May 29, 2016

लगा लो होठों से

इतनी कसमें न खाओ घबराकर 
जाओ हम एतबार करते हैं.

उस आखिरी कश में क्या होता है? अक्सर मैं मांग लेता हूँ. उसने शेयर करना जाने कब का छोड़ दिया होगा कि देने से पहले एक सवालिया निगाह उठती है. उसने ज़रा सा जाने क्या सोचकर अपनी अंगुलियाँ आगे कर दी.
यही कोना है, मेरा. ऐसा सुनते हुए मैं उसकी अँगुलियों से आखिरी कश चुन लेता हूँ. क्या उसके लबों को छूकर ठहरी चीज़ें बेशकीमती हो जाती हैं. हो ही जाती होंगी कि मैं अपनी नादानी पर चुप रखे हुए धुएं को रोशनदान से बाहर जाते हुए देखता हूँ.
आह ! किस चीज़ को किस चीज़ से मिला रहा हूँ मैं. 

कभी किसी परिंदे का मन भी उस बाग़ से भी उठ जाता होगा. जिस बाग़ से सुकून और अपनेपन की आस रहती थी. कई बार वे रास्ते भी फीके लगते हैं, जिनपर चलते हुए वक़्त जाने कहाँ चला जाता था. कई बार खिड़कियाँ वहीँ रहती हैं मगर बाहर के सब दृश्य गुम हो जाते हैं. कई बार हम वो नहीं होते जो कभी थे. 
इसी होने और बदल जाने के बीच, अतीत को धन्यवाद. 
अगर वह सबकुछ न जीया होता. तकलीफें हिस्से न आई होती. वो बना ही रहता अपने आवरणों के भीतर और सजा आगे खींचती ही जाती. तो क्या कर सकते थे. उस रोज़ धूप ज्यादा थी मगर लगी नहीं. इसलिए कि कड़ी तपिश से बाहर आ जाने पर कुछ चीज़ें आसान लगने लगती हैं. असल में खुले पाँव और खुली आत्मा हज़ार अनचाहे हाल बरदाश्त कर सकते हैं.  और आप एक सूने अनजाने रास्ते पर आगे बढ़ सकते हैं. कहीं जाने का तय न हो. कहीं कोई न हो, तब भी. 
फिर मैं उसी तलब से घिरता हूँ इसे लिखते हुए. हाँ वही धुंआ.रुखसारों को चूमता. आँखों में चुभता. खिड़की के रास्ते बाहर जाता हुआ धुंआ. एक शाम के अहसास का धुंआ. कि इस वक़्त यहाँ की सीली ठंडक में ज़रा सी तपिश घुली है. ये तरतीब से रखी चीज़ें और इनके सामने खड़ी हुई बेतरतीब ज़िन्दगी. 

लगा लो होठों से, ये एक हसरत है. शुक्रिया. 

May 25, 2016

पार्टनर तुम आबाद रहो.

मिर्ज़ा ग़ालिब की वो बात याद है न? कहते थे नौकर नहीं हूँ मैं. 

मैं सोचता हूँ कोई तो कुछ वजीफे छोड़ जाता हिस्से में कि कहानियां कहते, तनहा रहते, फाकों की चिंता न होती. हर महीने रूपया घर आ जाता. मन मुस्कराता है. ऐसा कहाँ होता है. मैं तो जहाँ से याद कर पाता हूँ वहां से जीवन जीने को नौकरी करने की ही चिंता दिखाई देती है. बड़े नौकर, छोटे नौकर और मंझले नौकर मगर पक्के सरकारी नौकर. यही नौकरी सुख की नांव है. 

सुख ने सही वक़्त से पहले ही गलबहिंयाँ डाल दी थी. उसे पता था नाज़ुक दिल आदमी है ख़ुद को सता लेगा मगर कोई छल-प्रपंच न कर सकेगा. जियेगा, चाहे निचले दोयम हाल में ही जीना पड़े. कहीं किसी अख़बार में कुछ एक लेख लिखता. पुराने दुष्टों की झिडकियां सुनता रह न सकेगा इसलिए बार-बार नयी नौकरियों की ओर भागेगा. इस तरह का भागना इसे हताश करेगा. तो कुदरत और हालत ने बाईस साल की उम्र में रेडियो में बोलने की नौकरी पर लगा दिया. 

नौकरी का ख़याल कल दिन भर पार्टनर के कारण रहा. छोड़ दो नौकरी या रिटायर हो जाओ का हिसाब इसलिए नहीं जमता कि ये पार्टनर कि अपनी चीज़ है. उसपर कोई हुक्म चलाना या दखल देना बेजा है. इसलिए कड़ी धूप में नीम की छाँव तले एक दिन बिताना कोई बड़ी बात न थी. इस पर भी अगर आप उस कमरे के आगे खड़े हों जहाँ कभी दसवीं की कक्षा हुआ करती थी. बहार खड़े हुए भी अन्दर का सब हाल मालूम हो कि किस तरह ब्लैक बोर्ड है, किस दीवार पर क्या लिखा होगा अगर चूने की पुताई न हुई हो तो. 

सब कुछ बहुत पीछे छूट गया है. मालूम नहीं पीछे छूटा कहना ठीक है या खत्म होना. मगर अब नहीं है. शायद कहीं नहीं एक याद के सिवा. 

शाम छत पर खड़े हुए तेज़ हवा के झोंके भी पसीने को नहीं सुखा पा रहे थे. गली के छोर देखे, पास के घरों कि छतों पर बिखरे सामान और धूप को देखा. अचानक देखा कि एक चिड़िया किसी मुंडेर पर बैठी थी. रेगिस्तान की तेज़ आंधी में थोड़ी सी दूर जाने को चिड़िया दूर तक उड़ी। उसने हवा के साथ कई कलाबाजियां खाईं, कई गिरहें बुनी और आखिर पहुँच गयी पास की जगह पर।

उसे देख ख़याल आया कि प्रेम का भी यही हाल है।

[Image courtesy : ronbigelow.com]

May 24, 2016

एक जुगलबंदी को

कितनी ही दफा कितने ही मौसमों से गुज़र कर दिल भूल जाता है. कभी-कभी हवा, पानी, ज़मीं और आसमान के बीच किसी एक ख़याल की छुअन होती है. ये छुअन मौसम की तासीर को अपने रंग में ढाल लेती है. तल्ख़ हवा, तपिश भरी ज़मीं, उड़ चुका पानी और साफ़ या भरा आसमान सब बदल जाते हैं. 
कोई शहर किसलिए बुलाता है किसी को?

क्या कुछ कहीं छूट गया था? क्या कोई हिसाब बाकी था. क्या कोई नयी बात रखनी थी ज़िन्दगी की जेब में. फिर अचानक ख़याल आता है फटी जेबों और उद्दी सिलाई वाली जिंदगी के पास यादों के सिवा क्या बचेगा? अब तक यही हासिल है तो आगे भी...

पिछले सप्ताह के पहले दिन को मुकम्मल जी लेने के बाद एक लम्बी सांस आती है. याद से भरी सांस कि हाव यही वे लम्हे थे. दिल फिर उसी मौसम से गुजरता है. 

जबकि कुछ ही देर पहले गुज़रा हो कोई अंधड़ सूखी पत्तियों की बारिश लिए। बूंदें गिरती हो कम-कम। इतनी कि भीग जाएँ और भीगा भी न लगे। दुकानें पूरे शबाब पर हों मगर गिरे हुए हों शटर आधे-आधे। जब दो अलग तरह के प्याले रखे हों एक साथ जैसे कोई दो अलग वाद्य आ जुटे हों एक जुगलबंदी को। जब सर रखा हो उसकी गोद में और आवाज़ बरसती हो आहिस्ता मीठे सलीके से और बत्तियां बुझती जाए बार-बार मगर ज़िन्दगी फिर से।

उस सबके लिए शुक्रिया कहना मना हो मगर बार बार कहा जाये कि...

तुम न समझोगे। छोड़ो।

[Abstract photograph courtesy etsy.com]

May 20, 2016

कासे में भरा अँधेरा

“माँ, तुम मेरी चिंता करती हो. एक आदमी की प्रतीक्षा करती हो. एक मूरत पर विश्वास करती हो.”

रेहा के कहने का ढंग चुभ गया था या इस बात को माँ सुनना नहीं चाहती थी. उनका चेहरा कठोर हो आया था. “जो बातें समझ न आये वे नहीं करनी चाहिए”

“समझने के लिए ही पूछा है”

माँ कुछ नहीं कहती पहले रेहा की तरफ देखती है फिर दीवार के कोने में झाँकने लगती हैं. चेहरा स्थिर से जड़ होता जाता है. रेहा पास सरक कर माँ के कंधे पर अपनी हथेली रखती है. “बुरा न मानों माँ. ऐसे ही कई बार लगता है कि तुमसे पूछूं. तो आज पूछ लिया”

“तुम्हें मालूम है? तुम्हारी उम्र क्या है? इस साल तुम पंद्रह की हो जाओगी” 
“हाँ तो?”
“तो ये एक आदमी की प्रतीक्षा क्या होता है? कैसे बोलती हो?..”

रेहा ने माँ को कभी ऐसे नहीं सुना. वे शांत रहती हैं. उनका चेहरा ठहरा रहता है. उनके चेहरे की लकीरें, रंगत, फिक्र, ख़ुशी कभी नहीं बदलती. लेकिन उन्होंने चिढ कर कहा था. इस चिढ में दुःख भी था. उन्होंने अपने हाथ भी कुछ इस तरह उठाये जैसे जो बात शब्दों से न कही गयी उसे इशारे से कहना चाहती हों.

“माँ.” रेहा ने आहिस्ता से कहा. इसमें एक अर्ज़ भी थी कि दुखी न होइए.

“हम कैसे थे? ये समझ नहीं पाए थे. हमको वे चीज़ें समझने में वक़्त लेने की जगह सही वक़्त पर फैसले करने थे. जब तुम चौथे साल में तभी सब सब्र टूट गया था. मुझे मालूम हो गया था कि हम एक साथ रहने को नहीं बने हैं. मैंने ही उनसे कहा था कि हम एक ही छत के नीचे रह सकते हैं. उनको नहीं रहना था.”

“माँ क्या मैं पूछ लूँ कि ऐसा क्या था?”

“एक रोज़ सब मिट जाता है. बोलने में अपरिचय घुल जाता है. हम उसको सुनते हैं मगर लगता है कि शब्द ठंडे और ज़रूरत के हैं. छूने में वो बात नहीं होती. वो जिससे आपको लगे कि कोई आपका अपना है. वे इस तरह पास आते जैसे कोई काम था और... और हो गया...”

“क्या वे प्यार करते थे?”

“हाँ, अपनी सहूलियत का.”

“तो आपने क्यों नहीं किया?” रेहा माँ की आँखों में देखती है. “और मैं कहती हूँ कि किसकी प्रतीक्षा करती हैं तो इस तरह डांटने लगती हैं”

दो चिड़िया खिड़की के रास्ते उडती आई. छत पंखे का फेरा देकर परदे पर बैठ गयी. माँ ने चिड़ियाँ नहीं देखी. वे दीवार को देखती रही. रेहा ने चिड़ियाँ देखी. उनकी तेज़ बातें सुनी. फिर माँ की ओर मुंह करके बोली- “माँ बताओगी क्यों नहीं किया?”

“जिस दिन तन मिल जाता है उस दिन मन भर जाता है”

एक चिड़िया परदे के पास रखे मिट्टी के सांवले रंग के गुलदस्ते पर बैठी और वह गिर पड़ा. टूटे गुलदस्ते के कुछ टुकड़े रेहा के पाँव के पास आकर गिरे. कागज़ के फूलों से लदी टहनियां दरवाज़े के पास बिखरी गयी. बैंगनी और गुलाबी रंग एक साथ अच्छे दिख रहे थे. भले ही वे फर्श पर पड़े हुए थे.

[कागज़ के दो कप में स्ट्राबेरी फ्लेवर वाली आइसक्रीम- तीन]

तस्वीर सौजन्य : सुनयना खोत 

May 15, 2016

चल दिए सब चारागर



क़फ़स भी हो तो बन जाता है घर आहिस्ता-आहिस्ता

याद तो क्या है, रेगिस्तान के अंधड़ हैं. नहीं आते तो नहीं आते. आते हैं तो फिर नहीं रुकते. क्या सचमुच तीलियों के पीछे क़ैद कोई परिंदा पिंजरे को आहिस्ता-आहिस्ता अपना घर समझने लगता है?

रात दो पच्चीस पर नींद उचट गयी. आला किस्म की शराबें आहिस्ता चढ़ती हैं और आहिस्ता उतरती हैं. फिर ये नींद जो आहिस्ता आई थी जल्दी क्यों उचट गयी? नींद कमतर ही थी. क्या नींद को कोई नश्तर चुभता है. कौन जाग करके भाग जाता है. फ्रिज से पानी की बोतल लेकर पीने लगता हूँ. बहुत सारा पी लूँ कि पानी का नशा हो जाये. आँख फिर लगे.

मगर कुछ एक ख़याल गिरहें बन कर कस जाते हैं. कोई सिरा फटकार की तरह दिल पर बरसता है. उलटे-सीधे, दायें-बाएं हर करवट मगर कहीं कोई आराम नहीं. तभी याद आया कि एक दिन पिंजरा भी घर लगने लगता है. तो क्या हम सब दुखों और तकलीफों के आदि हो सकते हैं. क्या सचमुच? मैं आँख मूंदे हुए मुस्कुराता हूँ. कुछ हल्का सा लगता है. उसके पेट पर रखा अपना बायाँ हाथ हटा लेता हूँ. शायद बोझ हो गया होगा. कहीं उसकी नींद न उचट जाये.

सुबह की ठंडी हवा घर से होकर गुज़रती है. सोफ़ा से उठकर रसोई की ओर जाता हूँ. मैं कहता हूँ. क़मर जलालवी साहब की ग़ज़ल सुनोगी? वो नाश्ता बनाते हुए कहती है- हाँ. मैं उनको कब मेरा नशेमन अहल ए चमन सुनाता हूँ. कुछ क़दम रसोई से बाहर रखता हूँ और फिर लौटता हुआ कहता है एक दूसरी ग़ज़ल का शेर सुनो.

इलाही कौनसा वक़्त आ गया बीमार-ए-फुरक़त पर 
कि उठकर चल दिए सब चारागर आहिस्ता-आहिस्ता

May 13, 2016

जाने किसी और बात की

रेहा बहुत पीछे से याद करती है. उतना पीछे जहाँ से उसकी स्मृतियाँ शुरू होती हैं.

शाम का धुंधलका डूब रहा था. चौक की दीवार में एक आला था. बहुत नीचे. लगभग वहीँ जहाँ से दीवार उठती थी. एक छोटी मूरत थी. काले रंग के पत्थर पर सुन्दर चेहरा था. बंसी साफ़ न दिखाई देती थी मगर थी. मूरत के आगे घी की चिकनाई फैली हुई थी. मूरत के ऊपर दीपक की लौ से बनी स्याही थी. माँ धुंधलके के डूबने की प्रतीक्षा कर रही थी. अँधेरा बढ़ा तो एक कांपती हुई लौ दिखी. श्याम मूरत और आला कभी-कभी टिमटिमाहट की तरह दिखने लगे. माँ ने अपनी हथेलियाँ आहिस्ता से हटा लीं. मूरत पर टिकी आँखें पढना चाहती थी कि क्या ये लौ जलती रहेगी. एक बार माँ ने पीछे देखा. रेहा चौक के झूले पर बैठी हुई माँ की तरफ ही देख रही थी. माँ फिर मूरत को निहारने लगी. माँ मौन में कुछ कह रही थी. या वह प्रतीक्षा में थी कि कोई जवाब आएगा.

माँ रसोई से सब्जी की पतीली, रोटी रखने का कटोरदान, एक थाली, अचार का छोटा मर्तबान लेकर आई. रेहा झूले से उतरी और चटाई पर बैठ गयी. माँ मुस्कुराई. मगर इतनी कम कि ये न मुस्कुराने जैसा था. आले में दीया जल रहा था. मूरत ठहरी हुई थी. माँ ने एक बार फिर आले की तरफ देखा और थाली में साग रखा. माँ, रेहा को देखने लगी. जैसे पूछ रही हो हाथ धोये क्या? रेहा ने पलभर में अपनी हथेलियाँ दिखाईं. माँ उसकी नन्हीं हथेलियों को देखने लगी.

रेहा मुस्कुराने लगी.- “माँ हैं न एकदम साफ़?” 
“हाँ, अन्न ईश्वर का प्रसाद होता है. उसे साफ़ हाथों से ही छूना चाहिए.”
“देखो माँ, मैंने झूले पर बैठकर खाना छोड़ दिया. अब ईश्वर प्रसन्न रहेंगे. हमें उनके आसन से ऊपर नहीं बैठना चाहिए”
माँ मुस्कुराती है. रोटी का एक नन्हा सा टुकड़ा रेहा के मुंह में रखती है. 
रेहा उसे खाकर, भरे गले से कहती है- “नहीं माँ, मैं आप खाऊँगी” 
माँ रोटी को कोमलता से तोड़ती है. थाली में लगातार देखती है. साग को रेहा की तरफ सरकाती है. खुद हलकी मिर्ची वाली तरी में रोटी का टुकड़ा भिगोती है. 
“माँ ईश्वर सबकुछ देखते हैं? क्या वे हमको खाना खाते हुए भी?”
“हाँ. मगर पहले खाना खाओ हम बाद में बात करेंगे” 
रेहा धीरे-धीरे खाती है. माँ उसका साथ देती है. इसी तरह धीरे-धीरे.

माँ रेहा को अपने पास सुलाती है. इस तरह जैसे सबकुछ खो गया हो और यही आखिरी चीज़ उनके पास बची हो. रेहा के सर को चूमती है. उसको अपनी बांह में इस तरह छुपाती है कि रेहा के दोनों गाल माँ की बांह को दोनों तरफ से छूने लगते हैं.

“माँ”
“हूँ”
“क्या ईश्वर सबको खाना खाते हुए देखते हैं?”
“हाँ”
“माँ क्या इससे ईश्वर को प्रसन्नता होती है”
“हाँ”
“माँ क्या जब कोई खाना नहीं खाता उसे भी ईश्वर देखते हैं”

माँ चुप हो जाती है. वह कुछ देर सोचती है. छत में एक लकीर बन आई है. एक दरार है. जैसे कोई पतला धागा बेढब चिपका हुआ हो.

रेहा अपना सर उठाती है. माँ का चेहरा देखती है. वह अपनी दोनों हथेलियों से माँ के गालों को छूती है. अपने होठों से माँ को चूमती है.

रेहा की सुंदर छोटी आँखों में झांकते हुए माँ कहती है- “ईश्वर सबको देखता है. जब हम अच्छे काम करते हैं और जब बुरे काम करते हैं”
“हम बुरे काम क्यों करते हैं?”
“हमारा मन बहक जाता है, इसलिए हम बुरे काम करने लगते हैं”
“मन कैसे बहकता है?”
“जैसे प्याली में रखा हुआ पानी लुढ़क जाये.”
“और अगर मटका लुढक जाये तो?”
माँ रेहा को बाहों में भर लेती है. 
“जब हम बुरे काम करते हैं तब हमारा जीवन नष्ट हो जाता है. ठीक वैसे जैसे मटका लुढ़क जाये”
रेहा की आँखें कुछ और पूछती हैं. माँ कहती है- “अब सो जाओ” 
रेहा मन्द चहकती है- “ईश्वर को थेंक्यु बोलकर”

रेहा उनींदी स्वप्न देखती है. उसके मिट्टी के घोड़े की टांग टूट गयी है. वह उसे जोड़ना चाहती है. वह नहीं जुड़ती. भुरभुरी मिट्टी और ज्यादा गिरने लगती है. ईश्वर देख रहे हैं। वे कुछ नहीं करते. रेहा घोड़े को हथेलियों में रखती है. उसे रोना आता है. स्वप्न देखते हुए वह रोने लगती है. माँ रेहा को अपने निकट लेती है. उसके सर पर हाथ फेरती है. अपनी अंगुलियाँ उसके बालों में घुमाती है.

“क्या हुआ रेहा?”
अधखुली आँखों से रेहा माँ को देखती है. 
“क्या हुआ बेटा”
“माँ क्या ईश्वर घोड़े की टांग सही कर देंगे?”
माँ अपलक चुप देखती है. 
“ईश्वर ने घोड़े की टांग क्यों टूटने दी?”
“घोड़े ने कुछ गलत काम किया होगा. ईश्वर सबसे प्रेम करते हैं। वे किसी की टांग नहीं तोड़ते. घोड़े को उसके पाप का ही दंड मिला होगा.” 
रेहा नींद में खो जाती है.

अचानक माँ सोचने लगती है. ये छत की दरार किस बात का दंड है. क्या रेहा के पापा इस वक़्त जाग रहे होंगे? माँ जीवन के प्याले में रखे अपने मन तरल को लुढकने से सम्भालती है. ईश्वर का धन्यवाद करते हुए आँखें मूंदकर प्रतीक्षा करती है.

नींद की या जाने किसी और बात की...

[कागज़ के दो कप में स्ट्राबेरी फ्लेवर वाली आइसक्रीम- दो ]

May 12, 2016

केसी, क्या हो तुम?



एक लम्हा आता है, आह सुबह के काम पूरे हुए।

फिर?

फिर सम्मोहन की डोर एक खास जगह खींच लेती है। खिड़की, मुंडेर, कुर्सी या कोई कोना एक बिस्तर का। कोई गली में सूनी झांक, कोई किताब का पन्ना या टीवी पर कहीं से भी कुछ देखना।

मगर वह चुप लबों, ठहरी आँखों और खोये मन में ढल जाती। वह अतीत के उस सिरे तक जाती जहाँ वह पिछली फुरसत में थी। जब उसे रोज़मर्रा के कामों ने बुला लिया था।

मालूम है? जीवन को पीछे की तरफ देखने पर वह दूर तक फैला हुआ दिखाई देता है। वह उसी अतीत को पढ़ते जाने को पूरा करना चाहती थी। जैसे कोई आखिरी सीढ़ी पर खड़ा हो कब से इस इंतज़ार में कि ज़िन्दगी का पाँव फिसल जाए।

कहानियां उतना नहीं रुला पाती जितना ज़िन्दगी।

मगर मैं लिखता हूँ। सोचता हूँ मन हल्का होगा, न हुआ तो कुछ कहानियां अगले बरस किताब आने जितनी हो जाएँगी। लोग पढ़ेंगे, उदास होंगे और कहेंगे केसी, क्या हो तुम?

May 7, 2016

दिल उदास तो नहीं मगर



मैं दफ्तर की कुर्सी पर बैठा हुआ उकता गया था। मैंने कुछ काम किया, कुछ फोन देखा और फिर स्टूडियो से बाहर इस घने पेड़ की छाँव में चला आया। ये पेड़ जाल का है मगर बोगनवेलिया भी इसके साथ-साथ बढ़ा था। अब दोनों प्रेमपाश में इस तरह गुंथे है कि दोनों को अलग करके नहीं देखा जा सकता। अब गहरा हरा और गुलाबी रंग एक साथ मुस्कुराते हैं।

दीवार के पास रेडियो कॉलोनी का रास्ता है वहीँ छोटी लड़कियों की चहचाहट सुनाई देने लगी। बारह बज रहे होंगे और स्कूल जा रही होंगी। एक ने शिकायत की- "तुम आई नहीं" दूसरी ने उसकी शिकायत को काटते हुए कहा- "मैं सबके लिए करती हूँ, मेरे लिए कोई कुछ नहीं करता" वे तीनों एक साथ चुप हो गयीं। शायद तीनों इस बात से सहमत थीं।

मैंने किसी के लिए कुछ नहीं किया इसलिए असहमति में फोन खोजने लगा कि वह किस जेब में रखा है। सामने दफ्तर के लोग दिखाई दिए। इस साफ़ धूप में वे अच्छे दिख रहे थे। सोचा तस्वीर उतार लूँ। तस्वीर को देखा तो ख़याल आया कि इस रेगिस्तान में भी इंसान का जीवट कैसी हरियाली बना लेता है।

वैसे बात ये थी कि आज धूप के साथ उमस भी है। दिल उदास तो नहीं मगर ऊब से भरा है। कुछ याद आते ही लगता है कि

जाने दो।

May 5, 2016

तुम पुकारना


तुम जब मिले उस साल बारिशें बेढब हुई थी. तुम जब गए थे, सड़कों पर बिछा स्याह कोलतार पिघल गया था. उसके बाद दूर तक कोई आवाज़ नहीं आती थी. अलाव तापते हुए लोग कम्बलों में ढके हुए रहते थे. उन्हें देखकर लगता था दुनिया ने स्वैच्छिक सेवानिवृति ले ली थी.

मौसमों का क्या है? वे हर रंग में आते हैं. मगर याद सिर्फ वे रहे जिनमें तुम्हारी कोई बात थी.

मुझे कई बार लगता है कि मेरे हाथ में कोई एक कलम है. फिर मैं बेहिसाब मुस्कुराता हूँ कि वह कलम कोई काम नहीं आती. मैं सिर्फ प्रेम करना जानता हूँ. लिखना क्या चीज़ है ईश्वर जाने. हाँ जिस रोज़ तुम मेरी बाहों से गुज़रोगे. मैं ठीक-ठीक पढ़ लूँगा तुम्हे जैसे दीवारों पर लिखी हुई बारिशें पढता हूँ.

तुम पुकारना- केसी. ये सुनकर मैं भले न रुकूँ मगर ठिठक ज़रूर जाता हूँ.

तस्वीर सौजन्य : सुप्रतिम दास फ़ोटोग्राफ़ी

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.