जब आपको जानने का दायरा बढ़ता जाता है तब वह आपको अधिग्रहित कर लेता है। उसके बाद लिखना होने की जगह लिखवाना होने लगता है।

मैं कहता हूँ- हाँ, ये सत्य है। इसी सत्य की घबराहट में मैं अपनी कहानियों को स्थगित करता हूँ। मैं ऐसी कोई किताब नहीं चाहता जिस में बाहरी दबावों की लिखाई दिखे। वस्तुतः प्रेम करना, चाहना से भरा होना, दैहिक लालसा में बहना, कथित व्यभिचार में लिप्त होना और अनैतिक सम्बन्धों को जीना लिखना कठिन है। इसलिए कि कुछ एक रचनाएं और पुस्तकें आने के बाद आपके जीवन को सार्वजनिक मान लिया जाता है। तब आप लेखक हो चुके होते हैं और समाज के प्रति आपके दायित्व याद दिलाये जाने का अधिकार हर पाठक और परिचित को स्वतः मिल जाता है।

हम सब भीतर से कोमल होते हैं। कोमलता जब तक गहरी न हो उसे कमजोरी कहा जाना ठीक है। कि बेहद कोमल को तो तोड़ पाना असम्भव होता है। लेकिन हमारी भीतरी कोमलता वस्तुतः सख्त होने से पहले की स्थिति भर होती है, जो छोटी बातों से आहत होकर टूटती रहती है। हम जल्दी जजमेंटल होते हैं और फतवे सुनाने लगते हैं। ये ऐसा है तो इसका आशय ये है और इस स्थिति में केसी आपका प्यार, एक दिखावा है।

मैं कई बार तय करता हूँ कि ब्लॉग करने लगूँ। और हर बार ये पाता हूँ कि मेरे जीवन आरोहण में अब तक बहुत सफर हो चुका है और लोग इस बात से अनजान हैं। वे किसी पुरानी या बेहद पुरानी अपनी ओछी जानकारी से अर्थ ग्रहण करने लगेंगे। वे इस बात को कभी नहीं समझ पाएंगे कि मैंने जहाँ लकीर खींची थी, उसके आगे किसी सम्बन्ध के निकल जाने के बाद मेरे वृत्त में खालीपन के सिवा कुछ नहीं मिलेगा।

मैं किसी के प्रेम में नहीं हूँ। मैं किसी के प्रेम में था। इन दो स्थितियों के अतिरिक्त नवीन घटना ये है कि मैं अक्सर अपने बीते दिनों में लौटने का सोचता रहता हूँ। वे दिन जहाँ एक कच्चा और रूमान से भरा गैरज़िम्मेदार जीवन मुझे आमंत्रित करता है।

एक खोखला जीवन, दूसरे खोखले जीवन से मिलकर दुगना शोर करता है। तुम अपनी आवाज़ से पता करो कि भीतर का दृश्य क्या है? कहीं तुम आदर्श, व्यवहार, प्रतिष्ठा, सम्मान, प्रतिबद्धता जैसी बातें करते हुए भीतर से खोखले तो नहीं हो गए। क्या अब भी तुम किसी निषेध को आगे बढ़कर चूम सकते हो?

जाने क्यों, इन दिनों लगता है कि मैं कुशलता से उन्हीं दिनों में लौट जाऊँगा। जहाँ मैं केवल मैं था।

August 23, 2016

तुम्हारे उसका क्या हाल है?

उसके हाथ साफ़ थे. अंगुलियाँ सब गिरहों को करीने से रखती जाती थीं. दिल और दिमाग भले कितनी ही जगह उलझे हों, फंदे के कसाव न कम होते थे न फैलते थे. जब तक थका हारा हुआ बदन ठंडा था. वो आराम गरमाहट भली सी लगती थी. लोग कहते थे कि ये बुनावट असल में उसकी अँगुलियों की ज़रूरत थी. वे अंगुलियाँ जो बचपन से अब तक नयी छुअन की तलबगार रही मगर अपने ही किसी डर के कारण चुप लगाकर बैठी रहती थी.
जिस तरह बेशर्मी आती है. जिस तरह असर खत्म होता है. जिस तरह परवाह जाती रहती है. उसी तरह ये हुनर भी आया था. अलग-अलग सिरे बांधना और फंदे बुनते जाना.
एक दोपहर उसने सिरा बाँधा. शाम को बात करते हैं. शाम को फंदा डाला.
"वो बहुत दूर है. हालाँकि लौटने में कोई तीन दिन का फासला भर है. मगर तुम समझते हो न कि किसी का यूं लौट आना लौटना नहीं होता. बस आधी रात को फ्लाइट लेंड करेगी. दो एक घंटे में घर की डोरबेल बजेगी. उसके इंतज़ार में कदम वहीँ दरवाज़े के पास खड़े होंगे. वह अपने ट्रोली बैग को किनारे कर देगा. उसी तरफ जहाँ पिछली बार लाया हुआ एक पौधा रखा होगा. वाशरूम उधर ही है. रास्ता बेडरूम के अन्दर है. अगर उसी की आदत न हुई होती तो वो वो वहीँ सामने रखे सोफे पर आराम करने लगे."
इस फंदे के बाद उसने सांस ली. एक छोटी चुप्पी भरी सांस. ये सांस भी एक फंदा ही था. जो आगे इस तरह बढ़ा- "खिड़की के पास रखे हुए गद्दे, खिड़की के बाहर टंगा हुआ गन्दला आसमान. दोनों किसी काम के नहीं हैं. एक तरफ इंतज़ार किया जा सकता है, दूजी तरफ दूर तक फैले सूनेपन में बे रोक देखा जा सकता है. मैं बस ऐसे ही कोई कागज़ उठाऊं और उस पर लकीरें खींचने लगूं. मालूम है तुमको बेल, बूटे, कसीदे जैसे आकार मुझे भाते हैं. कागज़, कलम, रंग एक इंतज़ार लिखते हैं. रिश्तों से दूर और धन की घनी छाया में मेरा मन चाहता है कि आते ही वो मुझे बाहों में भर ले. पूछे कि कब से नींद नहीं आई?"
इस फंदे की मुकम्मल बुनावट के बाद एक फीकी सी हंसी हवा में घुल जाती है. "अरे कुछ नहीं होता. सब मुझे ही करना पड़ता है"
छोटी चुप्पी, छोटी साँस के बाद - "जाने दे."
फंदे ख़त्म नहीं होते- "हम सबके साथ ऐसा ही है. ठीक ऐसा न हो तो भी लगभग यही है. तुम्हारे उसका क्या हाल है? पता है, तुम मूर्ख हो. तुम चाहो तो... "
* * *

मैं अपनी अंगुलियाँ झटक लेता हूँ. फंदे लिखने से भी अक्सर अँगुलियों का दम घुटने लगता है. 

फंदे - 1

August 12, 2016

उससे पहले

स्मृतियां गहरे से हल्के रंग की ओर बढ़ती हैं। फिर पीली पड़ जाती हैं। जैसे किसी तस्वीर का कागज़ उम्रदराज़ दिखने लगता है। उसके पीलेपन को देखते हुए लगता है कि एक हलके से मोड़ से टूट जाएगा। उस कागज़ को छूने से अंगुलियां डरती हैं। जाने किस छुअन से एक दरार आ जाये। आँखे चुप बैठी सोचती हैं। वो कितना ताज़ा लम्हा था। वक़्त की धूप छाया तक कैसे चली आती है। बंद कमरे की दीवार को भी धूप किस तरह छूती है। कि कागज़ अपना हरापन खो देता है।

तस्वीर के कागजों की कुछ जड़ें हुई होती तो शायद कुछ और वक़्त तक अपना हरापन सींचती रहती। ऐसे ही स्मृतियां जिन कारणों से बची रहती हैं, वे सब कारण असल में बीत चुके कारण होते हैं। स्मृतियों के अक्स में एक पीलापन अपनी जगह बनाता रहता है। हम एक रोज़ स्मृति को छूने से डरते लगते हैं।

सब स्मृतियां उन कारणों पर खिलती हैं जिनके पाए सम्मोहन होते हैं। ये सम्मोहनों की ही दुनिया है। सम्मोहन अपने भीतर ईर्ष्या और युद्ध के नक्शे लिए होते हैं। ये ऐसे संघर्ष है जिन्हें आप टाल नहीं सकते। इनसे लड़कर ही मुक्त हुआ जा सकता है।

अकेलेपन का अभ्यस्त नित नए सम्बन्ध तलाशने में सुख पाता है। वह व्यक्ति आस पास की जड़ों में अपने पैर फंसाता है। बेल की घुमावदार कोमल जकड़न बनाता है। उसी से उसी को छीनता है, जिसके सहारे उगा हुआ है। इस जीवन जुगत में किसी एक हरेपन को हारना होता है। जीत अक्सर परजीवी की होती है। वह सम्बन्धों का पानी चुरा कर आगे बढ़ जाता है।

कभी ऊँची शाखों पर ज़िद करके घोंसला बनाने वाली चिड़िया अपने साथ कुछ बीज लेकर आती है। पेड़ जानता है कि इन बीजों में से कोई एक कोटर में जा गिरेगा। वह बीज उगकर एक दिन उसे लील लेगा। लेकिन जीवन में समझदारी सिर्फ कहने को ज्यादा होती है। जीवन अक्सर लाचार बंधुआ होता।

हम सब हारने को अभिशप्त होने की जगह अपने से लगने वाले रिश्तों से ही छले जाने की नियति से बंधे होते हैं। सच कहूं तो पेड़ का खिले रहने की कामना में रहना ही कष्ट का सबसे बड़ा कारण है। जिन्हें बार-बार नष्ट होकर उगने का हुनर होता है, केवल वे ही इस प्रक्रिया में शांत और गतिमान रहते हैं।

एक रोज़ कोई गहरा सन्नाटा उस चिड़िया के अंतस को भी भेद देता है। ख़ामोशी में याद किरचों की तरह बिखर जाती है। वो दौड़ता भागता मन चोटिल होकर लम्बी सांसे लेने लगता है। तब कोई हल नहीं होता। अपने किये और जीये हुए के नतीजे उसकी साँस घोट देते हैं। सूखे हुए दरख़्त चिड़िया की बुझी हुई आँखे देखने को नहीं होते। वे उसके मरने से पहले मर चुके होते हैं।

जीन्स पुरानी हो चुकी है कि सिर्फ ज़िंदा चीज़ें ही नहीं मरती।

August 11, 2016

असंयत उद्विग्न

आप कभी नहीं समझ पाएंगे कि आसान क्या है और मुश्किल क्या? इस दुनिया में सबकुछ अपनी न्यूनता और आधिक्य के साथ गुण-दोष में परिवर्तित होता रहता है। इधर कई रोज़ से आसमान में बादल हैं। सूरज दिखा नहीं। पूरे राजस्थान में बरसात किसी नवेले प्रिय की तरह बरस रही है। कुछ एक टुकड़े जो सूखे हैं, बादलों की छतरी उन पर भी बनी हुई है। रेगिस्तान तपता हुआ कितना कड़ा लगता है। पानी ही जीवन की इकलौती ज़रूरत जान पड़ती है। जहाँ तक आप देख पाते हैं, केवल सूखा और तपिश दिखाई देती है। इधर जब बादल आसाम पर डेरा डालते हैं और बिखरने का नाम नहीं लेते तब स्थिति प्रकृति के विपरीत हो जाती है। कैसी आदतें होती है न। सूखे, बियाबान और उजाड़ में जीने की आदत। प्यास, पसीना और तन्हाई की आदत। प्रेम की कामना, प्रतीक्षा और उसके अंत होने की चाहना। लेकिन कभी सब बदल जाता है। सडकों के किनारे काई जमी दिखने लगती है। हरियाली का बारीक अक्स हर तरफ उभर आता है। सीले कमरे, सीले पैराहन, सीले बिस्तर और भीगी भारी स्मृतियां।

सफ़र के टुकड़े पांवों में चुभे रहते हैं। लंबे समय तक कहीं जाने की आदत नहीं होती। कभी यात्रा पर यात्रा आमंत्रित करती रहती है। नए पुराने शहरों में, बीते हुए रिश्तों और नए चेहरों की आमद में हम कहीं पीछे छूट गए होते हैं मगर खुद को वर्तमान तक खींचने की जुगत लगाते रहते हैं। कॉफी हाउस, मॉल्स, बड़े शोरूम्स के आगे के अविराम चलते बरामदे। देखे भाले रेलवे स्टेशन, मेट्रो, बसें, कैब्स। सब कुछ मिलकर किसी नयी सर्जना की भूमि तो बनाते हैं लेकिन सर्जक जीवन के इस कारवां में कहीं थककर बैठ चुका होता है। बारिश किस तरह गिरती है, ये लिखने वाला मन गायब रहता है।

बस इसी तरह शायद सबका जीवन चलता होगा।

कुछ एक किताबें पास में हैं। मैं रोज़ दो सौ पन्ने की औसत गति से उनका पठन करता हूँ। किसी एक सिटिंग में साठ-सत्तर पन्ने पढ़ते हुए अकसर कुछ एक पैरा, कुछ एक पंक्तियां लौटकर पुनः पढ़नी पड़ती है। मुझे याद है कि मेरा पढ़ना कभी तेज़ कदम रहा ही नहीं। मैं तीन सौ पन्ने पढ़कर थक जाता था। कुछ रोज़ पहले रेल यात्रा में एक उपन्यास को बाड़मेर से रेक के छूटते ही निकाला था। वे डेढ़ सौ पन्ने पढ़ने में मुझे ढाई- तीन घंटे लगे। उपन्यास का प्रवाह तो अद्भुत था ही शब्दों का आकार भी बड़ा था। कितना के पूरा होते ही ख़याल आया कि ये शायद बीस एक हज़ार शब्द रहे होंगे। मेरे एक सहयात्री ने दूजे से कहा- इनकी किताब पूरी होने वाली है। इसके बाद शायिका को खोलते हैं। मुझे ख़ुशी हुई कि पढ़ते हुए व्यक्ति को लोग परेशान नहीं करने का मन रखते हैं।

कल एक छूटी हुई किताब हाथ लगी। दो एक महीने पहले उसके आठ नौ पन्ने पढ़े थे। वो किताब इस तरह छूट गयी जैसे अजाने जीवन का कोई काम छूट जाता है। एक लघु उपन्यास है। सादा लिफ़ाफ़ा। इसके लेखक हैं, मोती नन्दी। मोती बाँग्ला का उच्चारण है। हिंदी में उनको मति नंदी लिखा गया है।

प्रियव्रत का जीवन एक छद्म आवरण में गुज़र रहा है। वह असल पहचान को छुपाये हुए जीता है। जीवन के छब्बीस बरस। प्रियव्रत ने मज़बूरी में एक छद्म नाम से नौकरी हासिल की थी। नौकरी दिलाने वाला छब्बीस सालों तक भयादोहन करता है। एक रोज़ प्रियव्रत का बचपन के दोस्त की बेटी निरुपमा से मिलना होता है। नीरू छद्म आवरण पर तेजाब की तरह गिरती है। कहानी पढ़ते हुए, कोलकाता का शहरी ढब, ट्रामें, सस्ते जीवन, गिरते मूल्य और परपीड़ा से बेखबर उदास जीवन सामने से गुज़रता रहता है। मैं इस उपन्यास को सुबह और शाम दो बैठक में पूरा करता हूँ। मैं कुछ एक कहानियां और उपन्यास पहले पन्ने से आगे नहीं पढ़ पाता हूं। लेकिन सादा लिफ़ाफ़ा की अद्भुत शैली और कथानक का प्रवाह मुझे परमानन्द तो नहीं मगर आनंद की ओर ले जाता है।

तुम्हें मालूम है एक रोज़ छद्म आवरण में ढका हुआ सब कुछ बाहर की दुनिया के सामने आ जाता है।

अभी मैंने अपनी किताबों के बीच से लेव टॉलस्टॉय की लंबी कहानी खोज निकली है। सुखी दम्पत्ति। मुझे इस कहानी की याद कुछ रोज़ से थी। सर्गेई, मरिया और कात्या याद थे। मालूम है इस कहानी में पात्रों के आचरण और कथन के बीच के बारीक परदे, हलकी स्याही और नमक सी गलन रुक रुक कर पढ़ने पर मजबूर करती है। हम बार-बार किन्ही कहानियों को क्यों पढ़ते हैं? मुझे नहीं मालूम मगर मैं नयी कहानियां भी खूब पढता हूँ। पिछले दिनों नरेश सक्सेना और उपासना झा की कुछ कहानियां पढ़ीं। कुछ एक कहानियां सुखी करती हैं। उनके भीतर रचे बिछोह में गहरा जीवन होता है।

"तुम खेलना चाहते हो, बेशक खेलो। लेकिन मेरे साथ मत खेलो। मैं यहाँ किसी और वजह से हूँ।" सुखी दाम्पत्य। टॉलस्टॉय।

June 28, 2016

एक रोज़ तुम्हें मालूम हो


उस सूनी पड़ी सड़क पर कोलतार की स्याह चमक के सिवा कुछ था तो एक फासला था. उमस भरे मौसम में हरारत भरा मन दूर तक देखता था. देखना जैसे किसी अनमने मन का शिथिल पड़े होना.

दफअतन एक संदेसा गिरा.

जैसे कोई सूखी पत्ती हवा के साथ उडती सड़क के वीराने पर आ गिरी हों. सहसा कोई हल्की चाप हुई हो आँखों में. मन को छूकर कोई नज़र खो गयी हो. हवा फिर से दुलारती है सूखी पत्ती को. एक करवट और दो चार छोटे कदम भरती हुई पत्ती सड़क की किनार पर ठहर जाती है. ऐसे ही किसी रोज़ ठहर जाना.

शाम गए छत पर बैठे हुए क़स्बे की डूबी-डूबी चौंध में उजाले में दिखने वाले पहाड़ उकेरता हूँ. चुप पड़ा प्याला. बारीक धूल से अटा लाइटर. और बदहवास बीती गर्मियों की छुट्टियों की याद. फोन के स्क्रीन पर अंगुलियाँ घुमाते हुए अचानक दायें हाथ की तर्जनी उस बटन को छूने से रुक जाती है. जिससे फोन का स्क्रीन चमक उठे. क्या होगा वहां? आखिर सब चीज़ें, रिश्ते, उम्मीदें एक दिन बेअसर हो जाती हैं. उनके छूने से कोई मचल नहीं होती. कब तक उन्हीं चंद लफ़्ज़ों में बनी नयी बातें. कब कोई ऐसी बात कि लरज़िश हो.

मगर उसके लफ्ज़ पढता हूँ. 

सोचता हूँ कि क्या बात उसे बांधती होगी. इस दुनिया में वजहों के बिना चीज़ें नहीं होती. बेसबब कुछ नहीं होता. किसी शाम ढले. कहीं कुछ पढ़-सोचकर. किसी याद, किसी ऐसे अहसास से गुजरते हुए कि अभी कुछ बाकी है. कि दिल उस मकाम पर आया ही नहीं. जिसे सोचा था, वह एक सुविधा है. वह सबसे आसान हासिल है.

मगर कुछ एक हसरतें कहीं टूटना चाहती है. वे इस तरह बिखर जाना चाहती हैं कि आंधियां उनको उड़ा ले जाये.

ये एक रोज़ तुम्हें मालूम हो. 
दुआ.

[Watercolor Y. Warren]

May 29, 2016

लगा लो होठों से

इतनी कसमें न खाओ घबराकर 
जाओ हम एतबार करते हैं.

उस आखिरी कश में क्या होता है? अक्सर मैं मांग लेता हूँ. उसने शेयर करना जाने कब का छोड़ दिया होगा कि देने से पहले एक सवालिया निगाह उठती है. उसने ज़रा सा जाने क्या सोचकर अपनी अंगुलियाँ आगे कर दी.
यही कोना है, मेरा. ऐसा सुनते हुए मैं उसकी अँगुलियों से आखिरी कश चुन लेता हूँ. क्या उसके लबों को छूकर ठहरी चीज़ें बेशकीमती हो जाती हैं. हो ही जाती होंगी कि मैं अपनी नादानी पर चुप रखे हुए धुएं को रोशनदान से बाहर जाते हुए देखता हूँ.
आह ! किस चीज़ को किस चीज़ से मिला रहा हूँ मैं. 

कभी किसी परिंदे का मन भी उस बाग़ से भी उठ जाता होगा. जिस बाग़ से सुकून और अपनेपन की आस रहती थी. कई बार वे रास्ते भी फीके लगते हैं, जिनपर चलते हुए वक़्त जाने कहाँ चला जाता था. कई बार खिड़कियाँ वहीँ रहती हैं मगर बाहर के सब दृश्य गुम हो जाते हैं. कई बार हम वो नहीं होते जो कभी थे. 
इसी होने और बदल जाने के बीच, अतीत को धन्यवाद. 
अगर वह सबकुछ न जीया होता. तकलीफें हिस्से न आई होती. वो बना ही रहता अपने आवरणों के भीतर और सजा आगे खींचती ही जाती. तो क्या कर सकते थे. उस रोज़ धूप ज्यादा थी मगर लगी नहीं. इसलिए कि कड़ी तपिश से बाहर आ जाने पर कुछ चीज़ें आसान लगने लगती हैं. असल में खुले पाँव और खुली आत्मा हज़ार अनचाहे हाल बरदाश्त कर सकते हैं.  और आप एक सूने अनजाने रास्ते पर आगे बढ़ सकते हैं. कहीं जाने का तय न हो. कहीं कोई न हो, तब भी. 
फिर मैं उसी तलब से घिरता हूँ इसे लिखते हुए. हाँ वही धुंआ.रुखसारों को चूमता. आँखों में चुभता. खिड़की के रास्ते बाहर जाता हुआ धुंआ. एक शाम के अहसास का धुंआ. कि इस वक़्त यहाँ की सीली ठंडक में ज़रा सी तपिश घुली है. ये तरतीब से रखी चीज़ें और इनके सामने खड़ी हुई बेतरतीब ज़िन्दगी. 

लगा लो होठों से, ये एक हसरत है. शुक्रिया. 

May 25, 2016

पार्टनर तुम आबाद रहो.

मिर्ज़ा ग़ालिब की वो बात याद है न? कहते थे नौकर नहीं हूँ मैं. 

मैं सोचता हूँ कोई तो कुछ वजीफे छोड़ जाता हिस्से में कि कहानियां कहते, तनहा रहते, फाकों की चिंता न होती. हर महीने रूपया घर आ जाता. मन मुस्कराता है. ऐसा कहाँ होता है. मैं तो जहाँ से याद कर पाता हूँ वहां से जीवन जीने को नौकरी करने की ही चिंता दिखाई देती है. बड़े नौकर, छोटे नौकर और मंझले नौकर मगर पक्के सरकारी नौकर. यही नौकरी सुख की नांव है. 

सुख ने सही वक़्त से पहले ही गलबहिंयाँ डाल दी थी. उसे पता था नाज़ुक दिल आदमी है ख़ुद को सता लेगा मगर कोई छल-प्रपंच न कर सकेगा. जियेगा, चाहे निचले दोयम हाल में ही जीना पड़े. कहीं किसी अख़बार में कुछ एक लेख लिखता. पुराने दुष्टों की झिडकियां सुनता रह न सकेगा इसलिए बार-बार नयी नौकरियों की ओर भागेगा. इस तरह का भागना इसे हताश करेगा. तो कुदरत और हालत ने बाईस साल की उम्र में रेडियो में बोलने की नौकरी पर लगा दिया. 

नौकरी का ख़याल कल दिन भर पार्टनर के कारण रहा. छोड़ दो नौकरी या रिटायर हो जाओ का हिसाब इसलिए नहीं जमता कि ये पार्टनर कि अपनी चीज़ है. उसपर कोई हुक्म चलाना या दखल देना बेजा है. इसलिए कड़ी धूप में नीम की छाँव तले एक दिन बिताना कोई बड़ी बात न थी. इस पर भी अगर आप उस कमरे के आगे खड़े हों जहाँ कभी दसवीं की कक्षा हुआ करती थी. बहार खड़े हुए भी अन्दर का सब हाल मालूम हो कि किस तरह ब्लैक बोर्ड है, किस दीवार पर क्या लिखा होगा अगर चूने की पुताई न हुई हो तो. 

सब कुछ बहुत पीछे छूट गया है. मालूम नहीं पीछे छूटा कहना ठीक है या खत्म होना. मगर अब नहीं है. शायद कहीं नहीं एक याद के सिवा. 

शाम छत पर खड़े हुए तेज़ हवा के झोंके भी पसीने को नहीं सुखा पा रहे थे. गली के छोर देखे, पास के घरों कि छतों पर बिखरे सामान और धूप को देखा. अचानक देखा कि एक चिड़िया किसी मुंडेर पर बैठी थी. रेगिस्तान की तेज़ आंधी में थोड़ी सी दूर जाने को चिड़िया दूर तक उड़ी। उसने हवा के साथ कई कलाबाजियां खाईं, कई गिरहें बुनी और आखिर पहुँच गयी पास की जगह पर।

उसे देख ख़याल आया कि प्रेम का भी यही हाल है।

[Image courtesy : ronbigelow.com]

May 24, 2016

एक जुगलबंदी को

कितनी ही दफा कितने ही मौसमों से गुज़र कर दिल भूल जाता है. कभी-कभी हवा, पानी, ज़मीं और आसमान के बीच किसी एक ख़याल की छुअन होती है. ये छुअन मौसम की तासीर को अपने रंग में ढाल लेती है. तल्ख़ हवा, तपिश भरी ज़मीं, उड़ चुका पानी और साफ़ या भरा आसमान सब बदल जाते हैं. 
कोई शहर किसलिए बुलाता है किसी को?

क्या कुछ कहीं छूट गया था? क्या कोई हिसाब बाकी था. क्या कोई नयी बात रखनी थी ज़िन्दगी की जेब में. फिर अचानक ख़याल आता है फटी जेबों और उद्दी सिलाई वाली जिंदगी के पास यादों के सिवा क्या बचेगा? अब तक यही हासिल है तो आगे भी...

पिछले सप्ताह के पहले दिन को मुकम्मल जी लेने के बाद एक लम्बी सांस आती है. याद से भरी सांस कि हाव यही वे लम्हे थे. दिल फिर उसी मौसम से गुजरता है. 

जबकि कुछ ही देर पहले गुज़रा हो कोई अंधड़ सूखी पत्तियों की बारिश लिए। बूंदें गिरती हो कम-कम। इतनी कि भीग जाएँ और भीगा भी न लगे। दुकानें पूरे शबाब पर हों मगर गिरे हुए हों शटर आधे-आधे। जब दो अलग तरह के प्याले रखे हों एक साथ जैसे कोई दो अलग वाद्य आ जुटे हों एक जुगलबंदी को। जब सर रखा हो उसकी गोद में और आवाज़ बरसती हो आहिस्ता मीठे सलीके से और बत्तियां बुझती जाए बार-बार मगर ज़िन्दगी फिर से।

उस सबके लिए शुक्रिया कहना मना हो मगर बार बार कहा जाये कि...

तुम न समझोगे। छोड़ो।

[Abstract photograph courtesy etsy.com]

May 20, 2016

कासे में भरा अँधेरा

“माँ, तुम मेरी चिंता करती हो. एक आदमी की प्रतीक्षा करती हो. एक मूरत पर विश्वास करती हो.”

रेहा के कहने का ढंग चुभ गया था या इस बात को माँ सुनना नहीं चाहती थी. उनका चेहरा कठोर हो आया था. “जो बातें समझ न आये वे नहीं करनी चाहिए”

“समझने के लिए ही पूछा है”

माँ कुछ नहीं कहती पहले रेहा की तरफ देखती है फिर दीवार के कोने में झाँकने लगती हैं. चेहरा स्थिर से जड़ होता जाता है. रेहा पास सरक कर माँ के कंधे पर अपनी हथेली रखती है. “बुरा न मानों माँ. ऐसे ही कई बार लगता है कि तुमसे पूछूं. तो आज पूछ लिया”

“तुम्हें मालूम है? तुम्हारी उम्र क्या है? इस साल तुम पंद्रह की हो जाओगी” 
“हाँ तो?”
“तो ये एक आदमी की प्रतीक्षा क्या होता है? कैसे बोलती हो?..”

रेहा ने माँ को कभी ऐसे नहीं सुना. वे शांत रहती हैं. उनका चेहरा ठहरा रहता है. उनके चेहरे की लकीरें, रंगत, फिक्र, ख़ुशी कभी नहीं बदलती. लेकिन उन्होंने चिढ कर कहा था. इस चिढ में दुःख भी था. उन्होंने अपने हाथ भी कुछ इस तरह उठाये जैसे जो बात शब्दों से न कही गयी उसे इशारे से कहना चाहती हों.

“माँ.” रेहा ने आहिस्ता से कहा. इसमें एक अर्ज़ भी थी कि दुखी न होइए.

“हम कैसे थे? ये समझ नहीं पाए थे. हमको वे चीज़ें समझने में वक़्त लेने की जगह सही वक़्त पर फैसले करने थे. जब तुम चौथे साल में तभी सब सब्र टूट गया था. मुझे मालूम हो गया था कि हम एक साथ रहने को नहीं बने हैं. मैंने ही उनसे कहा था कि हम एक ही छत के नीचे रह सकते हैं. उनको नहीं रहना था.”

“माँ क्या मैं पूछ लूँ कि ऐसा क्या था?”

“एक रोज़ सब मिट जाता है. बोलने में अपरिचय घुल जाता है. हम उसको सुनते हैं मगर लगता है कि शब्द ठंडे और ज़रूरत के हैं. छूने में वो बात नहीं होती. वो जिससे आपको लगे कि कोई आपका अपना है. वे इस तरह पास आते जैसे कोई काम था और... और हो गया...”

“क्या वे प्यार करते थे?”

“हाँ, अपनी सहूलियत का.”

“तो आपने क्यों नहीं किया?” रेहा माँ की आँखों में देखती है. “और मैं कहती हूँ कि किसकी प्रतीक्षा करती हैं तो इस तरह डांटने लगती हैं”

दो चिड़िया खिड़की के रास्ते उडती आई. छत पंखे का फेरा देकर परदे पर बैठ गयी. माँ ने चिड़ियाँ नहीं देखी. वे दीवार को देखती रही. रेहा ने चिड़ियाँ देखी. उनकी तेज़ बातें सुनी. फिर माँ की ओर मुंह करके बोली- “माँ बताओगी क्यों नहीं किया?”

“जिस दिन तन मिल जाता है उस दिन मन भर जाता है”

एक चिड़िया परदे के पास रखे मिट्टी के सांवले रंग के गुलदस्ते पर बैठी और वह गिर पड़ा. टूटे गुलदस्ते के कुछ टुकड़े रेहा के पाँव के पास आकर गिरे. कागज़ के फूलों से लदी टहनियां दरवाज़े के पास बिखरी गयी. बैंगनी और गुलाबी रंग एक साथ अच्छे दिख रहे थे. भले ही वे फर्श पर पड़े हुए थे.

[कागज़ के दो कप में स्ट्राबेरी फ्लेवर वाली आइसक्रीम- तीन]

तस्वीर सौजन्य : सुनयना खोत 

May 15, 2016

चल दिए सब चारागर



क़फ़स भी हो तो बन जाता है घर आहिस्ता-आहिस्ता

याद तो क्या है, रेगिस्तान के अंधड़ हैं. नहीं आते तो नहीं आते. आते हैं तो फिर नहीं रुकते. क्या सचमुच तीलियों के पीछे क़ैद कोई परिंदा पिंजरे को आहिस्ता-आहिस्ता अपना घर समझने लगता है?

रात दो पच्चीस पर नींद उचट गयी. आला किस्म की शराबें आहिस्ता चढ़ती हैं और आहिस्ता उतरती हैं. फिर ये नींद जो आहिस्ता आई थी जल्दी क्यों उचट गयी? नींद कमतर ही थी. क्या नींद को कोई नश्तर चुभता है. कौन जाग करके भाग जाता है. फ्रिज से पानी की बोतल लेकर पीने लगता हूँ. बहुत सारा पी लूँ कि पानी का नशा हो जाये. आँख फिर लगे.

मगर कुछ एक ख़याल गिरहें बन कर कस जाते हैं. कोई सिरा फटकार की तरह दिल पर बरसता है. उलटे-सीधे, दायें-बाएं हर करवट मगर कहीं कोई आराम नहीं. तभी याद आया कि एक दिन पिंजरा भी घर लगने लगता है. तो क्या हम सब दुखों और तकलीफों के आदि हो सकते हैं. क्या सचमुच? मैं आँख मूंदे हुए मुस्कुराता हूँ. कुछ हल्का सा लगता है. उसके पेट पर रखा अपना बायाँ हाथ हटा लेता हूँ. शायद बोझ हो गया होगा. कहीं उसकी नींद न उचट जाये.

सुबह की ठंडी हवा घर से होकर गुज़रती है. सोफ़ा से उठकर रसोई की ओर जाता हूँ. मैं कहता हूँ. क़मर जलालवी साहब की ग़ज़ल सुनोगी? वो नाश्ता बनाते हुए कहती है- हाँ. मैं उनको कब मेरा नशेमन अहल ए चमन सुनाता हूँ. कुछ क़दम रसोई से बाहर रखता हूँ और फिर लौटता हुआ कहता है एक दूसरी ग़ज़ल का शेर सुनो.

इलाही कौनसा वक़्त आ गया बीमार-ए-फुरक़त पर 
कि उठकर चल दिए सब चारागर आहिस्ता-आहिस्ता

May 13, 2016

जाने किसी और बात की

रेहा बहुत पीछे से याद करती है. उतना पीछे जहाँ से उसकी स्मृतियाँ शुरू होती हैं.

शाम का धुंधलका डूब रहा था. चौक की दीवार में एक आला था. बहुत नीचे. लगभग वहीँ जहाँ से दीवार उठती थी. एक छोटी मूरत थी. काले रंग के पत्थर पर सुन्दर चेहरा था. बंसी साफ़ न दिखाई देती थी मगर थी. मूरत के आगे घी की चिकनाई फैली हुई थी. मूरत के ऊपर दीपक की लौ से बनी स्याही थी. माँ धुंधलके के डूबने की प्रतीक्षा कर रही थी. अँधेरा बढ़ा तो एक कांपती हुई लौ दिखी. श्याम मूरत और आला कभी-कभी टिमटिमाहट की तरह दिखने लगे. माँ ने अपनी हथेलियाँ आहिस्ता से हटा लीं. मूरत पर टिकी आँखें पढना चाहती थी कि क्या ये लौ जलती रहेगी. एक बार माँ ने पीछे देखा. रेहा चौक के झूले पर बैठी हुई माँ की तरफ ही देख रही थी. माँ फिर मूरत को निहारने लगी. माँ मौन में कुछ कह रही थी. या वह प्रतीक्षा में थी कि कोई जवाब आएगा.

माँ रसोई से सब्जी की पतीली, रोटी रखने का कटोरदान, एक थाली, अचार का छोटा मर्तबान लेकर आई. रेहा झूले से उतरी और चटाई पर बैठ गयी. माँ मुस्कुराई. मगर इतनी कम कि ये न मुस्कुराने जैसा था. आले में दीया जल रहा था. मूरत ठहरी हुई थी. माँ ने एक बार फिर आले की तरफ देखा और थाली में साग रखा. माँ, रेहा को देखने लगी. जैसे पूछ रही हो हाथ धोये क्या? रेहा ने पलभर में अपनी हथेलियाँ दिखाईं. माँ उसकी नन्हीं हथेलियों को देखने लगी.

रेहा मुस्कुराने लगी.- “माँ हैं न एकदम साफ़?” 
“हाँ, अन्न ईश्वर का प्रसाद होता है. उसे साफ़ हाथों से ही छूना चाहिए.”
“देखो माँ, मैंने झूले पर बैठकर खाना छोड़ दिया. अब ईश्वर प्रसन्न रहेंगे. हमें उनके आसन से ऊपर नहीं बैठना चाहिए”
माँ मुस्कुराती है. रोटी का एक नन्हा सा टुकड़ा रेहा के मुंह में रखती है. 
रेहा उसे खाकर, भरे गले से कहती है- “नहीं माँ, मैं आप खाऊँगी” 
माँ रोटी को कोमलता से तोड़ती है. थाली में लगातार देखती है. साग को रेहा की तरफ सरकाती है. खुद हलकी मिर्ची वाली तरी में रोटी का टुकड़ा भिगोती है. 
“माँ ईश्वर सबकुछ देखते हैं? क्या वे हमको खाना खाते हुए भी?”
“हाँ. मगर पहले खाना खाओ हम बाद में बात करेंगे” 
रेहा धीरे-धीरे खाती है. माँ उसका साथ देती है. इसी तरह धीरे-धीरे.

माँ रेहा को अपने पास सुलाती है. इस तरह जैसे सबकुछ खो गया हो और यही आखिरी चीज़ उनके पास बची हो. रेहा के सर को चूमती है. उसको अपनी बांह में इस तरह छुपाती है कि रेहा के दोनों गाल माँ की बांह को दोनों तरफ से छूने लगते हैं.

“माँ”
“हूँ”
“क्या ईश्वर सबको खाना खाते हुए देखते हैं?”
“हाँ”
“माँ क्या इससे ईश्वर को प्रसन्नता होती है”
“हाँ”
“माँ क्या जब कोई खाना नहीं खाता उसे भी ईश्वर देखते हैं”

माँ चुप हो जाती है. वह कुछ देर सोचती है. छत में एक लकीर बन आई है. एक दरार है. जैसे कोई पतला धागा बेढब चिपका हुआ हो.

रेहा अपना सर उठाती है. माँ का चेहरा देखती है. वह अपनी दोनों हथेलियों से माँ के गालों को छूती है. अपने होठों से माँ को चूमती है.

रेहा की सुंदर छोटी आँखों में झांकते हुए माँ कहती है- “ईश्वर सबको देखता है. जब हम अच्छे काम करते हैं और जब बुरे काम करते हैं”
“हम बुरे काम क्यों करते हैं?”
“हमारा मन बहक जाता है, इसलिए हम बुरे काम करने लगते हैं”
“मन कैसे बहकता है?”
“जैसे प्याली में रखा हुआ पानी लुढ़क जाये.”
“और अगर मटका लुढक जाये तो?”
माँ रेहा को बाहों में भर लेती है. 
“जब हम बुरे काम करते हैं तब हमारा जीवन नष्ट हो जाता है. ठीक वैसे जैसे मटका लुढ़क जाये”
रेहा की आँखें कुछ और पूछती हैं. माँ कहती है- “अब सो जाओ” 
रेहा मन्द चहकती है- “ईश्वर को थेंक्यु बोलकर”

रेहा उनींदी स्वप्न देखती है. उसके मिट्टी के घोड़े की टांग टूट गयी है. वह उसे जोड़ना चाहती है. वह नहीं जुड़ती. भुरभुरी मिट्टी और ज्यादा गिरने लगती है. ईश्वर देख रहे हैं। वे कुछ नहीं करते. रेहा घोड़े को हथेलियों में रखती है. उसे रोना आता है. स्वप्न देखते हुए वह रोने लगती है. माँ रेहा को अपने निकट लेती है. उसके सर पर हाथ फेरती है. अपनी अंगुलियाँ उसके बालों में घुमाती है.

“क्या हुआ रेहा?”
अधखुली आँखों से रेहा माँ को देखती है. 
“क्या हुआ बेटा”
“माँ क्या ईश्वर घोड़े की टांग सही कर देंगे?”
माँ अपलक चुप देखती है. 
“ईश्वर ने घोड़े की टांग क्यों टूटने दी?”
“घोड़े ने कुछ गलत काम किया होगा. ईश्वर सबसे प्रेम करते हैं। वे किसी की टांग नहीं तोड़ते. घोड़े को उसके पाप का ही दंड मिला होगा.” 
रेहा नींद में खो जाती है.

अचानक माँ सोचने लगती है. ये छत की दरार किस बात का दंड है. क्या रेहा के पापा इस वक़्त जाग रहे होंगे? माँ जीवन के प्याले में रखे अपने मन तरल को लुढकने से सम्भालती है. ईश्वर का धन्यवाद करते हुए आँखें मूंदकर प्रतीक्षा करती है.

नींद की या जाने किसी और बात की...

[कागज़ के दो कप में स्ट्राबेरी फ्लेवर वाली आइसक्रीम- दो ]

May 12, 2016

केसी, क्या हो तुम?



एक लम्हा आता है, आह सुबह के काम पूरे हुए।

फिर?

फिर सम्मोहन की डोर एक खास जगह खींच लेती है। खिड़की, मुंडेर, कुर्सी या कोई कोना एक बिस्तर का। कोई गली में सूनी झांक, कोई किताब का पन्ना या टीवी पर कहीं से भी कुछ देखना।

मगर वह चुप लबों, ठहरी आँखों और खोये मन में ढल जाती। वह अतीत के उस सिरे तक जाती जहाँ वह पिछली फुरसत में थी। जब उसे रोज़मर्रा के कामों ने बुला लिया था।

मालूम है? जीवन को पीछे की तरफ देखने पर वह दूर तक फैला हुआ दिखाई देता है। वह उसी अतीत को पढ़ते जाने को पूरा करना चाहती थी। जैसे कोई आखिरी सीढ़ी पर खड़ा हो कब से इस इंतज़ार में कि ज़िन्दगी का पाँव फिसल जाए।

कहानियां उतना नहीं रुला पाती जितना ज़िन्दगी।

मगर मैं लिखता हूँ। सोचता हूँ मन हल्का होगा, न हुआ तो कुछ कहानियां अगले बरस किताब आने जितनी हो जाएँगी। लोग पढ़ेंगे, उदास होंगे और कहेंगे केसी, क्या हो तुम?

May 7, 2016

दिल उदास तो नहीं मगर



मैं दफ्तर की कुर्सी पर बैठा हुआ उकता गया था। मैंने कुछ काम किया, कुछ फोन देखा और फिर स्टूडियो से बाहर इस घने पेड़ की छाँव में चला आया। ये पेड़ जाल का है मगर बोगनवेलिया भी इसके साथ-साथ बढ़ा था। अब दोनों प्रेमपाश में इस तरह गुंथे है कि दोनों को अलग करके नहीं देखा जा सकता। अब गहरा हरा और गुलाबी रंग एक साथ मुस्कुराते हैं।

दीवार के पास रेडियो कॉलोनी का रास्ता है वहीँ छोटी लड़कियों की चहचाहट सुनाई देने लगी। बारह बज रहे होंगे और स्कूल जा रही होंगी। एक ने शिकायत की- "तुम आई नहीं" दूसरी ने उसकी शिकायत को काटते हुए कहा- "मैं सबके लिए करती हूँ, मेरे लिए कोई कुछ नहीं करता" वे तीनों एक साथ चुप हो गयीं। शायद तीनों इस बात से सहमत थीं।

मैंने किसी के लिए कुछ नहीं किया इसलिए असहमति में फोन खोजने लगा कि वह किस जेब में रखा है। सामने दफ्तर के लोग दिखाई दिए। इस साफ़ धूप में वे अच्छे दिख रहे थे। सोचा तस्वीर उतार लूँ। तस्वीर को देखा तो ख़याल आया कि इस रेगिस्तान में भी इंसान का जीवट कैसी हरियाली बना लेता है।

वैसे बात ये थी कि आज धूप के साथ उमस भी है। दिल उदास तो नहीं मगर ऊब से भरा है। कुछ याद आते ही लगता है कि

जाने दो।

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.