March 24, 2017

और फिर कहीं खो गए.



दीवार का सहारा लिए
उंघती चारपाइयाँ.

आँगन पर बुझी-बुझी
चादर एक छींट की.

जैसे हम तुम मिले थे
और फिर कहीं खो गए.
* * *

वो उसकी भीगी आवाज़ थी
कि पानी की ख़ुशबू थी, रेगिस्तान में.

और ये
ज़िन्दगी है कि कुछ सूखे हुए कतरे हैं, याद के.

* * *

उदासी जाने किस बात पर ज़िन्दा रहती है. जिन बरसों में बहुत प्रेम था. बहुत कल्पनाएँ थीं. उसी में डूबे हुए दिन-रात गुज़र जाते थे. जैसे बचपन में रेल के पहियों के बीच से रौशनी दिखा करती थी. दिप-दिप-दिप. पहिये तेज़ी से घूमते जाते और आँखें रेल के गुजरने तक इसी जादू को देखते जाना चाहती. रेल के पहियों से लेकर मादक बाहों में खोये रहने तक के, प्रेम के दिनों में बेहद उदासी थी. उन बरसों के दिनों को मैंने अपनी डायरी के हर पन्ने पर उदास पाया.

इन दिनों मन हर ऐसी बात से बेपरवाह है. थोड़ा-थोड़ा बच्चों के बारे में सोचता है. थोड़ा ख़ुद से कहता है- "समय के फूल हैं, समय के हवाले रखो" चिंता नहीं करता. मदद करता हूँ, प्यार करता हूँ.

बस एक ही बात है कि उदासी के दिनों में लिखने का खूब मन हुआ करता था. जो इन दिनों नहीं है.

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.