January 28, 2016

सपनों की धूसर झाड़न में

मन उष्णता से सिंचित एक सुबह को देखता है. ऐसी सुबह जो लौट-लौट कर आती है. नुकीले प्रश्नों की खरोंचों में आई तिलमिलाहट की स्मृति रक्ताभ रेशों की तरह आड़ी तिरछी मुस्कुराती रहती है. तलवों पर पुनः शीत बरस रहा है. धूप कच्ची है, उजास मद्धम है. रात्री का अवसान हो चुका है. प्रश्नों के मुख पर चुप्पी है. उत्तरों के मुख पर प्रश्नों की कड़वाहट की स्याह छवि है. एक घिरता हुआ हल्का स्याह अकेलापन है. एक प्रज्ज्वलित होती स्मृति है. 

एक शांत, निरपेक्ष और निर्दोष मन हूक से भर उठता है. 

रिश्तों से प्रश्न न करो. उनको भीतर से खोलकर मत देखो. उनको टटोलो नहीं. उनकी प्रवृतियों को स्मृतिदोष के खाने में रखो. चुप निहारो, सराहो, प्रसन्न रहो. 

मन एक किताब उठाता है. सोचता है स्वयं को कोई रेफरेंस याद दिलाये. मन किताब का एक सौ बारहवां पन्ना खोलते हुए स्वयं को रोकता है. इस तरह के उद्धरण क्या भला करेंगे. अपनी प्रकृति और प्रवृति चिकनी मिटटी होती है. उस पर स्थिर होने का विचार तो जाग सकता है किन्तु अंततः वह स्वभाव के अनुसार ही व्यवहार करती है और फिसलन पर सब कुछ गिर पड़ता है. मन चुप्पी का सिरा थामता है. एक अनंत चुप्पी इस जगत की सबसे मूल्यवान वस्तु है. निर्दोष चुप से भली कोई स्थिति नहीं है. 

कितने प्रहार और कितनी चीखें. कितनी उद्विग्न लज्जा की छवियाँ और कितनी क्रूर हंसी. 

अनेक सम्बन्ध किसलिए?

मन डेविएशन की सीमा के पार उसकी तरफ कूद जाना चाहता है. वह जो उसका प्रिय जगत है. संभव है कि उसमें उसके जीने के ढंग में ढला जा सके. उसके प्रिय जीवन बहाव में बनते-छीजते सम्बन्ध देखकर हो सकता है कोई नयी परिभाषा सीख सके. मन समझ सके कि जिस अनेक की छुअन के पीछे वह गतिमान है, उसका आनंद क्या है? मगर फिर ये नहीं होता. मन अपने ही एकांत से सुख पाते हुए लौट जाता है. मन के साथ दूर से एक आवाज़ लौट आती है. उसे जीने दो अनेकों के साथ. उससे प्रश्न न करो. उसकी प्रसन्नता के साक्षी बनो. 

मग से बाहर चाय के छलक जाने से कई लकीरें बन आई हैं. जैसे किसी रेगिस्तान पर किसी मटमैली नदी की स्मृति बची हो. जैसे कहीं दूर कोई कच्चा रास्ता दीखता हो. जैसे कि हर किसी के पास ऊब को किसी और रंग में रंगकर प्रस्तुत करने का हुनर होता है. जैसे हर कोई जानता है चले जाने  का ठीक-ठीक बहाना. 

केसी तुमने बिहारी को पढ़ा था न? याद करो- कोटि जतन कोऊ करै, परै न प्रकृतिहिं बीच.

[Sketch by Dario Moschetta]

January 7, 2016

दूसरी दुनिया का कोई फाहा, जाग के कंधे पर

बंद आँखों में
कभी-कभी
चहचहाती हैं नीली- धूसर चिड़ियाँ.
खुली आँखों में जैसे कभी बेवक्त चले आते हैं आंसू.

सुबहें तलवों के नीचे तक घुसकर गुदगुदी करती हैं. उजास का कारवां अपने चमकीले शामियाने के साथ तनकर खड़ा होता है. मैं जागता हूँ. घर में आवाजें आती हैं. रसोई से. पास के कमरों से. इन आवाज़ों में मेरी करवटें खो जाती हैं. बिस्तर के सामने की खिड़की पर पड़े हुए परदे से छनकर कुछ लकीरें उतरती हैं.

सफ़र में जो बरस जो गिर गए, उनकी बुझी हुई याद कमरे में भरी लगती है. क्यों होता है ऐसा कि जागते ही लगता है कहीं भटक गए थे, खो गए किसी रास्ते में या कुछ छूट गया है अधूरा सा. ये छूटा हुआ एक बेचैनी बुनता है. इसे पूरा कर भी नहीं सकते और इससे बच भी नहीं सकते.

कहीं ऐसा तो नहीं कि एक ही दुनिया में बसी हुई हैं अनेक दुनिया. हम इन दुनियाओं में आते-जाते रहते हैं. कई बार मन पीछे छूट जाता है. कई बार दूसरी दुनिया में जो काम कर रहे थे, उनकी स्मृति, उनका अधूरापन, उनसे बिछड़ने की तकलीफ़ साथ चली आती है. फिर किसी नींद में हम उसी दुनिया में दाख़िल हो जाते हैं.

ये सिलसिला खत्म नहीं होता.

दिल की दीवारें
पहनती रहती हैं दरारें.

अँधेरा और उदासी
चुप झांकते हैं इन दरारों से
और लिपट कर सो जाते हैं.

मगर ज़रूरी बात इतनी सी है कि
तुम आना मोहोब्बत की तरह
और विदा होना दुःख की मानिंद.

उलटे चलते हुए. पीछे की कोई बात दिखाई देती है. कोई एक पुराना रंग उतरा हुआ संकेत का पत्थर दिखाई देता है. ये उस वक़्त की बात है. वह वक़्त बीत चुका है मगर उसकी तकलीफ़ अब तक क्यों नहीं बीती? क्या कुछ चीज़ों की उम्र बीत जाने के बाद भी बची रहती है. जो मोहोब्बत की तरह आया था, उसका जाना नहीं होना चाहिए. वह जीवन ही है जो मोहोब्बत की तरह आता है. उसी की विदा का मुसलसल गीत कितने पतझड़ों तक समूहगान की तरह घेरे रहेगा. वसंत में कहाँ छुप जायेगा?

पिछले बरस की आखिरी शाम की दुआ थी- नए साल में पुराने दुखों को साथ लिए चलो, नए दुःख जाने कैसे निकलें? 

ज़िन्दगी ने फिर आवाज़ दी- "केसी, मेरे पीछे आओ." सन-सन की आवाज़ के साथ रेत झरने लगी. आवाज़ ने फिर सावधान किया- “पीछे देखना मना है.” सम्मोहनों की राख़ गिर रही है. रास्ता जो पीछे छूट गया है, वह हलके स्याह रंग से भर गया है. मैं पीछे मुड़कर देखे बिना ये सब देखता हूँ. ज़िन्दगी आगे बढती जाती है. जिसे नहीं देखना है वह सब दिखाई देता है.

कोई दवा है?



दो सूखे पत्ते नम मिट्टी में

एक रोज़ कोई कोंपल खिली जैसे नज़र फेरते ही किसी ने बटुआ पार कर लिया हो। एक रोज़ उससे मिला। फिर उससे ऐसे बिछड़ा जैसे खाली बटुए को किसी ने उदासी ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.